Thursday, 4 July 2019

संतुलन का नियम सिर्फ तीन चक्र तक ही काम करता है..


   प्रश्न - प्रणाम इक्क्युजी, एक प्रश्न बेचैन किए है| संतुलन, प्रकृति में संतुलन है, हजारों नींद में डूबे व्यक्तियों के कारण एक बुद्ध का जन्म होता है| एक डाकू के कर्म बराबर करने के लिए एक साधू का जन्म होता है| अगर मैं किसी पोजिटिवनेस को साधता हूँ, तो कही एक नेगेटिव व्यक्ति को जन्म देने का कारण भी बनता हूँ क्या? क्या घर में एक एक्टिव व्यक्ति दूसरे में आलसी का कारण बनता है? अगर ये बराबरी का संतुलन बनता है , तो इसका इफ़ेक्ट किस प्रकार होगा| इसका विज्ञान किस तरह का है| कृपया मार्गदर्शन करें|  
बुद्धत्व कार्य-कारण के नियम से बाहर की घटना है| क्योंकि बुद्धत्व की घटना ही इस बोध से घटती है कि 'मैं कर्ता नहीं  हूँ|' और जहाँ कर्ता नहीं है, वहां कर्म का सिद्धांत काम नहीं करता है| अगर आप बुद्धत्व को उपलब्ध होते हैं, तो इससे किसी को नुकसान नहीं होता है| बल्कि, जैसे ही कोई व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध होता है, वैसे ही सारे मनुष्य जाति की चेतना थोड़ी और उपर उठ जाती है| न सिर्फ मनुष्य जाति की चेतना बल्कि सारा अस्तितिव एक नई ऊंचाई को उपलब्ध हो जाता है|
दूसरी बात, जागरण हमारा स्वभाव है|'जागरण' यानि हमारा होना| हम जिस तत्व से बने हैं, वह जागरण है| इसीलिए यह बात तो भूल ही जाइए कि 'हजारों लोग नींद में डूबे हैं'| कोई भी नींद में डूबा नहीं है| बुद्ध का मतलब 'जागना' नहीं है| बुद्बधत्सव का मतलब बस  इतना जान लेना है कि 'मैं सोया हुआ नहीं हूँ' | जागे तो आप सदा से ही हैं| बस आपने यह मान रखा है कि आप सोए हुए हैं| इस जगत में कोई भी सोया हुआ नहीं है| इसीलिए, जैसे ही कोई इस बोध को उपलब्ध होता कि 'मैं सोया हुआ नहीं हूँ', वह यह भी देखता है कि कोई भी सोया हुआ नहीं है| और चूँकि कोई भी सोया हुआ नहीं है, इसीलिए किसी को भी जगाया नहीं जा सकता है| अगर आप सच में सोए होते, तो मामला बहुत आसान था, कोई भी जगा देता है| आप बस 'सोने' का अभिनय कर रहे हैं, इसीलिए इतने बुद्ध पुरुष आते हैं, और चले जाते हैं| कोई आपको जगा नहीं पाता है| जागे हुए कौन जगा पाएगा|  
तीसरी बात, संतुलन का नियम सिर्फ तीन चक्र तक ही काम करता है.. पहला चक्र- भोजन, दूसरा चक्र-शक्ति, तीसरा चक्र-सुख/काम/सेक्स इन तीन चक्रों पर जो लोग/जीव जीते हैं सिर्फ उन्ही के जीवन में संतुलन का नियम काम करता है| क्योंकि भोजन, वस्तु (जिसको अर्जित करके आदमी शक्ति बढ़ता है जैसे धन, पद, स्त्री, इत्यादि), और सुख-सुविधा, की सीमा है| इसीलिए, यदि एक आदमी बहुत अधिक धन इकठ्ठा कर लेता है, दूसरे आदमी को ग़रीब होना ही पड़ेगा|
सन्तुलन प्रकृति में नहीं बेहोशी में है| होश के साथ गणित का तालमेल नहीं बैठता है| क्योंकि ‘होश’ कहीं है नहीं जिसे आपको पाना है| ‘होश’ को पैदा करना होता है| इसीलिए अगर मैं अपने भीतर ‘होश’ बढ़ाता हूँ, तो इससे आपको कोई नुकसान नहीं होगा| इससे आपकी आपकी बेहोशी बढ़ेगी नहीं, बल्कि मेरे होश की रौशनी में आपके भीतर का अँधेरा थोड़ा कम ही हो जाएगा|

चौथे से सांतवे चक्र तक की जो यात्रा है, उसका संसार के साधारण नियम से कोई संबंध नहीं है| चौथा चक्र-प्रेम, पांचवा चक्र- प्राथना, छठा चक्र-ध्यान, और सातवां चक्र-समाधि| अगर आपके जीवन में प्रेम, प्राथना या ध्यान बढ़ता है, तो इससे इस जगत में किसी को भी नुकसान नहीं होगा| उल्टा, थोड़ा फायदा अवश्य होगा|
नकारात्मकता, सकरात्मकता, साधुता, असाधुता, सुख, दुःख, इत्यादि का संबध पहले तीन चक्र से है| इन सबका होश की दुनिया से कोई सम्बन्ध नहीं है| सुख का उल्टा दुःख होता है, लेकिन कभी आपने गौर किया कि ‘आनंद’ का उल्टा कोई शब्द अपने पास नहीं है| आनंद सुख और दुःख दोनों के पार की घटना है| अगर आपका सुख बढ़ेगा, तो इससे किसी का दुःख जरूर बढ़ेगा| लेकिन अगर आप आनंद को उपलब्ध होते हैं, तो इससे किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा| कम-से-कम कोई नकारात्मक फर्क तो नहीं ही पड़ेगा|

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