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Tuesday, 5 June 2018

'क्राइम एंड पनिशमेंट'-तब्सिरा

कार्ल-चेपाक की एक कहानी है- आखिरी फैसला| उसमे कगलर नाम का एक ‘मुजरिम’ जब मरने के बाद दूसरी दुनिया की अदालत में पेश किया जाता है, तो उसने ज़िन्दगी में जो-जो कुछ किया था उसका ब्योरा उसके सामने रखा जाता है| ब्योरा सही है, वो इंकार नहीं करता| लेकिन वो सब कुछ क्यों हुआ, जब वो इसकी तफसील देना चाहता है, तो उसकी सुनवाई नहीं होती| ब्योरे की तस्दीक के लिए एक गवाह को तलब किया जाता है, और कगलर देखता रह जाता है कि जो अजीबोगरीब व्यक्ति वहां गवाही देने के लिए आता है, उसके नीले चोगे में आसमान के सितारे जड़े हुए हैं, और उसके चेहरे पर कोई इलाही नूर है कि वहां के मुनसफ भी उसके स्वागत में एक बार खड़े हो जाते है, और फिर उस इलाही व्यक्ति को गवाह के कठघरे में खड़ा करते हैं, और कहते हैं- ‘यह मुकदमा बहुत उलझा हुआ है, हालाँकि जो भी हादसे इस व्यक्ति के हाथों हुए उनमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं है| लेकिन यह व्यक्ति बार-बार कहे जाता है कि वो बेगुनाह है| इसलिए खुदावंद! एक तुम हो जो परम सत्य हो, इसलिए तुम्हे बुलाया गया है- गवाही देने के लिए...
और वो गवाह कहना शुरू करता है- ‘यह कगलर अपनी माँ को इतना प्यार करता था कि उसे किसी तरह व्यक्त नहीं कर पाता था| इसीलिए यह बचपन से इतना जिद्दी हो गया कि माँ पर जब भी कोई ज्यादती की जाती, यह बाप से उलझ जाता था| इतना कि यह छोटा बच्चा हों के कारण जब एक बेबसी महसूस करता तो अपने दांतों से बाप की अँगुलियों को काट खाता....
तीनो मुनसिफ गवाह को टोक देते हैं; कहते हैं- खुदावंद, यह माँ से इतना प्यार करता था, हमें इसकी गवाही नहीं चाहिए, हमें तो यह बताओ कि इसने पहला जुर्म किसी के बाग़ से फूल तोड़ने का किया था या नहीं?
गवाह मुस्कुरा देता है, कहता है- वो फूल तो इसने एक इरमा नाम की प्यारी सी लड़की को देने के लिए तोड़े थे| वो इसे बेहद अच्छी लगती थी... वो इसके दिल में प्राणों की तरह बस गई थी...
कलगर जल्दी से पूछता है- खुदावंद! इरमा कहाँ चली गई, यही तो मुझे कभी पता नहीं चल सका...
ख़ुदा बताता है- तुम तो गरीब थे, इसलिए इरमा का विवाह मिल मालिक के लड़के से कर दिया गया, जिसे गुप्त रोग था, और इसी वजह से जब इरमा का हमल गिर गया तो वह भी बच नहीं सकी, मर गई थी...
अदालत के मुंसिफ ख़ुदा को फिर टोक देते हैं| "हमें यह सब तफसील नहीं चाहिए- हमें यह बताइए कि कगलर कब से शराब पीने लगा और बुरी सांगत में पड़ गया?"
ख़ुदा फिर मुस्कुराता देता है; कहता है- "इसका एक दोस्त था, जो जलसेना में भर्ती हो गया, और समुन्द्र की दुर्घटना में उसका जहाज डूब गया, और वो मर गया, और यह हताश होकर गलत लोगों की संगत में पड़ गया, और गारिबल नाम के एक शराबी के घर आने-जाने लगा| उसकी एक बेटी थी मेरी, जिससे यह प्यार करने लगा, लेकिन मेरी को पैसा कमाने के लिए उसके बाप ने एक ऐसी जलील जिंदगी में ढाल दिया था कि वो जवानी में ही मर गई, और मरते हुए उसका ही नाम लेकर पुकारती रही..."
मुंसिफ लोग खीझ-से उठते है, कहते हैं- "इस वाकयात का मुकदमे से कोई ताल्लुक नहीं, खुदावंद करीम! हमें यह बताइए कि इसने कितने क़त्ल किए?"
ईश्वर कहता है- "शहर में जब दंगा हुआ तो इसके हाथों पहला क़त्ल हुआ था| इसने जान-बूझकर नहीं किया था, पर इसके हाथों हुआ था| फिर जब इसे जेल में डाला दिया गया और वहां इसे यातनाएं दी गई तो इसके मन में वो दुःख ऐसा पकने लगा कि जेल से छूटने पर जब इसने एक लड़की से मुहब्बत की, और वो बेवफ़ा साबित हुई तो इसने उस लड़की का कत्ल कर दिया..."
और इस तरह कार्ल चेपाक की कहानी, हर घटना की गहराई में उतरती चली जाती है, और जब वो मुंसिफ आपना फैसला लिखने के लिए एक अलग कमरे में जाते हैं, तो कलगर ख़ुदा से पूछता है- "खुदावंद ! यह क्या हो रहा है? मैंने तो समझा था कि इस दूसरी दुनिया में तुम ख़ुद मुंसिफ होगे और ख़ुद फैसला सुनाओगे| लेकिन यहाँ भी..."
उस वक़्त ख़ुदा की मुस्कुराहट ग़मगीन हो जाती है और वो कहता है- फैसला सिर्फ वो लोग दे सकते हैं, जो अधूरा सच जानते हैं| मैं तो पूरा सच जानता हूँ| और पूरा सच जानने वाला इस तरह से फैसले नहीं देता....
“I wanted to become a Napoleon, that is why I killed her... Do you understand now?- Crime and Punishment
‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ का नायक राम भी है और रावण भी| और दोस्तोवस्की राम को रावण से  और रावण को राम से अलग करने के लिए कहीं भी अस्पष्ट लकीर नहीं खीचते है| दोस्तोवस्की अपने पत्रों को कभी भी किसी छवि में कैद नहीं करते हैं| उनकी किताब में न तो कोई खलनायक होता है, और न ही कोई नायक| दोस्तोवस्की मनुष्य के मन को समझते है, वे जानते हैं कि मनुष्य बहुचितवान है, उसे किसी छवि के साथ कैद करना न्याय नहीं है| इसीलिए ‘ब्रदर्स करमाज़ोव’ हो या ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’, कहीं भी आप यह तय नहीं कर पाएँगे कि कौन सही था और कौन गलत| अपने पात्रों के साथ जितना न्याय दोस्तोवस्की कर पाते है, उतना और किसी ने नहीं किया है| सभी लेखक पक्षपातों और अपने समूह की मान्यताओं से बंधे होते हैं| हर कोई अपने चश्मे से चाँद को देखता है, और अपने ढंग से उसकी व्याख्या करता है| लेकिन दोस्तोवस्की नंगी आँख से खुले आसमान के नीचे खड़े हो कर चाँद को देखते हैं, और फिर चाँद उनसे जो भी कहता है, उसे लिख देते हैं| दोस्तोवस्की की अपनी कोई मान्यता नहीं है, उनके पात्र स्वतंत्र हैं| इसीलिए सत्य के जितने क़रीब दोस्तोवस्की आ पाते हैं, उतना कोई दूसरा नहीं आ पता है| दोस्तोवस्की को पढ़ना बेघर होने जैसा है| जिस ज़मीन पर आप अभी खड़े हैं, उसे दोस्तोवस्की आपके पैरों के नीचे से खींच लेंगे| दोस्तोवस्की को पढ़ना एक अनंत खाई में गिरने जैसा है|
‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ दोस्तोवस्की की सबसे प्रसिद्ध कृति है| आप अगर गूगल पर दुनिया के सबसे लोकप्रिय उपन्यासों की सूचि ढूंढेंगे, तो उसमे प्रथम दस में ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ का नाम आता है| बहुत ही सरल कृति है, कहानी समझने मैं आपको कहीं कोई दिक्कत नहीं होगी| पात्र भी ज्यादा नहीं हैं, इसीलिए नाम याद रखने में भी ज्यादा झंझंट नहीं होती है| रूसी उपन्यास पढ़ने में सबसे अधिक दिक्कत नाम याद करने की ही होती है| अगर आप दुनिया के बेहतरीन साहित्यों से अभी तक परिचित नहीं हैं, तो ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ आपके के लिए सबसे उपयुक्त किताब है| आप यहाँ से शुरुआत कर सकते हैं| लेकिन शुरुआत को अंत मत मान लीजिएगा, ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में जिस बीच को दोस्तोवस्की ने रोपा है, वह ‘ब्रदर्स करमाज़ोव’ में वृक्ष बनता है, ‘दी इडियट’ में उसमे फूल लगते हैं, और ‘नोट्स फ्रॉम अंडरग्राउंड’ उस फूल की सुवास है| 

पीछे मैंने आपसे लियो टॉलस्टॉय एक किताब ‘रेज़रेक्शन’ की बात की थी| उस किताब में टॉलस्टॉय एक जगह लिखते हैं, “यह एक आम मान्यता है कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं- अच्छे और बुरे| जो अच्छा है वह हमेशा अच्छा है, और जो बुरा है वह हमेशा बुरा है| लेकिन यह मान्यता भ्रांत है| बुरे से बुरा आदमी भी हमेशा बुरा नहीं होता है, और अच्छे से अच्छा आदमी भी हमेशा अच्छा नहीं होता है| इन फैक्ट, आदमी न तो अच्छा होता है और न ही बुरा, वह बस आदमी होता है|” इसी चीज़ को लओत्जु दूसरे ढंग से कहते हैं, “तारीफ़ और निंदा दोनों इंसान को पाखंड की ओर धकेलता है| जब तुम किसी से कहते हो, “आप अच्छे हैं”, तो तुम उसे अच्छाई से बाँध रहे हो, अब तुम्हारी नज़र में अच्छा बने रहने के लिए वह पाखंड का सहारा लेगा| इसी तरह जब तुम किसी से कहते हो, “आप बुरे हैं”, तब तुम उसे बुराई से बाँध देते हो| एक बार जब कोई व्यक्ति किसी ‘छवि’ से बंध जाता है, तो उसे कायम रखने के लिए वह पाखंड का सहारा लेने लगता है|’’ एक बार जब हम किसी व्यक्ति को किसी छवि से बाँध कर देख लेते हैं, तो फिर उसे छवि से परे देखने में हमें परेशानी होनी लगती है| जैसे अगर कोई हमसे यह कहने लगे कि रावण उतना बुरा नहीं था जितना हम उसे बारे में सोचते है, और राम उतने भी अच्छे नहीं जितना हम उन्हें मानते हैं, तो हमें परेशानी होने लगती है, हम असहज होने लगते हैं| हम ऐसा मान कर चलते हैं कि राम सदा अच्छे थे, और रावण सदा बुरा था| लेकिन यह मान्यता सही नहीं है| कोई भी राम हमेशा अच्छा नहीं होता है, और न ही कोई रावण हमेशा बुरा होता है| लेकिन हम ऐसा मान कर चलते है, इसीलिए हम फिर राम की गलतियों और रावण के पुण्यों पर लीपापोती करने लगते हैं| हम राम की कहानी में से उन सब बातों को हटा देते हैं, जिससे हमारी अच्छे की मान्यता को चोट पहुँचती हो, और रावण की कहानी में उन सब बुराइयों को भी जोड़ देते हैं, जो रावण में कभी था भी नहीं| हमारी सभी कहानियां अतिशयोक्तियों से भरी पड़ी है|
लेकिन हम इन तथ्यों को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते हैं| क्योंकि इन को स्वीकार करते ही हमारी न्याय व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी| क्योंकि जिसको हम बुरा कह रहे हैं, वह अगर हमेशा बुरा नहीं है, और जिसको हम अच्छा कह रहे हैं, हमेशा अच्छा नहीं है, तो फिर सज़ा कैसे देंगे? सज़ा देने के लिए यह सिद्ध कर देना अत्यंत आवश्यक है कि बुरा हमेशा बुरा है, और अच्छा हमेशा अच्छा है|
लेकिन अगर अच्छा, अच्छा नहीं है, और बुरा, बुरा नहीं है, और हम इस तथ्य को स्वीकारते हैं, तो हमें अपने कथा-कहानियों को फिर से लिखना पड़ेगा| फिर हमें इस कहावत को बदलना पड़ेगा कि ‘सत्यमेव जयते’, यह कहावत झूठ है, मामला बस इतना है कि जो भी जीतता है उसे सत्य मान लिया जाता है| क्योंकि वस्तुतः न तो इस जगत कुछ सत्य है, और न ही झूठ- सब व्याख्या है| एक ‘तथ्य’ की व्याख्या हज़ार तरीके से की जा सकती| जिस तर्क से हम राम को भगवान सिद्ध करते हैं, और रावण को राक्षस उसी तर्क से इससे उल्टा भी सिद्ध किया जा सकता है| सारे तर्क बेठुआ होते हैं| इसीलिए कोई भी मान्यता कभी भी सार्वभौमिक नहीं हो सकती है| पूरी दुनिया किभी भी किसी आदमी को एक मत होकर कभी न तो अच्छा मान सकती है, और न ही कभी बुरा| अगर दुनिया में राम, कृष्ण, महावीर और बुद्ध को पूजने वाले लोग हैं, तो ऐसे भी लोग हैं जो रावण, कंस, हिटलर और तैमूर को पूजते हैं| किसी खास समुदाय में ही किसी को अच्छा या बुरा माना जा सकता है| इसीलिए हर व्यक्ति अपने हिसाब के समूह के साथ रहना पसंद करता है| और एक समूह का व्यक्ति हमेशा दूसरे समूह के लोगों को गलत मान कर चलता है| अगर हमारे समूह में शादीशुदा और पतिव्रता स्त्री को सही माना जाता है, तो इस दुनिया में ऐसे समूह हैं जिसमे वेश्याओं को सही माना जाता है, और शादीशुदा स्त्री को नीच और चरित्रहीन समझा जाता है| ऐसे में आप कैसे तय कर सकते हैं कि कौन सही है, और कौन गलत? हमारे पास सही और गलत को तय करने का एक ही पैमाना है और वो है भीड़| हमारी मान्यता है कि अधिक लोग जिस मत में मानते हैं वह सही है| लेकिन यह मान्यता बिलकुल ही भ्रांत है| क्योंकि ऐसे लोग हैं जो यह सिद्ध करने पर अमादा हैं कि अधिक लोग सिर्फ उन्ही चीज़ों को मानते हैं जो बिलकुल ही नासमझी की है| वे भीड़ की तुलना भेड़ से करते हैं| उनके अनुसार भीड़ हमेशा अंधानुकरण में जीती है|
सब के पास अपनी-अपनी दलीलें हैं, सब के पास अपनी-अपनी मान्यताएं हैं| इसीलिए जिसको भी आप गौर से सुनेंगे वही आपको सही लगने लगेगा| सभी मतों के लोगों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है उनके समूह का व्यक्ति किसी और समूह की बात को गौर से न सुने| इसीलिए सब भोपूं लगा कर अपनी गुणगान और दूसरों की निंदा करने में लगे रहते हैं|
दोस्तोवस्की, कामू, चेपक, काफ्का और टॉलस्टॉय को पढ़ना नए पाठकों के लिए बहुत ही हिलाने वला अनुभव हो सकता है| इन लोगों का संबंध किसी समूह से नहीं है, ये मान्यताओं में नहीं मानते हैं| ये मनुष्य को उसकी पूरी विराटता और संभावनाओं के साथ स्वीकार करते हैं, उसे किसी छवि में कैद नहीं करते हैं| दोस्तोवस्की ख़ुदावंद है जो सिर्फ गवाही देते हैं, फैसला करने का काम वे पाठकों पर छोड़ देते हैं| लेकिन बिडम्बना यह है कि इनको पढ़ने के बाद पाठक किसी भी निर्णय पर पहुँचने की स्थिति में रह नहीं जाता है| जिसने एक बार ख़ुदावंद को सुन लिया, उस का ख़ुदा हो जाना तय है| यही तो तुलसी कहते हैं, “झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥ जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥“
      Crime? What crime? He cried in sudden fury. ‘That I killed a vile noxious insect, an old pawnbroker woman, of use to no one !... Killing her was atonement for forty sins. She was sucking the life out of poor people. Was that a crime? - Crime and Punishment


-इक्क्यु केंशो तजु 

Sunday, 27 May 2018

“द आउटसाइडर’


              किताब का नाम- द आउटसाइडर, लेखक- अल्बर्ट कामू
               “My mother died today. Or maybe yesterday, I don’t know.”- The outsider
अलबर्ट कामू पिछली सदी के उन चंद ख़तरनाक लोगों में से एक हैं, जिनको पढ़ना और जिनसे बचना दोनों ही बहुत ज़रूरी है| लेकिन समस्या यह है कि यह दो काम एक साथ संभव नहीं है| अगर आप इनको पढ़ते हैं, तो इन से बचना क़रीब-क़रीब असंभव है| क़रीब-क़रीब इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि कुछ हैं जिनकी बुद्धि भैंस की चमड़ी जितनी मोटी होती है, (ये भेंस की चमड़ी वाली बात बचपन में माँ मेरे लिए इस्तेमाल में लाती थी) ऐसी मोटी बुद्धि वाले लोग, पढ़कर भी बच सकते हैं| बांकी जो थोड़े भी समझदार और चेतनावान हैं, उन के लिए बचना बहुत ही मुश्किल है|
                             “Mama often said that no one is ever really entirely unhappy.”
कामू की द आउटसाइडर’ 120 पेज की एक बहुत ही पतली किताब है| किताब को बड़े आराम से एक दिन में पढ़ा जा सकता है, कहनी बिलकुल सरल और सीधी है| लेकिन इसको पचाने में आपको सालों लग सकते हैं| और अगर ग़लती से आप इसे नहीं पचा पाए, तो पहले यह नासूर बनेगा, फिर नासूर से कर्क रोग, और अंत में आप केंसर से मर जाएंगे| तो, इसे पढ़ने से पहले अच्छे से सोच विचार कर लेना जरूरी है| नहीं तो आपकी स्थिति सांप छुछुंदर जैसी हो जाएगी| अगर पचा लिया, तो आप एक ऐसे व्यक्ति हो जाएंगे, जिस तरह के व्यक्तियों से आपके माता-पिता बचपन में आपको हमेशा दूर रहने के लिए कहते थे| और अगर नहीं पचा पाए, तो कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से आपकी मौत होगी|

कामू का मर्सो बहुत ही ख़तरनाक आदमी है| सामने माँ की लाश पड़ी है, और वह रोने-धोने के बजाए सिगरेट फूंक रहा है| 24 घंटे भी माँ को जलाए नहीं हुए हैं, और वह स्विमिंग पूल में अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ रंगरलियां मना रहा है, “Gentlemen of the Jury, just after his mother’s death, this man went swimming, began a casual affair and went to see a comedy. I have nothing more to say.” लेकिन इस सब का यह अर्थ नहीं है कि मर्सो अपनी माँ से प्यार नहीं करता है| नहीं वह अपनी माँ से उतना ही प्यार करता है, जितना कोई भी बेटा अपनी माँ से कर सकता है, “I undoubtedly loved Mama very much, but that didn’t mean anything. Every normal person sometimes wishes the people they love would die.” मर्सो वहां से बोल रहा हैं, जिसको जुंग ने स्टोरहाउस ऑफ़ कांशसनेसकहा है| यह वह जगह है, जहाँ आप दिन तो क्या रात सपने में भी जाना पसंद नहीं करते हैं|
                                                “Everything is true and nothing is true.”
द आउटसाइडरकामू की कालजयी रचना है| कामू का मर्सो मेरे लिए बिलकुल भी अजनबीनहीं है| साहित्य संसार में, कामू की द स्ट्रेंजर/आउटसाइडरपढ़ने से पहले, मर्सो के अलावा दो और लोगों को, मैं बहुत पहले से जानता था, जो मर्सो की तरह आउटसाइडर हैं| एक तुर्गनेव का बज़ारोव और दूसरा दोस्तोवस्की का रस्कोलनिकोव | तुर्गनेव का बज़ारोवमेरे सबसे अधिक पसंदीदा साहित्य चरित्रों में से एक है| रस्कोलनिकोव को में समझ सकता हूँ, इन फैक्ट उसे अच्छे से समझता हूँ, फिर भी उसमे कुछ ऐसा है जो मेरे लिए दस्तरस नहीं है| मेरी पूरी सहानुभूति उसके साथ नहीं है| बज़ारोव के साथ मेरी समानुभूति है, उसके साथ मैं 100 फीसदी राज़ी हूँ|
निज़ी ज़िन्दगी में भी, मैं मर्सो और बज़ारोव से बहुत ही अच्छे से परिचित हूँ| लेकिन आपके लिए किताब 10000 वोल्ट का झटका हो सकता है| इसीलिए जरा संभल कर| ‘तब्सिरापढ़ कर झट से आर्डर मत दे दीजिएगा| इस किताब को पढ़ने के बाद कई लोगों का दिमागी संतुलन बिगड़ चुका है| एक महानुभाव, जिनका नाम कामेल दाउद है, का दिमाग किताब पढ़ कर इतना सटक गया कि इन्होने इस किताब के खिलाफ एक पूरी किताब लिख दी| इसलिए ज़रा संभल कर, बहुत कठिन है डगर पनघट की| किताब का हैंगओवर महीनो तक आप पर हावी रह सकता है| एक बार दोस्तोवस्की की ब्रदर्स करमाज़ोवपढ़ते-पढ़ते मुझे ही ऐसा लगने लगा था कि कहीं मैं ही पागल ना हो जाऊं(क्या पता हो ही गया होऊं)| दोस्तोवस्की और कामू एक ही स्कूल से आते हैं| अतः दोनों, आपको सच में पागल कर सकते हैं| कामू एक बहुत ही ख़तरनाक दार्शनिक हैं, उनका दर्शन ईश्वर के इर्दगिर्द नहीं घूमता है| ईश्वर इत्यादि के बकवास में वे ज्यादा उत्सुक नहीं है| उनके लिए जीवन में एक ही मूलभूत समस्या है, आत्महत्या करें या ना करें?” इसीलिए अगर आपको जीवन पर पकड़ बनाए रखनी हो, तो कामू से थोड़ी दूरी बना कर रखिये|
“I have never truly been able to regret anything. I was always preoccupied by what was about to happen, either today or tomorrow.”
अगर आपको अपनी घर-गृहस्थी, और रोजगार ठीक ढंग से चलाना है, और किसी जोम्बी की तरह घिसट-घिसट कर मर जाना है, तो मैं यहाँ आपको उन लोगों के नामों की लिस्ट दे रहा हूँ, जिनसे मिलना तो दूर, आपको उनके आसपास भी नहीं फटकना चाहिए| दोस्तोवस्की(दइडियट और ब्रदर्स करमाज़ोव और नोट्स फॉर्म अंडरग्राउंड), तुर्गनेव (फादर्स एंड संस), कामू (द आउटसाइडर), हक्सले (आइलैंड), एलन वाट्स (दी बुक), टॉलस्टॉय (रेज़रेक्शन) और काफ्का (कहानियां), ये वो सात लोग हैं, जिन से आपको हमेशा बच कर रहना चाहिए| अगर ग़लती से भी कभी आप इनके चपेटे में आ गए, तो फिर धोबी के गधे की तरह, आप ना तो घर के रह जाएंगे, और ना ही घाट के| इस लिस्ट में दो और नाम हैं| ये दोनों भस्मासुर भारतीय हैं| मैंने जानबूझ कर इन दोनों महाभूपों का नाम लिस्ट में शामिल नहीं किया है| क्योंकि, ये दोनों लॉरेन हार्डी, उन लोगों के लिए हैं, जो अपना आमूल विनाश यानि सर्वनाश चाहते हैं| ये दोनों उनके लिए हैं, जिनके इंतजार में कबीर बीच गाँव में खड़े होकर कह रहे हैं, कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकठी हाथ जो घर बारे आपना चले हमारे साथ| ये उन फ़कीरों के लिए हैं, जिनकी घर फूंकने की तैयारी है, आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक"| जो एक बार घर छोड़ कर निकला तो फिर मुड़ कर नहीं देखा| ये उनके लिए लिए हैं जिनके कुल में अब कोई रोने धोने के लिए भी नहीं बचा,राम विमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा
        “Even in the dock, it is always interesting to hear people talk about you.” -The outsider
अगर आप ख़ुद का नामोंनिशान हमेशा-हमेशा के लिए मिटाने के लिए आमादा हों, तो मैं आपको उनका नाम बता सकता हूँ| इन फैक्ट अभी ही बता देता हूँ, शुभ कार्य में विलंब क्यों? एक हैं मैरून माफ़िया के सरगना धार्मिक आतंकवादी ओशो’, और दूसरे हैं धर्म के ब्रह्मास्त्र जिद्दु कृष्णमूर्ति| ये दोनों वो तीर्थ हैं, जहाँ से नाहा कर कोई वापिस नहीं लौटता| ये दोनों काल के गाल हैं, एक बार अगर आप इनमे प्रवेश करते हैं, तो फिर ‘come back’ नहीं है| ये दोनों महामृत्यु हैं
ये दोनों बड़े ही अनूठे ढंग से आपका क़त्ल करेंगे| एक पहले लतीफ़ा और लच्छेदार बातें सुना कर आपको हँसाएगा, गुदगुदी लगेगा, हँसाते-हंसाते आपको बेसुध कर देगा| जब आप हँसते-हँसते बेहोश हो कर गिर जाएँगे, तब तर्क की दोधारी तलवार से आप का गला रेत दिया जाएगा| एक बूंद भी शोणित नहीं बहेगा और आप का काम तमाम हो जाएगा| दूसरा, आपको लतीफ़ा तो नहीं सुनाएगा, लेकिन बात ही इनती अनोखी बोलेगा कि सुन कर आपको हंसी आएगी| लेकिन क्या आपको हंसने दिया जाएगा? जी नहीं आपको हंसने नहीं दिया जाएगा| “Sir, please don’t laugh, don’t waste your energy.” ऐसा बोल कर आपको चुप कर दिया जाएगा| लेकिन कितनी देर कोई हंसी रोक कर बैठ सकता है? किसी भी चीज़ की एक सीमा होती है| आप का दम घुटने लगेगा, आपके प्राण शरीर छोड़ने के लिए छटपटाएंगे| जल्दी ही आप उस पॉइंट पर पहुँच जाएँगे, जहाँ एक और लतीफ़े जैसी बातअगर आपको सुनाई गई, और हंसने नहीं दिया गया, तो तक्षण आप पूरे हो जाएँगे| लेकिन आप उस क्षण इस घुटन भरी जिंदगी से मर जाना ज्यादा उचित समझेंगे| आपको अपने मरने का ग़म नहीं होगा| आपको बेसब्री से इंतजार कर  रहे होंगे एक और लतीफ़े जैसी बातकी..., आप चाह रहे होंगे हैं कि एक और लतीफ़ा आपको सुनाया जाए...., और आपको इस घुटन से..., इस देह की बोझ से मुक्ति मिल जाए| ताकि आप स्वर्ग में खुल कर हंस सके| लेकिन तभी कहानी में ट्विस्ट की तरह आपसे एक यक्ष प्रश्न पूछा जाएगा| प्रश्न सुनकर आप हंसी भूल जाएँगे| अब दांत निपोड़ने के बजाए, आप अपना सिर खुजाने लगेंगे| आपको सिर खुजाते देख कर, आपसे एक और यक्ष प्रश्न पूछा जाएगा| फिर आपको दाढ़ी में खुजली होने लगेगी| आपको अपनी दाढ़ी खुजाता देख कर, आप से तीसरा सवाल पूछा जाएगा| अब आपको पीठ में खुजली होने लगेगी| फिर चौथा प्रश्न, फिर पांचवा, फिर छठा, एक के बाद एक प्रश्नों की बमबारी शुरू हो जाएगी| अब, आपके पूरे शरीर में खुजली का भयंकर उत्पात मचेगा| सिर से लेकर पैर तक कोई ऐसा अंग नहीं बचेगा जहाँ आपको खुजली नहीं हो रही होगी| एक ऐसी घनघोर खुजली मचेगी, जिसकी आपने कभी सपनो में भी परिकल्पना नहीं की होगी| काश उस वक़्त आपके पास दस हाथ होते! लेकिन यह तो काशहै, हकीकत यह है कि आपके पास सिर्फ दो ही हाथ है| और दो कमज़ोर हाथों से आप कितना खुजा सकते हैं....? आपको अफ़सोस होगा कि आज ही आपने नाखून क्यूँ कटा था? आप सोचेंगे, 'आज अगर नाख़ून बड़े होते तो अच्छे से खुजा पता'| किसी से आप मदद भी नहीं मांग पाएँगे, क्योंकि आपका पड़ोसी भी आपनी खुजली शांत करने में व्यस्त होगा| पहले से पता होता, तो घर से खुजली की कोई दवाई, लेकर आये होते, लेकिन अब इस वक्त इस निर्जन में क्या उपाय करे कोई? अरे पहले पता होता तो आप आते ही नहीं, लेकिन अब क्या हो सकता है? खुजली का भयंकर उत्पात परमाणु के विस्फोट की तरह एक से तीन, तीन से 9 और फिर 9 से अनंत की तरफ बढ़ता ही चला जाएगा| अंत में कुछ खुलजी और कुछ खुलजी को ना खुजा पाने की खुजली की वजह से, मौके पर ही आप टें बोल देंगे| और किसी को कानो-कान ख़बर नहीं होगी कि आप खुजली से मरे|  "वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं, ये काम किस ने किया है, ये काम किस का था " |  फिर घटेगा चमत्कारों का चमत्कार, मर कर आप पाएँगे कि जीतेजी जिन यक्ष प्रश्नों को सुन कर सिर खुजा रहे थे, मरते ही उन सारे प्रश्नों का आपको हल मिल गया| लेकिन अब इस ज्ञान का क्या फायदा? क्या बरसा जब कृषि सुखाने? 
“She murmured that I was very strange, that she undoubtedly loved me for that very reason, but that one day she might find me repulsive, for the some reason.” –The outsider
इन सात और दो नौ, लोगों से अगर आप ख़ुद को बचा लेते हैं, तो आप हमेशा सेफ है, फिर कोई माई-का-लाल आपको आपके नर्क से खीच कर बाहर नहीं ला सकता है| फिर आराम से नौकरी कीजिये, पैसा कमाइए, घर बनाइये, नाम कमाइये, जो मन में आये वो कीजिये, जिंदगी अपनी है, मौज जीते से रहिए| बस इन कुल-सोधनोंसे बचिए| अगर आपको रस्ते में सांप और इन दोनों में कोई एक साथ दिख जाएँ, तो पहले इनको मारिये, सांप का काटा तो बच भी सकता है, लेकिन इनका काटा हुआ, बिना पानी मांगे ही दम तोड़ देता है|  जैसे शंकर ने कहा था भज गोविन्दं मूढ़मते, उसी तरह मैं आप से कहना चाहता हूँ, बच इन दोनों से मूढ़मते, बच| इनसे अगर जान बच गई, तो जीने के लाखो उपाय कर लेंगे| फिर तो, सौ-सौ जूते खाएँगे, मगर तमाशा घुस कर देखेंगे| 
“The first few days she was at the old people’s home, she often cried. But that was because her routine had changed. After a few months, she would have cried if she’d been taken out of the home. For the same reason.” – The outsider


Wednesday, 23 May 2018

‘दी इडियट’ (विवेचन)


किताब का नाम- दी इडियट’, लेखक- दोस्तोवस्की
‘दी इडियट’ दोस्तोवस्की की सबसे से कम चर्चित किताबों में से एक है| लेकिन, मेरी दृष्टि में ‘द इडियट’ दोस्तोवस्की की सबसे उत्कृष्ट कृति है| अगर मुझे दुनियां की सबसे बेहतरीन दस किताबों की फेहरिस्त बनानी हो, तो मैं ‘द इडियट’ को शीर्ष पर रखूँगा| ‘द इडियट’ उस ऊंचाई की किताब है, जिस उंचाई को देखने में ‘उपनिषदों’ की भी गर्दन टूट जाए| अगर इस किताब को भारत के किसी ऋषि ने लिखा होता, तो हिन्दू बेझिझक किताब को ही ईश्वर का अवतार मान लेते| जैसे बाल्मिकी ने राम के जन्म से सैकड़ो साल पहले रामायण लिखी थी, वैसे ही संभवतः दोस्तोवस्की ने यह कथा लिखी है|
यह किताब लिखकर दोस्तोवस्की ने अस्तित्व की सृजनात्मक क्षमता को चुनौती दी है| अभी तक इस पृथ्वी पर जितने भी बुद्ध पुरुषों का जन्म हुआ है| उन सभी का जन्म पुरुष के वीर्य और स्त्री के गर्भ से हुआ है| इससे इतर घटना सिर्फ एक बार घटी है| कहा जाता है कि जीसस का जन्म कुवारी माँ से हुआ था, मतलब बिना किसी पुरुष से संबंध बनाए मरियम गर्भवती हो गई थी| जन्म के मामले में यह अब तक की सबसे ज्यादा चमत्कृत करने वाली घटना है|  
लेकिन, दोस्तोवस्की ने जो चमत्कार पैदा किया है, उस के सामने अभी तक के सभी चमत्कारों की आभा मंद पड़ जाती है| दोस्तोवस्की ने ‘कलम’ की नोक से बुद्ध पैदा कर दिया| इस तरह के चमत्कार का इतिहास में इससे पहले कोई उल्लेख नहीं है| यह अघट पहली बार दोस्तोवस्की की कलम से घटा है|
दोस्तोवस्की का इडियट कोई साधारण इडियट नहीं है, वह ‘सम्बुद्ध’ है| किताब का नाम ‘इडियट’ रख कर दोस्तोवस्की ने मनुष्य की मूढ़ता का गहरा मजाज़ उड़ाया है| अगर यह दुनिया सम्यक व स्वस्थ्य होती तो निश्चित ही दोस्तोवस्की अपनी किताब का नाम ‘सेज’ रखते| लेकिन यह दुनिया एक बड़ा पागलखाना है| यहाँ हर कोई शीर्षासन किए हुए है| वेदों ने ठीक ही कहा है कि यह दुनिया एक ऐसे वट वृक्ष के समान है, जिसकी जड़ ऊपर की ओर, और शाखाएं नीचे की ओर है| यहाँ मुर्ख पंडित बने बैठे हैं, और पंडित मुर्ख बन मारा-मारा फिर रहा है| यहाँ बुद्धो को सूली दी जाती है, और बुद्धुरामों को पूजा जाता है|
किताब की शुरुआत में ही इडियट अपने बुद्धत्व की घोषणा करते हुए कहता, “What kind of idiot am I now, when I myself am aware of the fact that people consider me an idiot? They regard me as an idiot, but I’m intelligent, and they don’t realize It.” किताब अद्वितीय है| सदियों में ऐसी सुन्दर किताब लिखी जाती| किताब का नायक एक सीधा, सरल और बच्चो सा निर्दोष चित का व्यक्ति है| उसकी सरलता साधी हुई नहीं है, वह एकदम एफर्टलेस है| उसके आस-पास के लोग उसकी सरलता को उसकी मुर्खता समझते हैं, और उसे ‘इडियट’ कह कर पुकारते हैं| उसके परिचित और कुटुम्ब उसका मजाक उड़ाते हैं, उस पर हँसते हैं| लेकिन बड़े मजे की बात है कि जब लोग उस पर हँसते हैं, तो वह भी लोगों के साथ हँसने लगता है| वह बालचित जरूर है, लेकिन बचकाना नहीं है| उसकी जीवन दृष्टि सागर से भी ज्यादा गहरी है| प्रौढ़ उसकी बातों से चिढ़ते हैं, लेकिन बच्चों को उससे प्रेम है| उसे भी बच्चों का संगसाथ पसंद है| बड़ों का संग उसे जरा भी रुचता नहीं है| उसका मानना है कि, Through children the soul is healed.”
पूरी किताब में आत्म-शुद्धिकरण के सैकड़ो सूत्र हैं| इडियट का पूरा जीवन अनुकरणीय है|
“To kill murder is an immeasurably greater evil than the crime itself. Murder by judicial sentence is immeasurably more horrible than murder committed by bandit.”
 “And then it seemed to me that even in prison one might discover an immense life.”
“Nothing should be hidden from children on the pretext that they’re too young and it’s too soon for them to know.”
“Adults don’t realize that even in the most difficult matter a child can give extremely useful advice.”
                            

एक जगह इडियट अपने एक दूर के परिचित, जो कि काफी अमीर व्यक्ति है, से मिलने जाता है| वह आदमी पहले तो उसे पहचान ही नहीं पाता है, फिर जब इडियट उसे अपना परिचय देता है, तो उसे बिठाता है, और फिर चाय-पानी के लिए पूछता है| चाय-पानी के बाद वह इडियट से उसके मिलने आने के कारण के बारे में पूछता है| इस पर इडियट कहता है, “कोई कारण नहीं है, मैं बस आपसे यूं ही मिलने आया हूँ, बस मिलने के आनंद के लिए मिलने आया हूँ| (“I had a feeling’, the prince interrupted, that you would be bound to see some special purpose in my visit. But to be quite honest, apart from the pleasure of making your acquaintance, I have no private purpose.”) लेकिन अमीर व्यक्ति को यकीन नहीं आता है| वह बार-बार हर तरह से इडियट के मिलने आने का कारण पता करने की कोशिश करता है| लेकिन हर बार इडियट उसे यही समझाता है कि वह उससे अकारण मिलने आया है| लेकिन जिस आदमी ने अपनी पूरी ज़िन्दगी में एक भी कृत्य बिना हेतु के नहीं किया हो, उसे इडियट का अकर्म कैसे समझ आए| यह दृश पढ़ कर मुझे बहुत सी बातें याद आ गई| बहुत बार ऐसा होता था कि मैं अपने किसी दोस्त, संबंधी या किसी पुराने परिचित को यूं ही कॉल कर लेता था(यह मैं आपको तब की बात बता रहा हूँ, जब कॉल करने का प्रति मिनट 2.50 पैसा लगता था), या फिर कभी किसी के यहाँ मिलने चला जाता था| मैं बड़ा असहज महसूस करता था| सामने वाला हमेशा यही पता करने की कोशिश में दिखता था कि आख़िर मैंने उन्हें क्यों कॉल किया है, या फिर मैं क्यों उनके घर पर उनसे मिलने आया हूँ| अब मैं कॉल करने से पहले या फिर मिलने जाने से पहले कोई तर्कसांगत कारण पहले से सोच कर रखता हूँ| किसी से मिलना हो तो पहले कारण दूंढता हूँ, फिर मिलने जाता हूँ| इसी तरह की एक और घटना याद आ रही है| 2012 की बात है, मैं बम्बई में अपने एक दोस्त के साथ रह रहा था| एक बार मैंने अपने दोस्त से बम्बई में रह रहे हमारे एक परिचित से मिलने के लिए चलने को कहा| तो मेरे दोस्त ने मुझसे पूछा, “क्या उससे मिल कर हमें ख़ुशी मिलेगी?”, मैंने कहा, “हाँ मिलेगी|”, फिर उसने पूछा “क्या उसे हमसे मिलकर ख़ुशी मिलेगी|” मैंने कहा ‘शायद’| तो, वह कहने लगा फिर हम नहीं जाएंगे| ‘शायद’ किसी से मिलने जाने का बहुत ही कमज़ोर रीज़न है| “याद रखो, हमेशा ऐसे ही व्यक्ति से मिलने जाना चाहिए, जिसे मिल कर हमें ख़ुशी मिले है, और जिसको हमसे मिल कर ख़ुशी मिले’’, मेरे दोस्त ने उपदेश देते हुए मुझ से कहा था| आज मेरा वह इस दुनिया से जा चुका है, लेकिन ‘द इडियट’ पढ़ते हुए मैंने उसे कई बार याद किया| उसे भी लोगों से अकारण मिलने और बात करने में ख़ुशी मिलती थी| कारण दूंढने वाले व्यक्ति के पास वह नहीं जाता था, और यदि कोई सकारण उससे मिलने की कोशिश करता, तो वह जल्दी मिलता भी नहीं था|
किताब के कुछ सूत्र जो मुझे बेहद पसंद है, आपके साथ शेयर करता हूँ|

                “You are so pretty that one is afraid to look at you.”
                     “You always hurt the one you love.”
         “The vilest and hateful thing about money is that it even imparts talent.”
               “Human beings are created in order to torment one another.”
               “Sir, we know him for the simple reason that he’s well known.”
-इक्क्यु केंशो तजु



    

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...