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Tuesday, 9 July 2019

Sit back and reflect on things

Question- Pranam Swamiji, I am a working woman with 3 kids. I live in Ahmedabad. My husband is a nice person, a software engineer. But, he is social unlike me. I meditate every day, and I don't like social people. I feel I don't love him from the first day we met. I am in love with a person. He is my facebook friend. He is a very deep meditative, intelligent and very impressive personality. He is godlike for me. I want to spend my whole life with him. Because he is the man I was searching for, I feel. I don't feel like to spend my rest life with my hubby. What should I do?

Ikkyu- There is no question of what you should do. Don’t ask this now. You have already done enough. Now, just stop doing everything. Sit back and reflect on things going around you. Do a little introspection.
As I can see your problem is born out of a very famous religious disease known as ‘Holier than thou attitude.’ It is a very ancient disease. Almost every so-called religious person is suffering from it. You are not the first one. You think you are holier than your husband, he is a social man and you are a religious woman. This superiority complex of yours is the root cause of all the turmoil you’re facing and creating in your life. In India, almost all married women are suffering from this disease, they all feel that they are religious souls, and their husbands are dragging them into hell. They always look down upon their husband for he is the one who is forcing her into sex-and obviously, sex is a sin. Hence, You see these Indian women hovering around So-called Godmen and Babas of whom they think are super celibates. They seek solace in their teaching, grovel at their feet and beg for liberation from their husband. You seem to be doing the same in a very sophisticated and modern way.   
Just drop the idea that you are a religious woman. If you were really religious you would see God in everyone, even in your husband. This is the criterion, unless you see God in your neighbours, in your kids and at last in your husband, do not consider yourself a religious person. It is very easy to see good in someone you don’t know well. If you don’t know a person well, you can project anything on him.
I have met many godlike, deep meditative personalities from Facebook in person, and without any exception, they all had feet of venal clay. So beware.     
"सिर्फ़ इक क़दम उठा था ग़लत राह-ए-शौक़ मेंमंज़िल तमाम उम्र मुझे ढूँढती रही"
You don’t love your husband because you don’t have love in your heart. You don’t love even this man who you have met on Facebook. If love is not unconditional, it cannot be called love. What if this man from Facebook was not godlike? 
Bringing change in the situation will change nothing in your life, you have to change yourself. As they say in French, "plus ça change, plus c'est la même chose." You say my husband is a nice person. What else do you want now? If there were any particle problems like he would be beating and abusing you and kids, I would definitely advise you to move on. But your problems are utterly superficial.  

Spend time away from social media and the internet. Play with children, be in nature, behold the morning sun, and feast your eyes on the setting sun in the evening. Do some creative thing every day.  Asking for love is a very childish thing, learn to give love. Love your husband for what he is. No man can match your imagination, you can imagine anything. Reality will never fit into it.
Instead of wasting and killing time on Facebook and WhatsApp, read some good books. At this juncture, reading “Anna Karenina” from Tolstoy will help you understand many things.

Tuesday, 5 June 2018

'क्राइम एंड पनिशमेंट'-तब्सिरा

कार्ल-चेपाक की एक कहानी है- आखिरी फैसला| उसमे कगलर नाम का एक ‘मुजरिम’ जब मरने के बाद दूसरी दुनिया की अदालत में पेश किया जाता है, तो उसने ज़िन्दगी में जो-जो कुछ किया था उसका ब्योरा उसके सामने रखा जाता है| ब्योरा सही है, वो इंकार नहीं करता| लेकिन वो सब कुछ क्यों हुआ, जब वो इसकी तफसील देना चाहता है, तो उसकी सुनवाई नहीं होती| ब्योरे की तस्दीक के लिए एक गवाह को तलब किया जाता है, और कगलर देखता रह जाता है कि जो अजीबोगरीब व्यक्ति वहां गवाही देने के लिए आता है, उसके नीले चोगे में आसमान के सितारे जड़े हुए हैं, और उसके चेहरे पर कोई इलाही नूर है कि वहां के मुनसफ भी उसके स्वागत में एक बार खड़े हो जाते है, और फिर उस इलाही व्यक्ति को गवाह के कठघरे में खड़ा करते हैं, और कहते हैं- ‘यह मुकदमा बहुत उलझा हुआ है, हालाँकि जो भी हादसे इस व्यक्ति के हाथों हुए उनमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं है| लेकिन यह व्यक्ति बार-बार कहे जाता है कि वो बेगुनाह है| इसलिए खुदावंद! एक तुम हो जो परम सत्य हो, इसलिए तुम्हे बुलाया गया है- गवाही देने के लिए...
और वो गवाह कहना शुरू करता है- ‘यह कगलर अपनी माँ को इतना प्यार करता था कि उसे किसी तरह व्यक्त नहीं कर पाता था| इसीलिए यह बचपन से इतना जिद्दी हो गया कि माँ पर जब भी कोई ज्यादती की जाती, यह बाप से उलझ जाता था| इतना कि यह छोटा बच्चा हों के कारण जब एक बेबसी महसूस करता तो अपने दांतों से बाप की अँगुलियों को काट खाता....
तीनो मुनसिफ गवाह को टोक देते हैं; कहते हैं- खुदावंद, यह माँ से इतना प्यार करता था, हमें इसकी गवाही नहीं चाहिए, हमें तो यह बताओ कि इसने पहला जुर्म किसी के बाग़ से फूल तोड़ने का किया था या नहीं?
गवाह मुस्कुरा देता है, कहता है- वो फूल तो इसने एक इरमा नाम की प्यारी सी लड़की को देने के लिए तोड़े थे| वो इसे बेहद अच्छी लगती थी... वो इसके दिल में प्राणों की तरह बस गई थी...
कलगर जल्दी से पूछता है- खुदावंद! इरमा कहाँ चली गई, यही तो मुझे कभी पता नहीं चल सका...
ख़ुदा बताता है- तुम तो गरीब थे, इसलिए इरमा का विवाह मिल मालिक के लड़के से कर दिया गया, जिसे गुप्त रोग था, और इसी वजह से जब इरमा का हमल गिर गया तो वह भी बच नहीं सकी, मर गई थी...
अदालत के मुंसिफ ख़ुदा को फिर टोक देते हैं| "हमें यह सब तफसील नहीं चाहिए- हमें यह बताइए कि कगलर कब से शराब पीने लगा और बुरी सांगत में पड़ गया?"
ख़ुदा फिर मुस्कुराता देता है; कहता है- "इसका एक दोस्त था, जो जलसेना में भर्ती हो गया, और समुन्द्र की दुर्घटना में उसका जहाज डूब गया, और वो मर गया, और यह हताश होकर गलत लोगों की संगत में पड़ गया, और गारिबल नाम के एक शराबी के घर आने-जाने लगा| उसकी एक बेटी थी मेरी, जिससे यह प्यार करने लगा, लेकिन मेरी को पैसा कमाने के लिए उसके बाप ने एक ऐसी जलील जिंदगी में ढाल दिया था कि वो जवानी में ही मर गई, और मरते हुए उसका ही नाम लेकर पुकारती रही..."
मुंसिफ लोग खीझ-से उठते है, कहते हैं- "इस वाकयात का मुकदमे से कोई ताल्लुक नहीं, खुदावंद करीम! हमें यह बताइए कि इसने कितने क़त्ल किए?"
ईश्वर कहता है- "शहर में जब दंगा हुआ तो इसके हाथों पहला क़त्ल हुआ था| इसने जान-बूझकर नहीं किया था, पर इसके हाथों हुआ था| फिर जब इसे जेल में डाला दिया गया और वहां इसे यातनाएं दी गई तो इसके मन में वो दुःख ऐसा पकने लगा कि जेल से छूटने पर जब इसने एक लड़की से मुहब्बत की, और वो बेवफ़ा साबित हुई तो इसने उस लड़की का कत्ल कर दिया..."
और इस तरह कार्ल चेपाक की कहानी, हर घटना की गहराई में उतरती चली जाती है, और जब वो मुंसिफ आपना फैसला लिखने के लिए एक अलग कमरे में जाते हैं, तो कलगर ख़ुदा से पूछता है- "खुदावंद ! यह क्या हो रहा है? मैंने तो समझा था कि इस दूसरी दुनिया में तुम ख़ुद मुंसिफ होगे और ख़ुद फैसला सुनाओगे| लेकिन यहाँ भी..."
उस वक़्त ख़ुदा की मुस्कुराहट ग़मगीन हो जाती है और वो कहता है- फैसला सिर्फ वो लोग दे सकते हैं, जो अधूरा सच जानते हैं| मैं तो पूरा सच जानता हूँ| और पूरा सच जानने वाला इस तरह से फैसले नहीं देता....
“I wanted to become a Napoleon, that is why I killed her... Do you understand now?- Crime and Punishment
‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ का नायक राम भी है और रावण भी| और दोस्तोवस्की राम को रावण से  और रावण को राम से अलग करने के लिए कहीं भी अस्पष्ट लकीर नहीं खीचते है| दोस्तोवस्की अपने पत्रों को कभी भी किसी छवि में कैद नहीं करते हैं| उनकी किताब में न तो कोई खलनायक होता है, और न ही कोई नायक| दोस्तोवस्की मनुष्य के मन को समझते है, वे जानते हैं कि मनुष्य बहुचितवान है, उसे किसी छवि के साथ कैद करना न्याय नहीं है| इसीलिए ‘ब्रदर्स करमाज़ोव’ हो या ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’, कहीं भी आप यह तय नहीं कर पाएँगे कि कौन सही था और कौन गलत| अपने पात्रों के साथ जितना न्याय दोस्तोवस्की कर पाते है, उतना और किसी ने नहीं किया है| सभी लेखक पक्षपातों और अपने समूह की मान्यताओं से बंधे होते हैं| हर कोई अपने चश्मे से चाँद को देखता है, और अपने ढंग से उसकी व्याख्या करता है| लेकिन दोस्तोवस्की नंगी आँख से खुले आसमान के नीचे खड़े हो कर चाँद को देखते हैं, और फिर चाँद उनसे जो भी कहता है, उसे लिख देते हैं| दोस्तोवस्की की अपनी कोई मान्यता नहीं है, उनके पात्र स्वतंत्र हैं| इसीलिए सत्य के जितने क़रीब दोस्तोवस्की आ पाते हैं, उतना कोई दूसरा नहीं आ पता है| दोस्तोवस्की को पढ़ना बेघर होने जैसा है| जिस ज़मीन पर आप अभी खड़े हैं, उसे दोस्तोवस्की आपके पैरों के नीचे से खींच लेंगे| दोस्तोवस्की को पढ़ना एक अनंत खाई में गिरने जैसा है|
‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ दोस्तोवस्की की सबसे प्रसिद्ध कृति है| आप अगर गूगल पर दुनिया के सबसे लोकप्रिय उपन्यासों की सूचि ढूंढेंगे, तो उसमे प्रथम दस में ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ का नाम आता है| बहुत ही सरल कृति है, कहानी समझने मैं आपको कहीं कोई दिक्कत नहीं होगी| पात्र भी ज्यादा नहीं हैं, इसीलिए नाम याद रखने में भी ज्यादा झंझंट नहीं होती है| रूसी उपन्यास पढ़ने में सबसे अधिक दिक्कत नाम याद करने की ही होती है| अगर आप दुनिया के बेहतरीन साहित्यों से अभी तक परिचित नहीं हैं, तो ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ आपके के लिए सबसे उपयुक्त किताब है| आप यहाँ से शुरुआत कर सकते हैं| लेकिन शुरुआत को अंत मत मान लीजिएगा, ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में जिस बीच को दोस्तोवस्की ने रोपा है, वह ‘ब्रदर्स करमाज़ोव’ में वृक्ष बनता है, ‘दी इडियट’ में उसमे फूल लगते हैं, और ‘नोट्स फ्रॉम अंडरग्राउंड’ उस फूल की सुवास है| 

पीछे मैंने आपसे लियो टॉलस्टॉय एक किताब ‘रेज़रेक्शन’ की बात की थी| उस किताब में टॉलस्टॉय एक जगह लिखते हैं, “यह एक आम मान्यता है कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं- अच्छे और बुरे| जो अच्छा है वह हमेशा अच्छा है, और जो बुरा है वह हमेशा बुरा है| लेकिन यह मान्यता भ्रांत है| बुरे से बुरा आदमी भी हमेशा बुरा नहीं होता है, और अच्छे से अच्छा आदमी भी हमेशा अच्छा नहीं होता है| इन फैक्ट, आदमी न तो अच्छा होता है और न ही बुरा, वह बस आदमी होता है|” इसी चीज़ को लओत्जु दूसरे ढंग से कहते हैं, “तारीफ़ और निंदा दोनों इंसान को पाखंड की ओर धकेलता है| जब तुम किसी से कहते हो, “आप अच्छे हैं”, तो तुम उसे अच्छाई से बाँध रहे हो, अब तुम्हारी नज़र में अच्छा बने रहने के लिए वह पाखंड का सहारा लेगा| इसी तरह जब तुम किसी से कहते हो, “आप बुरे हैं”, तब तुम उसे बुराई से बाँध देते हो| एक बार जब कोई व्यक्ति किसी ‘छवि’ से बंध जाता है, तो उसे कायम रखने के लिए वह पाखंड का सहारा लेने लगता है|’’ एक बार जब हम किसी व्यक्ति को किसी छवि से बाँध कर देख लेते हैं, तो फिर उसे छवि से परे देखने में हमें परेशानी होनी लगती है| जैसे अगर कोई हमसे यह कहने लगे कि रावण उतना बुरा नहीं था जितना हम उसे बारे में सोचते है, और राम उतने भी अच्छे नहीं जितना हम उन्हें मानते हैं, तो हमें परेशानी होने लगती है, हम असहज होने लगते हैं| हम ऐसा मान कर चलते हैं कि राम सदा अच्छे थे, और रावण सदा बुरा था| लेकिन यह मान्यता सही नहीं है| कोई भी राम हमेशा अच्छा नहीं होता है, और न ही कोई रावण हमेशा बुरा होता है| लेकिन हम ऐसा मान कर चलते है, इसीलिए हम फिर राम की गलतियों और रावण के पुण्यों पर लीपापोती करने लगते हैं| हम राम की कहानी में से उन सब बातों को हटा देते हैं, जिससे हमारी अच्छे की मान्यता को चोट पहुँचती हो, और रावण की कहानी में उन सब बुराइयों को भी जोड़ देते हैं, जो रावण में कभी था भी नहीं| हमारी सभी कहानियां अतिशयोक्तियों से भरी पड़ी है|
लेकिन हम इन तथ्यों को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते हैं| क्योंकि इन को स्वीकार करते ही हमारी न्याय व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी| क्योंकि जिसको हम बुरा कह रहे हैं, वह अगर हमेशा बुरा नहीं है, और जिसको हम अच्छा कह रहे हैं, हमेशा अच्छा नहीं है, तो फिर सज़ा कैसे देंगे? सज़ा देने के लिए यह सिद्ध कर देना अत्यंत आवश्यक है कि बुरा हमेशा बुरा है, और अच्छा हमेशा अच्छा है|
लेकिन अगर अच्छा, अच्छा नहीं है, और बुरा, बुरा नहीं है, और हम इस तथ्य को स्वीकारते हैं, तो हमें अपने कथा-कहानियों को फिर से लिखना पड़ेगा| फिर हमें इस कहावत को बदलना पड़ेगा कि ‘सत्यमेव जयते’, यह कहावत झूठ है, मामला बस इतना है कि जो भी जीतता है उसे सत्य मान लिया जाता है| क्योंकि वस्तुतः न तो इस जगत कुछ सत्य है, और न ही झूठ- सब व्याख्या है| एक ‘तथ्य’ की व्याख्या हज़ार तरीके से की जा सकती| जिस तर्क से हम राम को भगवान सिद्ध करते हैं, और रावण को राक्षस उसी तर्क से इससे उल्टा भी सिद्ध किया जा सकता है| सारे तर्क बेठुआ होते हैं| इसीलिए कोई भी मान्यता कभी भी सार्वभौमिक नहीं हो सकती है| पूरी दुनिया किभी भी किसी आदमी को एक मत होकर कभी न तो अच्छा मान सकती है, और न ही कभी बुरा| अगर दुनिया में राम, कृष्ण, महावीर और बुद्ध को पूजने वाले लोग हैं, तो ऐसे भी लोग हैं जो रावण, कंस, हिटलर और तैमूर को पूजते हैं| किसी खास समुदाय में ही किसी को अच्छा या बुरा माना जा सकता है| इसीलिए हर व्यक्ति अपने हिसाब के समूह के साथ रहना पसंद करता है| और एक समूह का व्यक्ति हमेशा दूसरे समूह के लोगों को गलत मान कर चलता है| अगर हमारे समूह में शादीशुदा और पतिव्रता स्त्री को सही माना जाता है, तो इस दुनिया में ऐसे समूह हैं जिसमे वेश्याओं को सही माना जाता है, और शादीशुदा स्त्री को नीच और चरित्रहीन समझा जाता है| ऐसे में आप कैसे तय कर सकते हैं कि कौन सही है, और कौन गलत? हमारे पास सही और गलत को तय करने का एक ही पैमाना है और वो है भीड़| हमारी मान्यता है कि अधिक लोग जिस मत में मानते हैं वह सही है| लेकिन यह मान्यता बिलकुल ही भ्रांत है| क्योंकि ऐसे लोग हैं जो यह सिद्ध करने पर अमादा हैं कि अधिक लोग सिर्फ उन्ही चीज़ों को मानते हैं जो बिलकुल ही नासमझी की है| वे भीड़ की तुलना भेड़ से करते हैं| उनके अनुसार भीड़ हमेशा अंधानुकरण में जीती है|
सब के पास अपनी-अपनी दलीलें हैं, सब के पास अपनी-अपनी मान्यताएं हैं| इसीलिए जिसको भी आप गौर से सुनेंगे वही आपको सही लगने लगेगा| सभी मतों के लोगों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है उनके समूह का व्यक्ति किसी और समूह की बात को गौर से न सुने| इसीलिए सब भोपूं लगा कर अपनी गुणगान और दूसरों की निंदा करने में लगे रहते हैं|
दोस्तोवस्की, कामू, चेपक, काफ्का और टॉलस्टॉय को पढ़ना नए पाठकों के लिए बहुत ही हिलाने वला अनुभव हो सकता है| इन लोगों का संबंध किसी समूह से नहीं है, ये मान्यताओं में नहीं मानते हैं| ये मनुष्य को उसकी पूरी विराटता और संभावनाओं के साथ स्वीकार करते हैं, उसे किसी छवि में कैद नहीं करते हैं| दोस्तोवस्की ख़ुदावंद है जो सिर्फ गवाही देते हैं, फैसला करने का काम वे पाठकों पर छोड़ देते हैं| लेकिन बिडम्बना यह है कि इनको पढ़ने के बाद पाठक किसी भी निर्णय पर पहुँचने की स्थिति में रह नहीं जाता है| जिसने एक बार ख़ुदावंद को सुन लिया, उस का ख़ुदा हो जाना तय है| यही तो तुलसी कहते हैं, “झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥ जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥“
      Crime? What crime? He cried in sudden fury. ‘That I killed a vile noxious insect, an old pawnbroker woman, of use to no one !... Killing her was atonement for forty sins. She was sucking the life out of poor people. Was that a crime? - Crime and Punishment


-इक्क्यु केंशो तजु 

Friday, 25 May 2018

रेज़रेक्शन (तब्सिरा)

किताब का नाम- रेज़रेक्शन, लेखक- लियो तोल्स्तोय

किताब के बारे में कुछ भी कहने से पहले एक शेर पेश करना चाहता हूँ| अर्ज़ किया है, एक तुमसे हाथ मिलाने के वास्ते, महफ़िल में सबसे हाथ मिलाना पड़ा”| जिस दिन से विवेचन लिखना शुरू किया है, उसी दिन से रेज़रेक्शनको टाल रहा हूँ| किताब के बारे में कुछ भी कहने में ख़ुद को असमर्थ महसूस कर रहा हूँ| जैसे गाँव की विवाहित स्त्रियाँ अपने पति का नाम लेने में झिझकतीं हैं, कुछ वैसी ही झिझक मैं इस वक़्त महसूस कर रहा हूँ| यह किताब मेरे जीवन की सबसे कोमलतम एहसासों में से एक हैं| अगर कबीर होते तो कहते, ‘इक्क्यु, हीरा मिला है, गाँठ बना कर रख लो, इसे बार-बार मत खोलो’| अगर मेरी जगह Ludwig Wittgenstein होते तो, वे भी इस किताब के बारे में चुप रह जाते, “Whereof one cannot speak, thereof one must be silent.” लेकिन मैं, काफ्का की तरह, बिना कुछ बोले नहीं रह पा रहा हूँ| जब से किताब पढ़ा हूँ, ऐसा लग रहा अपने भीतर एक गर्भ लेकर घूम रहा हूँ| ज्यादा देर तक इस प्रसव-पीड़ा के साथ जीया नहीं जा सकता है| इससे पहले कि मेरी जान चली जाए, या फिर गर्भपात हो जाए, मैं अपनी स्वेच्छा से जन्मदे देना चाहता हूँ| अभी अगर अथक कोशिश करके किसी तरह मैं चुप भी रह जाता हूँ, तो जैसे इन द मूड फॉर लवका नायक, अंत में आपने राज़ को पेड़ के धोधर में बंद कर आता है, वैसे ही मरने से पहले मुझे भी कहीं-न-कहीं इसे विसर्जित करना ही पड़ेगा| जिसका होना एक दिन तय ही है, उसे मैं अपनी स्वेच्छा से करके मुक्त होना चाहता हूँ|  


जितना नर्वस मैं इस वक़्त हो रहा हूँ, उतना पहली बार प्रेम निवेदन करते समय भी नहीं हुआ था| जिस दिन इस किताब को पढ़ना शुरू किया था, उसी दिन से किताब मेरी नसों में खून, हड्डी में मज्जा, सीने में धड़कन और खोपड़ी में विचार बन कर घूम रही है| अगर आप कभी मेरे पास बैठें और किसी अज्ञात सुगंध से अपने नासापुटों को भरता हुआ पाएं, तो समझ लीजिए की यह महक रेज़रेक्शनकी है| इस किताब को पढ़ कर इससे अछूता नहीं रहा जा सकता है| दो अजनबी व्यक्ति जिन्होंने इस किताब को पढ़ रखी है, अगर कभी किसी मोड़ पर एक-दूसरे से टकरा जाते हैं, तो तक्षण एक दूसरे की आँखों में देख कर पहचान लेंगे कि सामने वाले ने भी रेज़रेक्शनपढ़ रखा है| मेरी दृष्टि में, सिर्फ दो ही लोग इस दुनिया में मनुष्य कहलाने योग्य हैं- एक जिन्होंने इस किताब को पढ़ी है, और दूसरा जो इसे पढ़ना चाहता हैं| बांकी की भीड़ को मैं मनुष्य मानने से इंकार करता हूँ|    

अगर हजारों गुलाब को निचोड़ कर कोई इत्र बनाए, और फिर उस इत्र को भी किसी विधि से निचोड़ा जाए, फिर जो बनेगा उसे आप क्या कहेंगे? आपका पता नहीं, लेकिन मैं उसे तोल्स्तोय की रेज़रेक्शनकहूँगा| ‘ऐना केरेनिनामें तोल्स्तोय की देह है, ‘वॉर एंड पीसमें उनका मनहै, और रेज़रेक्शनमें उनकी आत्मा है| जैसे शरीर और मन का हमें पता चलता है, और आत्मा सदा अदृश्य रहती है, वैसे ही तोल्स्तोय की रेज़रेक्शनएक अदृश्य किताब है| बहुत ही थोड़े-से लोगों को यह पता है कि तोल्स्तोय ने ऐना केरेनिनाऔर वॉर एंड पीसके अलावे एक और किताब लिखी है, जो इन दोनों जगत विख्यात किताबों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है| इस में कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि लोगों को रेज़रेक्शन' के बारे में कम पता है, आत्मा के बारे में हमेशा कम ही लोगों को पता होता है|

किताब के बारे में, मैं आपसे कुछ भी नहीं कहूँगा, ना ही इसे पढ़ने या ना पढ़ने के लिए कहूँगा| किसी को इसे पढ़ने के लिए कहना, ऐसे ही है, जैसे कोई किसी से यह कहे कि भाई, मेरी गर्लफ्रेंड बड़ी सुंदर है, तू भी उससे प्यार कर|” ऐसा भला कोई कहता है क्या? नहीं कहता ना? तो, मैं भी नहीं कहूँगा| और, कुछ भी ना कहने का एक और कारण है| वह कारण बताने के लिए मुझे आपको एक कहानी सुनानी होगी| ‘लैला के प्रति मजनू की दीवानगी के किस्से सुनकर, उस प्रदेश का राजा लैलामें बड़ा उत्सुक हो गया था| उसे लगा सौन्दर्य के मामले में लैला जरूर अद्वितीय होगी| उसने लैला को देखनी की इच्छा से, उसे महल पर आमंत्रित किया| जब लैला राजा से मिलने आई, तो उसे देख कर राजा बड़ा हैरान हुआ| लैला एक बेहद ही साधारण स्त्री थी| उसे यकीन नहीं आया कि कैसे मजनू इतनी साधारण स्त्री के लिए ऐसा दीवानावार हो सकता है? उत्सुकता की खुजली से विवश होकर, राजा ने मजनू को भी महल पर बुलाया और उससे पूछा तू क्यूं ऐसी साधारण स्त्री के लिए ऐसा पागल हुआ जाता है?’, इस पर मजनू ने जो जवाब दिया वह विचार करने योग्य है| मजनू ने कहा, महराज, लैला को देखने के लिए मजनू की आँख चाहिए| लैला साधारण स्त्री नहीं है, आपकी आँख साधारण है|”

तो, ‘रेज़रेक्शनको आप बिना तैयारी के नहीं पढ़ सकते हैं| अगर आपने बिना तैयारी के इसे पढ़ा तो आप इसकी कहानी यानि देह में ही उलझ कर रह जाएँगे| इसकी आत्मा से आप परिचित नहीं हो पाएँगे| और देह कितना ही सुन्दर क्यों ना हो, आत्मा के सौन्दर्य से उसकी तुलना नहीं की जा सकती है| ‘रेज़रेक्शनकी आत्मा को आप तभी आत्मसात कर सकते हैं, जब आपके पास भी आत्माहो|

इसीलिए, सिर्फ कहानी पढ़ने की दृष्टि से यदि आप इसे पढ़ना चाहते हों, तो मेरी मानिए इसे हाथ भी मत लगाइए| यह आपके काम की किताब नहीं है| कहानियां वो अच्छी होती हैं, जिन्हें कलम से लिखी जाती है, मशाल से नहीं| इस किताब को तोल्स्तोय ने कलम से नहीं मशाल से लिखी है| सो, अगर घर जलाने की तैयारी हो, तो इसे पढ़िए| अगर, ख़ुद को खोने की हिम्मत हो, तो इसे हाथ लगाइये| अन्यथा, पोगो देखिये, और चेतन भगत, अमीश, और रोबिन शर्मा को पढ़िए
-इक्क्यु केंशो तजु


जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...