16-07-2019, 17:25
कुछ महीने पहले (पिछले साल अक्टूबर में) जब मेरा बोधगया जाना हुआ था, तब वहाँ रह रहे अपने एक परिचित से मिलने मैं उनके
घर गया था। काफ़ी दिनों से फ़ोन करके वो मुझसे मिलने आने को कह रहे थे। मेरा भी बोधगया
जाने का सालों से मन था, हर साल प्लान बनाता
था, लेकिन किसी-न-किसी कारण से प्लान रद्द हो जाता था। लेकिन इस बार, बहुत ही आश्चर्यजनक संयोग के कारण बोधगया जाना संभव हो पाया। बौधगया पहुँचने से
पहले मैंने अपने मित्र को कॉल किया, मेरे आने की ख़बर सुनकर ख़ुशी के मारे वे अपना पोन पीटने लगे। “कहाँ पर रुकेंगे?”, फ़ोन के उस ओर से उनकी आवाज़ आई। ‘बोधिवृक्ष के आसपास कहीं रुकूँगा’,
मैंने उनसे कहा। “संडे तक तो रुकेंगे ना?”, उन्होंने पुछा| मैंने कहा, ‘जी हाँ रुकेंगे।‘ (यह ग़ौर-ए-तलब है कि उन्होंने एक बार भी मुझे अपने यहाँ रुकने
को नही कहा, औपचारिकरूप से भी नहीं।) “तो, आइये फिर संडे को, मैं घर पर ही रहूँगा, मेरा घर बोधिवृक्ष से बस चार किलोमीटर
की दूरी पर है|”, फिर फ़ोन के उस तरफ़
से उनकी आवाज़ आई। फ़ोन पर बात करने के थोड़ी देर बाद मेरे मोबाइल पर उनका एक मेसेज
आया जिसमें उन्होंने अपना पता लिखकर भेजा था।
संडे को मिलने जाने से पहले मैंने गूगल मैप पर उनका ऐड्रेस डालकर देखा। मेरे करंट
लोकेशन, जो बोधिवृक्ष से 300 मीटर
की दूरी पर था, से उनका घर सिर्फ़
दो किलोमीटर की दूरी पर बता रहा था। मुझे बड़ी हैरानी हुई क्योंकि उस दिन उन्होंने
बताया था कि उनका घर मंदिर से चार किलोमीटर की दूरी पर है| मैंने सोचा हो सकता है,
सुनने में मुझसे भूल हो गई हो|
होटल से बाहर निकलकर मैंने एक ऑटो को हाथ दिया| ऑटोवाले ने ठीक मेरे पैर के
पास आकर ऑटो रोका| पता बताकर जब मैंने भाड़ा पूछा, तो उसने 60 रुपया बतया| “दो
किलोमीटर का साठ रुपया किस हिसाब से हो गया भाई?”, थोड़ा चौंकते हुए मैंने
उससे पूछा| “बात दूरी का नहीं है भाई जी, अभी उधर ढेर जाम होता है, कम-से-कम
20 से 30 मिनट लग जाएगा वहां पहुँचने में”, पान का पीक सकड़ पर फेकते हुए
वह मुझसे बोला| उसकी ‘ढेर जाम’ वाली बात सुनकर मैं मुस्कुराने लगा| मुझे अपने
मुंबई निवास के वे दिन याद आ गए, जब मैं अँधेरी में पटना के तीन लड़कों के साथ रह
रहा था| उनकी पटनिया भाषा सुनने में मुझे बड़ा मजा आता था| अपने सुनहरे दिनों को
याद करते हुए, मैं ऑटो में बैठ गया| ‘ठीक है चलो पचास ले लेना’, बैठते हुए
मैंने उससे कहा| “आप से बेसी भाड़ा नहीं मांग रहे हैं भाई जी, जितना उचित है
उतना ही आपसे बोले हैं|”, गाड़ी बढ़ाते हुए वह बोला|
30 मिनट तो नहीं लेकिन 20 मिनट जरूर लग गया पहुँचने में| ऑटो से उतरकर मैंने एक
सौ का नोट निकालकर ऑटोवाले को दिया, उसने मुझे 40 रुपया वापिस किया| रूपया वापिस
लेते हुए मैंने उसके मुंह को गौर से देखा, हल्की दाढ़ी पर चंद्रशेखर आज़ाद टाइप
मूंछ में वह ऑटो ड्राइवर कम विदूषक ज्यादा लग रहा था| जहाँ मैं ऑटो से उतरा वही
रोड किनारे एक पान की दूकान थी| मैंने अपने जेब से मोबाइल निकाला और पता देखकर
दूकानदार से पते के बारे में पूछा| “सामने वाली गली में तीसरा मकान ओझा जी का है”,
पान पर चूना लगते हुए, दूकानदार ने मुझसे कहा| ऑटो ड्राईवर की तरह दूकानदार का
मुंह भी पान के थूक से भरा हुआ था, बड़ी मुश्किल से वह बोल पा रहा था| इसकी मूंछ और
शक्ल-ओ-सूरत तारक मेहता के पत्रकार पोपटलाल जैसी थी|
रोड पार करके मैं गली में पहुंचा| पहला मकान किसी राय जी का था, दूसरे मकान के बाहर लगे नेम प्लेट पर ‘एडवोकेट सुमन यादव’ लिखा हुआ था, और तीसरे मकान के बाहर लगे बोर्ड पर लिखा था, “आनंद निवास, कृष्ण मोहन ओझा’ (बदला हुआ नाम)” यह मेरे मित्र का मकान था| चूँकि यह सरकारी कॉलोनी थी, इसीलिए सारे मकान का पैटर्न एक जैसा था| सड़क किनारे घर का मुख्य द्वार था; दो सीमेंट के खम्भे के बीच एक लोहे का छोटा-सा फाटक| दाहिने खम्भे पर रखे गमले में नागफनी उगा हुआ था| नागफनी देखकर मुझे मेहशर अफरीदी साहब का एक शेर याद आ गया, “जब से कैक्टस को देखा है, सोच रहा हूँ गमले में भी दर्द उगाया जा सकता है”| पता नहीं कृषमोहन जी ने अपने किस दर्द को गमले में उगा रखा था| मुख्यद्वार इतना छोटा था कि यदि आप नियमित रूप से योग करते हैं, तो उसे आसानी सी टांग उठाकर फांद सकते थे| मुख्य द्वार और घर के बीच थोड़ी खाली जमीन थी, जिसमे में चार आम के पेड़, एक अर्जुन का पेड़, एक लीची और दो अमरुद के पेड़ लगे थे| घर के ठीक बाहर क्यारी बनी हुई थी, जिसमे गुलाब, गेंदा और बेला के छोटे और बड़े पौधे लगे हुए थे| घर के दाहिने भाग में भी थोड़ी खाली जमीन थी, उसमे कृष्ण मोहन जी ने धनिया, पुदीना, और मूली उगा रखा था| मकान के पीछे सीरिष्ट के दो बड़े-बड़े पेड़ थे, पेड़ की छाया से उनका पूरा मकान ढका हुआ था| कृष्ण मोहन जी के मकान की तरह ही गली के सारे मकान पेड़-पौधों से घिरे हुए थे| कृषमोहन जी के बाद गली का चौथा मकान किसी ‘अमरकांत झा’ का था| अमकांत जी और कृष्णमोहन जी के मकान के बीच जो दीवार थी उस पर लौकी और करेला लटका हुआ था| आनंद निवास के ठीक सामने सड़क के उस तरफ SBI का एटीएम था, यह कृष्णमोहन जी के घर का लैंडमार्क था| मुझे SMS करके जो पता उन्होंने भेजा था, उसमे इस एटीएम का भी जिक्र था| मुख्य द्वार का फाटक खोलकर मैं अन्दर उनकी मकान की और बढ़ा|
रोड पार करके मैं गली में पहुंचा| पहला मकान किसी राय जी का था, दूसरे मकान के बाहर लगे नेम प्लेट पर ‘एडवोकेट सुमन यादव’ लिखा हुआ था, और तीसरे मकान के बाहर लगे बोर्ड पर लिखा था, “आनंद निवास, कृष्ण मोहन ओझा’ (बदला हुआ नाम)” यह मेरे मित्र का मकान था| चूँकि यह सरकारी कॉलोनी थी, इसीलिए सारे मकान का पैटर्न एक जैसा था| सड़क किनारे घर का मुख्य द्वार था; दो सीमेंट के खम्भे के बीच एक लोहे का छोटा-सा फाटक| दाहिने खम्भे पर रखे गमले में नागफनी उगा हुआ था| नागफनी देखकर मुझे मेहशर अफरीदी साहब का एक शेर याद आ गया, “जब से कैक्टस को देखा है, सोच रहा हूँ गमले में भी दर्द उगाया जा सकता है”| पता नहीं कृषमोहन जी ने अपने किस दर्द को गमले में उगा रखा था| मुख्यद्वार इतना छोटा था कि यदि आप नियमित रूप से योग करते हैं, तो उसे आसानी सी टांग उठाकर फांद सकते थे| मुख्य द्वार और घर के बीच थोड़ी खाली जमीन थी, जिसमे में चार आम के पेड़, एक अर्जुन का पेड़, एक लीची और दो अमरुद के पेड़ लगे थे| घर के ठीक बाहर क्यारी बनी हुई थी, जिसमे गुलाब, गेंदा और बेला के छोटे और बड़े पौधे लगे हुए थे| घर के दाहिने भाग में भी थोड़ी खाली जमीन थी, उसमे कृष्ण मोहन जी ने धनिया, पुदीना, और मूली उगा रखा था| मकान के पीछे सीरिष्ट के दो बड़े-बड़े पेड़ थे, पेड़ की छाया से उनका पूरा मकान ढका हुआ था| कृष्ण मोहन जी के मकान की तरह ही गली के सारे मकान पेड़-पौधों से घिरे हुए थे| कृषमोहन जी के बाद गली का चौथा मकान किसी ‘अमरकांत झा’ का था| अमकांत जी और कृष्णमोहन जी के मकान के बीच जो दीवार थी उस पर लौकी और करेला लटका हुआ था| आनंद निवास के ठीक सामने सड़क के उस तरफ SBI का एटीएम था, यह कृष्णमोहन जी के घर का लैंडमार्क था| मुझे SMS करके जो पता उन्होंने भेजा था, उसमे इस एटीएम का भी जिक्र था| मुख्य द्वार का फाटक खोलकर मैं अन्दर उनकी मकान की और बढ़ा|
घर के प्रवेश द्वार पर ‘सुस्वागतम्’ का एक टिनही बोर्ड लगा हुआ था| बोर्ड मेरे
नोटिस में आया, क्योंकि एक कील निकल जाने की वजह से वह नीचे झूल
गया था| गेट के बायीं ओर बने खिड़की से एक लोहे का कूलर लगा हुआ था, जिसकी तेज़ आवाज़ मेरे
कानो को चुभ रही थी| कूलर का पानी टपककर नीचे फूलों की क्यारी में जा रहा था| क्यारी के जमा पानी में दो बगरी (स्पैरो) पंख फड़फड़ा कर नाहा रही थी| गेट के सामने खड़े
होकर मैंने घंटी बजाई| अन्दर कमरे से घंटी के बजने की आवाज़ आई, ‘ॐ भूर्भुवः...’| “अरे...सुमन
देखो तो कौन है”, अन्दर से कृष्णमोहन जी की आवाज़ आई| कमरे के अन्दर से आ
रही टीवी की आवाज़ को सुनकर मैंने अंदाज़ा लगाया कि कृष्ण मोहन जी कमरे में टीवी देख
रहे हैं| पांच सेकेण्ड बाद कमरे का दरवाज़ा खुला| कृष्णमोहन जी का 7 वर्षीय बेटा सुमन अपरिचित निगाहों से मुझे घूरने लगा| तभी सोफे पर बैठे हुए कृष्णमोहन जी ने टीवी से नज़रे हटाकर मेरी ओर देखा| मुझे देखते ही एकदम से हडबडाकर उठे, “आइये-आइये
कब से इंतज़ार कर रहा था”, बोलते हुए मेरे पास आए और हाथ मिलाने के लिए
अपना दाहिना हाथ मेरी ओर बढाया| तीन साल आश्रम में रहने के बाद, मैं लोगों हाथ मिलाना भूल गया
था| आश्रम में या तो हम लोगों से गले मिलते थे (कुछ लोग गले पड़ भी जाते थे), या फिर
हाथ जोड़कर नमस्ते किया करते थे| बड़े ही अटपटे ढंग से मैंने अपना हाथ उनकी और
बढाया| मुझे वह दिन याद आ गया जब जीवन में पहली बार मैंने किसी से हाथ मिलाया था|
अपने एक दोस्त के साथ मैं गावं का ‘महावीर मेला’ देखने गया था| मेरे दोस्त का एक
पुराना दोस्त नवीन नया-नया दिल्ली से आया था| वह हमें मेले में मिल गया| मिलते ही उसने
हम दोनों के सामने अपना हाथ बढ़ाया| हमें एकदम से समझ नहीं आया कि करना क्या हैं,
वो तो अच्छा था कि हमने फ़िल्मों में लोगों को हाथ मिलाते देखा था| हडबडाते हुए हम
दोनों ने उससे हाथ मिलाया| आज जब कृषमोहन जी ने अचानक अपना हाथ मेरी और बढ़ाया, तो
मैं वैसे ही हडबडा गया| 7 साल दिल्ली में और तीन साल मुंबई में रहने के बाद हाथ मिलाना
मेरे लिए सहज हो गया था, लेकिन आश्रम में रहने के बाद अब फिर से मुझे यह अटपटा और
अजीब लगने लगा है| अब या तो ओशो की तरह हाथ जोड़कर मंद-मंद मुस्कुराते हुए मिलना अच्छा
लगता है, या फिर करीबी मित्रों के साथ गले मिलकर| यहाँ
कृष्णमोहन जी मेरे इतने करीबी मित्र तो जरूर थे कि मैं उनसे गले मिल सकता था, लेकिन हाथ
बढ़ाकर उन्होंने सब ख़राब कर दिया| अच्छा, एक मिनट रुकिए...!!! कहानी आगे बढ़ाने से
पहले आपको एक शेर सुनाना चाहता हूँ, हाथ मिलाने से संबंधित शेर है इसिलिये अभी
अचानक याद आ गया, बहुत अच्छा शेर है, पहले शे’र सुनिए फिर आगे की कहानी सुनेंगे,
तो अर्ज़ किया है,
“आँख उठाकर भी न देखूँ, जिससे मेरा दिल न मिले
रस्मन सबसे हाथ मिलाना, मेरे बस की बात नहीं”
वा-वाह क्या शेर है...!!
हैण्डशेक करने के
बाद कृष्णमोहन जी मेरा हाथ पकड़कर मुझे कमरे में ले आए| और फिर जिस सोफे पर वे
बैठे थे, उस के बगल वाले सोफे से अपने बेटे का स्कूल बैग हटाकर मुझे बिठाया| फिर,
अपनी पत्नी को आवाज़ लगाते हुए बोले, “सुनती हो, इक्क्यु जी आए हैं|”
उनकी आवाज़ काफी तेज़ थी, लेकिन इतनी नहीं की टीवी से आ रहे शोर को दबा दे| “हाँ
बस लाती हूँ बस दो मिनट और रुको”, अन्दर से सीमा भाभी की आवाज़ आई| “ये
पता नहीं क्या समझ रही है, मैं बोल रहा हूँ इक्क्यु जी आये हैं, तो यह बोल रही है लाती
हूँ”, मेरी ओर देखते हुए कृषमोहन जी बोले| टीवी चालू था, ‘सब टीवी’ पर तारक
मेहता का उलटा चश्मा चल रहा था|
“बोधगया कैसा लगा, पहलीबार आए हैं ना आप?”, टीवी का चैनल बदलते हुए उन्होंने मुझसे पुछा| “पापा, रहने दो न मुझे देखना है”, टीवी के नीचे जमीन पर बैठा सुमन बोला| “बेटा अभी ऐड दे रहा है, थोड़ी देर स्कोर देख लेने दो, फिर लगा दूंगा”, टीवी पर नज़रे टिकाये कृष्णमोहन जी बोलें| ‘स्कूल जाता है सुमन’, मैंने सुमन की ओर देखते हुए पुछा| (कृष्णमोहन जी ने मुझसे जो सवाल पूछा था, उसका जवाब न तो मैंने दिया न ही उन्होंने दूबारा पूछा, वह सवाल दो चैनलों के बीच दबकर मर गया|) सुमन ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया| चैनल बदले जाने की वजह से वह मुंह फुलाए बैठा था| “बेटा, अंकल कुछ पूछ रहे हैं, जवाब दो”, कृष्णमोहन जी ने सुमन से कहा| ‘अच्छा ये देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लेकर आया हूँ’, अपने बैग से चोकॉलेट निकालकर देते हुए मैंने सुमन से कहा| “अरे क्या बात है, कितना बड़ा चॉकलेट लेकर आए हैं अंकल जी सुमन के लिए|”, अपनी आवाज़ में पुचकार लाते हुए कृष्णमोहन जी ने अपने मुंह फुलाए बेटे से बोला| मेरे हाथ में चॉकलेट देखकर सुमन का गुस्सा गायब हो गया| वह झट से चॉकलेट लिया और अन्दर की और भागा| अब कमरे में बस हम तीन लोग रह गए थे, एक मैं, दूसरा कृष्णमोहनजी और तीसरा टीवी| “कोहलिया आजकर कमाल कर रहा है, आप क्रिकेट देखते हैं की नहीं”, एड आ जाने की वजह से टीवी को म्यूट करते हुए कृष्णमोहन जी ने मुझसे पूछा| इससे पहले की मैं जवाब देता, उनके मोबाइल की घंटी बजी| उन्होंने झट से कॉल उठाया और फोन पर बात करने लगे| उनको कॉल पर बात करते देख मुझे अपने मोबाइल की याद आई| बैग से मैंने मोबाइल निकाला, ‘साकेत ब्रो JIO 4 मिस्ड कॉल’| फोन साइलेंट होने की वजह से मुझे कॉल का पता नहीं चला था| ‘किसी दोस्त से मिलने आया हूँ, भाई| दो घंटे बाद कॉल करता हूँ’, मैंने साकेत को SMS किया| “अरे सन्डे है भाई घर पर बैठे हैं, मन क्या लगेगा टीवी पर मैच देख रहे हैं”, कृष्णमोहन जी फोन पर बोल रहे थे|
“बोधगया कैसा लगा, पहलीबार आए हैं ना आप?”, टीवी का चैनल बदलते हुए उन्होंने मुझसे पुछा| “पापा, रहने दो न मुझे देखना है”, टीवी के नीचे जमीन पर बैठा सुमन बोला| “बेटा अभी ऐड दे रहा है, थोड़ी देर स्कोर देख लेने दो, फिर लगा दूंगा”, टीवी पर नज़रे टिकाये कृष्णमोहन जी बोलें| ‘स्कूल जाता है सुमन’, मैंने सुमन की ओर देखते हुए पुछा| (कृष्णमोहन जी ने मुझसे जो सवाल पूछा था, उसका जवाब न तो मैंने दिया न ही उन्होंने दूबारा पूछा, वह सवाल दो चैनलों के बीच दबकर मर गया|) सुमन ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया| चैनल बदले जाने की वजह से वह मुंह फुलाए बैठा था| “बेटा, अंकल कुछ पूछ रहे हैं, जवाब दो”, कृष्णमोहन जी ने सुमन से कहा| ‘अच्छा ये देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लेकर आया हूँ’, अपने बैग से चोकॉलेट निकालकर देते हुए मैंने सुमन से कहा| “अरे क्या बात है, कितना बड़ा चॉकलेट लेकर आए हैं अंकल जी सुमन के लिए|”, अपनी आवाज़ में पुचकार लाते हुए कृष्णमोहन जी ने अपने मुंह फुलाए बेटे से बोला| मेरे हाथ में चॉकलेट देखकर सुमन का गुस्सा गायब हो गया| वह झट से चॉकलेट लिया और अन्दर की और भागा| अब कमरे में बस हम तीन लोग रह गए थे, एक मैं, दूसरा कृष्णमोहनजी और तीसरा टीवी| “कोहलिया आजकर कमाल कर रहा है, आप क्रिकेट देखते हैं की नहीं”, एड आ जाने की वजह से टीवी को म्यूट करते हुए कृष्णमोहन जी ने मुझसे पूछा| इससे पहले की मैं जवाब देता, उनके मोबाइल की घंटी बजी| उन्होंने झट से कॉल उठाया और फोन पर बात करने लगे| उनको कॉल पर बात करते देख मुझे अपने मोबाइल की याद आई| बैग से मैंने मोबाइल निकाला, ‘साकेत ब्रो JIO 4 मिस्ड कॉल’| फोन साइलेंट होने की वजह से मुझे कॉल का पता नहीं चला था| ‘किसी दोस्त से मिलने आया हूँ, भाई| दो घंटे बाद कॉल करता हूँ’, मैंने साकेत को SMS किया| “अरे सन्डे है भाई घर पर बैठे हैं, मन क्या लगेगा टीवी पर मैच देख रहे हैं”, कृष्णमोहन जी फोन पर बोल रहे थे|
करीब 10 मिनट तक
कृषमोहन जी फोन पर बात करते रहें| इस बीच उनकी पत्नी आई और मुझसे मिलकर फिर से किचन
में काम करने चली गई| कुछ देर पहले जब कृषमोहन जी ने आवाज़ लगा कर मेरे बारे उन्हें
बताया था तब, सीमा भाभी को ऐसा लगा था कि कृष्णमोहन जी चाय के लिए उन्हें आवाज़ लगा
रहे हैं, इसीलिए उन्होंने दो मिनट में लेकर आने की बात कही थी| फिर जब सुमन चॉकलेट
लेकर अन्दर गया तो उन्हें पता चला कि कोई अंकल जी आए हैं| अमन की बातों से उन्हें
अंदाज़ा लग गया था कि अजनबी अंकल जी मैं ही हूँ, (कृष्णमोहन जी ने उन्हें पहले से
मेरे आने के बारे में बता रखा था|), इसीलिए जब वह हॉल में आई तो एक ट्रे में दो कप
चाय और दो कटोरे में नमकीन और बिस्कुट ले कर आईं| करीब दो घंटे तक मैं कृष्णमोहन
जी के यहाँ रुका| इस दो घंटे में उनकी पत्नी ने मेरे मना करने के बावजूद दो बार
चाय पिलाया और एक बार खाना खिलाया| मैं जबतक रहा तब तक कृष्णमोहन जी का टीवी चलता
रहा, कुछ देर ‘सब टीवी चलता था, तो कुछ देर क्रिकेट’| इसके अलावा दो घंटे में
उन्होंने छः लोगों से फोन पर बात की| एक्स्ट्रा एक्टिवि में सुमन ने भाभी जी के
कहने पर मुझे दो पोएम्स सुनाए| हालचाल पूछने और सुनाने के अलावा कृषमोहन जी से
मेरी किसी और विषय पर कोई बात नहीं हुई| हद तो तब हो गई जब कृष्णमोहन जी मुझे
छोड़ने के लिए अपने मकान के मुख्य द्वार तक भी नहीं आए, गली से बारह ऑटो तक छोड़ने
की बात तो भूल ही जाइए| ये बाहर आकर छोड़ने वाली बात पहले मेरे नोटिस में नहीं आती
थी, लेकिन एक बार मेरे एक ग्रामीण मित्र ने जब मुझे एक वाकया सुनाया तब से मैं इसे
नोट करने लगा हूँ| वो वाकया क्या था? आइये सुनाता हूँ....
सन 2003 की बात
है, मैं दरभंगा के MLSM कॉलेज से आई.एस.सी.(मैथ्स) कर रहा था| काश तब मुझे पता
होता कि आर्ट्स/लिटरेचर पढ़ना शर्म की नहीं गर्व की बात है, तो मैं कभी साइंस में
एडमिशन नहीं लेता| हालाँकि मेरे चाचा ने मुझे 10th के बाद यह सलाह दी थी कि आर्ट
से आगे की पढ़ाई करो, लेकिन मैं अपने इस तर्क में कि मेरा जो विषय कमज़ोर है मुझे
उसे मजबूत करना है, मैथ्स में एडमिशन ले लिया| साला ये तर्क बहुत ही ख़तरना चीज़
होता है, कब आपको डूबा दे कुछ पता नहीं| सुकरात ठीक ही कहते थे, “तर्क
वेश्या है”| खैर, क्या करना चाहिए था, और क्या नहीं करना चाहिए था यह
बताने के लिए अभी मैं आपको यह कहानी नहीं सुना रहा हूँ| कहानी पर लौटते हैं|
दरभंगा चूँकि मेरे घर से 25 किलोमीटर दूर है, पढ़ाई करने के लिए मुझे गावं छोड़कर
वहां शिफ्ट होना पड़ा, घर से रोज़ जाना आना संभव नहीं था| आज-कल की तरह अगर मोटर
बाइक का चलन उन दिनों आम होता, तो आना-जाना मुश्किल नहीं है| लेकिन साइकल से यह
नामुमकिन था| हालाँकि मेरे दादा अपने समय में गावं से रोज़ 13 किलोमीटर कमतौल
हाईस्कूल पैदल जाते और आते थे| फिर साइकल से 25 किलोमीटर बहुत ज्यादा दूर नहीं था|
लेकिन मेरे समय में आम रवायत यह था कि लड़के गाँव से दसवीं पास करने के बाद आगे की
पढ़ाई करने के लिए दरभंगा रहने चले जाते थे|
दोनार में
गोविन्द (गोविन्द का जिक्र बहुत से संस्मरणों आ चूका है, इसीलिए मैं
मानता हूँ अबतक आपको यह पता लग गया होगा कि गोविन्द मेरे बचपन का मित्र/ग्रामीण और
चचेरा भाई है, और बहुत दूर के रिश्ते में वह मेरा मामा भी लगता है| गोविन्द का
नानी गाँव और मेरी माँ का नानी गाँव एक ही है|) का अपना घर था| दरभंगा
में मैंने वहीं शरण लिया| घर का छत सीमेंट के चदरे का था, जिसपर गोबिंद ने लौकी का
लता चढ़ा रखा था| गर्मी में छत से आग, बारिश में पानी और सर्दी में ओस टपकता था|
सभी मौसम में घर में बहार आया रहता था| गोविन्द कक्षा में मेरे से एक वर्ष आगे था|
मेरे से एक साल पहले, जब वह वहां रहना शुरू किया, तब मकान पूरा बनकर तैयार नहीं
हुआ था| अधबने मकान में ही गोविन्द अपने चार दोस्तों के साथ रहना शुरू कर दिया था|
टॉयलेट न होने की वजह से ये लोग सुबह घर से एक किलोमीटर दूर रलवे स्टेशन जाते थे|
वहां वाशिंग के लिए खड़ी ट्रेन में फ़ारिग होते थे| एक बार तो यूं हुआ कि गोविन्द का
एक दोस्त राकेश (बदला हुआ नाम), जोकि अब इस दुनिया में नहीं है 3 वर्ष पहले एक रोड
एक्सीडेंट में उसकी मौत हो गई, ट्रेन के
टॉयलेट में बंद था, और ट्रेन चल दी| वह इतना खोया था कि जब तक ट्रेन तेज नहीं हो
गई उसे पता ही न चला कि ट्रेन चल रही है| अगले स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो वह
दूसरी ट्रेन पकड़ कर तीन घंटे बाद वापिस आया| ऑटो से वापिस आने के लिए उसके पास
पैसे ही नहीं थे, इसीलिए ट्रेन से वापिस आना उसकी मजबूरी थी| खैर, जब मैं रहने आया
तब तक वह मकान पूरा बनकर तैयार हो गया| मुझे इस तरह की दिक्कतों का सामना नहीं
करना पड़ा| हाँ, बारिश, आग और ओस का सुख सदैव मिलता रहा|
गोविन्द के जिस
मकान में हम रह रहे थे, उस मकान से थोड़ी दूर पर मेरे एक और ग्रामीण का मकान था| उस
ग्रामीण का नाम ‘शिवपाल’ (बदला हुआ नाम) था| शिवपाल अपने मकान से रोज़ 9 बजे हमारे
मकान पर आता था| उसके रोज़ आने का कारण यह था कि वह हमारे यहाँ से सुबह का अख़बार
लेकर अपने यहाँ जाता था| शिवपाल का ऐसा करने के पीछे गहरी राजनीति और चालाकी थी|
हमारे मकान पर
रोज़ सुबह 6 बजे अख़बार आ जाता था| एक दिन शिवपाल जब हमारे यहाँ आया तो हमारा अख़बार
देखकर उसके दिमाग में एक खुराफाती आइडिया आया| “तुम लोग कितने बजे तक अख़बार
पढ़ लेते हो”, शिवपाल ने हम सब से पूछा| “9 बजे हम उस पर सुबह का
नाश्ता करते हैं”, मेरे एक दोस्त ने जवाब दिया| “तो फिर ठीक है, 9
बजे तक तुम सब अख़बार पढ़कर उस पर नाश्ता कर लेते हो”, शिवपाल बोलने लगा, “और
रोज़ 9 बजे मैं घर से दादाजी के लिए अख़बार लेने निकलता हूँ, अगर तुम लोग मुझे अपना
अख़बार दे दो तो मुझे अख़बार खरीदना नहीं पड़ेगा| मेरा इससे थोड़ा पॉकेट मनी बन जाएगा,
तुम लोग तो जानते ही हो कि मेरे दादा कितने कंजूस हैं| इसके बदले महीने में एक दिन
मैं तुम लोगों को फिल्म दिखा दिया करूँगा|”, शिवपाल ने अपना प्लान हमारे सामने
रखा| हमें शिवपाल का प्लान अच्छा लगा| “लेकिन अगर तुम हमारा अख़बार लेकर चले
जाओगे, तो फिर महीने के अंत में हम क्या बेचेंगे? हर महीना 20 रुपया का अख़बार
बिकता है| जितने का तुम हमें फ़िल्म दिखाओगे उतना तो हम हर महीना अख़बार बेचकर कमा
लेते हैं(उन दिनों दरभंगा में सिनेमा का सबसे मंहगा टिकट 7 या 9 रूपये का था| हम
लोग अक्सर 5 या सात वाला टिकट कटाते थे|)”, ऐसा मेरा रूममेट विजय बोला|
विजय MLSM कॉलेज से ही कॉमर्स में पढ़ाई कर रहा था| हम सब विजय की चतुराई से सहमत
हुए| मुझे भी इस बात का गर्व हुआ कि मैं एक शातिर आदमी के साथ रूम शेयर कर रहा हूँ|
हालाँकि गोविन्द विजय की ऐसी हरकत को ‘छूछ काइयांपन’ कहा करता था| गोविन्द का ऐसा
सोचने के पीछे कारण यह था कि विजय कभी भी गोविन्द को रूम रेंट टाइम पर नहीं देता
था| “अगर ऐसा है तो रोज़ सुबह मैं पिछले दिन का अख़बार तुम लोगों के लिए ले
आऊंगा| एकबार पढ़ने के बाद दादाजी इस बात की फिकिर नहीं करते हैं कि अख़बार कहाँ
गया”, शिवपाल ने विजय की ओर देखते हुए कहा| इस बार शिवपाल की बात का काट
हम में से किसी के भी पास नहीं था| हम सब एक मत से राज़ी हो गए| अब शिवपाल रोज़ सुबह
हमारे यहाँ नया अखबार लेने और पुराना अखबार देने आने लगा|
अब तक शिवपाल से
मेरी कोई खास दोस्ती नहीं थी| इन फैक्ट, गोविन्द और पारितोष के अलावा शिवपाल की
हमारे मकान पर किसी से भी ज्यदा बातचीत नहीं थी| लेकिन अब धीरे-धीरे शिवपाल से
सबकी दोस्ती होने लगी थी| मेरे से भी उसकी अच्छी बातचीत होने लगी| एक शाम शिवपाल
हमारे मकान पर आया| कुछ दिनों से वह हर शाम बेडमिन्टन खेलने हमारे यहाँ आ जाता था|
हालाँकि गोविन्द का कहना था कि वह खेलने कम और सामने वाली आंटी को देखने ज्यादा
आता था| मकान मालिक होने की वजह से गोविन्द हर चीज़ को अलग और गूढ़ तरीके से देखने
लगा था| उस दिन मेरे आलावा सब लोग बाहर गए हुए थे| शातिर विजय गाँव गया हुआ था,
गोविन्द किसी से मिलने गया था| पराग और मोहित कोचिंग करने गए थे| एक बस अकेला में
घर पर था|
बेडमिन्टन खेलने
के बाद, थोड़ी देर हम ने इधर-उधर की बातें की फिर मैंने उससे बोला, “विश्वनाथ,
यहीं पास वाली गली में अभी दो दिन पहले शिफ्ट हुआ है, कल मैं उसके यहाँ से एक
किताब ले कर आ गया था, चलो किताब वापिस करके आते हैं|” शिवपाल की तरह
विश्वनाथ भी मेरा ग्रामीण ही है| वह पहले हमसे दूर किसी और मुहल्ले में रहता था|
अभी दो दिन पहले यहाँ शिफ्ट हुआ था| “मैं उससे मिलने नहीं जा सकता”,
शिवपाल कहने लगा, “उसको मिलने की
तमीज़ नहीं है| पहले जब वह छपकी में रहता था, तो मैं एक बार उससे मिलने गया था| जब
मैं उसके घर से निकला तो वह गेट तक भी छोड़ने नहीं आया|” ऐसा मैं पहली बार
सुन रहा था| गेट तक छोड़ने नहीं आना मतलब मिलने की तमीज़ नहीं होना| पहले मैंने नहीं
सुना था|
इस घटना के बाद
से मैं गौर करने लगा कि मिलने जाने पर कौन मेजबान बहार तक छोड़ने आता है, और कौन
नहीं आता है| दिल्ली में जब नासिर से मेरी दोस्ती हुई तो, जब भी उसका फोन आता था
कि वह आ रहा है, तो मैं उसके घर तक उसको लेने के लिए चला जाता था| और जाते वक़्त
ठीक उसके गेट के बाहर तक उसको छोड़कर आता था| इसलिए आज कृष्णमोहन जी का छोड़ने
के लिए बाहर तक नहीं आना मुझे खला| अगर आज यहाँ कृष्णमोहन जी की जगह मेरे
राव साहब होते तो गेट क्या मुझे मेरे होटल तक छोड़ने आ जाते| ऐसा मेरे और राव साहब
के बीच कई बार हो चूका है| कभी जब मैं उनसे मिलने अहमदाबाद जाता था, तो वे घर से
अदालच तक मुझे छोड़ने आते थे और अंत में मेरे साथ ही मेहसाना चले आते थे| एक बार तो
स्कूटी से वे हमें योग युनिवर्सिटी तक छोड़ने आए, फिर जब हम निकलने लगे तो हमारे
जरा सी इसरार पर, युनिवर्सिटी के बाहर स्कूटी खड़ी करके, वे हमारे साथ अहमदाबाद से
70 किलोमीटर दूर मेहसाना आ गए|
कृष्णमोहन जी के घर से निकलकर होटल के
लिए ऑटो में बैठने के बाद, पूरे रास्ते यही सोचता रहा कि आखिर मैं मिलने किससे गया
था? कृष्णमोहन जी या उनकी टीवी से? या फिर उनके बेटे सुमन से? नहीं मैं मिलने नहीं
गया था, मैं भाभी जी के हाथ का खाना खाने और सुमन की पोएट्री सुनने गया था|
ना..ह.. मैं ये देखने गया था कि कृष्णमोहन जी का घर कितना बड़ा है, और वे दो घंटे
में कितनी बार फोन पर बात करते हैं| .....नहीं ऐसा भी नहीं है....., दी फैक्ट इज़
जहाँ मैं गया था वहां न तो कोई घर था, न ही कोई आदमी| वह एक शमशान था, जहाँ कुछ
मुर्दे रह रहते हैं...., मैं उन्ही मुर्दों से मिलने गया था| हाँ यह ठीक है, मैं
मुर्दों से मिलने गया था.... | ट्रिंग...ट्रिंग...ट्रिंग....मेरे फोन की घंटी बजी (ऑटो में
बैठने से पहले मैंने मोबाइल को साइलेंट मोड़ से ‘रिंग’ मोड’ पर डाल दिया था), मैंने
बैग से फ़ोन निकला, ‘कृष्णमोहन जी कॉलिंग.....’ मैंने फोन उठाया... “इक्क्यु
जी, आप अपने साथ जो किताब लेकर आए थे..क्या नाम लिखा है इस पर ‘इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस, यहीं छुट गई है”, उधर से आवाज़ आई| ‘कृष्णमोहन जी, छूटी नहीं है, मैंने जानबूझकर छोड़ दी
है आपके लिए, मोबाइल और टीवी से अगर कभी फुर्सत मिले तो इस किताब को एक बार पढ़
लीजिएगा| शायद इस किताब को पढ़ने के बाद आप मशीन से थोड़े मनुष्य बन जाएँ|’, इतना
कहकर मैंने फोन काट दिया और उनका नम्बर ब्लाक कर दिया| और कृष्णमोहन जी को अपने
दिमाग से हमेशा के लिए इरेज़ कर दिया|
दस महीने बाद....
कल शाम जब मैंने अपने
फेसबुक पेज पर सितम्बर में होने वाले मनाली कैंप (प्रक्टिसिंग अवेअरनेस इन डेली
लाइफ, 31st Aug to 4 Sep, 2019.)
के बारे में डाला, तो उसके दो घंटे बाद मनाली
वाले स्वामीजी का मुझे फोन आया, “स्वामी आज हम ने पोस्ट डाला और आज ही एक
बुकिंग कन्फर्म हो गई|” उनकी आवाज़ से लगा वे काफी खुश हैं| ‘कहाँ से
बुकिंग हुई है’, मैंने उनसे पूछा| “बोधगया के कोई हैं, अपना नाम
उन्होंने ‘कृष्णमोहन ओझा’ लिखवाया है, कहते हैं वो आपको जानते हैं| आप जानते हैं क्या
उनको?”, फिर उस तरफ से मनाली वाले स्वमी जी की आवाज़ आई| कृष्णमोहन...! मैं एकदम से चौंक गया| ‘हाँ,
मैं उन्हें जानता हूँ’, खोई हुई आवाज़ में मैंने उनसे कहा| फोन रखने के बाद
बड़ी देर तक मैं सोच-विचार में खोया रहा| यह चमत्कार कैसे हुआ, ‘कृष्णमोहन
ओझा कैंप करने मनाली आ रहा है’....!!!! मुझे यह बात पच नहीं रही थी| रात
सोने से पहले मैंने अपने फोन का कांटेक्ट लिस्ट खोला और कृष्णमोहन के नंबर को कल
दस महीने बाद अनब्लॉक किया|
आज सुबह चार में
से तीन आर्य कर्मों को निपटने के बाद 10 बजे जब फोन ऑन किया तो पता नहीं मुझे क्या
सूझा मैंने कृष्णमोहन के व्हात्सप्प पर एक मेसेज भेजा, ‘मनुष्यों की
दुनिया में आपका स्वागत है, कृष्णमोहन जी|’ बीस मिनट बाद उधर
से उनका रिप्लाई आया, “प्रणाम स्वामी जी, आप तो हमें भूल ही गए... अच्छा
हुआ कि कल मैंने आपके कैंप का पोस्टर देख लिया, वर्ना इस शनिवार को ‘टी टॉक’ पर
आपसे मिलने मैं दिल्ली आने वाला था| उस दिन उस किताब को मेरे यहाँ छोड़कर आपने मेरे
उपर बड़ा उपकार किया, उसको पढ़ने के बाद से मेरी ज़िन्दगी बदल गई है| अब मैं टीवी
नहीं देखता हूँ| मोबाइल का इस्तेमाल भी बहुत कम कर दिया है| सिर्फ सुबह 10 बजे से
लेकर शाम के 6 बजे तक ऑफिस टाइम में मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल करता हूँ| ऑफिस में जब भी टाइम मिलता है www.ikkyutalk.blogspot.com पर आपका ब्लॉग पढ़ता रहता हूँ| आपकी बताई हुई सारी किताबें
मंगाकर पढ़ चुका हूँ| जीवन में सब कुछ बड़ी तेजी से बदल रहा है| बहुत दिनों से आपसे
मिलकर आपका शुक्रिया अदा करना चाह रहा था| कल कैंप का पोस्टर देखा तो सोचा चलो
इससे अच्छा मिलने का मौका और कुछ नहीं हो सकता है|” इस मेसेज के बाद उन्होंने चार-पांच और मेसेज किये| अलग-अलग
तरह से वे अपना आभार प्रगट करने की कोशिश कर रहे थे| अंतिम मेसेज था , “I can’t express it in words, I
just want see you asap.”
जीवन बहुत है
अजीब और अनूठा है| कौन-सी बात कब किस को छू जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है| उस दिन
मैंने किताब जानबूझकर नहीं छोड़ा था| मुझे किताब लेने न जाना पड़े या फिर उनको किताब
देने न आना पड़े इस वजह से मैंने उन्हें ऐसा बोल दिया था| या फिर शायद मैं उनसे
दूबारा नहीं मिलना चाह रहा था| बाद में बहुत दिनों तक मुझे ख़िताब खोने का अफ़सोस
रहा था| कल रात से ही चमत्कृत और हतप्रभ हूँ| ऐसा भी होता है क्या?
अगर आपके जीवन
में कभी कोई ऐसा चमत्कार घटा हो तो नीचे कमेंट में जरूर शेयर कीजिए, या फिर आप
अपनी कहानी मुझे ikkyutzu@gmail.com पर मेल कर सकते हैं| अगर आपकी कहानी मुझे अच्छी लगी
तो उसे अपने ब्लॉग और फेसबुक पेज पर शेयर करूँगा|
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”You have more time than any age, and you are not exhausted because of the world. You are exhausted because you have lost the inner contact- because you do not know how to go deeper in your self and be revitalized.”- Osho


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