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Monday, 31 August 2020

भीख मांग कर गुजारा कर लेना

“ऐसा कोई काम जिसको करने के बाद मन में तारीफ़ पाने, पैसा पाने, या कुछ भी पाने का ख्याल उठे, तो उस काम को करना बंद कर दीजिए, वह काम आपकी आत्मा को घुन की तरह खा जाएगा| उस काम को करने से अच्छा है भीख मांग कर गुजारा कर लेना|

 

इक्क्यु- मेरा एक प्रश्न है, सर ये बताइए हम कैसे जाने कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?

 

इक्क्यु- पश्चिम का एक बड़ा उपन्यासकार हुआ ऐल्डस लॅनर्ड हक्स्ले, उनकी किताब ब्रेव न्यू वर्ल्ड और आइलैंड पढ़ने जैसी है| हक्सले की पहली पत्नी मरिया थी, जिसके मरने के बाद हक्सले ने लॉरा अर्चेरा से शादी कर ली| लॉरा ख़ुद भी एक लेखिका थी, और साथ ही संगीतकार भी| हक्सले जिद्दु कृष्णमूर्ति, भारतीय चिंतन और ओरिएंट के दर्शन से बहुत प्रभावित थे| अक्सर वे अपनी पत्नी के साथ कृष्णमूर्ति के यहाँ चर्चा-परिचर्चा के लिए जाया करते थे|

 

कृष्णमूर्ति बारहा अपने प्रवचनों में गुरु, संस्था, और आर्डर आदि के खिलाफ बोलते रहते थे| लॉरा हक्सले ने एक दिन कृष्णमूर्ति से पूछा, "आप ऑर्गनाइजेशन और गुरु के खिलाफ बोलते हैं, लेकिन आप ख़ुद भी तो यही सब कर रहे हैं| अगर गुरु की ज़रूरत नहीं है, तो आप फिर प्रवचन क्यों देते हैं? आप अगर ऑर्गेनाइजेशन के खिलाफ हैं, तो फिर कृष्णमूर्ति फाउंडेशन क्यों चलाते हैं?"

 

लॉरा हक्सले के ये प्रश्न बहुतों के प्रश्न थे, कृष्णमूर्ति को जो लोग सुनते थे, उन में से बहुतों के मन में इस तरह के प्रश्न उठते थे| किसी ने अभी तक पूछने की हिम्मत नहीं की थी, लेकिन लॉरा ने पूछ लिया, उसके मन में भी बहुत दिनों से ये सब बातें घूम रही थी| जे. कृष्णमूर्ति ने जो लॉरा से कहा उसी में आपके प्रश्न का भी जवाब है|

 

कृष्णा जी ने ज़ोर देकर लॉरा से कहा, "I don't do it on purpose." मतलब "मैं यह सब किसी उद्देश्य से नहीं करता हूँ|" क्या अर्थ हुआ इसका? इसका अर्थ हुआ 'मैं जो कर रहा हूँ उसको करना मेरा आनंद है, इससे कोई फल मिले, इसका का कोई परिणाम हो ऐसी किसी आशा के साथ मैं ये सब नहीं करता हूँ|' इसको हमें इस तरह से समझें| सुबह पंछी गीत गाते हैं, फूल खुशबू बिखेरते हैं, क्या उद्देश्य है इस सब का? क्या पंछी पैसा कमाने के लिए गाते हैं? या इस लिए गाते हैं कि कोई उनको सुने? यदि ऐसा होता तो पंछी कब के डिप्रेश होकर गाना बंद कर दिए होते| वे गाते हैं क्योंकि गाना उनका आनंद है, इसके पीछे कोई हेतु नहीं| कोई हेतु अपने आप सिद्ध हो जाता हो, ये हो सकता है, लेकिन पंछीयों के तरफ से कोई नहीं है| आप उनके गीत सुनकर आनंदित हो सकते हैं, कोई ध्यानी उनके गीत सुनकर समाधि को उपलब्ध सकता है, कोई कवि कविता रच सकता है, कोई संगीतकार धुन तैयार कर सकता है, कुछ भी हो सकता है, लेकिन चिड़िया इन में से किसी भी कारण के लिए नहीं गाती है| कृष्णमूर्ति, रमण, ओशो, बुद्ध, कृष्ण या महावीर इसीलिए नहीं बोलते हैं कि उन्हें लोगों को बदलना है, नहीं ऐसा उद्देश्य रखकर वे नहीं बोलते हैं| अगर ऐसा होता तो वे कबके निराश होकर बोलना बंद कर देते| बुद्ध चालीस साल अहर्निश बोलते रहे, और उन चालीस साल में मुश्किल से चालीस लोग उनकी बातों से बदले होंगे| और मैं कहता हूँ अगर चार लोग भी यदि नहीं बदले होते तब भी बुद्ध बोलते ही रहते|

आप पूछती हैं " कैसे जाने कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?" बहुत ही सरल है| देखें कि आपके जीवन में ऐसा क्या है जो आप बिना किसी परिणाम के चिंता किए बगैर कर सकती हैं, वही आपके जीवन का उद्देश्य है| अगर आप कहती हैं कि आपको गीत गाना पसंद है, तो क्या आप तब भी गा सकती है जब आपको एक आदमी भी न सुने? और अगर कभी सुने भी तो तारीफ न करे? और कभी तारीफ भी कर दे, तो आपको गाने के लिए कोई इनाम या पैसा न दे? क्या तब भी आप उसी आनंद से गा सकती हैं? यदि हाँ तो गाना आपके जीवन का उद्देश्य है| फिर संगीत के प्रति ख़ुद को समर्पित पर दीजिए| बिना मांगे, बिन चाहे आप को वो सब मिल जाएगा, जिसकी तलाश में योगी और ध्यानी वर्षों तक हिमालय में तपस्या करते हैं, और उन्हें नहीं मिलता है|

 

कभी इस तरह से सोच कर देखें कि यदि दुनिया में पैसा, प्रसिद्ध और पॉवर जैसी चीज़ें नहीं होती, तो मैं करती??? क्या वही करती जो अभी कर रही हूँ, या फिर वही करना चाहती जो अभी करना चाह रही हूँ, यदि हाँ तो आपने अपने जीवन का उद्देश्य पा लिया है| यदि आपका जावाब नहीं है, तो फिर आपने उद्देश्य की तलाश कीजिए, मेहनत कीजिए, खोजिए कि वो क्या चीज़ है जिसको आप सिर्फ करने के आनंद के लिए कर सकती हैं| उसको करने में ही आपको इतना मजा आ रहा है कि आप उस से कुछ मिले ऐसी कोई उम्मीद नहीं बांधती हैं| भूखे पेट भी आप उसको कर सकती हैं| ग़ालिब का एक शेर है, "न सताइश की तमन्ना न सिले की परवा, गर नहीं हैं मिरे अशआर में मअ'नी न सही " मतलब न तो मुझे किसी की तारीफ़ चाहिए, न ही शिकायत से मुझे दुःख होता है, यदि मेरे शेर में कोई अर्थ नहीं है, तो न सही, मुझे कहने में मजा आता है, इसलिए मैं तो कहता रहूँगा|

 

डच चित्रकार हुआ वानगोग, उसका छोटा भाई थिओ उसे पैसे भेजता था, महीने का| वह एक दिन खाता था और दूसरे दिन उपवास करता था| भूखे रह कर पैसे बचाता था, फिर उस पैसे से रंग और कागज़ खरीद कर चित्र बनाता था| ख़ुद को गोली मारने से पहले उसने अपने भाई को लिखा, "मैं जो करना चाहता था, वो मैंने कर दिया, जैसी तस्वीर मैं बनाना चाहता था, मैंने बना दी, अब बेमतलब का जीने में मुझे मजा नहीं आ रहा है|" जब तक वानगोग जिंदा रहा उसकी एक पेंटिंग नहीं बिकी| लेकिन वह आनंदित था, किसी ने उसके चित्रों की तारीफ नहीं की लेकिन वह आनंदित था|

 

उसी बातचीत में लॉरा ने कृष्णा जी से पूछा, "आपके आनंद का क्या राज़ है", तो कृष्णमूर्ति ने कहा, "I don't mind what happens." (क्या होता है उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है|) यही राज़ की बात है-फर्क नहीं पड़ना चाहिए| कुछ लोग ऊपर-ऊपर से ऐसा बोलते हैं- अरे लोग पसंद करे या न करे, पैसा मिले या न मिले मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता| यदि ऊपर-उपर से ऐसा कहना पड़े, लोगों को दिखाने के लिए मुस्कुराना पड़े तो समझिये आप जो कर रहे हैं, वह गलत है| वह वो काम नहीं है जिसको करने के लिए आपका जन्म हुआ है| आप न सिर्फ लोगों धोखा दे रहे बल्कि अपना भी जीवन नष्ट कर रहे हैं| ऐसा कोई काम जिसको करने के बाद मन में तारीफ़ पाने, पैसा पाने, या कुछ भी पाने का ख्याल उठे, तो उस काम को करना बंद कर दीजिए, वह काम आपकी आत्मा को घुन की तरह खा जाएगा| उस काम को करने से अच्छा है भीख मांग कर गुजारा कर लेना|

 

ढूंढिए अपने जीवन में, कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर होगा, सबके जीवन में होता है, कुछ लोग खोज लेते कुछ नहीं खोज पाते हैं, लेकिन होता सबके जीवन में है| आपके जीवन में भी कुछ ऐसा होगा जिसके बारे में आप कह पाएंगी, "स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा"| अभी जो आपका प्रश्न है, एक दिन मेरा भी था, 7 वर्ष लगे मुझे ढूँढने में, आपको भी वक़्त लग सकते हैं, क्योंकि समाज और शिक्षा ने हमारे आत्मा के ऊपर बहुत धूल चढ़ा दिए हैं, उनको हटाने में वक्त लग सकता है, लेकिन उद्देश्य मिलेगा ज़रूर| इसलिए, जब तक अपना उद्देश्य नहीं मिल जाता है, तब तक अपने उद्देश्य को खोजने को ही उद्देश्य मानकर आगे बढ़िये|

-इक्क्यु केंशो तजु

 

नोट-प्रश्नकर्ता ने जवाब पाने के लिए 500 रूपये डोनेट किये हैं| यदि आपके कोई प्रश्न हैं तो आप उसे ikkyutzu@gmail.com पर मेल करके पूछ सकते हैं| जवाब पाने के लिए डोनेट करना अनिवार्य है|



Thursday, 27 August 2020

रात का रिपोर्टर

 अब हम तुम्हे नहीं पढ़ा सकेंगे| जानती हो, आस-पड़ोस के लोग क्या कहते हैं ? कहते हैं, लड़का रिपोर्टिंग के लिए लिए बाहर रहता है और बूढ़ा पढ़ाने के बहाने अपनी जवान बहू के साथ........

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एक बूढ़ा बालक, लओत्सो नाम का यही अर्थ होता है चीनी भाषा में| कहते हैं लओत्सो जब पैदा हुआ तो वह 80 साल का था| कुछ लोग इस बात को प्रतीक की तरह लेते है, मतलब उसकी बौद्धिक उम्र उतनी थी| मेरी दृष्टि में लओत्सो ओरिएंट का असली हिमालय है, एक ऐसा हिमालय जिस पर पश्चिम का कोई हिलेरी कभी नहीं चढ़ सकता है| लओत्सो ज्ञान के गौरीशंकर हैं|
लओत्सो का सारा ज्ञान उनकी छोटी-सी किताब 'ताओ ते चिंग' में समाहित है| मुश्किल से 30 पेज की यह किताब अपने में अस्तित्व के सभी राज़ को समेटे हुए है| 'ताओ ते चिंग' के बहुत से सूत्रों में से एक सूत्र अस्तित्व के शुरुआत के बारे में हैं| उसी शुरुआत के बारे में, जिसके सम्बन्ध में अरविन्द सावित्री में लिखते हैं- It was the hour before the Gods awake. जी, यह उस क्षण की बात है जब ईश्वर अपनी नींद से जागा नहीं था| ग़ालिब कहते हैं, जब कुछ नहीं था तो ख़ुदा था, लेकिन लओत्सो ने कहा है कि जब कुछ भी नहीं था तब कोहरा था, धुंध था| ख़ुदा के होने के लिए बन्दे का होना ज़रूरी है, बिना बन्दे के ख़ुदा नहीं हो सकता है| इसलिए ग़ालिब की बातों में बहुत सचाई नहीं है| अरविन्द भी सत्य के बहुत करीब हैं, लेकिन उनकी भी ऊँगली ठीक सत्य पर नहीं है| ईश्वर और नींद ये सब द्वैत की बातें है|
लओत्सो की व्यख्या एकदम सटीक है- जब कुछ भी नहीं था तब धुंध था| रहस्यदर्शी के लिए अंग्रेज़ी में हम मिस्टिक शब्द का उपयोग करते हैं, यह शब्द भी मिस्ट यानि धुंध से बना है| संत वह जो धुंध को देखता है| हमें सब साफ़ दिखता है, हमें पता है कि क्या गलत है और क्या सही, पाप और पुण्य की परिभाषा हमें याद है| लेकिन संत को कुछ भी साफ़ नहीं होता है, उसके लिए पाप-पुण्य, सुख-दुःख, धर्म-अधर्म और अच्छा-बुरा इस सबमे कोई भेद नहीं होता है| उसको कुछ भी साफ़ नहीं होता है| सिर्फ मूर्खों को सब चीज़ें साफ़ दिखाई देती है, संत को नहीं, संत जहाँ से देखता है वहां सिर्फ घाना कोहरा है|
निर्मल वर्मा को पढ़ना धुंध को टटोलना है| निर्मल की दुनिया में कुछ भी साफ़ नहीं होता है, न तो वहां दिन का अलोक है, और न ही रात का अँधेरा, क्योंकि अभ्यास से कोई अँधेरे में भी दिन की तरह देख सकता है| चोर देख लेते हैं, शिकारी देख लेते हैं, आप भी देख सकते हैं| लेकिन कोहरे में देखने का कोई अभ्यास नहीं हो सकता है| आप कितनी ही कोशिश क्यूं न कर लें, कोहरे में कुछ भी साफ़ नहीं होता|
"ज़रा सोचिये, हम कैसे टाइम में जी रहे हैं, जहाँ आदमी अपनी औरत के सामने नंगा नहीं हो सकता है!" - निर्मल वर्मा (रात का रिपोर्टर)
यही सच है हमारे समय का, हमारे ही समय का क्यों यह हमेशा का सच है| कवि गंग को अकबर ने हाथी से कुचलवा दिया था, क्यों? क्योंकि उन्होंने लिखा 'जिसको हरि से प्रीत नहीं आस करे अकबर की' | हमें भी कुचल दिया गया है, हाथी से| यह और बात ही कि इस बार हाथी चीन से आया था|
लओत्सो कहते हैं, "The supreme rulers are hardly known by their subjects. The lesser are loved and praised. The even lesser are feared. The least are despised" (राजा वही महान है जिसकी उपस्थिति का बोध प्रजा को न के बराबर हो, समान्य राजा से लोग प्रेम करते हैं, उनकी प्रशंसा करते हैं, और घटिया रजा से प्रजा डरती है)
इस कसौटी पर आज के राजाओं को कहाँ रखते हैं? आज यह सवाल पूछना बहुत ज़रूरी है| आज ही क्यों यह सवाल हमेशा ज़रूरी था, और आगे भी रहेगा|
'ताओ ते चिंग' में ही लओत्सो का एक और वचन है, "The more laws and commands there are, the more thieves and robbers there will be. (अगर अपराध और अपराधी को बढ़ाना है तो नियम और कानून को बढ़ा दो|)
यही हो रहा है पूरी दुनिया में, रोज़ नए-नए नियमों को लोगों पर थोपा जाता है, कभी घर से बाहर मत निकलो, कभी बिना मुंह ढके बाहर मत निकलो, मत कहो को आसमां में छेद यह किसी व्यक्तिगत निंदा हो सकती है|
इसीलिए रिशी का बॉस, राय साहब, उससे आत्मकथा लिखने के लिए कहते हैं, क्योंकि समाज के सत्य को बिना सत्ता की नज़रों में आए लोगों तक पहुँचाने का एक मात्र उपाय है आत्माकथा| लेकिन वह दिन दूर नहीं जब दुनिया की सरकारें आत्मकथा लिखने पर बैन लगा देगी|
फिर रिशी के पिता को अपनी बहू से कहना पड़ेगा, "अब हम तुम्हे नहीं पढ़ा सकेंगे| जानती हो, आस-पड़ोस के लोग क्या कहते हैं ? कहते हैं, लड़का रिपोर्टिंग के लिए लिए बाहर रहता है और बूढ़ा पढ़ाने के बहाने अपनी जवान बहू के साथ........
-इक्क्यु केंशो तजु (२६, अगस्त २०२०)


Saturday, 2 May 2020

किताब-ए-मिरदाद (तब्सिरा)



किताब का नाम- 'किताब-ए-मिरदाद, लेखक-मिखाइल नईमी

बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में अपने दस सबसे अधिक पसंदीदा किताबों की फ़ेहरिस्त साझा की है। उसमें से दो किताबों का नाम मुझे अभी याद है-महापण्डित राहुल सांकृत्यान की बौद्धचर्या' और लीयो टोलस्टोय की युद्ध और शांति। 'बैद्धचर्या' को लिस्ट में उन्होंने सबसे ऊपर और 'युद्ध और शांति' को सबसे नीचे रखा है। अगर मुझे कभी कोई ऐसी लिस्ट बनानी हो, तो मैं सबसे ऊपर मिखाइल नईमी की किताब-ए-मिरदादलिखूँगा, और फिर नीचे दस तक सेम ऐज़ अववलिख दूँगा।
दो साल से ऊपर हो गये मुझे तब्सिरालिखते हुए, लेकिन मिरदाद के संबंध में अब तक मैं मौन रहा हूँ। और मैंने तय किया था कि इस मौन को कभी नहीं तोड़ूँगा, लेकिन कल फेसबुक पर एक मित्र ने इस किताब का ज़िक्र छेड़ दिया, उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की है कि मैं बूक ऑफ़ मिरदादके बारे में लिखूँ।
मैं कल से ही बड़ी असमंजस में हूँ, आख़िर लिखूँ तो लिखूँ क्या...? मिरराद पर अगर कुछ बोलना हो, तो भीतर बुद्ध-सी गहरी मौन, और बाहर अल हल्लाज़ मंसूर सी मुखरता चाहिए। और यह बहुत ही दुर्लभ संयोग है, दो में से एक को साधना तो आसान है, लेकिन दोनों को एक साथ साध लेना, ‘एक अचंभा मैंने देखा नदिया लागी आग’ जैसी घटना है| इसीलिए इतने दिनों से चुप था|
‘मिरदाद’ पर सिर्फ़ लिखने से काम नहीं चल सकता है। इतने सालों का मौन सिर्फ लिखने से नहीं टूट सकता है| शब्द बहुत ही निर्बल हैं, मौन को तोड़ने के लिए| जब तक कि आप मेरे सामने न हों, और मैं चीख-चीख कर आपसे इस किताब के बारे में न कह  लूं, तब तक न तो आप इस किताब की महिमा को समझ पाएँगे, और न ही मुझे अभिव्यक्ति के बाद जो सहज तसल्ली मिलती है, वो मिलेगी|
खैर, आज कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ, तुतलाते हुए ही सही, आज कुछ बोलूँगा जरूर| मेरे आश्रम प्रवास के दौरान (2014 के 10 नवम्बर से लेकर 2017 के 10 जनवरी तक) , किसी ने मुझे किताब ए मिरदादपढ़ने को दी थी। मुझे याद है दिन भर किताब पढ़ने के बाद शाम को, संध्या सत्यसंग से पहले, ज़ोरबा (आश्रम का टी-शॉप) पर ग्रीन-टी पीने के लिए बैठता था| मेरी जगह तय थी, कैश काउन्टर के सामने खम्भे से सट कर, गर्मी के दिनों में दादी हौवा के ज़माने का एक पंखा सर पर घूमता रहता था, सामने हाईवे पर आती-जाती गाड़ीयों को मैं अपनी जगह से देख सकता था, पर्वत स्वामी मेरी सीट को व्यास सीट बोलते थे| वहीं टेबल पर मेरे पास दो-चार और सन्यासी बैठ जाते थे, फिर चाय पर चर्चा शुरू होती थी| मैं किताब-ए-मिरदाद पर बोलना शुरू करता था| बोलते समय मैं बिलकुल आविष्ट हो जाता था, लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे| मेरी बातें सुन-सुनकर आश्रम में किताब पढ़ने की होड़ मच गयी| कई लोगों ने किताब मंगवाई, कईयों ने मुझसे उधार मांग कर पढ़ी| जिस सन्यासिन ने मुझे वो किताब पढ़ने को दी थी, अचानक उनकी पूछ बढ़ गई, हर कोई उनसे वो किताब मांगने लगा| मजा ये था कि मुझे देने से पहले उन्होंने ख़ुद भी वो किताब नहीं पढ़ी थी| अब उनको भी किताब पढ़ने की जल्दी थी| इसी होड़ में दिव्या ने एक ही रात में पूरी किताब पढ़ डाली| जिसके पास ही किताब जाती थी, उसी पर उसे जल्दी ख़त्म करने की प्रेशर बनने लगता था| कई लोग किताब के लिए आपस में लड़ भी लिये| ऐसा कोई दो महीने तक चला था|
होड़ भले ही दो महीने तक चला हो, लेकिन उसका प्रभाव बहुत ही दूरगामी रहा था| 6 महीने बाद मेरे जन्म दिन पर दिव्या ने मुझे ‘किताब-ए-मिरदाद’ गिफ्ट की| मुझे याद गिफ्ट-रैप हटा कर जैसे ही मैंने कितबा को देखा, ख़ुशी के मारे पागल हो गया, जैसे आर्थर शोपनहावर उपनिषद को अपने सिर पर रख कर नाचे थे, वैसे ही मैं 'बुक ऑफ़ मिरदाद' को सर पर रख कर नाचने लगा था| दिव्या को पता था कि ‘हिंदी वर्शन’ पढ़ कर मैं बहुत खुश नहीं था, एक बार मैं किताब को अंग्रेजी में पढ़ना चाहता था| हिंदी अनुवाद बहुत ही पुअर था| अनुवाद में अक्सर आत्मा चली जाती है, और भाषाओं का तो मुझे पता नहीं, लेकिन किसी भी किताब का हिंदी अनुवाद पढ़कर मुझे ऐसा ज़रूर लगता है|
उस दिन से लेकर आज तक ‘बुक ऑफ़ मिरदाद’ मेरा पाथेय बना हुआ है| कुछ दिनों के अन्तराल पर, एक बार किताब को ज़रूर पलट कर देख लेता हूँ| जब भी लगता है अपना पता भूल गया हूँ, एक बार मिरदाद से पूछने चला जाता हूँ| अक्सर ख्वाबों में नरौन्दा की जगह ख़ुद को मिरदाद के श्री चरणों में बैठा हुआ देखता हूँ|
किताब से कोई भी ‘कोट’ यहाँ शेयर नहीं करूँगा| इसके पीछे दो वजूहात हैं- एक यह कि मैं तय नहीं कर पा रहा कि क्या शेयर करूं, और क्या न करूं| किताब का हर वाक्य एक महावाक्य है| यही दिक्कत मैंने किताब पढ़ते समय भी महसूस की थी| मुझे हाईलाइटर साथ में रख कर किताब पढ़ने की आदत है| पढ़ते समय अगर कुछ महत्वपूर्ण लगता है तो उसे मैं अंडरलाइन कर देता हूँ| लेकिन, दो ऐसी किताबें हैं जिनके दो-तीन पृष्ठों पर ही मैंने अंडरलाइन किया है| एक ‘किताब-ए-मिरदाद’ और दूसरा जे कृष्णमूर्ति की ‘सद्गुरु के चरणों में (At the feet of the master)’, इन दोनों किताबों में एक भी ऐसा वचन नहीं है, जो कोहिनूर से कम वैल्यू का हो, इन फैक्ट जो जानते हैं, उनके लिए इन वचनों के सामने कोहिनूर की चमक भी फीकी है|

किताब के पहले ही पृष्ठ पर मिखाइल ने पाठकों को चेताया है, यह है किताब-ए-मिरदाद’ उस रूप में जिसमें उसके (मिरदाद के) सबसे छोटे और विनम्र शिष्य नरौंदा ने लेखनीबद्ध किया| जिनमे आत्म-विजय के लिए तड़प है, उनके लिए यह आलोक-स्तम्भ और आश्रय है| बांकी सब इससे सावधान रहें|” मैं भी आपसे यही कहूँगा, अगर आपको अपने सपनों से प्रेम है, और नींद अच्छी लगती है, तो इस किताब से सावधान रहिये| यह किताब नहीं डायनामाइट है| इसका धमाका सिर्फ आपके शरीर को ही नहीं, आपके मन और आत्मा दोनों को उड़ा देगा| इस किताब से डरिये, और जिन्होंने यह किताब पढ़ रखी हो उनसे बच कर रहिये| 
            यही मेरी आपसे विनती है| Please don't read this book. संत पल्टू के इस महावाक्य को हमेशा याद रखिये" अजहूं चेत गंवार-
जीते जी मरि जाय, करै ना तन की आसा।
आसिक का दिन रात रहै सूली उपर बासा।।
मान बड़ाई खोय नींद भर नाहीं सोना।
तिलभर रक्त न मांस, नहीं आसिक को रोना।।
पलटू बड़े बेकूफ वे, आसिक होने जाहिं।
सीस उतारै हाथ से, सहज आसिकी नाहिं।
 -इक्क्यु केंशो तजु

Sunday, 5 April 2020

जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?


प्रश्न - 24 घंटे आनंदित रहने का क्या मार्ग है ?
Ikkyu- सबसे पहले आपके भीतर 24 घंटे आनंदित रहने का जो लोभ है, उसे छोड़ना होगा..। दूसरी बात, आनंद का अपना कोई अनुभव नहीं होता है| सुख का अनुभव होता है, दुःख का भी अनुभव होता है, लेकिन आनंद का कोई अनुभव नहीं होता है, क्योंकि अनुभव के लिए ‘दो’ का होना ज़रूरी है। सुख के पीछे दुःख छिपा होता है, इसीलिए सुख का अनुभव होता है। इसी तरह दुःख के पीछे सुख छिपा होता है। अगर भीतर बिल्कुल ही सुख न हो तो आपको दुःख का पता नहीं चलेगा। तो, इस बात को बहुत ही अच्छे से समझ लीजिए कि अनुभव हमेशा विपरीत का होता है। साथ ही एक और बात गहरे उतार लीजिए,’कोई भी अनुभव आध्यात्मिक नहीं होता है’। कैसा भी अनुभव क्यों न हो सब अनुभव मन के हैं।
आनंद का अनुभव नहीं हो सकता है क्योंकि आनंद आपका होना है। आनंद चेतना का स्वभाव है। इसीलिए, जब तक चेतना सुख और दुःख के अनुभव में उलझी रहती है, वह अपने स्वभाव से वंचित रहती है। सुख में सुखी होना और दुःख में दुखी होना छोड़ दीजिए, फिर जो रह जाएगा वही अनन्द है।
प्रश्न- जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?
इक्क्यू- जागकर जीना चाहिए...दो दृष्टिकोण मैं आपको देता हूँ, जो भी सही लगे उसे चुन लीजिए। दोनों का परिणाम एक जैसा है।
पहला- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखिये जैसे आप उन्हें पहली बार देख रहे हैं। हर दिन को ऐसे जीना शुरू कीजिये जैसे यह आपके जीवन का पहला दिन है।
दूसरा- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखना शुरू कर दीजिए जैसे कि आप उन्हें आख़री बार देख रहे हैं। हर दिन को अपने जीवन का आख़री दिन समझिए।
दोनों ही दृष्टिकोण का एक ही लक्ष्य है-अतीत और भविष्य से मुक्ति..। जो भी आपको जमे उसे चुन लीजिए और कोई तीन महीने इस प्रयोग को कीजिए।
प्रश्न- आपका मूल संदेश क्या है ?
मेरा कोई संदेश नहीं है..। मैं कोई पैग़म्बर (पैग़ाम/मेसेज लाने वाला) नहीं हूँ..! संदेश लाना डाकिये का काम है। मैं कोई डाकिया-वग़ैरह नहीं हूँ। डाकिया एक जगह की ख़बर को दूसरी जगह पहुँचता है। यह बिचौलिये काम है। मुझे ऐसा काम पसंद नहीं है।
मैं अपने से ऊपर किसी को नहीं मानता हूँ, और ना ही कोई मुझसे नीचे है। फिर किसका संदेश किस तक पहुँचाऊँ?? मैं स्वयं संदेश हूँ।और यही मैं आपसे भी कहना चाहता हूँ, “अप्प दीपो भव:”


Saturday, 8 February 2020

हर पल सेक्स माइंड में चलता रहता है

प्रश्नकर्ता-माइंड बहुत डिस्टर्ब रहता है, हर पल सेक्स माइंड में चलता रहता है|
इक्क्यु- पोर्न देखते हैं?
प्रश्नकर्ता-जी, देखता हूँ|
इक्क्यु-पोर्न देखते हुए हस्तमैथुन/मैथुन करते हैं?
प्रश्नकर्ता- जी, करता हूँ|
इक्क्यु- जितनी जल्दी हो सके ये दोनों चीज़ छोड़ दीजिए...यह आपके सेक्स लाइफ को बर्बाद कर देगा..वैवाहिक जीवन को भी नष्ट कर देगा..साथ ही आपके दिमाग की संवेदनशीलता को हमेशा के लिए खत्म कर देगा| पोर्न का दिमाग पर वही असर पड़ता है, जो ड्रग्स या किसी और मादक द्रव का...पोर्न देखने वालों में शीघ्र-पतन, और erectile dysfunction की समस्या बहुत ही आम है.. पोर्न को जीवन से एकदम दूर कर दीजिए..कुछ दिन (कोई 30 दिन ) पत्नी के साथ भी सेक्स मत कीजिये...सब ठीक हो जाएगा...
प्रश्नकर्ता- मैं पत्नी के साथ 3----(बीप) करना चाहता हूँ.....मन में हमेशा यही सब चलता रहता है|
इक्क्यु- यह सब ख्याल आपके भीतर पोर्न देख कर पैदा हुआ है... इस सबसे से आप चीज़ों को बहुत ही मुश्किल बना देंगे... आप कुछ दिन वाइफ के साथ सेक्स मत कीजिए, पोर्न मत देखिये...हस्तमैथुन भी मत कीजिए ...कुछ दिनों में आपका ब्रेन नार्मल हो जाएगा...और फिर आपकी पत्नी भी आपके साथ पहले से ज्यादा खुश रहने लगेगी... सेक्स से कभी भी स्थाई सुख या आनंद नहीं मिल सकता है... थ्री...(बीप) जैसी चीजें लॉन्ग रन में आपको अपनी पत्नी की नज़रों में गिरा देगा...वो कभी भी आपकी इज्जत नहीं कर पाएगी... जीवन बहुत ही दुष्कर हो जाएगा... पोर्न छोड़ दीजिए सब ठीक हो जाएगा..और साथ ही कोशिश कीजिए की पत्नी के साथ महीने में सिर्फ दो बार सेक्स हो ...धीरज रखिये चीज़ें बेहतर हो जाएगी...
चित्र साभार- गूगल
सेक्स से सुख तभी मिल सकता है जब आप एक गैप के बाद इसमें उतरते हैं... पोर्न देखने की वजह से आदमी सेक्स का आदि हो जाता है .... और जितना अधिक इसके बारे में सोचता है, उतना ही रियल सेक्स उसके लिए मुश्किल हो जाता है
अकेले में फ़ोन का इस्तेमाल मत कीजिए, रात को बिलकुल ही नहीं... कोई 90 दिन जब आप बिलकुल पोर्न नहीं देखेगे और हस्तमैथुन भी नहीं करेंगे...तब आपका ब्रेन और शरीर नार्मल हो पाएगा...

Tuesday, 4 February 2020

ध्यान जीवन जीने का एक ढंग है...


प्रश्न- नमस्ते सर, आपकी बात सोच रहे थे, हम खुद को समझने और शांत करने के लिए क्या करें... हमें मैडिटेशन के बारे में भी कुछ पता नहीं... कुछ दिन ब्रह्मा कुमारी में जाते थे पर अब नहीं जाते... पता नहीं क्यों..| आप कुछ बताएं प्लीज्..!

ख़ुद को वही समझ सकता है, जो यह भलीभांति जान ले कि वह ख़ुद को नहीं समझता/जानता है| इसी तरह, जिसको शांति चाहिए उसे अपनी अशांति को ठीक से समझना होगा..| तो, आपको अपने को समझना नहीं है, आपको बस इतना समझना है कि आप अपने को नहीं समझती/जानती हैं| और जिस उपाय से हमें यह समझ आता है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, उसी को ही शास्त्रों में ध्यान/मैडिटेशन कहा गया है| 
ध्यान से न तो शांति मिलती है, न ही हम ख़ुद को समझते हैं.. ध्यान से हमें बस इतना समझ में आता है कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं| यह कहने में कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, और सच में ही यह जानना कि हम ख़ुद को नहीं जानते हैं, में बड़ा भेद है| जिस दिन आपको पता चलेगा कि आप सच में ही ख़ुद को नहीं जानती हैं, आपके पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाएगी...पूरा जीवन ही कुछ और हो जाएगा...| 
ध्यान हमें वस्तुस्थिति का बोध करता है| और जिसने यह जान लिया कि वह ख़ुद को नहीं जानता है, वह असल में बहुत कुछ जानता है| उपनिषद तो यहाँ तक कहते हैं कि वह सब कुछ जानता है, "यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्‌ ॥"
अशांति का बोध ही शान्ति का मार्ग है..| इसीलिए, शांति पाने से ज्यादा अशांति को समझने की कोशिश कीजिए...असल में शांति की बहुत ज्यादा चाह की वजह से ही हम कभी अशांति को नहीं समझ पाते हैं| अज्ञानी ज्ञान की चाह के कारण ही भटक जाता है| इन फैक्ट 'चाह' हमें भटकती है..| कुछ लोग, जो क्रोध से पीड़ित है, पूरी जिंदगी क्रोध से लड़ते रहते हैं, फिर भी कभी उससे मुक्त नहीं हो पाते हैं| कारण क्या है? कारण है 'अक्रोधी बनने की चाह'...! और मजा यह है कि जो व्यक्ति अक्रोधी होने की चाह को छोड़ कर क्रोध से लड़ना बंद कर देता है, वह क्रोध से मुक्त हो जाता है| तो, इसका अर्थ हुआ 'स्वीकार' करना सूत्र है| यही ध्यान है... 'स्वीकार करना' ध्यान है, और लड़ना/विरोध करना 'अध्यान है| अगर आप अशांत हैं, तो अपनी अशांति को स्वीकार कर लीजिए, उससे लड़िये मत...अशांति के क्षण में शांत होने की कोशिश करना 'अशांति से लड़ना है'... और आप जितना अशांति से लड़ेंगी और शांत होने की कोशिश करेंगी, उतना है अशांति बढ़ता जाएगा...| अशांति को स्वीकार करने से मेरा क्या मतलब है? जब अशांति मन को पकड़े तब आँखे बंद करके भीतर देखिये, देखिये कि उस क्षण आपके शरीर और मन में क्या घट रहा है... उस क्षण शांत होने की कोशिश या फिर अशांति से भागिए मत...टीवी खोल कर मत बैठिये, दोस्तों को मत फोन लगाइए...यह मत कहिये कि मुझे शांत होना है , या फिर मैं शांत हूँ... नहीं बस जो कुछ भी आपके भीतर घटित हो रहा है, उसको देखिये, उसमे गहरे उतरिये...इस बोध से ख़ुद को भरिये कि अभी इस क्षण मैं अशांत हूँ (ऐसा नहीं की अशांत होना अच्छी बात नहीं है, मुझे शांत होना है, नहीं ऐसा नहीं ...बस अशांति है ..यथा भूतं...ऐसा है ....!) | बिना किसी विकल्प के, बिना किसी धारणा के जो हो रहा है , उसके अनुभव में गहरे उतरना ध्यान है| ध्यान कोई क्रिया नहीं है जिसे कोई आँख बंद कर के एक घंटा कर सकता है ... ध्यान जीवन जीने का एक ढंग है... | अगर आपको ख़ुद को समझना है, तो आपको अभी तक के इकट्ठा किये गए सभी उधार ज्ञान को उतार का फेकना होगा..| आपको अपने उस रूप की तलाश करनी होगी, जो आपके पास तब था जब आपके पिता भी नहीं जन्मे थे| ये जो अभी आपका नाम है, यह उधार है... धर्म उधार है, रूप उधार है, जाति उधार है... इन फैक्ट अभी आपके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे आप अपना कह सकती हैं, सब उधार है ...वही ज्ञान आपका अपना हो सकता है जिसे आप गहरी नींद में अपने साथ ले जा सकती हैं... अभी तो नींद में आप सब भूल जाती हैं..| जो ज्ञान नींद में साथ छोड़ देता है, वो मौत में क्या काम आएगा...| 

आप कहती हैं 'हमें मैडिटेशन के बारे में भी कुछ पता नहीं', यह अच्छी बात है| ब्रह्मा कुमारी से भी आप बचकर निकल गयीं, यह बहुत ही सौभाग्य की बात है|

Monday, 4 November 2019

बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है (महा-प्रयोग डे- 4 & 5)

परसों पीवीआर पर कॉफ़ी पीने गया था| एक छोटा-सा लड़का एक मरे हुए चूहे को हाथ में लेकर सबको डराने की कोशिश कर रहा था| चूहा आकर में काफी बड़ा था, वह उसके पूछ को पकड़कर बैठे हुए लोगों पर उछाल रहा था| उसी लड़के के साथ एक और लड़का था, जो लोगों को पहले आगाह कर दे रहा था, "वो देखिये वह चूहा लेकर आपको डराने आ रहा है|" लोग डरने से पहले संभल जाते थे, इसीलिए संभल-संभल कर डरते थे और डर-डर कर संभलते थे| यह एक अच्छा खेल था, लेकिन मुझे इस तरह का खेल देखना पसंद नहीं है| मैं चूहों से नहीं डरता, इसीलिए मैंने कभी बिल्ली नई पाली| चूहे और बिल्ली दोनों (लिखता भले ही 'दोनों' हूँ, लेकिन मैं बोलता हमेशा 'दौनों' हूँ, बोलने में लिखने से ज्यादा गलतियाँ करता हूँ|) मुझे नापसंद है|
मौन के अलावा मैं किसी भी भाषा को ठीक से उच्चारित नहीं कर पाता हूँ| मुझे भाषओं से डर लगता हूँ| इन फैक्ट, हर बार बोलने से पहले मैं बहुत डर जाता हूँ| अक्सर बहुत बोल कर मैं अपने डर को छुपाने की कोशिश करता हूँ| लेकिन डर छुपाने से नहीं छिपता है| छिपाने की कोशिश में ही वह बाहर आ जाता है|
मौन मेरी अपनी भाषा है, इसे मैंने किसी से सीखा नहीं है| 9 महीने तक माँ के गर्भ में रह कर मैंने इसे साधा है| माँ के गर्भ से निकल कर मैं तुरंत नहीं चीखा था, रोने से पहले थोड़ी देर 'मौन' रहा था| मौन रहना, सुनना, रोना और मुस्कुराना ये चार चीज़े मैं अपने साथ लेकर आया था| इसके लिए मैंने कहीं से ट्रेनिंग नहीं ली थी| इसीलिए मैं जब भी मौन होता हूँ, 'मैं' नहीं होता हूँ-बस 'मौन' होता है, एक समग्र मौन| माँ के गर्भ में आने से पहले मैं मौन में था-मौन के गर्भ से ही मैं माँ के गर्भ में आया था| पहली बार जब मैंने 'माँ' शब्द का उच्चार किया था, तो वह कोई शब्द नहीं था, वो मेरे मौन का विस्तार था| इस जीवन से जाने से पहले भी अंतिम बार मैं इसी शब्द का उच्चार करके अनंत मौन के गर्भ में चला जाऊँगा| मेरे बाबा ने भी ऐसे ही किया था| मरने से पहले वे कोमा में चले गए थे| उनकी आँखे हमेशा बंद रहती थी| न वे किसी से कुछ बोलते थे, न ही किसी की कोई बात सुन सकते थे| बस कभी-कभी माँ शब्द का उच्चार करते थे| मरने के बाद वे बिलकुल 'मौन' हो गए थे|
कल शाम का खाना आदित्य के यहाँ खाया था| वे गाँव से मरुआ का आटा लेकर आए थे| इधर काफी दिनों से मैं मरुआ की रोटी खाना चाह रहा था| कल मरुआ की मोटी रोटी, देशी घी और गुड़ खाकर शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी तृप्ति मिली|
पिंज़रे के तोते की तरह मैं दिल्ली में छटपटा रहा हूँ| शहर की हवा शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी बीमार कर रही है| आदमी को कभी भी ऐसी जगह नहीं रहना चाहिए जहाँ वह कहीं भी पेशाब नहीं कर सकता हो| जंगल और गाँव मुझे इस लिए पसंद है कि वहां पेशाब करने के लिए किसी विशेष नियमों का पालन नहीं करना पड़ता है| खुले में पेशाब करना एक महान सुख है। शहर हमें ऐसे बहुत से सुखों से वंचित करता हैं| अनावश्यक 'dos और don'ts में रहना मुझे पसंद नहीं है- यहाँ से चलो, यहाँ से मत चलो, ये करो, ऐसा मत करो -शहरों में इन सब बातों से मैं बहुत थक जाता हूँ| शहर मनुष्यों के लिए नहीं मशीनों के लिए हैं| वही मनुष्य शहर में रह सकता है जो मशीन बनने को तैयार हो| आदित्य का बच्चा अभी सिर्फ आठ महीने का हैं| कल उनके बच्चे को देख कर मैंने उनसे वही कहा जो वानगोग ने अपने भाई थिओ से कहा था, "बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है|" आदित्य मेरी बातों को नहीं समझे, लेकिन उनका बेटा मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था|
मेरा महा-प्रयोग बहुत ही सही ढंग से सफलता पूर्वक चल रहा है| आज पांचवा दिन है, बिस्तर पर जाने का समय और मोबाइल को ऑन और ऑफ करने के मामले में मैं एकदम सही जा रहा हूँ| खाने के मामले में 2% इधर-उधर हो जाता है| बांकी प्रगोय से काफी कुछ बदल रहा है जीवन में| बदलते-बदलते एक दिन मेरा जीवन बिलकुल वैसा ही हो जाएगा, जैसा अभी हैं| बहुत बदले के बाद चीज़ें एन अपने जैसी हो जाती हैं|

Wednesday, 30 October 2019

महा-प्रयोग डे-1

आज महा-प्रयोग का पहला दिन है| कल शाम पांच बजे मोबाइल फोन बंद कर दिया था| और रात ठीक 10 बजकर 30 मिनट पर सोने चला गया था| शाम को मोबाइल बंद करने के बाद थोड़ी देर किताब (सावंत आंटी की लडकियाँ) पढ़ता रहा, लेकिन एक पॉइंट के बाद मन फोन का इस्तेमाल करने के लिए बेचैन होने लगा| बेचैनी इस बात का सबूत था कि मन मोबाइल फोन का आदी हो गया है| 
प्रयोग के हिसाब से मैं अगले 90 दिनों तक शाम पांच बजे से लेकर सुबह 9:30 तक मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करूँगा| साथ ही लैपटॉप, टीवी और रेडियो इत्यादि का इस्तेमाल भी नहीं करूँगा| दूसरा, रात 10:30 तक सो जाऊंगा| 
कल शाम मोबाइल फोन बंद करने के बाद सकारात्मक बात यह हुई कि दिव्या और मैं बड़ी देर तक सोफे पर बैठ कर बातें करते रहे| मोबाइल फोन के ऑन रहते इतनी लम्बी चर्चा निर्बाध रूप से बहुत कम ही हो पाती है| पीछे मेहसाना में भक्तराज, राव साहब और मैं एक दिन फोन भक्तराज के घर पर छोड़कर सीसीडी (संकूवाटरपार्क) गए थे| शाम 5:00 बजकर 30 मिनट पर हम घर से निकले थे| कोई आधा घंटा हमें सीसीडी पहुंचे में लगा होगा| कॉफ़ी आर्डर करने के बाद हम ब्रह्म-चर्चा में लग गए| शुरू में राव साहब थोड़े बेचैन लग रहे थे, उनकी चिंता यह थी अगर इस बीच उनकी होने वाली गर्लफ्रेंड ने मेसेज कर दिया तो क्या होगा-क्या वह इस बात को सहज रूप से स्वीकार कर पाएगी कि उसके मेसेज का राव साहब ने आनन-फ़ानन में जवाब नहीं दिया? भक्तराज और मुझे कोई तीस मिनट लगा राव साहब को सहज करने में- आप समझिये चौबीसों घंटे ढेल की तरह अगर आप उसके लिए बिछे रहेंगे तो वो कभी आपसे नहीं पटेगी| लड़कियां ऐसे लड़कों को कभी पसंद नहीं करती है जिसके पास कोई रीढ़ ना हो| जब हमने ऐसे अजीबों-गरीब कोई पचास तर्क दिए तब राव साहब थोड़े रिलैक्स हुए| हम (भक्तराज और मैं) दोनों इस बात से बहुत ही हैरान थे कि इस सदी में मोबाइल से दूर होने पर भी आदमी को सदमा लग सकता है|
हम तीनो में से किसी के भी पास घड़ी नहीं थी, सो हमें टाइम का कुछ पता नहीं चला| और हमने किसी से पूछा भी नहीं| हम अपने-अपने ढंग से ब्रह्म की व्याख्या करने में इतने तल्लीन थे कि कब शाम ढली और कब रात हुई हमें किसी भी चीज़ का कुछ पता नहीं चला| जब सीसीडी वाला भाई दूबारा आर्डर देने के लिए हमसे कहने आया, तब हमें अंदाज़ा लगा कि शायद हम बहुत देर से बैठे हैं|
घर पहुँच कर जब हमने समय देखा तो हम तीनो हैरान होने से ख़ुद को नहीं रोक पाए| रात के 11:00 बज रहे थे| मतलब अगर आने-जाने के एक घंटा को निकाल दिया जाए, तो हमने 4 घंटे से भी ज्यादा सीसीडी में ब्रह्मचर्चा करते हुए बिताया| अगर बिना घड़ी देखे कोई हमसे पूछता कि हम कितनी देर सीसीडी में बैठे थे, तो हम अंदाज़े से दो घंटे से ज्यादा नहीं बता पाते| हमें दो घंटे बोलते हुए भी डाउट ही होता| 

मोबाइल के इस्तेमाल को सिमित करने और सोने का समय तय करने के अलावा मैंने भोजन को भी महाप्रयोग में शामिल किया है| आज से तीन महीने के लिए मैं सफ़ेद, चीनी, गेंहू और दूध का सेवन बिलकुल बंद कर रहा हूँ| अभी तक मौका-बेमौका चीनी और दूध का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सेवन कर लेता था, लेकिन अब वो भी बंद कर रहा हूँ|    
मोबाइल का इस्तेमाल, सोने का तय समय और भोजन में मामूली सुधार लाने के अलावा और किसी चीज़ को बदलने पर मेरा कोई विशेष ज़ोर नहीं है| अगर कुछ अपने आप सजह रूप से बदलता है तो ठीक, वर्ना प्रयास से मैं किसी भी चीज़ में बदलाव नहीं लाना चाहता हूँ| 
जब से दिल्ली आया हूँ तभी से रोज़ सुबह उठ कर पार्क जाने की सोचता था और टाल देता था| रात लेट सोने की वजह से सुबह उठने में देर हो जाती थी| सुबह के पार्क जाने को शाम पर टाल देता था, और शाम आते-आते उसे अगली सुबह पर| लेकिन कल रात ठीक समय पर सो जाने की वजह से, आज सुबह जल्दी नींद खुल गई| नित्यकर्म से फ़ारिग होने के बाद बड़ी देर तक किताब (गीत चतुर्वेदी की सावंत आंटी की लड़कियां) पढ़ते हुए पौ फटने का इतज़ार करता रहा| बहुत दिन बाद किताब पढ़ते हुए ऐसी शान्ति अनुभव किया| 
अपने मुंबई, दाहोद और मेहसाना निवास के दौरान निरंतर वाक करते रहने की वजह से मैं बहुत ही सुगमता के साथ तेज गति से चल पा रहा था| काफी दिनों से निष्क्रिय रहने की वजह से दिव्या उतनी सुगमता से तेज़ नहीं चल पा रही थी| नतीजतन, मुझसे पीछे न रह जाए इसलिए, बीच-बीच में उसे दौड़ना पड़ता था| मुझे अपनी याद आ गई, बम्बई में ठीक ऐसी ही हालत मेरी थी| सर (पवन श्रीवास्तव) बहुत तेज चलते हैं, उनके साथ वाक करते समय मैं अक्सर पीछे छुट जाता था| मुझे तेज चलाने के लिए, सर कोई कई बार मुझे धक्का मारना पड़ता था| मैं सोचा करता था-इतनी तेज़ चलने तो अच्छा है कि दौड़ ही लूं| 
सुबह वाक पर जाने के अलावा एक और चीज़ जो सहज रूप से घट रही है, वह है 'लिखना'| एक अरसे से मेरा लिखना बंद हो गया था| आज बड़े ही सहज ढंग से यह फिर से शुरू हो गया है| आगे मेरी कोशिश यही रहेगी कि आने वाले 90 दिनों में महा-प्रयोग के जो भी छोटे-बड़े परिणाम होंगे उनसे आपको अवगत कराता रहूँ| 
                                                (दिल्ली- 31-10-2019, 12:08 PM)


Thursday, 5 September 2019

आज के आइस-क्रीम का स्वाद सबसे अलग लग राह है..है ना ?


लड़की-कोई आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता...(सोफे पर लेट कर छत को देखते हुए) कोई मुझे आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता.....
लड़का- पैसें नहीं है...और मेरा अभी आइस-क्रीम खाने का मन भी नहीं है..तुमको अकेले ही खाना हो तो ऑनलाइन आर्डर देकर माँगा लो?
लड़की- नहीं फिर रहने दो ...नमकीन होता तो, खा भी लेती, मीठा अकेले नहीं खाना| पैसे क्यूं नहीं है?
लड़का-नहीं है बस, जो थे वो बाइक वाले को दे दिये..कल एटीएम से निकालना होगा|
लड़की- (फिर से गाने लगती है..) कोई मुझे आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता.....| 
लड़का-बस दो-दस के नोट पड़े हैं, मेरे पास| इतने में होगा तो चलो चलते हैं| 
लड़की- कुल्फी तीस का देता है| 
लड़का- (अपना जेब टटोलते हुए) एक पांच का सिक्का भी है|
लड़की-रुको... कुछ छुट्टे मेरे पास भी पड़े हैं..(भाग कर हॉल से कमरे में जाते हुए) बीस रूपये हैं (चिल्लड़ गिनते हुए)-टोटल कितना हुआ?
लड़का-हम्म...पचीस मेरे पास है, और बीस तुम्हारे पास तो..कुल हुआ 45 रुपया..| अरे..यार अगर पन्द्रह रूपये और मिल जाए तो मैं भी खाल लूं... रुको मैं अपने बैग में देखता हूँ..(भाग कर कमरे में जाता है, बैग सर्च करता है)..सात रूपये मिले!
लड़की- दो कुल्फी के लिए आठ रूपये और चाहिए..रुको मैं अपने बैग में भी देखती हूँ...
लड़का-कहीं तो कल पांच का एक सिक्का पड़ा देखा था!
लड़की- वही पांच का सिक्का जोड़ कर तो मेरा बीस रुपया हुआ है| मेरे बैग में एक भी रुपया नहीं नहीं है-तुम एक भी रुपया मेरे पास नहीं छोड़ते हो| 
लड़का-(अपना सब सामान देखते हुए, बेड के नीचे, टेबल पर, जींस के जेब में, सोफे के नीचे..) यार ऐसा कैसे हो गया कि अपने पास 8 रुपया भी नहीं है..कितना तो यहाँ वहां पड़ा देखता था|
लड़की- वही 'कितना' जोड़ कर तो 52 रुपये हुए हैं....| छोड़ों नहीं मिलेगा...एक काम करते हैं...उसकों बोल देंगे कि 8 रुपया बाद में दे देंगे| 
लड़का-(बे-मन से) हाँ चलो ये ठीक रहेगा(रूम से निकलते हुए) अरे...आई हैव एन आइडिया...ये जो अपने पास इतना अख़बार पड़ा है, चलो इसको बेच देते हैं..| 
लड़की- (चहकते हुए) हाँ...वहीं हैंडी मार्केट के पास ही रद्दी वाले का शॉप है...चलो फिर ज्यादा पैसे आ गए तो मैं एक कोण भी ले लुंगी..|
लड़का- (मन-ही-मन 'गाँव बसा नहीं की भिखारी आ गए)
-------थोड़ी देर बाद-------
लड़की- आज के आइस-क्रीम का स्वाद सबसे अलग लग राह है..है ना ?

घर से जब आईना देखकर निकलता था


मैं किसी भी सवाल का जवाब नहीं हूँ| लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, "तुम क्या हो?", और मैं बगले झाँकने लगता हूँ| घर से जब आईना देखकर निकलता था, तो वही था जिसे लोग 'आदमी, इन्सान, और मनुष्य' कहते हैं| पता नहीं पूछने वाले महानुभाव को इसका पता कैसे नहीं चलता है| फिर कुछ लोग पूछते हैं, "तुम क्या करते हो?", तो मैं एकदम से बिदक जाता हूँ| क्या बोलूं की मैं क्या करता हूँ| यदि सच बोलता हूँ कि 'मैं कुछ भी नहीं करता हूँ', तो सामने वाले को यकीन नहीं होता है| और यदि झूठ बोलता हूँ, तो मुझे अच्छा नहीं लगता है| 

गए साल अपनी बुआ से मिलने राजस्थान गया था, वो कहने लगीं, "सब पूछते रहते हैं कि आपका भतीजा क्या करता है, मुझे तो ख़ुद ही पता नहीं की तुम क्या करते हो, अब क्या बोलूं में लोगों को, क्या करते हो तुम?" मुझे कुछ समझ ही नहीं आया कि मैं उनसे क्या बोलूं| 'बौआता(भटकता) रहता हूँ, इधर-से-उधर, और तो कुछ करता नहीं', मैंने ने उनसे कहा| "इतना घूमने के लिए पैसा कहाँ से लाते हो?", बुआ बोली| 'ढक-पेंच से कमा लेता हूँ, या कह लो की GD करता हूँ', मैंने उनसे कहा| "ई जीडी क्या होता है?", मुंह बनाते हुए बुआ बोली| 'जीडी माने गोरख धंधा, यही करता हूँ मैं', मैंने उनसे कहा| "तुम्हारे बाप का भी कभी किसी को पता नहीं चला कि क्या करता है, और तुम्हारा भी वही हाल है..असल बेटे हो तुम'', चाय का कप उठाकर जाते हुए बुला बोली| 
उस दिन के बाद से अब जब भी कोई मुझसे मेरे कमाने का राज़ पूछता है तो जीडी कह देता हूँ| लेकिन मैं ख़ुद नहीं जानता कि ये जीडी क्या है, और मैं क्या करता हूँ| मैं बस इतना जानता हूँ कि कुछ-से-कुछ करता रहता हूँ, और उसके परिणाम स्वरूप कुछ-का-कुछ होता रहता है| या फिर इसको ऐसे कह सकता हूँ, 'करता-धरता कुछ भी नहीं हूँ, लेकिन होता बहुत कुछ रहता है'| 'तुम क्या करते हो के बजाय यदि मुझसे ये पूछा जाए कि तुम्हारे जीवन में क्या-क्या होता रहता है', तो बड़ी सहजता से बहुत कुछ बता सकता हूँ| 
मैं अपने जीवन में करता कुछ भी नहीं हूँ, और न ही मैं कुछ हूँ| जैसे सबके जीवन में होता है, वैसे ही मेरे जीवन में भी बहुत कुछ होता रहता है| और मेरे जीवन में शुरू से ही सब कुछ ऐसे ही है| मैंने जन्म लिया नहीं था, मेरा जन्म हुआ था, और जैसे अपने आप एक दिन जन्म हुआ था, वैसे ही बड़ा हो गया, और एक दिन ऐसे ही मर भी जाऊँगा| सब अपने आप हो रहा है| इसमें मैं कुछ कर नहीं रहा हूँ| इसीलिए 'करने' की बात उठा कर आप मुझे बड़ी असुविधा में डाल देते हैं| 

Saturday, 24 August 2019

अरे...! देखो हाथी है


22-Aug-2019
पुदुच्चेरी आने के बाद से हमने एक नया शौक पाला है, रात को फ़िल्म देखने का| पहले दिन 'आनंद' देखा, दुसरे दिन 'शौक़ीन' और तीसरे दिन 'बरेली की बर्फी'| कल रात कुछ भी नहीं देखा| आनंद मैंने पहले भी कई बार देखी थी, पुरानी फिल्मों में 'गोलमाल, पड़ोसन, चश्मेबद्दूर' चलती का नाम गाड़ी, प्यासा, और अंगूर कुछ ऐसी फ़िल्में हैं, जिन्हें में एक अन्तराल के बाद देखता रहता हूँ| दिव्या को पुरानी फिल्मे देखना पसंद नहीं है, फिल्म चलाने से पहले मुझे फिल्म के बारे में पहले दस मिनट एक्सप्लेन करना पड़ता है, तब जाकर वो राज़ी होती है| 

परसों रात 'बरेली की बर्फी' देखते-देखते सोने में देर हो गई| 11 बजे हम सोने के लिए गए| परिणामतः सुबह उठने में भी लेट हो गया| जल्दी-जल्दी तैयार होकर हम, मातृमन्दिर के अन्दर जाने का 'पास' लेने के लिए, ओरोविल की ओर भागे| रास्ते में एक दिव्यांग व्यक्ति की रेहड़ी से नारियल पानी पिया-एक नारियल का तीस रुपया| दिव्या ने पानी पीने के लिए प्लास्टिक का पाइप लिया, मैं ऐसे ही पी गया| धर्मेद्र स्वामी मरने से पहले मुझे बिना पाइप के नारियल से पानी पीना सिखा गए थे|
सूचना भवन तक पहुँचते-पहुँचते 11 बज गये| "सामने वाले भवन के पहले मंजिल पर जाओ, ध्यान के लिए पास वहीं से मिलेगा, जल्दी करो ऑफिस बंद होने वाला है", नीली शर्ट पहने स्टाफ ने कहा| तेज़ क़दमों से चलते हुए हम बुकिंग ऑफिस तक पहुंचे| "लो, ऑफिस बंद हो गया", दिव्या बोली| "अब दोपहर 2 बजे आओ'', प्रदर्शनी रूम के बाहर खड़े एक व्यक्ति ने हमने से कहा| बुकिंग ऑफिस सुबह 10 से 11 और दोपहर 2-3 खुलता है, मंगलवार बंद रहता है| "नीचे चलो 2 बजे तक हम यहीं वेट कर लेंगे", दिव्या बोली| 'चलो पहले अन्दर चलकर चित्रकला की प्रदर्शनी देख लेते हैं', हॉल की तरफ मुड़ते हुए मैंने कहा| 
हॉल में 1-2-3 करके क्रम से श्री अरविन्द के वचनों के साथ पेंटिंग्स लगे हुए थे| दो-तीन पेंटिंग मुझे बहुत ही आकर्षक लगी| कोई दस मिनट तक चित्रों को निहारने के बाद हम नीचे कैफे के पास आ गए| पेड़ के नीचे पत्थर का एक बड़ा सा टेबल बना था, हम वहीं बैठ गए| "किताब लेकर आई होती, तो यहीं पढ़ लेती, अभी तीन घंटा है हमारे पास", दिव्या बोली| ‘चलो जहाँ से कल मद्रासी कॉफ़ी पिया था, वहीं से आज कैपेचिनो लेते हैं’ मैंने कहा।
गोल टेबल से उठ कर हम कैफे में आ गए हैं| कैफे के बाहर वाले एरिया में लगे छोटे पैरों वाले लाल चेयर पर मैं बैठ गया, दिव्या मेन्यू लेने अंदर चली गई| 'यहाँ के चेयर इतने आरामदायक नहीं हैं कि हम तीन घंटा तक बैठ सकें| इससे अच्छा तो घर चलो, वहीं से खाना आर्डर कर देंगे| खाने के बाद थोड़ी देर आराम करके फिर आ जाएँगे', मैंने दिव्या से कहा| “पार्किंग वाला फिर से 10 रूपये नहीं ले लेगा?, मेन्यू से सिर उठाते हुए दिव्या बोली| ‘यहाँ कॉफ़ी और समोसे का 300 रूपये देंगे, उससे तो अच्छा ही है’, मैंने कहा| “हाँ, ये तो है... चलो घर ही चलते हैं”, बैग उठाते हुए दिव्या बोली| 
दोपहर में जब हम दुबारा आए, तो पार्किंग वाले ने हमसे पैसा नहीं लिया, “आप सुबह आए थे ना?”, पार्किंग वाले ने हम से पूछा| हमने हाँ में सिर हिलाया| “फिर दुबारा आपको पे करने की ज़रूरत नहीं है|” मैंने गर्दन मोड़ कर दिव्या को देखा, उसके चेहरे पर ख़ुशी थी| 
2 बजने से 7 मिनट पहले हम बुकिंग ऑफिस के बाहर खड़े थे| थोड़ी देर बाद हमारे पीछे तीन-चार लोग और खड़े हो गए| ठीक दो बजे ऑफिस खुला| हमसे रूम के अन्दर आ कर एक बड़े टेबल से लगे हुए बेंच पर बैठने को कहा गया| थोड़ी देर बाद स्टाफ में से एक लेडी ने हमें एक कार्ड दिया, “इसे भरिये”| कार्ड का रंग पीला था| यह हमारा मातृमन्दिर के अन्दर जा कर ध्यान करने के पास था| अगले दिन सुबह 8:45 मिनट पर हमें विडियो हॉल में हाजिर होना था| 
‘अब कहाँ चलना है’, गाड़ी स्टार्ट करते हुए मैंने पूछा| “अरविन्द आश्रम के पास ही एक फेमस मंदिर है ‘अरुलमिगु मनाकुला विनयागर टेम्पल’ वहीं चलो| वहीं से संग्रहालय चल लेंगे, फिर शाम में बीच पर चलेंगे”, स्कूटी पर बैठते हुए दिव्या बोली| 
ओरोविल से निलकते समय रास्ते में एक गुलमोहर का बड़ा पेड़ आता है| पेड़ के नीचे की ज़मीन लाल फूलों से पटा रहता है| ओरोविल आते-जाते समय मैं उस पेड़ के नीचे थोड़ी देर ज़रूर रुकता हूँ| “शहर में बचपन बीतने की वजह से मैं पेड़ों के बहुत करीब नहीं आ पाई”, दिव्या गुलमोहर के नीचे मुझसे बोलने लगी“, शहर के बच्चे कुत्ते-बिल्लीयों के प्रेम से कभी आगे नहीं बढ़ पाते हैं|” 
पेड़ से थोडा आगे एक सूखा तलाब है| तलाब में बस नाम मात्र पानी है, पूरा तलाब सूखा है, बस बीच में थोड़ा पानी है, जिसमे कमल के फूल खिले हुए हैं| उस तलाब के घाट पर बैठना भी मुझे अच्छा लगता है| उसी तलाब के पास एक आदमी जाल में बंद करके मुर्गी, तीतर, तर्की और बत्तख के जोड़े बेचता है| तलाब किनारे एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ है| पेड़ के नीचे एक बूढी औरत नारियल पानी बेचती है| पेड़ के पास ही कुत्ते के दो छोटे-छोटे बच्चे-एक काला और दूसरा ब्राउन, खेलते रहते हैं| थोडा और आगे आने पर दिव्यांग व्यक्ति का रेहड़ी है| इसी रेहड़ी से आज मैंने नारियल पानी पिया था| वहीं पास में एक बूढी औरत मछली बेचती हैं| अजनबी शहर में अब बहुत कुछ ऐसा है, जिससे पहचान हो गई है| 
गूगल की मदद से हम मंदिर तक पहुँच गए| ‘जूस वाले से पूछो कि कितने का दे रहा है’, स्कूटी खड़ी करते हुए मैंने दिव्या से कहा| 

23-Aug-2019
"२० रूपये का एक ग्लास बोल रहा है", जूस वाले के पास से पलटते हुए दिव्या बोली| 'उसे बोलो कि दो ग्लास बनाए', स्कूटी का हैंडल लॉक करते हुए मैंने पूछा| "मैं नहीं पियूंगी", बैग से ताम्बे वाला बोतल निकाल कर पानी पीते हुए दिव्या बोली| 'तुम क्यों नहीं पीओगी?', जूस वाले के पास पहुँचते हुए मैंने पुछा| "मैं कुछ और ले लुंगी, तुम जूस पी लो", बोतल का ढक्कन बंद करते हुए बोली| 

'एक ग्लास जूस बनाना, चीनी, नमक और बर्फ कुछ भी मत डालना', मैंने जूस वाले से कहा| उसके रेहड़ी पर करीब दस किलो मौसमी थे| उसने चाकू से चार-पांच मौसमी को बीचो-बीच काट कर दो भागों में बाँट दिया| 'छिलने के बजाय ये गोल-गोल क्यों काट रहा है मौसमी को?', आँखे बड़ी करते हुए मैंने दिव्या से पूछा| "इसका जूस बनाने वाला भी तो देखो कुछ अलग हैं", मेरी तरह वह भी आश्चर्य में डूबी हुई थी| उसका जूस बनाने का मशीन लट्टू के जैसा था, बीच से दो भागों में बंट जाता था| नीचे का भाग मंदिर की तरह उठा हुआ था, और ऊपर का भाग गुम्बंद की तरह खोखला था| नीचे वाले भाग पर उसने मौसमी के कटे हुए टुकड़े पर रखा, फिर हैण्डल घुमा कर ऊपर वाले भाग को नीचे ले आया| एक बार में पूरे फांक का रस दब कर निकल गया| एक मिनट से भी कम समय में सारे फांकों से रस निकाल कर उसने एक ग्लास जूस मुझे पकड़ा दिया| "वाह! क्या सही तरीका है, हमारे यहाँ जैसे जूस निकालते हैं, उससे तो यही सही है", आश्चर्य से खुश होते हुए दिव्या बोली| 
जूस पीने के बाद रोड पार करके हम मंदिर वाले रोड पर आ गए, "अरे...! देखो हाथी है", रोड पर एक फीट कूदते हुए दिव्या बोली| 'अंधी यही तो मैं तुमको रोड पार करते हुए कह रहा था, ध्यान कहाँ था तुम्हारा', हाथी की मौजूदगी को हल्के में लेते हुए मैंने कहा| हालाँकि हाथी देखकर मैं भी उसके इतना ही उत्साहित था| लेकिन हमारे बीच एक शीत युद्ध चलता रहता है| जिस चीज़ को लेकर वह उत्साहित होती है, उसके प्रति मैं उदासीन हो जाता हूँ, जो मुझे पसंद होता है, उसके प्रति उसका रवैया तीखा हो जाता है| तथ्य यह है की हम दोनों की पसंद-नापसंद कुछ एक अपवादों को छोड़ कर करीब-करीब एक जैसी है| 
मंदिर के गेट के बाहर एक छोटे से घेरे में हाथी को रखा गया था| घेरे के अन्दर हाथी की सुविधा के लिए मिट्टी डाला हुआ था| हाथी की उम्र बहुत कम थी| उसके पूरे शरीर पर कलाकारी की हुई थी| आगे के दोनों पैरों में पायल पहनाया हुआ था| गौर से देखने पर पता चला यह हाथी नहीं हथनी है| गले में उसके नाम का बोर्ड लटका हुआ था 'लक्ष्मी'| आते-जाते श्रद्धालु उसके सूंढ़ पर पैसा, केला और प्रसाद रख देते थे, भेट पाने के बाद वह सूंढ़ मोड़ कर लोगों को आशीर्वाद देती थी| फिर अगर केला या खाने की कोई चीज़ हो तो खा लेती थी, पैसा होने पर अपने मालिक को दे देती थी| उसका मालिक वहीं उसके पैरों के पास मुंडेर पर बैठा था| एक आदमी वहीं तेल वाले कंटेनर में कुछ लेकर कर आया था, उसका बड़ा-बड़ा गोला बना कर हाथी के मुंह में डाल रहा था| "ये लोग क्या खिला रहे हैं, उसको?", दिव्या मुझसे पूछी| 'पता नहीं क्या खिला रहे हैं, लगता है आटा में केला मिला कर खिला रहे हैं', अंदाज़े से मैंने कहा| "मैं उसको पैसा देने जाती हूँ, तुम मेरी विडियो बनाओ", उसके चेहरे पर छोटे बच्चों जैसी चमक थी, और मेरे चेहरे पर बाप जैसी कठोरता| 'फिर शुरू हो गया तुम्हारा बोकलोली, विडियो बनाने की क्या जरूरत है, मैं देख रहा हूँ तुम्हारा मोबाइल एडिक्शन बढ़ता जा रहा है', कहते हुए मैंने उसे अपने जेब से पांच रूपये का सिक्का दिया| "पांच रुपया नहीं दस का नोट दो", पांच रुपया मेरे जेब में वापिस रखते हुए बोली, उससे पहले मैंने क्या बोला था उस पर उसने कान नहीं दिया| उस बात पर उसे बाद में लड़ाई करनी थी, अभी किसी भी सूरत में विडियो बनानी थी| कोई आम मौका होता तो, मुझे दस सुना चुकी होती-मेरा मोबाइल एडिक्शन बढ़ रहा है, तो तुम्हारा कौन से मीठे का एडिक्शन कम हो रहा है, दस-दस रसगुल्ला खाते समय नहीं सोचते हो| 
हाथी के साथ दिव्या का विडियो बनाने के बाद हम मंदिर के अन्दर गए| अंदर लगे बोर्ड से पता चला कि यह मंदिर अरविन्द आश्रम के सहयोग से बना है| मंदिर में लगी मूर्तियों के सामने दक्षिण भारतीय श्रद्धालु| अलग-अलग तरीके से नाक-कान पकड़ कर मूर्ति को प्रणाम कर रहे थे| मंदिर साफ़-सुथरा और काफी फैलाव वाला था| प्रांगण में कुछ लोग आँखे बंद किए ढोंग-धतूरे में लीन थे| 
मंदिर से निकल कर हम ‘बीच’ की तरफ जाने लगे| रास्ते में एक जगह HDFC का एटीएम देखकर मैंने स्कूटी रोकी| ‘चार हज़ार रूपये निकाल लो’, एटीएम कार्ड देते हुए मैंने दिव्या से कहा| कार्ड लेकर वह एटीएम के अंदर पैसा निकलने के लिए चली गई| “पैसा फंस गया”, थोड़ी देर बाद एटीएम से बाहर निकल कर बोली| मैंने जेब से मोबाइल निकाल कर देखा था| बैंक से 4000 निकालने का मेसेज आया था| ‘रुको में आता हूँ’, कहकर मैं गाड़ी खड़ी करने के लिए रोड के उस तरफ गया| जबतक मैं गाडी खड़ी करके के एटीएम पर आया, बैंक से दूसरा मेसेज आ गया, चार हज़ार अकाउंट में वापिस आ गए थे| ‘चलो बच गए, पैसा कहीं और से निकाल लेंगे’, एटीएम पर खड़ी दिव्या से मैंने कहा| 
एटीएम से निकल कर हम ‘बीच’ पर आ गए है| थोड़ी देर बीच पर बैठने के बाद मैंने कहा, ‘रात में लेट खाने से अच्छा से चलो अभी ही कुछ खा लेते हैं, अगर तुम कहो तो पहले दिन रेलवे स्टेशन के पास जहाँ से इडली खाया था, उसी के यहाँ चलते हैं| सही खिलाता है वह|’ दिव्या खाने के नाम पर राजी हो गई| खाने के लिए इसे कभी भी राजी किया जा सकता है| “रेलवे स्टेशन यहाँ से पास ही है’’, उठते हुए बोली| ‘हाँ उस दिन चर्च के पास से मैंने ट्रेन खड़ी देखी थी’, मैंने कहा| ‘हें’अ’, बोलकर वह मेरे साथ रोड पार करने लगी|
इडली वाले के यहाँ जब हम पहुंचे तो पता चला कि वहां कुछ काम चल रहा है| एक घंटा समय लगेगा| “चलो फिर बीच पर ही कुछ देर बैठ लेते हैं| शाम ढलने के बाद रूम पर चल चलेंगे|”, निराश होते हुए दिव्या बोली| ‘हाँ चलो गाडी में पेट्रोल भी डलवाना है’, हेलमेट पहनते हुए मैं बोला| “ये हेलमेट क्यों लगा लेते हो तुम, कोई तो लगता नहीं, पुलिस ऐसे ही सब जगह घूमती रहती है| तुम्हारी हेलमेट की वजह से ही पुलिस ने उस दिन हमें रोक कर चेक किया था”, गाडी पर बैठते हुए दिव्या बोली| मैं भी सोचना लगा कि यहाँ हेलमेट के मामले में लोग इतने ढीले क्यों है| एक परसेंट लोग भी हेलमेट नहीं लागते हैं|

Saturday, 27 July 2019

बॉयफ्रेंड की बात अधिक चोट करती है|

प्रश्न- सर, एक बात है, हम आपसे शेयर करना चाहते हैं, कोई भी बात का कई साइड होता है, तो अगर कोई मेरे अपोजिट साइड पे बात करते हैं, ख़ासकर मेरा बॉयफ्रेंड तो हमारा बहुत दिमाग ख़राब होता है, और ये सारी बाते पॉलिटिक्स पर होती है, और हम दोनों एक दूसरे के अपोजिट होते तो हमें बहुत गुस्सा आ जाता है, हमें समझ नहीं आता हम क्या करे...

इक्क्यु- बहुत सी बातें हैं, जो आपको समझनी होगी| पहली बात तो यह कि जीवन में सब कुछ एक वर्तुल में घूमता है, जैसे सूरज को ही देखिये, रोज सुबह निकलता है और शाम को डूब जाता है, सूरज की ही तरह चाँद, तारे, पृथ्वी और मौसम सभी चीज़े एक वर्तुल में घूम रहे हैं| जो बाहर के सम्बन्ध में सच है, वही भीतर के संबंध में भी सही है| हमारे मन के सभी भाव और विचार एक वर्तुल में घुमते हैं|
अब आप एक काम कीजिए अपने पास एक नोट-पेड रखिए, और जब आपको गुस्सा आए तब उसे दिन, डेट और समय के साथ नोट कर लीजिए| जैसे- सोमवार, 23 तारिक को मुझे शाम के पांच बजे गुस्सा आया था| ऐसा आप एक-से-तीन महीने तक करिये| तीन महीने बाद आप यह जान कर हैरान हो जाएंगी कि आपके गुस्से का एक पैटर्न है| वह हर महीने तय दिन, तय तारिक और तय समय पर आता है| जैसे अगर सितम्बर में आपको 3 से 7 तारिक के बीच आपको अधिक गुस्सा आया था, तो अगस्त में भी 3 से चार के बीच ही आपको अधिक गुस्सा आएगा| फिर हर महीने के कुछ ऐसे दिन भी होंगे जिस दिन चाहे कुछ भी हो जाए, दुनिया इधर की उधर हो जाए आपको गुस्सा नहीं आएगा| तीन महीने के प्रयोग से आपको यह साफ़ हो जाएगा कि गुस्सा का बाहरी कारण से कोई सम्बन्ध है| मन को जब गुस्सा करना होता है, तब वह बाहर कारण खोज लेता है|
यह एक बुनियादी भ्रम है कि गुस्सा बाहरी कारणों की वजह से आता है, अगर कारणों को मिटा दिया जाए तो गुस्सा आना बंद हो जाएगा| ऐसा कभी नहीं होता है| अगर एक कारण को मिटा दिया जाए, तो मन दूसरा कारण ढूँढ लेता है| जिसको गुस्सा करना है, उसके लिए कारण सदा मौजूद है| और जिसको गुस्सा नहीं करना है, उसको कोई कारण भी उकसा नहीं सकता है| बुद्ध के मुंह पर कोई थूक कर चला जाता है, और बुद्ध मुस्कुराते रहते हैं| और हमें देख कर कोई अगर मुस्कुरा भी देता है, तो हम गुस्से से भर जाते हैं| इसीलिए ऐसा मत सोचिये कि आपका बॉयफ्रेंड आपका विरोध करता है, इसलिए आपको गुस्सा आता है| मामला ऐसा है कि जब आपको गुस्सा करना होता है, तब आपको आपकी बॉयफ्रेंड की बातों में विरोध दिखने लगता है|
जैसे अगर कोई खाली कुँए में बाल्टी डालें, तो बाल्टी खाली ही बाहर आएगा, वैसे ही जब आपके भीतर गुस्सा नहीं होगा तो कोई चाहे कुछ भी कर ले आपको गुस्सा नहीं आएगा| इस समझ के साथ ही कि गुस्सा मेरे भीतर है, बाहर मैं इसे आरोपित कर रह रहा हूँ, गुस्सा ख़त्म होने लगता है|
गुस्से के संबंध एक और बात समझने जैसी है, गुस्सा हम सदा अपने से कमज़ोर पर प्रगट करते हैं| अगर आपको आपके ऑफिस में बॉस आपसे कुछ कह दे, तो आप वहां गुस्से को प्रगट नहीं करेंगी, घर आकर अपने छोटे भाई, नौकरानी या फिर किसी निरीह और कमज़ोर व्यक्ति पर आप उसे प्रगट कर देंगी|
अगर गुस्सा कभी प्रगट ही करना हो, तो ऐसी चीज़ों पर करना चाहिए जिस पर आपके गुस्से का कम-से-कम असर हो| सबसे से अच्छा है, आपका तकिया| अगली बार जब आपको गुस्सा आए तो किसी व्यक्ति पर प्रगट करने के वजाय उसे तकिये पर प्रगट कर दें| जब हम किसी व्यक्ति पर गुस्सा प्रगट करते हैं, तो एक दुष्ट-चक्र निर्मित होता है| अगर सामने वाला व्यक्ति आपसे कमज़ोर है, तो वह आपकी सुन लेगा और फिर वह अपने से किसी कमज़ोर पर उसे प्रगट करेगा| इस तरह से एक दुष्ट-चक्र निर्मित हो जाता है| और अगर सामने वाला व्यक्ति बराबरी वाला है, जैसे कि आपका बॉयफ्रेंड, तो फिर वह पलट वार करेगा| फिर रिश्ते में कलह बढ़ेगी| इसीलिए ज़रूरी है कि पहले आप गुस्से की यांत्रिकता को समझें, इसके पैटर्न को देखें फिर इसे धीरे-धीरे अपने भीतर से खत्म करें| शुरू में इसे तकिये पर निकालें, फिर आकाश में फेंक दें| फिर बाद में सिर्फ इतना बोध कि ‘मुझे गुस्सा आ रहा है’ आपके गुस्से को प्रगट होने से पहले ही खत्म कर देगा|
जब तक आप जिम्मेवारी दूसरों पर थोपती रहेंगी, तब तक इस से मुक्त नहीं हुआ जा सकता है| कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थीती जिम्मेवार नहीं है| व्यक्ति, वस्तु और परिस्थीती का प्रभाव हम पर तब तक ही पड़ता है, जब तक हम बेहोश हैं| जैसे ही हम जागने लगते हैं, हम एक्सटर्नल इन्फ्लुंस से मुक्त होने लगते हैं| आप कुछ भी करके बुद्ध के भीतर गुस्सा पैदा नहीं कर सकती हैं, और इसका विपरीत भी सच है कुछ भी करके हम बुद्दू को शांत नहीं कर सकते हैं| कितने ही आइडियल सिचुएशन में आपको रख दिया जाए, लेकिन अगर आपके अन्दर गुस्सा है, तो वह निकलेगा ही| गुस्से वाला व्यक्ति स्वर्ग में भी नर्क निर्मित कर लेता है| और जो शांत है वह नर्क को भी स्वर्ग बना लेता है|
अंतिम बात- जब कोई हमारा विरोध करता है, तो ज़रूरी नहीं है कि वह हमारा विरोध कर रहा हो, हो सकता है वह सिर्फ हमारी बातों का विरोध कर रहा हो| लेकिन शरीर और मन के तरंगों (विचारों) से हमारा तादात्म्य इतना गहरा होता है कि कोई जब हमारे शरीर और हमारी मान्यताओं के खिलाफ कुछ कह देता है, तो हम तिलमिला जाते हैं| रमण महर्षि कहा करते थे, “So long as you are identified with your thoughts and body, you have to suffer.” बॉयफ्रेंड की बात अधिक चोट करती है, क्योंकि उससे अपेक्षा अधिक है| और अपेक्षा सदा दुःख लाती है| अपेक्षा एक घनचक्कर है| अगर यह पूरी हो तो भी दुःख ही लाती है, “इतना तो होना ही था, इसमें क्या बड़ी बात है, यह तो मैं पहले से जानता था”| और अगर न पूरी हो तो भयंकर दुःख लाता है| इसीलिए अपेक्षा में जीने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो पाता है|

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...