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Monday, 31 August 2020

भीख मांग कर गुजारा कर लेना

“ऐसा कोई काम जिसको करने के बाद मन में तारीफ़ पाने, पैसा पाने, या कुछ भी पाने का ख्याल उठे, तो उस काम को करना बंद कर दीजिए, वह काम आपकी आत्मा को घुन की तरह खा जाएगा| उस काम को करने से अच्छा है भीख मांग कर गुजारा कर लेना|

 

इक्क्यु- मेरा एक प्रश्न है, सर ये बताइए हम कैसे जाने कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?

 

इक्क्यु- पश्चिम का एक बड़ा उपन्यासकार हुआ ऐल्डस लॅनर्ड हक्स्ले, उनकी किताब ब्रेव न्यू वर्ल्ड और आइलैंड पढ़ने जैसी है| हक्सले की पहली पत्नी मरिया थी, जिसके मरने के बाद हक्सले ने लॉरा अर्चेरा से शादी कर ली| लॉरा ख़ुद भी एक लेखिका थी, और साथ ही संगीतकार भी| हक्सले जिद्दु कृष्णमूर्ति, भारतीय चिंतन और ओरिएंट के दर्शन से बहुत प्रभावित थे| अक्सर वे अपनी पत्नी के साथ कृष्णमूर्ति के यहाँ चर्चा-परिचर्चा के लिए जाया करते थे|

 

कृष्णमूर्ति बारहा अपने प्रवचनों में गुरु, संस्था, और आर्डर आदि के खिलाफ बोलते रहते थे| लॉरा हक्सले ने एक दिन कृष्णमूर्ति से पूछा, "आप ऑर्गनाइजेशन और गुरु के खिलाफ बोलते हैं, लेकिन आप ख़ुद भी तो यही सब कर रहे हैं| अगर गुरु की ज़रूरत नहीं है, तो आप फिर प्रवचन क्यों देते हैं? आप अगर ऑर्गेनाइजेशन के खिलाफ हैं, तो फिर कृष्णमूर्ति फाउंडेशन क्यों चलाते हैं?"

 

लॉरा हक्सले के ये प्रश्न बहुतों के प्रश्न थे, कृष्णमूर्ति को जो लोग सुनते थे, उन में से बहुतों के मन में इस तरह के प्रश्न उठते थे| किसी ने अभी तक पूछने की हिम्मत नहीं की थी, लेकिन लॉरा ने पूछ लिया, उसके मन में भी बहुत दिनों से ये सब बातें घूम रही थी| जे. कृष्णमूर्ति ने जो लॉरा से कहा उसी में आपके प्रश्न का भी जवाब है|

 

कृष्णा जी ने ज़ोर देकर लॉरा से कहा, "I don't do it on purpose." मतलब "मैं यह सब किसी उद्देश्य से नहीं करता हूँ|" क्या अर्थ हुआ इसका? इसका अर्थ हुआ 'मैं जो कर रहा हूँ उसको करना मेरा आनंद है, इससे कोई फल मिले, इसका का कोई परिणाम हो ऐसी किसी आशा के साथ मैं ये सब नहीं करता हूँ|' इसको हमें इस तरह से समझें| सुबह पंछी गीत गाते हैं, फूल खुशबू बिखेरते हैं, क्या उद्देश्य है इस सब का? क्या पंछी पैसा कमाने के लिए गाते हैं? या इस लिए गाते हैं कि कोई उनको सुने? यदि ऐसा होता तो पंछी कब के डिप्रेश होकर गाना बंद कर दिए होते| वे गाते हैं क्योंकि गाना उनका आनंद है, इसके पीछे कोई हेतु नहीं| कोई हेतु अपने आप सिद्ध हो जाता हो, ये हो सकता है, लेकिन पंछीयों के तरफ से कोई नहीं है| आप उनके गीत सुनकर आनंदित हो सकते हैं, कोई ध्यानी उनके गीत सुनकर समाधि को उपलब्ध सकता है, कोई कवि कविता रच सकता है, कोई संगीतकार धुन तैयार कर सकता है, कुछ भी हो सकता है, लेकिन चिड़िया इन में से किसी भी कारण के लिए नहीं गाती है| कृष्णमूर्ति, रमण, ओशो, बुद्ध, कृष्ण या महावीर इसीलिए नहीं बोलते हैं कि उन्हें लोगों को बदलना है, नहीं ऐसा उद्देश्य रखकर वे नहीं बोलते हैं| अगर ऐसा होता तो वे कबके निराश होकर बोलना बंद कर देते| बुद्ध चालीस साल अहर्निश बोलते रहे, और उन चालीस साल में मुश्किल से चालीस लोग उनकी बातों से बदले होंगे| और मैं कहता हूँ अगर चार लोग भी यदि नहीं बदले होते तब भी बुद्ध बोलते ही रहते|

आप पूछती हैं " कैसे जाने कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?" बहुत ही सरल है| देखें कि आपके जीवन में ऐसा क्या है जो आप बिना किसी परिणाम के चिंता किए बगैर कर सकती हैं, वही आपके जीवन का उद्देश्य है| अगर आप कहती हैं कि आपको गीत गाना पसंद है, तो क्या आप तब भी गा सकती है जब आपको एक आदमी भी न सुने? और अगर कभी सुने भी तो तारीफ न करे? और कभी तारीफ भी कर दे, तो आपको गाने के लिए कोई इनाम या पैसा न दे? क्या तब भी आप उसी आनंद से गा सकती हैं? यदि हाँ तो गाना आपके जीवन का उद्देश्य है| फिर संगीत के प्रति ख़ुद को समर्पित पर दीजिए| बिना मांगे, बिन चाहे आप को वो सब मिल जाएगा, जिसकी तलाश में योगी और ध्यानी वर्षों तक हिमालय में तपस्या करते हैं, और उन्हें नहीं मिलता है|

 

कभी इस तरह से सोच कर देखें कि यदि दुनिया में पैसा, प्रसिद्ध और पॉवर जैसी चीज़ें नहीं होती, तो मैं करती??? क्या वही करती जो अभी कर रही हूँ, या फिर वही करना चाहती जो अभी करना चाह रही हूँ, यदि हाँ तो आपने अपने जीवन का उद्देश्य पा लिया है| यदि आपका जावाब नहीं है, तो फिर आपने उद्देश्य की तलाश कीजिए, मेहनत कीजिए, खोजिए कि वो क्या चीज़ है जिसको आप सिर्फ करने के आनंद के लिए कर सकती हैं| उसको करने में ही आपको इतना मजा आ रहा है कि आप उस से कुछ मिले ऐसी कोई उम्मीद नहीं बांधती हैं| भूखे पेट भी आप उसको कर सकती हैं| ग़ालिब का एक शेर है, "न सताइश की तमन्ना न सिले की परवा, गर नहीं हैं मिरे अशआर में मअ'नी न सही " मतलब न तो मुझे किसी की तारीफ़ चाहिए, न ही शिकायत से मुझे दुःख होता है, यदि मेरे शेर में कोई अर्थ नहीं है, तो न सही, मुझे कहने में मजा आता है, इसलिए मैं तो कहता रहूँगा|

 

डच चित्रकार हुआ वानगोग, उसका छोटा भाई थिओ उसे पैसे भेजता था, महीने का| वह एक दिन खाता था और दूसरे दिन उपवास करता था| भूखे रह कर पैसे बचाता था, फिर उस पैसे से रंग और कागज़ खरीद कर चित्र बनाता था| ख़ुद को गोली मारने से पहले उसने अपने भाई को लिखा, "मैं जो करना चाहता था, वो मैंने कर दिया, जैसी तस्वीर मैं बनाना चाहता था, मैंने बना दी, अब बेमतलब का जीने में मुझे मजा नहीं आ रहा है|" जब तक वानगोग जिंदा रहा उसकी एक पेंटिंग नहीं बिकी| लेकिन वह आनंदित था, किसी ने उसके चित्रों की तारीफ नहीं की लेकिन वह आनंदित था|

 

उसी बातचीत में लॉरा ने कृष्णा जी से पूछा, "आपके आनंद का क्या राज़ है", तो कृष्णमूर्ति ने कहा, "I don't mind what happens." (क्या होता है उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है|) यही राज़ की बात है-फर्क नहीं पड़ना चाहिए| कुछ लोग ऊपर-ऊपर से ऐसा बोलते हैं- अरे लोग पसंद करे या न करे, पैसा मिले या न मिले मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता| यदि ऊपर-उपर से ऐसा कहना पड़े, लोगों को दिखाने के लिए मुस्कुराना पड़े तो समझिये आप जो कर रहे हैं, वह गलत है| वह वो काम नहीं है जिसको करने के लिए आपका जन्म हुआ है| आप न सिर्फ लोगों धोखा दे रहे बल्कि अपना भी जीवन नष्ट कर रहे हैं| ऐसा कोई काम जिसको करने के बाद मन में तारीफ़ पाने, पैसा पाने, या कुछ भी पाने का ख्याल उठे, तो उस काम को करना बंद कर दीजिए, वह काम आपकी आत्मा को घुन की तरह खा जाएगा| उस काम को करने से अच्छा है भीख मांग कर गुजारा कर लेना|

 

ढूंढिए अपने जीवन में, कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होगा, सबके जीवन में होता है, कुछ लोग खोज लेते कुछ नहीं खोज पाते हैं, लेकिन होता सबके जीवन में है| आपके जीवन में भी कुछ ऐसा होगा जिसके बारे में आप कह पाएंगी, "स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा"| अभी जो आपका प्रश्न है, एक दिन मेरा भी था, 7 वर्ष लगे मुझे ढूँढने में, आपको भी वक़्त लग सकते हैं, क्योंकि समाज और शिक्षा ने हमारे आत्मा के ऊपर बहुत धूल चढ़ा दिए हैं, उनको हटाने में वक्त लग सकता है, लेकिन उद्देश्य मिलेगा ज़रूर| इसलिए, जब तक अपना उद्देश्य नहीं मिल जाता है, तब तक अपने उद्देश्य को खोजने को ही उद्देश्य मानकर आगे बढ़िये|

-इक्क्यु केंशो तजु

 

नोट-प्रश्नकर्ता ने जवाब पाने के लिए 500 रूपये डोनेट किये हैं| यदि आपके कोई प्रश्न हैं तो आप उसे ikkyutzu@gmail.com पर मेल करके पूछ सकते हैं| जवाब पाने के लिए डोनेट करना अनिवार्य है|



Thursday, 27 August 2020

रात का रिपोर्टर

 अब हम तुम्हे नहीं पढ़ा सकेंगे| जानती हो, आस-पड़ोस के लोग क्या कहते हैं ? कहते हैं, लड़का रिपोर्टिंग के लिए लिए बाहर रहता है और बूढ़ा पढ़ाने के बहाने अपनी जवान बहू के साथ........

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एक बूढ़ा बालक, लओत्सो नाम का यही अर्थ होता है चीनी भाषा में| कहते हैं लओत्सो जब पैदा हुआ तो वह 80 साल का था| कुछ लोग इस बात को प्रतीक की तरह लेते है, मतलब उसकी बौद्धिक उम्र उतनी थी| मेरी दृष्टि में लओत्सो ओरिएंट का असली हिमालय है, एक ऐसा हिमालय जिस पर पश्चिम का कोई हिलेरी कभी नहीं चढ़ सकता है| लओत्सो ज्ञान के गौरीशंकर हैं|
लओत्सो का सारा ज्ञान उनकी छोटी-सी किताब 'ताओ ते चिंग' में समाहित है| मुश्किल से 30 पेज की यह किताब अपने में अस्तित्व के सभी राज़ को समेटे हुए है| 'ताओ ते चिंग' के बहुत से सूत्रों में से एक सूत्र अस्तित्व के शुरुआत के बारे में हैं| उसी शुरुआत के बारे में, जिसके सम्बन्ध में अरविन्द सावित्री में लिखते हैं- It was the hour before the Gods awake. जी, यह उस क्षण की बात है जब ईश्वर अपनी नींद से जागा नहीं था| ग़ालिब कहते हैं, जब कुछ नहीं था तो ख़ुदा था, लेकिन लओत्सो ने कहा है कि जब कुछ भी नहीं था तब कोहरा था, धुंध था| ख़ुदा के होने के लिए बन्दे का होना ज़रूरी है, बिना बन्दे के ख़ुदा नहीं हो सकता है| इसलिए ग़ालिब की बातों में बहुत सचाई नहीं है| अरविन्द भी सत्य के बहुत करीब हैं, लेकिन उनकी भी ऊँगली ठीक सत्य पर नहीं है| ईश्वर और नींद ये सब द्वैत की बातें है|
लओत्सो की व्यख्या एकदम सटीक है- जब कुछ भी नहीं था तब धुंध था| रहस्यदर्शी के लिए अंग्रेज़ी में हम मिस्टिक शब्द का उपयोग करते हैं, यह शब्द भी मिस्ट यानि धुंध से बना है| संत वह जो धुंध को देखता है| हमें सब साफ़ दिखता है, हमें पता है कि क्या गलत है और क्या सही, पाप और पुण्य की परिभाषा हमें याद है| लेकिन संत को कुछ भी साफ़ नहीं होता है, उसके लिए पाप-पुण्य, सुख-दुःख, धर्म-अधर्म और अच्छा-बुरा इस सबमे कोई भेद नहीं होता है| उसको कुछ भी साफ़ नहीं होता है| सिर्फ मूर्खों को सब चीज़ें साफ़ दिखाई देती है, संत को नहीं, संत जहाँ से देखता है वहां सिर्फ घाना कोहरा है|
निर्मल वर्मा को पढ़ना धुंध को टटोलना है| निर्मल की दुनिया में कुछ भी साफ़ नहीं होता है, न तो वहां दिन का अलोक है, और न ही रात का अँधेरा, क्योंकि अभ्यास से कोई अँधेरे में भी दिन की तरह देख सकता है| चोर देख लेते हैं, शिकारी देख लेते हैं, आप भी देख सकते हैं| लेकिन कोहरे में देखने का कोई अभ्यास नहीं हो सकता है| आप कितनी ही कोशिश क्यूं न कर लें, कोहरे में कुछ भी साफ़ नहीं होता|
"ज़रा सोचिये, हम कैसे टाइम में जी रहे हैं, जहाँ आदमी अपनी औरत के सामने नंगा नहीं हो सकता है!" - निर्मल वर्मा (रात का रिपोर्टर)
यही सच है हमारे समय का, हमारे ही समय का क्यों यह हमेशा का सच है| कवि गंग को अकबर ने हाथी से कुचलवा दिया था, क्यों? क्योंकि उन्होंने लिखा 'जिसको हरि से प्रीत नहीं आस करे अकबर की' | हमें भी कुचल दिया गया है, हाथी से| यह और बात ही कि इस बार हाथी चीन से आया था|
लओत्सो कहते हैं, "The supreme rulers are hardly known by their subjects. The lesser are loved and praised. The even lesser are feared. The least are despised" (राजा वही महान है जिसकी उपस्थिति का बोध प्रजा को न के बराबर हो, समान्य राजा से लोग प्रेम करते हैं, उनकी प्रशंसा करते हैं, और घटिया रजा से प्रजा डरती है)
इस कसौटी पर आज के राजाओं को कहाँ रखते हैं? आज यह सवाल पूछना बहुत ज़रूरी है| आज ही क्यों यह सवाल हमेशा ज़रूरी था, और आगे भी रहेगा|
'ताओ ते चिंग' में ही लओत्सो का एक और वचन है, "The more laws and commands there are, the more thieves and robbers there will be. (अगर अपराध और अपराधी को बढ़ाना है तो नियम और कानून को बढ़ा दो|)
यही हो रहा है पूरी दुनिया में, रोज़ नए-नए नियमों को लोगों पर थोपा जाता है, कभी घर से बाहर मत निकलो, कभी बिना मुंह ढके बाहर मत निकलो, मत कहो को आसमां में छेद यह किसी व्यक्तिगत निंदा हो सकती है|
इसीलिए रिशी का बॉस, राय साहब, उससे आत्मकथा लिखने के लिए कहते हैं, क्योंकि समाज के सत्य को बिना सत्ता की नज़रों में आए लोगों तक पहुँचाने का एक मात्र उपाय है आत्माकथा| लेकिन वह दिन दूर नहीं जब दुनिया की सरकारें आत्मकथा लिखने पर बैन लगा देगी|
फिर रिशी के पिता को अपनी बहू से कहना पड़ेगा, "अब हम तुम्हे नहीं पढ़ा सकेंगे| जानती हो, आस-पड़ोस के लोग क्या कहते हैं ? कहते हैं, लड़का रिपोर्टिंग के लिए लिए बाहर रहता है और बूढ़ा पढ़ाने के बहाने अपनी जवान बहू के साथ........
-इक्क्यु केंशो तजु (२६, अगस्त २०२०)


Sunday, 23 August 2020

डरे हुए और काफी हद तक मरे हुए लोगों की दुनिया है

उसने पूछा, 'तुम्हे अपनी ग़रीबी से, भूख से या फिर अपनी मौत से डर नहीं लगता?'
'शायद नहीं, क्योंकि मैंने कई दिनों की लांघने की हैं, ऐसा भी हुआ है, जब एक दाना भी पेट में नहीं गया| कई महीने फंकामस्ती में गुजारे हैं, ऐसा कई बार हुआ, जब एक नया पैसा भी जेब में नहीं रहा, कहते हैं न --एक फूटी कौड़ी भी नहीं|' उसने ऐसा कहते हुए अपनी जेब में इस तरह से हाथ डाले जैसे उनमें अपने पुराने दिन टटोल रहा हो|
रेबेक ने फिर कुरेदा, 'और मौत?'
'कई बार मरते-मरते बचा, मौत कई बार करीब आकर लौट गई, अनुभव रोमांचक रहा पर भय कभी नहीं लगा| जिसके पास पैसा है, जिसे भूख लगने से पहले ही खाना मिल जाता है, जो हर तरह से सुरक्षित है, जिसे मृत्यु आसानी से छू नहीं सकती, वही सबसे ज्यादा डरता है| जितनी सुरक्षा, उतना डर| जितना पैसा, उतनी निर्धनता| यह डरे हुए और काफी हद तक मरे हुए लोगों की दुनिया है|'
-'डॉमनिक की वापसी' (लेखक-
Vivek Mishra
, प्रकाशन -
Kitabghar Prakashan
)
कई बार लोग मुझसे पूछते हैं, बुद्ध का इतना प्रभाव क्यों है दुनिया पर, आज पूरी दुनिया में लोग बौद्ध धर्म में उत्सुक हो रहे हैं, ऐसा क्यों, महावीर, नानक, कृष्ण और अन्य सद्गुरुओं का उतना प्रभाव क्यों नहीं ? तो, मैं उसने कहता हूँ, "ऐसा नहीं है कि बुद्ध किसी और सम्बुद्ध पुरुष से भिन्न हैं, या फिर उनका बोध औरों की अपेक्षा अधिक है| उनका प्रभाव है, क्योंकि सत्य को जिस ढंग से उन्होंने कहा है, वह बहुत ही सुंदर और सम्मोहक है| बुद्ध एक बहुत ही कुशल स्टोरी-टेलर (कहानी सुनाने वाला) हैं| जिस ढंग से बुद्ध ने सत्य को लोगों तक पहुँचाया वह बड़ा अद्भुत है| लोगों के हृदय को छूने के लिए सत्य का सिर्फ सत्य होना ही काफी नहीं है, उसका सुंदर होना भी ज़रूरी है|
विवेक मिश्र एक बहुत ही सम्मोहक कहानीकार हैं, इतने सम्मोहक कि यदि आप उनकी किताब 'डॉमनिक की वापसी' आज सुबह 5 बजे पढ़ना शुरू करते हैं, तो फिर आप उसे दोपहर एक बजे खत्म करके ही दम लेते हैं| और न सिर्फ किताब खत्म करते हैं, बल्कि तुरंत ही तब्सिरा लिखने के लिए भी मजबूर हो जाते है| ऐसा बहुत कम होता है कि 208 पेज की किताब कोई एक सिटींग में पढ़कर खत्म कर दे| लेकिन 'डॉमनिक की वापसी' के मामले में ऐसा बहुतों के साथ हो सकता है| सत्य को कहने का इतना सरल, सुंदर और अनूठा ढंग इससे पहले मैंने भगवतीचरण वर्मा की चित्रलेखा में देखा था| विवेक मिश्र जी जानते हैं कि सत्य को कैसे सुंदर और सरल ढंग से कहा जाए, इसीलिए उनकी बातें आपके हृदय को छूती है|
यह किताब (डॉमनिक की वापसी) जिस अनोखे ढंग से मेरे पास पहुंची उसके बारे में बताये बिना समीक्षा पूरी नहीं हो सकती है| यह कहानी भी किताब की जितनी ही रोचक है|
एक दिन, और वो दिन आज से कोई एक महीना पहले का था, मेरे फेसबुक इनबॉक्स एक में मेसेज आता है,
"इक्कयू तजु जी, नमस्कार,
अभी कुछ ही दिन पहले आपकी पोस्ट पढ़नी शुरू की और आपको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी और आपके स्वीकारने से हम जुड़ गए। जैसे जैसे आपको पढ़ रहा हूं, गहरे आश्चर्य से भरता जा रहा हूं। 2013 में शुरू किए और 15 में छपे मेरे उपन्यास का मुख्य पात्र डॉमनिक (दीपांश) न केवल आपकी तरह दिखता है, वह कई बिंदुओं पर आपकी तरह सोचता और बोलता भी है। जब मैं उसे लिख रहा था तब तक मैंने आपका होना नहीं जाना था।
कैसे डॉमनिक एक काल्पनिक चरित्र होने पर भी मैं आपमें उसे सजीव देख पा रहा हूं। ख़ुश भी हूं और आश्चर्य से भरा भी। पात्र पहले मिला और बाद में कहानी लिखी ये हुआ है पर कथा पहले लिखी और फिर कोई वहीं जीवन दृष्टि लिए। मात्र कला के लिए कला को जीता मिला। यह पहली बार हुआ। आप ऐसे ही बने रहिए। आपकी नियति डॉमनिक जैसी न हो। आप स्वस्थ और दीर्घायु हों। शुभकामनाएं|”
मेसेज पढ़ने के बाद मैं किताब में बेहद उत्सुक हो गया| सोचने लगा ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी किताब का पात्र मुझसे मिलता हो, और लेखक कहे कि मैंने कल्पना में जो चरित्र गढ़ा था, आप उसके मूर्त रूप हो| आज किताब पढ़ते समय शुरू के कुछ पन्नो पर मैं ख़ुद को ढूंढता रहा, लेकिन मैंने पाया कि यह तो मेरी कहानी नहीं है| लेकिन फिर 50 पेज पढ़ने के बाद, मुझे लगा यह मेरे नाम और रूप की कहानी नहीं है, मेरे आत्मा की कहानी है| फिर तो हर पेज पर मुझे सच में ही ऐसा लगा कि किताब जैसे मेरी आत्मकथा हो|
मैं हमेशा ऐसा सोचता हूँ कि आत्माकथा अगर सच में ही आत्मकथा है, तो वह फिर सब की कथा होती है| एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य के बीच जो भेद है, वह भेद नाम और रूप का है, पता ठिकाने का है, लेकिन आत्मा का नहीं है| आत्मा के तल पर हम सब एक हैं| इसलिए डॉमनिक की कहानी हर उस व्यक्ति की कहानी है, जो आत्मअनुसन्धान में लगा है|
सत्य तक पहुँचने के तीन मार्ग है, मैथ्स, म्यूजिक और मैडिटेशन| डॉमनिक ने म्यूजिक और अभिनय को अपना मार्ग बनाया है| माध्यम कोई भी हो मार्ग की अनुभूतियां सबकी एक जैसी ही होती है| डॉमनिक हम सबके अस्तित्व वह हिस्सा है, जिसे लेकर हम पैदा हुए थे, और जो धन कमाने, पद पाने, सेक्स पाने और पावर की पीछे भागने में कहीं खो गया है| डॉमनिक की वापसी पढ़ना अपने घर वापसी जैसा है| किताब पढ़ते समय आपको कई बार अपने उस संसार की याद आएगी, जिससे आपका सम्बन्ध वर्षों पहले टूट गया था|
अगर आप थोड़े हिम्मत वाले हुए, तो किताब खत्म होते ही आपके भीतर भी बहुत से दौड़ खत्म हो जाएँगे, आप उस संसार की और वापिस लौटने लगेंगे, जहाँ के आप असली निवासी है| यह दुनिया जिसमे अभी हम रह रहे हैं, यह तो बस एक सराय है| याद कीजिए जीसस का वो वचन, “यह दुनिया एक पुल की तरह है, इससे होकर गुजर जाओ, यहाँ अपना घर मत बनाओ”| आइये डॉमनिक के साथ हम सब भी अपनी दुनिया में वापिस चलें|
-इक्क्यु केंशो तजु

Monday, 17 August 2020

पुरुष का प्रेम अंततः अन्याय में बदल जाता है

 "समझदार स्त्रियाँ अपना चंडी वाला रूप पति के लिए बचाकर रख लेती है, प्रेमी के सामने वह अपना 'आई एम् अ स्वीट गर्ल' वाला पहलु ही उजागर करती है"

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प्रश्न- एक सवाल प्राय: मन में उठता है कि अगर राधा से इतना ही प्रेम था, तो कृष्ण उन्हें छोड़कर क्यों चले गए। फिर कभी लौटे क्यों नहीं, और शादी क्यों नहीं की । बैरागी की जिंदगी जीने के लिए छोड़ क्यों दिये ।


इक्क्यु- यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, बहुतों के मन में उठता है| दो-तीन दिशाओं से इसको समझने की कोशिश करते हैं|


पहला- आधुनिक मनोविज्ञान कहता है कि स्त्री उसी से शादी करती हैं, जिनसे उन्हें बदला लेना होता है| यदि कोई लड़की सच में ही आपसे प्रेम करती है, तो वह कभी भी आपसे शादी नहीं करेगी, वह आपको इतना बड़ा दुःख नहीं देगी| समझदार स्त्रियाँ अपना चंडी वाला रूप पति के लिए बचाकर रख लेती है, प्रेमी के सामने वह अपना 'आई एम् अ स्वीट गर्ल' वाला पहलु ही उजागर करती है| जिन लोगों की भी प्रमिकाओं ने उसने शादी कर लिया है, वो यहाँ मेरी बात को गहराई से समझ सकते हैं| शादी के बाद स्त्री का जो विकराल रूप अपने पति के सामने निकलकर आता है, उसकी परिकल्पना प्रेमी कभी नहीं कर सकते हैं|

तो, मैं मानता हूँ कि राधा को कृष्ण से सच में ही प्रेम था, और वह समझदार भी थी, इसीलिए उन्होंने कृष्ण से विवाह नहीं किया| आपका यह कहना कि "तो कृष्ण उन्हें छोड़ कर क्यों चले गए", यह वक्तव्य बहुत ठीक नहीं हैं, पुरुष कभी भी इतना समझदार नहीं होता कि वह 'छोड़कर चला जाए' वो भी तब जब वो सच में ही स्त्री के प्रेम में हो| कृष्ण से इतनी समझदारी की अपेक्षा मैं नहीं रखता हूँ| जहाँ तक मैं समझता हूँ, राधा ने ही मना कर दिया होगा| कृष्ण तो पीछे पड़े होंगे शादी के लिए| प्रेम में धोखा सिर्फ स्त्रियाँ देती हैं, पुरुष न तो इतना उदार होता है कि अपने प्रेम को किसी और सौंप दे, और न ही इतना समझदार कि जिससे प्रेम करे उसे अपने बन्धनों से मुक्त कर दे| इसलिए छोड़ने का गौरव कृष्ण को देना मुझे उचित नहीं लगता है| जिन किताबों में ऐसा लिखा हो, उनमे सुधार कर देनी चाहिए|

उन दिनों मैं दिल्ली में था, 2010 की बात है, प्रेम में था| दिल्ली में अक्सर लोग प्रेम में होते है, मैं भी था| पहले उसे मुझसे प्रेम हुआ, और फिर मुझे उससे| रुकिए, 'मुझे उससे प्रेम हुआ' कहना ग़लत होगा, क्योंकि मुझे तो हमेशा ही हुआ रहता था, यह पहला मौका था कि सामने वाले को मुझसे हुआ था| लड़कों के लिए प्रेम कोई करने की चीज़ नहीं है, यह उनके व्यक्तित्व की सहज अवस्था है, 'करने' का काम सिर्फ लड़कियों का है, क्योंकि उनके चित की सहज अवस्था 'कठोरता' है|

एक दिन हमारी किसी विषय पर बात हो रही थी, तो उसने मुझसे कहा, "मैं तुमसे शादी नहीं करुंगी", मैंने पूछा, 'क्यूं', मुझे लगा शायद मज़ाक में ऐसा कह रही है| लेकिन वो इस बात को लेकर बेहद गंभीर थी, बोली, "तुम बर्बाद हो जाओगे", मैं थोड़ा हैरान हुआ, "बर्बाद क्यों हो जाऊंगा मैं? मुझे तो लगता है कि अगर हमारी शादी नहीं हुई तो मैं बर्बाद हो जाऊंगा" मैंने उससे कहा| "बर्बाद क्यों हो जाओगे ये मैं अभी तो नहीं बता सकती हूँ, लेकिन बीस साल बाद तुमको पता चल जाएगा", वह मुझसे बोली|

और, आज दस वर्ष बीत चुके हैं उस बात को, 2010 में वह मुझसे ऐसा बोली थी, और अभी 2020 चल रहा है| मैं अभी ही थोड़ा-थोड़ा समझ रहा हूँ उसके आशय को| मैं ख़ुद को भी देखता हूँ, और उस नमूने को भी जिससे उसने शादी की| और मुझे लगता है, आने वाले दस सालों में,अगर मैं जिंदा बचा, तो यह दावे के साथ कह पाउँगा कि उसने जो कहा था, वह १०० फीसदी सच साबित हुआ|

स्त्री जिससे भी प्रेम करती है, उसके साथ न्याय करती हैं| और पुरुष जिससे प्रेम करता है, उससे वह शादी करके अपना गुलाम बना लेना चाहता है| पुरुष का प्रेम अंततः अन्याय में बदल जाता है| और स्त्री का प्रेम अंत में पुरुष की आज़ादी, स्त्री जिससे भी प्रेम करती है, उसे आज़ादी देती है| और पुरुष पाश देता है, उम्र भर की गुलामी| इसीलिए, मुझे लगता है, कृष्ण से विवाह न करके राधा ने उनके साथ न्याय किया| और दुनिया की अन्य औरतों को भी यह सीख दी कि जिससे प्रेम करो, उससे शादी कभी मत करना| अभी दो दिन पहले ही मास्टर उगवे मुझसे कह रहे थे कि कभी अगर मैं अपनी पुरानी प्रेमिकाओं से बात करता हूँ, तो वो मुझे आज भी देवता समझती हैं, उनसे बात करके अपने बारे में अच्छा फील होता है| लेकिन वहीं पत्नी के सामने ऐसा लगता है, जैसे दुनिया का सबसे नीच, कमीना और लुच्चा आदमी मैं ही हूँ, दो कौड़ी की भी इज्ज़त नहीं है, उसके सामने मेरी|

दूसरा- दूसरे पहलु को भी आधुनिक मनोविज्ञान की मदद से समझने में आसानी होगी| मनोविज्ञान कहता है कि हर पुरुष के भीतर स्त्री, और हर स्त्री के भीतर एक पुरुष होता है| अंतर सिर्फ अनुपात का होता है| स्त्री में पुरुष का अनुपात कम होता है- ६० फीसदी स्त्री, तो, ४० पुरुष| ऐसा ही पुरुषों के साथ भी होता है- पुरुष तत्व ज्यादा होते हैं, और स्त्री तत्व कम, लेकिन होते दोनों है| और हर व्यक्ति में यह अनुपात अलग-अलग होता है| आजकल के पुरुषों में, जिनके जीवन से संघर्ष गायब हो गया है, उनमे स्त्री तत्व की मात्र बढ़ गई है| और वो स्त्रीयां जो राजनीती, पुलिस, और सेना इत्यादि में चली जाती हैं, उनमे पुरुष तत्व बढ़ जाता है|

पुराने शास्त्र कहते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण पूर्ण पुरुष थे| मतलब उनमे स्त्री तत्व बिलकुल भी नहीं था| और राधा पूर्ण स्त्री थी, उनमे पुरुष तत्व का पूर्णतया अभाव था| और विवाह के लिए दोनों में से एक का अपूर्ण होना अनिवार्य है| दो पूर्ण के बीच विवाह संभव नहीं है| इसको ऐसे समझिये आपके पास एक लीटर शुद्ध दूध, और एक लीटर शुद्ध पानी है| अब आप दोनों को आपस मिला देते हैं, तो जो मिश्रण होगा, उसको आप शुद्ध कह सकते हैं? अब न तो उसे आप शुद्ध पानी कह सकते हैं, न ही शुद्ध दूध| मतलब दो शुद्ध चीज़ों को अभी अगर आपस में मिला दिया जाए, तो जो मिश्रण तैयार होता है, वह अशुद्ध हो जाता है| इसलिए, राधा और कृष्ण का विवाह संभव नहीं है| विवाह के लिए कम-से-कम एक का अशुद्ध होना ज़रूरी है, तभी समबन्ध चलेगा| क्योंकि विवाह का अर्थ होगा है स्त्री और पुरुष के बीच शाश्वत कलह| और यह तभी संभव है, जब या तो दोनों अपूर्ण हो, या फिर दो में से के अपूर्ण हो| अन्यथा विवाह संभव नहीं है|

तीसरा- तीसरे आयाम को समझने के लिए हमें थोड़ा तंत्र को समझना होगा| तंत्र कहता है, बाहर हम जिस स्त्री को ढूंढ रहे हैं, या स्त्री जिस पुरुष को ढूंढ रही है, वह दरसल भीतर के स्त्री और पुरुष की तलाश है| इसलिए, बाहर के स्त्री और पुरुष से आप कभी भी पूर्ण तृप्त नहीं हो सकते हैं| चाहे आप कितने ही स्त्री-पुरुष से सम्बन्ध क्यों न बना लें| वे लोग जो बहुत से रिलेशन से होकर गुज़रे हैं, मेरी बातों को समझ सकेंगे|

तृप्ति तभी संभव है, जब पुरुष अपने भीतर के स्त्री से सम्बन्ध बना है, और स्त्री अपने भीतर के पुरुष से सम्बन्ध स्थापित कर ले| उससे पहले कहीं ठौर नहीं है| तो, मेरी दृष्टि में, और यही सनातन की दृष्टि है, राधा कृष्ण के भीतर जो स्त्री है, उसकी प्रतीक है| राधा शब्द को यदि आप उल्टा करें, तो ‘धारा’ बनता है| राधा कहीं बाहर नहीं है, वह कृष्ण की भीतरी धारा है| इसलिए, बहुत पुराने शास्त्रों में राधा का कहीं जिक्र नहीं है| नए शास्त्रों में ही राधा की चर्चा है, पुराने में सिर्फ रुक्मिणी की बात है| राधा की कोई कहानी नहीं है| ज़रूरी भी नहीं था| राधा कृष्ण से अलग नहीं है, इसलिए, अलग से उसकी चर्चा करने की कोई ज़रूरत भी नहीं है| जैसे पर्वती कोई बाहर की स्त्री नहीं है, वह भी शिव के भीतर जो स्त्री है, उसकी प्रतीक है| उसी तरह राधा भी कृष्ण के भीतर है|
-इक्क्यु केंशो तजु


Tuesday, 5 May 2020

अंतिम यात्रा


धुंध की वजह से लालटेन के आसपास एक पीली आभा बनी हुई है| बाहर बहुत ठण्ड है लेकिन, मेरा कमरा गर्म है| दिव्या बीच-बीच में उठकर आग में लकड़ी डाल आती है, मैं पूछता हूँ, "तुम क्यों बार-बार उठ कर जाती हो, थक जाओगी, अमन कहाँ गया?" वह अपने चश्मे पर जमे पानी की बूंदों को साड़ी के पल्लू से साफ़ करती है, और गेट से बाहर देखते हुए मुझसे कहती हैं, "अमन शायद बाहर रॉकी के साथ खेल रहा है, राव साहब आते हैं तो बोलती हूँ, उसे बुला लाएंगे|" पिछले एक घंटे से हम दोनों राव साहब का इंतजार कर रहे हैं| "ब्लैक कॉफ़ी बना कर लाऊँ, पीओगे", मेरे कानो को ढकते हुए दिव्या बोली| "वह भी तुम्ही को बनाना होगा, अपनी सेहत का ख्याल रखो, अभी बहुत काम करने हैं तुम्हे| राव साहब से सब कुछ अकेले नहीं संभलेगा| भक्तराज की हालत भी बहुत गंभीर है....", “भक्त राज बड़े भी तो आपसे कितने हैं, 12 साल छोटे हैं आप उनसे" दिव्या मुझे बीच में काटते हुए बोली| "यही तो मैं तुमसे कह रहा हूँ, अब जब मेरे जाने का वक़्त आ गया है, तो भक्तराज और कितने दिन जिएंगे", खिड़की की तरफ मुंह करते हुए मैंने कहा| खिड़की के उस पार देवदार पर एक कौव्वा बैठा था| उसके पंख गीले थे, अपने पैरों के नीचे उसने कुछ दबा रखा था| बार-बार चोंच मार कर उन्हें खा रहा था, और बीच-बीच में इधर-उधर देख लेता था| "मैं कॉफ़ी बनाने जा रही हूँ", रजाई से मेरे कन्धों को ढकते हुए दिव्या बोली| "आपके बाद मैं या तो मर जाउंगी, या फिर दिल्ली चली जाउंगी| आपके बिना मैं यहाँ एक दिन भी नहीं रह सकती हूँ", बोलते हुए कमरे से निकल गई| जाते समय मैंने उसे देखा, घुटने का दर्द शायद फिर से बढ़ गया था, ठीक से चल नहीं पा रही थी| 'कितना तो समझाया करता था कि नियमित रूप से योग किया करो, लेकिन इसको बकलोली से फुर्सत मिले तब तो', मैं मन-ही-मन सोचने लगा| वो भी क्या दिन थे जब हम भारत के अलग-अलग खूबसूरत जगहों पर जाया करते थे, सुबह उठकर योग करते थे| मुझे आज भी याद है कैसे सुबह चार बजे उठकर दिव्या मेरे लिए नाश्ता तैयार करती थी| और मैं मेहसाणा से 70 किलोमीटर दूर योग सिखने जाया करता था| "इतना सब करने का लेकिन फायदा क्या हुआ? इतनी मेहनत करके सीखो, फिर उसी चीज़ का विरोध करने लगो", ख्याब में ही दिव्या मुझसे बोली| उसे मेरी इस आदत से हमेशा से शिकायत रही है| पहले किसी चीज़ को सीख लो, फिर उसके खिलाफ़ हो जाओ| "कितनी बार मना किया है, पुरानी यादों को मत कूदेरा करो", टेबल पर कॉफ़ी रखते हुए दिव्या बोली| "कहाँ कुछ सोच रहा हूँ", 'पता नहीं इसे कैसे पता चल जाता है कि मैं अतीत की राख को कुदेर रहा हूँ' सोचते हुए मैं बोला| "अगर सोच नहीं रहे हो, तो फिर आँखों में आंसू कैसे है", पीठ को सहारा देकर मुझे बिठाते हुए बोली| "अब बोलो क्या सोच कर रो रहे थे", कॉफ़ी का मग पकड़ाते हुए बोली| "अब तुम्हारे हाथ भी कांपने लगे हैं", कांपते हुए कप को देख कर बोली| मैंने भी कप पर नज़र डाली, सच में हाथ कापं रहे थे| "ठण्ड से कांप रहे होंगे", मैंने उससे कहा| "हाँ कमरे में ठण्ड जो बहुत है", अपनी कॉफ़ी का मग लेकर मेरे पैताने बैठते हुए बोली

खिड़की से आने वाली रौशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी| मैंने देखा एक दो को छोड़ कर उसके सारे बाल सफ़ेद हो गए थे| "मुझे घूरना बंद करो और बताओ कि क्या सोच कर रो रहे थे?", कॉफ़ी मग को नाक के पास ले जाते हुए बोली| "यही याद कर रहा था कि पहली बार जब आईने में तुम्हे एक सफ़ेद बाल दिखा था तो तुम कैसे रोने लगी थी", बोलते-बोलते मुझे हंसी आ गई| "25 वर्ष की आयु में किसी की बाल सफ़ेद होने लगे तो वो रोएगा नहीं, इसमें हंसने की क्या बात है| चलो मेरे तो सफ़ेद हैं, लेकिन अपना न देखो...गंजा होने से तो बेहतर है सफ़ेद होना|", गुस्से से उसका नाक लाल हो गया था| -इसकी गुस्सा करने की बीमारी मरते दम तक भी नहीं गई| मैं खिड़की से बाहर देखने लगा|
वह कौव्वा अब भी वहीं बैठा था, लेकिन उसके पैरों के नीचे अब कुछ भी नहीं था| अपने चोंच से पंखों को साफ़ कर रहा था| "तब मैं नादान थी, इसलिए रोई थी, अब मुझे अपने सफ़ेद बालों से प्रेम हैं| पहले मैं बुढ़ापे से डरती थी, लेकिन अब जानती हूँ, बुढ़ापा जीवन का फूल है| जो लोग ठीक से बूढ़े नहीं हो पाते हैं, वो बाँझ ही रह जाते हैं, उनका जीवन एक ठूंठ पेड़ जैसा हो जाता है-न फूल न पत्ते", वो भी मेरी तरह खिड़की के बाहर ही देख रही थी| "और हाँ, मुझे तुम्हारा गंजापन भी पसंद है", कॉफ़ी के खाली कप को बेड के सामने पड़े तिपाये पर झुककर रखते हुए बोली| उसका गुस्सा शांत हो चुका था| मैंने देखा सफ़ेद बालों और साड़ी में वह सच में ही बहुत सुंदर लग रही थी, इतनी सुंदर जितनी वह पहले कभी नहीं लगी थी| "साड़ी जंचती है तुम पर", अपना खाली कप बढ़ाते हुए मैंने कहा| "हाँ, मैं भी यही सोचती हूँ, लेकिन याद है भारतीय कपड़ों से मुझे कितनी चिढ़ थी| मैं कितना गुस्सा करती थी जब तुम मुझे इंडियन पहनने को कहते थे", मेरे कप को भी तिपाये पर रखते हुए बोली| "यह सब गार्गी कॉलेज की विकृत शिक्षा-दीक्षा का असर था, वहीं से तुम बिगड़ी थी", राव साहब के लिए प्रतीक्षा रत आँखों से मैंने गेट की ओर देखा| "आप तो गार्गी कॉलेज और दिल्ली के पीछे ही पड़े रहते हैं", पांच साल हो गए मुझे दिल्ली गए हुए| पिछले महीने धीरज के बेटे की मंगनी थी, उसमे भी नहीं गई| पता नहीं क्या सोचेगा वह?", वह भी बार-बार गर्दन मोड़ कर गेट की ओर देख रही थी|
"तुम्हारे गार्गी कॉलेज से याद आया, अपनी गार्गी कैसी ही है, कोई ख़त आया है उसका?", मैंने बातों को मोड़ते हुए कहा| "अरे हाँ, शनिवार को उसका ख़त आया था, मैं आपको देना भूल गई| सुभूति की तबियत थोड़ी ख़राब हो गई थी| इसीलिए गुरुपूर्णिमा पर नहीं आ पाई| मैंने जवाब लिख दिया है, उसे यह भी बता दिया है कि आपकी तबियत बहुत ख़राब है| देखिये कब तक आती है....अरे ओ अमन", बात को बीच में रोककर अमन को आवाज़ देने लगी| "मेरी तबियत का बोली हो, तब तो वो भागी चली आएगी, उसके बाप को भी ख़बर कर दो| उसे गाँव से यहाँ आने में वक्त लगेगा", मेरी आँखे फिर नम थी| "आपको क्या लगता है, आपकी तबियत ख़राब होगी और आपके थिओ को पता नहीं चलेगा| ७ दिन पहले ही उसका खत आया था वो और गार्गी की माँ दोनों आ रहे हैं", बेड से उतरते हुए बोली, 'रे अमन...अमन', बोलते हुए गेट की ओर जाने लगी| "क्या बात कर रही हो, साकेत आ रहा है?", मैंने थोड़ा अविश्वास दिखाते हुए पूछा| "हाँ..आ रहा है बाबा आ रहा है...आपका थिओ, .......भाई के बिना इनका प्राण भी कैसे छुटेगा", बुदबुदाते हुए गेट पर चली गई| पैर मोड़ कर काफी देर तक बैठे रहने की वजह से इस बार उसे चलने में ज्यादा तकलीफ हो रही थी| "रे अमन.....", दो-तीन बार उसने आवाज़ लगाई| कौव्वा अपनी जगह से उड़ गया था| 'साकेत आ रहा है', सोच कर मेरे भीतर गुदगुदी होने लगी| “अच्छा सुनो, मैं सोच रहा था कि कितना सही रहता यदि गार्गी अपने बेटे का नाम सुभूति की जगह शेख़ सरायरख लेती”, मैं ज़ोर से हंसने लगा। हंसने की वजह से पेट में तेज़ दर्द होने लगता है। दिव्या को पता न चल जाए इसलिए मैं दर्द के बावजूद भी हंसता रहता हूँ। आपको हंसी आ रही, याद है गार्गी को उसके दोस्त JNU में कितना चिढ़ाते थे- अपना नाम गार्गी, बाप का नाम साकेत और माँ का नाम प्रीत विहार।”, दरवाज़े के पास से दिव्या बोली। प्रीत विहार तो ज़्यादती थी, उसकी माँ का नाम प्रीती है...भद तो तब होती जब उन्हें पता चलता कि उसके बड़े पापा का एक नाम नेहरुभी है। फिर उसे सब नेहरु प्लेस कहकर चिढ़ाते..हा..हा..हा”, मैं ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगता हूँ। शुक्र है आपके नेहरू नाम का बहुत से लोगों पता नहीं है...नहीं तो सच में गार्गी आपसे बहुत लड़ती”, अमन शायद उसे आता हुआ दिख गया था, वह दरवाज़े से नीचे उतरने लगी। "कितनी देर से आवाज़ लगा रही हूँ तुम्हे, सुनता क्यों नहीं है तू....", अमन को डांटते हुए बोली| "मैं सुराही आंटी को दादाजी के बारे में बताने गया था", सफाई देते हुए अमन बोला| "तू रॉकी के साथ मैदान में खेल रहा था, और बोल रहा है कि सुराही आंटी के पास गया था, झूठ बोलेगा तू..." दिव्या ने उसे डांटा| "खेल तो मैं अभी रहा था, वहां से आने के बाद", गहरी सांस भरते हुए अमन ने अपनी बात रखी| मैं अमन को देख तो नहीं सकता था, लेकिन उसकी आवाज़ से ऐसा लग रहा था कि वह हांफ रहा है| "क्या बोली सुराही?", दिव्या ने पूछा| "राव अंकल जब बाजार से लौट कर आ जाएँ, तो मुझे आकर बता देना, मैं पापा को लेकर आ उंगी", दिव्या के पीछे कमरे में घुसते हुए अमन बोला| अमन के पीछे कूँ-कूँ करके पूँछ हिलाता हुआ रॉकी खड़ा था| मास्टर उगवे रॉकी को अपने साथ गुजरात से लाए थे| मतलब रॉकी अब पंद्रह साल का हो गया है| "ग़जब की लड़की है सुराही भी, अब फिर से तुम इतने उपर जाओगे उसे बताने के राव साहेब आ गये", बिना अमन को देखते हुए दिव्या बोली| "मैं चला जाऊंगा", तिपाई पर पड़े कप्स को उठाते हुए अमन बोला| "हाँ-हाँ तू क्यों नहीं जाएगा...बहुत बड़ा पेटबहुक है ये लड़का सुराही कुछ-कुछ खाने को दे देती है, इस चक्कर में यह वहां जाने के लिए बहाने ढूंढता रहता है..एक बार वहां जाना हो तो मुझे पन्द्रह बार सोचना पड़ता है, और यह लड़का दिन में पांच बार वहां चला जाता है, पहाड़ चढ़ना न हुआ जैसे कोई खेल हुआ", मुझे देखते हुए दिव्या बोली| "तुम्हे भी तो मैं कहता हूँ कि इसे चॉकलेट दिया करो, लेकिन तुम्ही ज्यादा मीठा खाएगा तो ये हो जाएगा, वो हो जाएगा..करती रहती हो, तो बेचारा क्या करे...सुराही चॉकलेट देती है, तो वहां चला जाता है", अमन को देखते हुए मैंने बोला| वह दिव्या के पीछे खड़ा मुंह बना रहा था, और मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था| "आप से तो कुछ कहना ही बेकार है....सुनो कप्स को किचन में रख दो, फिर गोडाउन से लकड़िया लेकर आओ...आग ठंडी हो रही है", कप लेकर जाते हुए अमन से दिव्या बोली|
"लगता है राव साहब को किताब नहीं मिली, इसलिए इतनी देर हो रही है| नहीं तो ६ घंटे में आमदी चार बार रानीखेत से होकर आ जाए, ऐसे नहीं मास्टर उगवे इनको बबूचक बुलाते थे। एक काम भी ये ठीक से नहीं करते हैं। उस दिन सोनिया बता रही थी एक कप चाय बनाने में इनको बीस मिनट लगते हैं", खिड़की के ऊपर वाले पल्ले को बंद करते हुए दिव्या बोली| नीचे का पल्ला उसने खुला रहने दिया ताकि मैं देवदार को देख सकूँ।
मास्टर उगवे का जिक्र सुन कर मैं बड़ा बेचैन हो गया| चार साल पहले, इसी कमरे में, इसी बेड पर, जिसपर अभी मैं लेटा हूँ, मास्टर उगवे ने देह त्यागा था| "मृत्यु जीवन से हज़ार गुणा ज़्यादा सुंदर है मास्साहब, अगर हमने जीवन ठीक से जीया हो, और मैं जीवन को ठीक से जीकर मर रहा हूँ। जल्दी आइएगा, मैं वहाँ इंतज़ार कर रहा होऊँगा आपका, अकेले मेरा मन नहीं लगेगा वहाँ”, उगवे की आँखों में आंसू थे।
राव साहब मेरे दाईं ओर खड़े थे और भक्तराज़ अपने व्हीलचेअर पर मेरे बाईं ओर बैठे थे। राव को देखकर उगवे फुट-फुट कर रोने लगे थे। राव की आँखों से भी अनवरत आंसू बह रहे थे। बूढ़ऊ, तुम कब तक व्हीलचेअर पर बैठे रहोगे, सुराही भी तुमसे तंग आ गयी है अब तो...”, रोना रोक कर उगवे ने भक्तराज़ से कहा। भक्तराज के सब्र का बांध भी टूट चुका था, वह भी रोये जा रहे थे। तभी एक थाली हाथ में लिए सुराही अंदर आई। थाली में ये क्या लेकर आई है?” उगवे ने पूछा। आपके लिए प्याज़ और आलू के पकौड़े बना कर लाई है”, भक्तराज ने कहा। मुँह में एक भी दांत ना होने की वजह से भक्तराज हवा निकालते हुए बोलते थे। वाह...अब आप चैन से देह छोड़ पाएँगे जनाब”, राव साहब बोले।
मैं उगवे के बारे में सोच ही रहा था कि अमन, “असीम दादा (राव साहब) आ गए, असीम दादा आ गये...”, चिल्लाता हुआ कमरे में घुसा। उसके हाथों में लकड़ी का एक गट्ठर था। राव साहब आ गये”, दिव्या मुझसे बोली। हम्म...बोलकर मैं दरवाज़े को देखने लगा। कहाँ देखा तुमने उनको?” दिव्या ने अमन से पूछा। लकड़ी लेने गोडाउन गया था, तो वहीं से नीचे पुल के पास उनको ऊपर चढ़ते हुए देखा”, गट्ठर खोलकर लकड़ी आग में डालते हुए अमन बोला। फिर तो उन्हें आने में अभी 20 मिनट और लगेंगे, दमे की वजह से उन्हें ऊपर चढ़ने में बड़ी तकलीफ़ होती है”, मैं अपने आप से बोला। दमे की वजह से नहीं...नीचे गुप्ता जी के यहाँ जो रोज़ सिगरेट पीने जाते हैं, उससे दम फूलता है उनका”, दिव्या मुँह ऐंठते हुए ख़ुद से बोली। अमन... तुम आग को छोड़ों, और ऊपर जाकर सुराही से कहो कि वो भक्तराज जी को लेकर आए।अमन जाने से कतरा रहा था। उसे डर था कि अगर राव साहब के आने पर वह यहाँ मौजूद नहीं रहा, तो राव साहब उसके लिए जो चोकलेट लेकर आएँगे उसे वह अभी नहीं मिलेगा...। दिव्या ने उसके मन को भाँप लिया, “वो जो कुछ भी तुम्हारे लिए लेकर आएँगे, मैं नहीं रखूँगी..और भूलो मत सुराही भी तुम्हें कुछ न कुछ ज़रूर देगी।आश्वासन मिलने पर अमन लथराते हुए बाहर निकला..उसे दिव्या की बातों पर भरोसा नहीं था। अच्छा सुनो, पता है मैं क्या सोचता था?”, अमन के जाने के बाद मैंने दिव्या से कहा। दिव्या अंगीठी की आग को जगा रही थी। क्या सोचते थे?”, चिंगारी उड़ाते हुए वह बोली।
सुराही अपनी गार्गी से कुछ ही महीने छोटी है। जब उसका जन्म हुआ तो मैंने सोचा काश ये लड़का होती, तो गार्गी की शादी इसी से तय कर देता। हा..हा.हा”, मेरे साथ दिव्या भी हंसने लगी। आग के पास ज़ोर से हंसने की वजह से थोड़ी राख उसके मुँह में चली गई।बताओ तब गार्गी ठीक से तीन महीने की भी नहीं थी, और आप उसकी शादी की बात सोच रहे थे”, आग के पास से उठते हुए दिव्या बोली। बिना सहारे के उठने में उसे बड़ी दिक़्क़त हो रही थी। लगता है ठंड की वजह से दर्द बढ़ गया है। हंसने के बाद मैं फिर से पेट में खिंचाव महसूस कर रहा था।
सोनिया’ अहमदाबाद से कब लौट रही है?” मैंने दिव्या से पूछा। राव साहब तो कह रहे थे कि वो कल सुबह यहाँ पहुँच जाएगी”, ओवरकोट पर गिरे राख को झाड़ते हुए दिव्या बोली। तिपाई खींच कर मेरे सिर के पास बैठ गई, और फिर मेरे दाहिए हाथ को अपने दोनों हथेलियों के बीच रखकर रोने लगी,”क्या तुम सच में मर जाओगे.....?” अपने सिर को उसने हाथों पर रख दिया। उसे रोता देख मैं भी रोने लगा। रोते-रोते एक शेर याद आ गया, “अपने मरने का ग़म नहीं, हाय तुमसे जुदाई होती है”, 40 साल पहले यह शेर लोगों को बहुत सुनाया करता था। लेकिन मर्म आज समझ आया।
राव साहब के कदमो की आहट सुनकर दिव्या सिर उठा कर बैठ गई| जूते उतार कर राव साहब अंदर आए| उनकी टोपी पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें जमी हुई थी| वे तेज़-तेज़ सांस ले रहे थे| उनके हाथों में दो थैली थी, एक उन्होंने अंगीठी के पास कुर्सी पर रख दिया, और दूसरा दिव्या को थमा दिया| और ख़ुद अंगीठी में हाथ सेकने लगे| अंगीठी के पास बैठे इस बूढ़े राव साहब को देखकर मेरे लिए यकीन करना मुश्किल था कि यह वही राव साहब हैं, जिनके साथ 45 साल पहले अहमदाबाद में मैं कॉफ़ी पिया करता था| कितना कुछ बदल गया इस ४५ साल में| राव साहब सिंगल से डबल हो गए, मास्टर उगवे चले गए| बीस साल पहेल हम आठ लोग (मैं, दिव्या, रावसाहब, सोनिया, मास्टर उगवे, भक्तराज उनकी पत्नी, और सुराही) यहाँ, पहाड़ पर, रहने आए थे, आज बस ६ बच गए हैं| मैं जाने ही वाला हूँ, मुझे नहीं लगता दिव्या मेरे बाद यहाँ रहेगी| भक्त राज भी ज्यादा-से-ज्यादा एक-दो महीने और टिकेंगे| राव साहब के अकेले हो जाने का मुझे बड़ा दुःख हो रहा है| पता नहीं मेरे बाद क्या करेगा ये आदमी? सोनिया संभाल लेगी, समझदार लड़की है|  

सुबह के चार बज रहे हैं। आधा घंटा हो चुका है मुझे जगे हुए। दिव्या के उठने का वेट कर रहा हूँ। 8 बजे मैं शरीर छोड़ूँगा। दो बजे तक दिव्या जगी ही हुई थी।रात के बारह बजे तक साकेत, राव साहब, और भक्तराज यहीं कमरे ही थे। बारदो शुरू करने से पहले हमने बड़ी मुश्किल से सुराही और गार्गी को यहाँ से भेजा। दिव्या को जगाने से पहले मैं एकबार (या कह लें कि अंतिम बार) अष्ट्रावक्र गीता पढ़ना चाहता हूँ। मंगलवार को राव साहब यही किताब ख़रीदने रानीखेत गये थे। ‘Importance of living’ और अष्ट्रावक्र गीता को मैं अपने साथ ले जाऊँगा। इन दो किताबों के बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नर्क हो जाएगा। और अगर ये दोनों मेरे साथ है, तो फिर नर्क कहीं है ही नहीं, मैं जहाँ भी होऊँगा, स्वर्ग वहीं होगा। 
किताब पढ़ते-पढ़ते कब ६ बज गए पता ही नहीं चला। दिव्या अभी-अभी उठी है। आज पूरी खिड़की खोल दो, और अंगीठी जलाने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं काफ़ी गर्मी महसूस कर रहा हूँ।नीम-जगी दिव्या से मैंने कहा| वह बिना कुछ बोले बेड से उठ कर किचन में कॉफ़ी बनाने चली गई|
इस वक्त सुबह के ७ बज रहे हैं, कमरे में सारे लोग मौजूद हैं| मैं बेड पर लेटा हूँ| कमरे की सारी खिड़कियाँ और दरवाज़े खोल दिए गए हैं| दिव्या मेरे पैताने बैठी हुई हैं, दरवाज़े से आती हुई सूरज की लाल रौशनी उसके चेहरे पर पड़ रही है| बाल चांदी से चमक रहे हैं| दिव्या के बगल में साकेत बैठा हुआ है| उम्र में साकेत मुझसे सिर्फ तीन साल छोटा है, लेकिन इस वक़्त दस साल छोटा लग रहा है| प्रीती और गार्गी बेड के पीछे साकेत के पास ही खड़े हैं| राव साहब मेरे सिर के पास बैठे हैं, भक्त राज अपनी व्हीलचेअर पर बैठे हैं, सुराही उनके पीछे खडी है| कल अमन के माता-पिता मुझसे मिलने आए थे, अमन उन्ही के साथ कुछ दिनों के लिए अपने गाँव चला गया है| रॉकी अंगीठी के पास उदास बैठा, उसे शायद इस बात का इल्म हो गया है आज उसका दूसरा मालिक भी उसे छोड़ कर जा रहा है|
इशारे से मैंने गार्गी और सुराही को अपने पास बुलाया| दोनों राव साहब के बगल में आकर खड़ी हो गयी| दोनों की आँखों में आंसू है| अपने बगल से अष्ट्रावक्र गीता की दो कॉपी उठा कर मैं एक-एक दोनों को देता हूँ| “मुझे नदी के पास ले चलिए”, मैंने राव साहब से कहा|
मास्टर उगवे जब जिन्दा थे, और भक्तराज ने पेड़ से गिर कर अपना पैर नहीं तोड़ा था, तब हम चारों (भक्तराज, उगवे, राव और मैं) रोज़ यहाँ नहाने आते थे| जब मैं पहली बार यहाँ आया था तभी तय किया था कि अगर अस्तित्व ने चाहा तो अंतिम साँस यहीं लूँगा| नदी की कल-कल नाद और पंछियों की चहचहाहट के सिवाय यहाँ और कोई आवाज़ नहीं है| राव साहब और साकेत मेरे लिए चिता तैयार कर रहे हैं| शून्य आँखों से भक्तराज पानी को देख रहे हैं| सूराही उनके चेअर को संभाले हुए है| दिव्या मेरे बगल में बैठी है, मैं करवट लेकर नदी को बहता हुआ देख रहा हूँ| “पापा गिर गए.....” अचानक से सूराही चीखी| “मुझे पता था, यह आदमी मुझसे पहले जाएगा”, मैंने दिव्या से कहा| राव साहब दौड़ कर उनको उठाने गए|
अब एक की जगह दो चिताएं तैयार हो रही थी| साकेत लकड़ियाँ ला-लाकर राव साहब को दे रहा था| साकेत को देख कर मुझे रामचरित्रमानस का एक दोहा याद आ गया, “सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥ अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता” चिता तैयार हो जाने के बाद सब लोग मेरे पास आकर बैठ गए| भक्तराज को भी मेरे बगल में लिटा दिया गया| मैं अब भी पानी के बहाव को देख रहा था| प्रवाह में दौड़ते पत्थरों में मुझे वो सारे चेहरे दिख रहे थे, जिनसे जीवन काल में कभी मिलना हुआ था| थोड़ी देर प्रवाह को देखने के बाद मैंने अपनी आँखें बंद कर ली| और दिव्या के दाहिने हाथ को अपने दोनों हथेली के बीच रखा| मन-ही-मन माँ पिता जी को प्रणाम किया, दादाजी से आशीर्वाद माँगा, खानदान के सभी लोगों को एक साथ प्रणाम किया, गोविन्द और निकेश को याद करके आँखे गीली हो गई, पवन सर को प्रणाम किया और रोया, आदित्य से विदा मांगी| फिर आँखें खोल कर एक बार सबको देखा| हाथ जोड़ कर सबको प्रणाम किया| गहरी सांस लेते हुए एक बार धीरे से ओशो बोला, और फिर हमेशा के लिए शून्य में विलीन हो गया...
                                              The End..
Ikkyu Knesho Tzu (Between ‘Yesterday’-‘Today’) जन्म थिति-कल, मृत्यु- आज..!
किताब का नाम- अष्ट्रावक्र गीता, Importance of living..   लेखक- अज्ञात, लिन युतांग

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...