दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ का एल्बम है 'The sounds of India', रवि शंकर अभी भारतीय संगीत के बारे में मोटी-मोटी बातें बता रहे हैं। डोलते हुए पर्दे के ओट से लुकछिप करती हुई धूप मेरे टेबल पर कभी आती है, कभी छिप जाती है। आज थोड़ी अभी नींद आ रही है। इन दिनों बेड रूम में घड़ी ले जाना भी बंद कर दिया है, इसलिए सुबह बिना समय देखे ही जब ही आँखें खुल जाए बिस्तर छोड़ देता हूँ। आज पौने पाँच में ही उठ गया था। इसीलिए अभी आँखें थोड़ी बोझिल है।
संगीत, धूप, फ़िल्टर कॉफ़ी, खिड़की के बाहर की हरियाली, और सामने खुला ब्लॉग का राइटिंग विंडो, तैयारी तो पूरी है, लेकिन लिखूँगा क्या? अल्लाह जानता है। आह!! क्या बजा रहे हैं रवि शंकर! अभी दूसरा ट्रैक बज रहा है 'Maru Bihag', ११ मिनट का यह धुन एकदम ताज़ा कर देती है आपको। नेक्स्ट भीमपालसी है, मेरा सबसे पसंदीदा राग। जयातीर्थ मेवुंडी का जा जा रे अपने मंदिरवा कोई सौ बार सुना होगा, आज सुबह भी योग के बाद सुना था, I can never get enough of this raag. अगर आपने नहीं सुना है तो एकबार यूट्यूब पर ज़रूर सुनिए। सुनिए ही। आपके आसपास की हवा बदल जाएगी।
ओ-हो!! रवि शंकर जान लिए जाते हैं, आह! क्या लिखूँ, आँखें खुल ही नहीं रही है, बंद आँखों से टाइप कर रहा हूँ। ल्लिलाह!!!
बड़े दिनों बाद आज कव्वे की आवाज़ सुन रहा हूँ। इधर मेहसाणा में कव्वे बहुत नहीं दिखते हैं। सिंधी भैरवी बजा रहे हैं रवि शंकर। यह अंतिम ट्रैक है। भीमपालसी के बाद से मेरा दिमाग़ रुक-सा गया है। अब यह नशा दो तीन दिन तक नहीं उतरेगा। भगवान से एक शेर सुना था,
"सज़ा का हाल सुनाएँ जज़ा की बात करें
ख़ुदा मिला हो जिन्हें वो ख़ुदा की बात करें"
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