Saturday, 6 July 2019

सभी रोग मन से पैदा होते हैं


प्रश्न- 7 मार्च के बाद पहली बार 5 मई की रात को स्वप्नदोष Nightfall  हुआ। 5 मई के बाद से किसी भी काम मे मन नही लग रहा है कोई भी काम के लिए अपने आप को कमजोर महसूस कर रहा हुं सिर्फ सोने का मन  हो रहा है और अधिक सो भी रहा हुं। बेहोशी मे डूब रहा हुं जैसे बाथरूम लगनी भी बन्द हो गयी है  48 घंटो मे एक बार लगती है उसमे भी कॉफी जोर लगाना पडता है और अच्छे से पेट साफ नही होता है। मानसिक रुप से कॉफी तनाव भरा रहता हुं। शांति नही मिल रही अब जो पहले मिल रही थी।
जवाब- ‘मन’ एक रोग है, और सभी रोग मन से पैदा होते हैं| आपका ‘मन’ स्वास्थ्य को बीमारी बना रहा है| ‘स्वप्नदोष’ होना शुभ लक्षण है| स्वप्नदोष शुभ का सूचक है| इस का अर्थ हुआ कि अब शरीर प्राकृतिक तरीके से प्रतिक्रिया दे रहा है| इसको चिंता का विषय मत बनाइये| आपको स्वप्नदोष जल्दी हो गया| आमतौर पर लोगों को इतनी जल्दी नहीं होता है, इसका मतलब है कि ज्यादा हानि नहीं हुई थी| ठीक से तीन महीना भी नहीं हुआ, और शरीर प्रतिक्रिया करने लगा| यह बहुत शुभ संकेत है| किसी-किसी को 6 महीने से साल भर का वक़्त लग जाता है, स्वप्नदोष होने में| जब हम पोर्न देखना और हस्तमैथुन करना बंद कर देते हैं, तब स्वप्नदोष से ही यह पता चलता है कि शरीर पूरी तरीके से स्वस्थ्य हुआ या नहीं| आपकी रिकवरी हो गया है| स्वप्नदोष का सिर्फ इतना अर्थ है कि आपका शरीर नेचुरल सेक्स लाइफ जीने के लिए तैयार हो गया हैं|
किसी काम में मन न लगना और कमज़ोर महसूस करने का कोई भी संबंध स्वप्नदोष से नहीं है| यह आपकी इस पुरानी धार्मिक धारणा की वजह से हो रहा है कि ‘वीर्य’ निकलने से शक्ति का नाश होता है| ‘काम में मन ना लगना, और कमज़ोर महसूस करना’ मानसिक समस्या है| वीर्य निकलने से, और वो भी स्वप्नदोष के माध्यम से, किसी भी प्रकार की कमजोरी होने का कोई कारण नहीं है| अगर आप हस्तमैथुन नहीं करते हैं, तो महीने में एक-से-चार बार स्वप्नदोष होना बिलकुल स्वाभाविक है| स्वस्थ्य शरीर का लक्षण है| ‘
बाथरूम न लगना और पेट खाली ना होने के कुछ प्रैक्टिकल और कुछ मानसिक कारण हो सकते हैं| पेट हमारे मन से बहुत ज्यादा प्रभावित होगा है| पेट की 70 फीसदी समस्या मानसिक होती है| इसीलिए खाना खाते समय खाने को प्रेम-शांति व धर्यपूर्वक ग्रहण कीजिए| हड़बड़ी में जल्दी-जल्दी मत खाइए| गर्मी का समय है दिन में 4 लीटर तक पानी पीजिए| ज्यादा चिंता करने और तनाव की वजह से भी पेट अस्तव्यस्त हो जाता है| तो, इस बात का ठीक से अवलोकन कीजिए कि कारण मानसिक है या शारीरिक| अगर मानसिक है तो चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं है, जैसे मन ठीक होगा, पेट ठीक हो जाएगा| लेकिन यदि शारीरिक है, खान-पान में या भी किसी अन्य प्रकार की गड़बड़ी के कारण ऐसा हो रहा है, तो एक बार चिकित्सक से संपर्क कर लीजिए|
याद रखिए शांति कभी भी मांगने और प्रयास से नहीं मिलती है| अशांति का सदा एक ही कारण होता है ‘अस्वीकार’, और शांति का सदा एक ही मार्ग है ‘सर्व-स्वीकार’| अगर शांति नहीं मिल रही है तो इस बात को स्वीकार लीजिए कि ‘मैं अभी अशांत हूँ, और मुझे शांति नहीं मिल रही है’| समस्या ‘अशांति’ नहीं है, असली समस्या ‘अशांति’ की अस्वीकृति है| जितना आप अशांति से लड़ेंगे और और शांत होने की कोशिश करेंगे, उतनी अशांति बढ़ती जाएगी|
शांति नही मिल रही अब जो पहले मिल रही थी।“ यह कौन पहले जैसी शान्ति की मांग कर रहा है? यह कौन कह रहा है कि अब पहले जैसी शान्ति नहीं मिल रही है? जो यह कह रहा है वह ‘लोभ’ है| अपने लोभ को समझये| ‘लोभ’ और मोह सभी बिमारियों की जड़ है| जो भी बहार भीतर घटित हो रहा है उसके साक्षी बनीये, बस उसे दिखिए| घटना को अच्छे-बुरे में मत बाँटिये, और यदि पुरानी आदतवश मन ऐसा करता भी है, तो उसके भी साक्षी बनिये कि ‘मन व्याख्या कर रहा है’|
तथ्य यानि ‘फैक्ट’ के साथ जीना शुरू कीजिए- बुद्ध का शब्द है ‘यथाभूतं’ इसका अर्थ है, ‘जो जैसा है, उसको वैसे ही देखना, किसी भी चीज़ की व्याख्या नहीं करना’| ‘फैक्ट’ बस इतना है कि आपको स्वप्नदोष हुआ- अगर आप सिर्फ ‘फैक्ट के साथ बने रहते तो, ये तो मन न लगना और कमजोरी महसूस हो रहा है, ऐसा कुछ भी नहीं होता| लेकिन आपने मन ने व्याख्या कर लिया होगा, “बाप रे स्वप्नदोष हो गया, वीर्य का नाश हो गया”| इसी व्याख्या से गड़बड़ी होनी शुरू हो गई| इस शब्द ‘स्वप्न-दोष’ में ही खोट है, ‘दोष’ ‘शब्द’ को सुनकर ऐसा लगता है कि कुछ गलत हो गया| यह शब्द ठीक नहीं है| मेरे हिसाब से इसे स्वप्नदोष ना कह कर ‘स्वप्नसुख’ कहना चाहिए| यह मत कहिये कि 5 को स्वप्नदोष हुआ, कहिए कि ’5 मई को सपने में संभोग का सुख मिला’, फिर दिखिए कैसा महसूस होगा है| तक्षण आप आनंद से भर जाएँगे|

इस जगत में ‘सही’ और ‘गलत’ जैसा कुछ भी नहीं होता है| यह जगत घटनाओं की प्रवाह है| हर घटना की व्याख्या सही/गलत के तौर पर की जा सकती है| और सारी व्याख्या नासमझी से पैदा होती है| व्याख्या करने की नासमझी से बचिए और निरपेक्ष हो कर तथ्य का अवलोकन कीजिए| ‘’शरीर’ में जो उर्जा पैदा हो रहा है, उसका किसी सार्थक काम में इस्तेमाल कीजिए| पेड़ लगाइए, योग कीजिए, बच्चों के साथ खेलिए, आवारा जानवर और कुत्तों को खिलाइए, पंछी को पानी पिलाइए, हंसिये, कविता लिखिए, गीत गाइए, नृत्य कीजिए, भजन कीजिए- कुछ मंगल कीजिए| व्यर्थ के विचारों को अपने भीतर जगह मत दीजिए| हमारे 90 फीसदी विचार नकारात्मक होते हैं| फिजूल के बातों में समय मत खर्च कीजिए| ‘कब बुद्धत्व घटेगा, कब मैं पानी पर चलने लगूंगा, कब लोग मुझसे प्रभावित होने लगेंगे, कब मेरे हाथ राख और फूल निकलने लगेंगे...’ इस तरह की नासमझियों से बचिए...हल्के-फुल्के होइए...! हंसिये, खेलिए और ध्यान कीजिए..बाबा गोरखनाथ का वचन याद रखिए ‘हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानं’| धार्मिक गंभीरता इस जगत का सबसे बड़ा रोग, उस रोग से बचिए| ‘मैं पागल हो जाऊंगा, मैं परेशान हूँ, इस तरह के शब्द आत्म-सम्मोहन पैदा करते हैं| ऐसा कभी मंत बोलीये| मन मेगनिफाइंग ग्लास है, सादा सब चीज़ों को बड़ा करके देखता है| मन के जालों के प्रति जागिये|
मन किसी भी कृत्य को करने से पहले नफा-नुकसान के बारे में सोचने लगता है| मन स्वभाव से बनिया है| इसीलिए जब तक ‘मन’ की मालकियत रहेगी.. जीवन गंभीर रहेगा| और गंभीरता रोग है| मन हर चीज़ को समस्या बना देता है| अगर शांति आती है, तो मन इस बात की चिंता करने लगता है कि कहीं यह खो तो नहीं जाएगी, कहीं यह नकली शान्ति तो नहीं है, कहीं यह सब मेरा भ्रम तो नहीं है| और जब शांति चली जाती है, तो मन फिर से उसे पाने के लिए विकल होने लगता है| मन के इस पागलपन के प्रति जागिये|
बेहोशी मे डूब रहा हुं”  अगर आपको सच में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप बेहोशी में डूब रहे हैं, तो सुभ संकेत है| जब जीवन में होश की पहली किरण उतरती है तो साधक अपने ‘बेहोशी का ही पता चलता है’| ‘मैं बेहोश हूँ, मैं बेहोशी में डूब रहा हूँ,’ होश की पहली किरण है| ‘बेहोशी का पता चलना होश का लक्षण है| ‘मैं होश में हूँ, मैं जाग रहा हूँ’, ऐसा सिर्फ अज्ञानी कहता है| ज्ञानी कभी भी अपने होश की घोषणा नहीं कर्ता है| वह सदा यही कहता है कि ‘मैं बेहोश हूँ’| जिसको अपनी बेहोशी का पता चल गया वह अब ज्यदा देर होश से वंचित नहीं रह सकता है| जिसे यह पता चल गया कि ‘मैं नींद में हूँ’, समझिये वह जाग गया| ‘मैं नींद में हूँ’ यह जागरण का लक्ष्ण है|
सिर्फ सोने का मन  हो रहा है”, तो सोइये, कोई रोक रहा क्या आपको सोने से? लाखों लोग हैं जिनको नींद नहीं आती है, गोली लेकर सोते हैं| आप धन्यभागी हैं कि आपको नींद आती है| परमात्मा के प्रति अहोभाव प्रगट कीजिए|
“बाथरूम लगनी भी बन्द हो गयी है  48 घंटो मे एक बार लगती है” खान-पान में सुधार लाइए, और फिर भी यह समस्या बनी रहती है तो डॉक्टर से संपर्क कीजिए| इसका स्वप्नदोष होने, हस्तमैथुन ना करने, और पोर्न ना देखने से कोई संबंध नहीं है| हो सकता है कोई छोटी-मोटी शारीरिक परेशानी हो, तो ऐसे में आप एक चिकित्सक से परामर्श ले सकते हैं| सुबह, किसी योग कुशल योगाचार्य की देख रेख में, 40 मिनट योग और 15 मिनट प्राणायाम ( अनुलोम-विलोम)करना शुरू कर दीजिए|

1 comment:

  1. प्रेम शिवम19 July 2025 at 21:34

    काश यह पोस्ट उसी समय मिल जाता...क्या मन फिर ऐक्टिव हो गया?.&%thanks osho..

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