Sunday, 14 July 2019

चीज़ों को ऐसे देखो मानो तुम उन्हें पहलीबार देख रहे हो


14-जुलाई 2019 
रात 11:30 की पठान कोट से दिल्ली की मेरी ट्रेन थी, ‘धौलाधार एक्सप्रेस”| धर्मकोट से धर्मशाला पहुँचने में 20-से-30 मिनट लगते है| हमारे पास दो विकल्प था| एक हम जिनके यहाँ रुके थे, उन्हीं की टैक्सी से धर्मशाला जाएँ, और दूसरा हम ऑटो से पहले मेक्लोड आ जाएँ, फिर वहां से बस या टैक्सी लेकर धर्मशाला चले जाएँ| दूसरा विकल्प पहले के अपेक्षा बहुत ही सस्ता था| अगर हम धर्मकोट से सीधा टैक्सी लेते हैं, तो उसका भाड़ा होता है 500/- और धर्मकोट से मेक्लोडल का ऑटो से 70 रुपया लगता है, फिर वहां से यदि आप बस से जाते हैं, तो 20 रुपया किराया है, और अगर टैक्सी लेते हैं तो उसका भाड़ा 250/- रुपया है| साफ़ है, हमने दूसरा विकल्प चुना था, लेकिन निकलने से ठीक 30 मिनट पहले हमने अपना इरादा बदला और जिनके यहाँ हम रुके थे उन्ही की टैक्सी में बैठकर बारह बजकर बीस मिनट पर हम धर्मकोट से निकल गए|

ऐन वक़्त पर निर्णय बदलने के पीछे तीन कारण था| एक सुबह से ही लगातार बारिश हो रही थी| बारिश में सामान लेकर ऑटो स्टेंड, जो कि बौद्ध ध्यान केंद्र ‘तुषिता’ के सामने है, तक पहुंचना कवायत हो जाता| दूसरा, शनिवार होने की वजह से ट्राफिक जाम में फसने के भी आसार थे| ऐसा भी हो सकता था कि हमें ऑटो मिलता ही नहीं, क्योंकि रोड जाम होने पर ऑटो को रोक दिया जाता है| धर्मशाला से 2:40 की हमारी बस थी, हमने हिमाचल परिवहन की वेबसाइट से एक दिन पहले ही टिकट बुक कर ली थी| इसीलिए समय से पहले हमें धर्मशाला पहुँच जाना था| तीसरा, 40 दिन तक प्रकाश भाई (बदला हुआ नाम) के यहाँ ठहरने के बाद, उनके टैक्सी से धर्मशाला न जाते हुए, थोड़ा अजीब लग रहा था| सो, ऑर्गेनिक थाली (यह रेस्तरां का नाम है) में नाश्ता करते हुए हमने तय किया की हम प्रकाश भाई की टैक्सी से ही धर्मशाला जाएँगे|
धर्मकोट से निकलने से पहले दिव्या को थोड़ी घबराहट हो रही थी, किसी भी जगह पर लम्बे समय तक ठहरने के बाद, उस जगह को छोड़ने से पहले उसे इस तरह की घबराहट पकड़ लेती है| वो कल कह रही थी, “पहले जब मैं जॉब करती थी, तब सुबह ऑफिस जाने से पहले भी मुझे ऐसी ही घबराहट पकड़ लेती थी, अब तो बहुत कम हो गया है| पहले मेरे पेट में तेज़ दर्द होने लगता था|” मुझे इस तरह की कोई घबराहट नहीं पकड़ती है, लेकिन मन थोड़ा बोझिल जरूर हो जाता है| ऐसे नाज़ुक वक़्त को मैं बहुत ही सजगता पूर्वक जागते हुए जीने की कोशिश करता हूँ| ओशो कहते हैं, “जब कोई तुम्हारा बहुत ही करीबी मित्र तुमसे दूर जा रहा हो, या फिर जब तुम किसी ऐसे जगह को छोड़कर जा रहे हो, जिस जगह से तुम्हे बहुत ही प्यार और लगाव है, तो स्वाभाविक है कि उस क्षण में तुम्हारे मन को अवसाद घेरेगा| तुम दुखी होओगे कि क्या पता अब कभी दुबारा मिलना (या लौट कर आना) हो भी या नहीं| उस क्षण को गंवाना मत, वह क्षण मृत्यु का क्षण है, कुछ है जो छूट रहा है, जो ज्ञात है उससे तुम दूर जा रहे है, यही तो मृत्यु में होगा| ज्ञात छूटेगा और तुम अज्ञात में प्रवेश करोगे| इन क्षणों में जागो| इन्ही छोटे-छोटे क्षणों में जागते-जागते तुम एक दिन मृत्यु के लिए तैयार हो पाओगे|” तो, ऐसे क्षण मेरे लिए साधना के क्षण होते हैं| पीछे जब मास्टर उगवे और राव साहब जा रहे थे, तब भी ऐसा शुभ क्षण आया था| ऐसे क्षण रोज़ ही हमारे जीवन में आते रहते हैं| जब भी नोन को छोड़ कर अनोन में जाना होता है, मन कंपता है| मन हमेशा ‘अज्ञात’ व नए से घबराता है| इसी घबराहट की वजह से बहुत से लोग, कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल घुमते हुए जीवन को घसीटते रहते हैं| विज्ञान भैरव तंत्र में शिव का एक ऐसा ही सूत्र है, वह सूत्र भी मुझे बहुत पसंद हैं| शिव कहते हैं, On joyously seeing a long absent friend permeate this joy”. पहला सूत्र अगर मृत्यु का अभ्यास है, तो यह सूत्र जीवन का अभ्यास है|

रास्ते में सिर्फ एक जगह, मेक्लोड से थोड़ा पहले, हमें ट्राफिक जाम का सामना करना पड़ा| गाड़ी में, मैं आगे की सीट पर प्रकाश भाई (गुजरात में रहने की वजह से नाम के पीछे ‘भाई’ लगाने की आदत पड़ गई है) के बगल में बैठा था, और दिव्या पीछे सामान के साथ बैठी थी| ‘हमारा 20 तक रुकने का प्लान था, लेकिन परसों इंडक्शन ख़राब हो गया, इसीलिए हम आज ही निकल रहे हैं’, मैंने प्रकाश जी से कहा| “अरे.. आपने मुझे क्यों नहीं बताया,” प्रकाश जी हमसे कहने लगे, “मैं आपको गैस दे देता, या फिर आप हमारे किचन में खाना बना लेते”, बोलते हुए उन्होंने आगे वाली गाड़ी को रास्ते देने के लिए अपनी गाड़ी को पीछे लिया| एकबार को मुझे लगा कहीं ये हमें घर वापिस तो नहीं ले जा रहे हैं| मैंने गर्दन घूमा कर पीछे दिव्या को देखा, वो आँखे बड़ी करके मुझे देख रही थी, मानो कह रही हो, “मैंने तुम्हे पहले ही कहा था, एक बार बात करके देख लो, क्या पता कुछ जुगाड़ हो जाए|” मैंने झट से गर्दन सीधी कर ली| ‘मैंने पहले ही कहा था’ दिव्या का पसंदीदा तकियाकलाम है| लालबुझकर की तरह इसको पहले से ही सब पता होता है| हालाँकि, जब भी कोई निर्णय लेने की बात होती है, तो इसका जुमला होता है, “तुम देख लो, जैसा ठीक लगे”|

हम 12:45 पर, बस की समय से करीब दो घंटा पहले, धर्मशाला पहुँच गए| घर से जल्दी निकलने का हमारा निर्णय गलत साबित हुआ| और टैक्सी से आने का निर्णय तो और अभी ज्यादा| जब हम धर्मकोट से निकल रहे थे, तब बारिश भी थम गई थी| और जब हम टैक्सी से तुषिता के पास से गुजर रहे थे, तब हमने एक लाइन से 6 ऑटो को एक साथ खड़ा देखा| खैर, अब कुछ भी नहीं किया जा सकता था| कोई भी निर्णय लेने से पहले कोई यह कैसे तय करे कि वह जो निर्णय ले रहा है वही सही ही होगा, There is no means of testing which decision is better; because there is no basis for comparison. We live everything as it comes, without warning, like an actor going on cold. And, what can life be worth if the first rehearsal for life is life itself?”  पिछे लौटकर, दिव्या की तरह, सही गलत का फैसला करना बहुत आसान है| लेकिन, जीवन में सही और गलत दोनों ही संयोग की बात है| और बहुत गहरा देखा जाए तो, जीवन में न तो कुछ सही होता है, न ही गलत| क्योंकि दोनों के लिए जो आधार चाहिए वह है ‘शुरूआत और अंत’| और जीवन में से यही दोनों चीज़ गायब है| किसी उपन्यास के बीच के 100 पेज पढ़कर आप किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँच सकते हैं| निर्णय लेने के लिए शुरुआत और अंत जानना अपरिहार्य है| जीवन घटनाओं का अनंत प्रवाह, और सब कुछ एक दूसरे पर पारस्परिकरूप से निर्भर है, लाओत्से कहा करते थे, 'जब तुम यहाँ एक पत्ता तोड़ते हो, तो उसकी झानाहट को वो जो दूर आकाश में तारे तुम्हे दिख रहे हैं, वे भी महसूस करते हैं|, ऐसे में किसी भी निर्णय पर पहुंचना असंभव है| इसीलिए, जिन्हें पूरे सत्य का पता होता है, वे कभी निर्णय नहीं देते हैं|

धर्मशाला से पठानकोट पहुँचने में करीब तीन घंटा लगता है| और हमारी ट्रेन 11:30 की थी, इसलिए हमने सोचा था की पांच बजे के करीब हम धर्मकोट से निकलेंगे, और फिर 6 के आसपास धर्मशाला से बस लेकर पठानकोट जाएँगे| लेकिन परसों सुबह जब मैंने हिमाचल परिवहन का वेबसाइट चेक किया तो पाया कि दो बजकर चालीस मिनट पर धर्मशाला से पठानकोट की आखरी बस है| इसका मतलब अगर हम धर्मकोट से शाम को निकलने की सोचते, तो हमें सीधा धर्मकोट से पठानकोट की टैक्सी करना पड़ता, जिसका भाड़ा करीब 45,00 होता| यह ऐसा ही होता जैसा हमारे यहाँ कहते हैं, “जतेक के बोहु’अ नै, तते के लहठी” (जितने की पत्नी नहीं उससे ज्यादा का उसका गहना)| इसलिए अब दो घंटे धर्मशाला में, और करीब 6 पठानकोट में बैठकर इंतज़ार करने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था|
प्रकाश जी के टैक्सी से उतरने के बाद हम बस स्टैंड से थोड़ी दूर रास्ते के किनारे बने लोहे के बैंच पर बैठने चले गए| बैठने से पहले हमने सुनिश्चित किया कि आसपास बारिश से बचने की कोई जगह है भी या नहीं| पास ही रोड के उस तरफ हमें एक घर दिख गया| तेज़ बारिश में हम वहां भाग कर जा सकते थे| लोहे के दो बैंच बने हुए थे, एक टूटा हुआ था और दूसरा थोड़ा दुरुस्त| टूटा हुआ बैंच काफी पुराना हो चला था| लोहे पर जंग लगना शुरू हो गया था| आधा से ज्यादा बैंच जंगली लताओं से घिरा हुआ था| दूसरा बैंच हरे रंग से पुता हुआ था और पहले की तुलना में काफी अच्छी हालत में था| टूटे हुए बैंच पर हमने अपना सामान रख दिया| और हरे रंग वाले बैंच को पेपर से पोछकर उस पर बैठ गए| सामने हिमालय का उतुंग शिखर दिख रहा था| जाने से पहले मैं अपनी आँखों को हिमालय की अलौकिक सौन्दर्य से भर लेना चाहता था| संयोग ऐसा था कि ठीक दस दिन पहले मैं इसी बैंच पर राव साहब के साथ बैठा हुआ था| उनकी बस सुबह 7:50 की थी, मैं उन्हें छोड़ने आया था| उस दिन हम एक घंटा पहले पहुँच गए थे| यहीं बैठकर हमने अपने तीन महीने के तवील सफ़र का आखरी घंटा बिताया था| समय बीतते देर नहीं लगती है, “दिवस जात नहिं लागिहि बारा”|

छः बजकर दस मिनट पर हम पठानकोट पहुंचे| जब हम बस स्टेंड में घुस ही रहे थे, तभी हमें दाहिनी ओर ‘कार्निवल’ सिनेमा दिख गया| बस से उतरते ही हम सीधा सिनेमा हॉल पर पहुँच गए| दिव्या ने पहले से सिनेमा देखने के मन बना रखा था| अक्टूबर टूर के दौरान जब मैंने सोशल मिडिया से दूरी बनाई थी, तब से मैंने सिनेमा देखना भी बंद कर दिया था| इस बीच सिर्फ दिल्ली में ही गोविन्द के साथ ‘गल्ली बॉय’ देखा था| उसके बाद धर्मकोट छोड़ने से पहले एक शाम हमने ‘दिल तो बच्च्चा है जी, और आखरी शाम ‘चश्मे बद्दूर’ (पुराना वाला) लैपटॉप पर देखा था| माफ कीजिए कुछ दिन पहले तुषिता के प्रभाव में आकर दलाई लामा की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘कुनदून’ भी देखी थी| 6:50 पर ‘सुपर 30’ शुरू होने वाला था|
टिकट बुक करने से पहले मैंने सामान का कन्फर्म कर लिया था, आपका लैपटॉप ऑफिस में जमा हो जाएगा, और बांकी सामान गार्ड अपने पास रख लेगा| पैसा और कार्ड आप अपने साथ अन्दर ले जा सकते हैं” मैंने दो टिकट कटाया और फिर सामान गार्ड को सुपुर्द करके खाने के लिए कुछ ढूंढने बाहर निकल गया| सुबह जो ऑर्गनिक थाली पर हमने नाश्ता किया था, उसके बाद अभी तक हमने कुछ नहीं खाया था| बाहर कुछ ही दूरी पर हमें एक जूस वाला दिख गया|
फिल्म अच्छी थी, लेकिन ऋतिक की एक्टिंग से मैं प्रभावित नहीं हुआ| डायरेक्शन भी मुझे थोड़ी कमज़ोर लगी| इतनी अच्छी कहानी थी, क्या कुछ नहीं किया जा सकता था, लेकिन ख़राब डायरेक्शन, पुअर स्क्रिप्ट और ऋतिक की कमज़ोर एक्टिंग की वजह से सब गोबर हो गया| खैर, सेकंड हाफ में फिल्म थोड़ी ग्रीपिंग है| हॉल से निकलने के बाद हम रेलवे स्टेशन का पता करने लगे, अभी घड़ी में 9:20 बज रहा था| हालाँकि टिकट बाबु ने हमें बताया था कि स्टेशन पास ही है, पैदल जाया सकता है| लेकिन फिर भी किधर है, और कैसे जाना है, यह हमें नहीं पता था| मैं एक दूकानदार से स्टेशन का पूछ ही रहा था कि एक ऑटो वाला आ गया, और कहने लगा, “बैठीये 20 रूपये में हम छोड़ देंगे”| हमने सोचा पता नहीं कितना चलना पड़े, सामान भी कम नहीं है, बैठ ही जाते हैं| हमारे ऑटो में बैठने के 20 सेकेण्ड बाद ही ऑटो वाला एक जगह गाडी रोक कर बोला, ‘वो रहा स्टेशन’| ऐसा हादसा हमारे साथ एक दो बार और घट चुका है|
स्टेशन पहुँचने के थोड़ी देर बाद, मैंने खाना दूंढने के लिए निकला| पठान कोट बहुत ही छोटा स्टेशन है| पुरे स्टेशन पर सिर्फ चार दूकाने हैं, एक सरकारी भोजनालय, जिसमे छोले भटूरे के अलावा और कुछ भी नहीं मिलता है, एक किताब घर, एक अमूल पारलर, और एक छोटा शॉप जिसमे पैकेट बंद चीज़ें मिलती है| मैं सकारी दूकान से हल्दीराम का एक चिप्स लेकर आया, दिव्या ने खाने से इंकार कर दिया| थोड़ी देर बाद मैं स्टेशन से बाहर खाना ढूँढने निकला| रोड किनारे दो ढाबा दिखा, भीड़ काफी थी उनके यहाँ, लेकिन रोटी की शक्ल देखकर ही लगा की यहाँ सही खाना नहीं मिलेगा| थोड़ा आगे बढ़ने पर मुझे एक और ढाबा दिखा, लेकिन वहां की हालत भी मुझे ठीक नहीं लगी| थोड़ा और आगे बढ़ने पर मैंने एक दवाई दूकानदार से पूछा, ‘यहाँ आस-पास सही खाना कहाँ मिल जाएगा|’ “थोड़ा और आगे जाइए बाएँ में ‘खालसा हिन्दू ढाबा’ है, वहां आपको सही खाना मिल जाएगा, हम भी वही से खाते है”, हाथ से आगे की ओर इशारा करते हुए दुकानदार ने मुझसे कहा| 100 कदम चलने के बाद ढाबा आ गया| काफ़ी बड़ा ढाबा था| गेट पर दो गार्ड खड़े थे| अन्दर पंहुचा तो काउंटर पर दो सरदार जी खड़े हैं| हॉल में कोई 25 स्थानिए निवासी बैठकर खा रहे थे| मैंने अपना आर्डर दिया और वही पास लगे चेयर पर बैठकर इंतजार करने लगा| 20 मिनट बाद मेरा खाना तैयार होकर आया| भुगतान करने के बाद, मैं तेजी से स्टेशन की और भागा| 11 बजने में अभी कुछ मिनट बांकी थे|
जब मैं स्टेशन पर पहुंचा तो देखा, दिव्या बेसब्री से खाने का इंतजार कर रही थी| वह गर्दन टेढ़ी करके बार-बार जिस गेट से मैं खाना लाने गया था, उस गेट की ओर देख रही थी| मैं दूसरी गेट से वापिस आया था, इसीलिए उसे पीछे से देख सकता था| उसके पास पहुँच कर मैंने पीछे से उसके सिर को हल्के से छुआ| वह चौंकते हुए पीछे मुड़ी और मेरे हाथ में खाने की थैली देखकर अकाल के कव्वे की तरह खुश हो गई| खाने को लेकर जैसी दीवानगी मैं इसमें और मास्टर उगवे में देखता हूँ, वैसी मैंने आज तक किसी में नहीं देखी है| सुबह का नाश्ता करते समय ही मास्टर उगवे रात के खाने में क्या खाना यह तय करने बैठ जाते थे| उनके खाऊँपन से हम इतने परेशान हो गए थे, जब वे हमारे पास से गए, तो उनकी जाने की ख़ुशी में हमने एक दिन का उपवास रखा था| खाने के मामले में मेरे मरहूम मित्र धर्मेद्र स्वामी बहुत अच्छे थे| हालाँकि मरने से कुछ दिन पहले खाने को लेकर उनका रवैया भी थोड़ा बदल गया था| जैसे मास्टर उगवे खाने के दीवाने हैं, वैसे ही धर्मेद्र स्वामी न खाने के दीवाने हो गए थे| कुछ लोग उनकी इसी दीवानगी को उनके मौत का जिम्मेवार मानते हैं| हालाँकि  मैं इस आम-राय से जरा भी इत्तेफाक नहीं रखता हूँ| मैं आज भी मानता हूँ कि उनकी मौत बंदगी करते वक़्त हुई थी| भक्त आदमी थे, भाव में आकर जान दे दिये| खाने के मामले में राव साहब का मामला थोड़ा ठीक है, लेकिन नमकीन और भजिये के प्रति उनकी दीवानगी अनूठी है| खाने को लेकर मेरा मामला भी गड़बड़ ही है| मीठा मेरी कमज़ोरी है| और अगर घर में मेरे पसंद की कोई चीज़ रखी हो, तो जबतक वह खत्म न हो जाए, मुझे चैन नहीं पड़ता है|
खाना खाने के बाद हम लोग ट्रेन में आकर बैठ गए| अभी ट्रेन खुलने में 15 मिनट का समय था| खाना खाने के बाद दिव्या का अमूल से आइस-क्रीम खाने का मन था, मैंने मना कर दिया| इसीलिए वह मुंह बनाकर बैठी थी| लेकिन मुझे मलाल नहीं था| ऐसी जिद को मैं नहीं समझ पाता हूँ, “मैं तभी खाऊँगी जब तुम भी खाओगे”| (इस जुमले का असली अर्थ यह है- क्योंकि अगर तुम नहीं खाओगे तो तुम मुझे सुनाओगे, तो इससे अच्छा है कि मैं नहीं खाती हूँ, और अगले तीन महीने तक तुम्हे सुनाती रहूंगी)| मैं अपने बैग से टॉलस्टॉय की ‘War and Peace’ निकालकर पढ़ने लगा|
जब भी सुबह साढ़े पांच के आसपास मेरी आँख खुलती है, और ऐसा करीब-करीब रोज़ होता है, तो मुझे आश्रम की याद आ जाती है| सुबह सक्रीय ध्यान की म्यूजिक चलाने के लिए मुझे रोज़ 5:30 पर उठाना पड़ता था| वह आदत आज भी कायम है| जब गावं में था, तब भी इतने बजे ही उठ जाया करता था| दरभंगा, दिल्ली और मुंबई के निवास के दौरान सोने और जागने के समय में काफी हेर-फेर हो गया था| मुंबई में रात के 3-4 बजे सोता था, और दिन के 1 बजे उठता था| बहुत बेकार हो गया था सब कुछ| जैसे ही मेरी आँख खुली मैंने सामान चेक किया| सब कुछ अपनी जगह पर मौजूद था| सिर्फ एक-दो लोग जागे थे, और बांकी सब सो रहे थे| मैंने अपना फ़ोन ऑन किया, वैसे इन दिनों मैं 10 बजे से पहले फोन ऑन नहीं करता हूँ, चूँकि कल यात्रा में था इसलिए ख़ुद को थोड़ी रियात दे दी| अन्यथा, आजकल मैं 4 आर्य कर्मों का पालन कर रहा हूँ| जबतक मेरे सुबह के तीन आर्य कर्म पूरे नहीं हो जाते हैं मैं फोन या लैपटॉप ऑन नहीं करता हूँ| (वो 4 आर्य कर्म क्या हैं, इसका जिक्र किसी दुसरे लेख में तफसील से करूँगा)| मोबाइल ऑन होने पर पता चला सुबह के 5:40 बज रहे थे| मैंने अपनी सीट से उतर कर नीचे आ गया और खिड़की के बहार का नज़ारा देखने लगा| पंजाब की सुबह बहुत ही हसीन थी| एक सरदार जी को पिली पगड़ी बाँध कर धान के खेत में टहलते देखकर बहुत कुछ याद आ गया|
दस बज कर बीस मिनट पर ट्रेन सराय रोहिल्ला पहुंची| स्टेशन से बाहर निकल कर हमने ओला बुक किया| और 11:15 पर हम अपने निवास स्थान पर पहुँच गए| इस बार मैंने पहाड़ पर ही तय कर लिया था कि दिल्ली को ऐसे देखूंगा जैसे ज़ोरबा दुनिया को देखता था, “लोगों और चीज़ों को ऐसे देखो मानो तुम उन्हें पहलीबार देख रहे हो” (नोट-विज्ञान भैरव तंत्र के एक सूत्र में शिव पार्वती से ऐसे ही जगत को देखते के लिए कहते हैं- See as if for the first time A beauteous person Or an ordinary object.”) रास्ते में सबकुछ नया-नया दिख रहा था| दिल्ली इससे ज्यादा खूबसूरत कभी नहीं दिखी थी| पूरे रास्ते को मैंने अलग ही ढंग से एन्जॉय किया| अपने निवास स्थान पर पंहुचा तो दो नए मेहमान, एक मिलान कुण्डेरा की ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ और दूसरी गाबरीयल गर्सीया मारकेस की ‘वन हण्ड्रेड यर्स ऑफ़ सॉलीत्युड’ बेड पर बंद पैकेट में मेरा इंतजार कर रहे थे| अभी 5 दिन पहले ही अमेज़न से मैंने इन्हें मंगाया था| पहाड़ पर मंगा नहीं सकता था, इसीलिए अपने अगले ठिकाने पर इन्हें मंगा लिया था| आते ही सबसे पहले मैंने रवायत के हिसाब से किताबों को पैकेट से निकाला और उन पर साइन किया|
खाना खाने के बाद थोड़ी देर सोया, फिर दोनों किताब को अलट-पलट कर देखने लगा| ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ की पहली ही लाइन पढ़कर मैं आगे पढ़ने से ख़ुद को रोक नहीं पाया| हालाँकि मैं ऐसा नहीं करना चाहता था| धर्मकोट पहुँचते ही ‘वार एंड पीस’ शुरू किया था| लेकिन दो दिन बाद तुषिता की लाइब्रेरी में ‘तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाईंग’ दिख गई| उसको समाप्त किया फिर रमण महर्षि ‘बी एज़ यू आर’ पढ़ने लगा| अब सोचा था कि जबतक इस 1400 पेज की ग्रन्थ को समाप्त न कर लूं, दूसरी कोई किताब बीच में शुरू नहीं करूँगा| लेकिन आज फिर फिसल गया| ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ की अभी तक 50 पेज पढ़ी है, आई लव दिस बुक, अब इसको समाप्त किए बगैर नहीं रह सकता हूँ| ऊपर जो आपके साथ अंग्रेजी में एक कोट शेयर किया है, वह इसी किताब से है (There is no means of testing which decision is better; because there is no basis for comparison. We live everything...)| चालीस दिन पहाड़ पर बिताने के बाद मैं सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकता था कि दिल्ली में मेरा पहला दिन इतना अच्छा बीतेगा| इससे पहले जब भी दिल्ली आता था दिन आपाधापी में ही बीत जाता था|


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