“वह कुछ और नहीं बोले। जो चीज़ बुरी लगती थी, उसके बारे में वह चुप हो जाते।“ –अंतिम
अरण्य
होता तो यूं है कि हम जब
कहीं घूमने जाते हैं, तो अपने किसी दोस्त-अहबाब, भूले-भटके प्रेमी, या फिर किसी निकट
कुटुम्ब को याद करते है, उनकी कमी को महसूस करते हैं| सोचते हैं, काश अगर वो आज मेरे
साथ यहाँ होते तो कैसा होता, या फिर उनके साथ की गई पहले के किसी यात्रा को याद
करते हैं| बाज़-औक़ात, उनको कॉल और मेसेज भी कर लेते हैं| अभी जब मास्टर उगवे हमारे
साथ थे, तो वह अपने सभी परिचितों को Whatsapp से विडियो कॉल करके यहाँ की ख़ूबसूरती
दिखाया करते थे| उनका कहना था कि जब तक दो-चार दोस्तों को फोन करके जला न दूं, तब तक मुझे ऐसा लग रहा होता कि यात्रा पर पैसा व्यर्थ खर्च हो रहा है| मास्टर उगवे हर
रोज, जब तक वे यहाँ रहें, कम-से-कम दस दोस्तों को जरूर विडियो कॉल करते थे| मुझे
ऐसा लगता है, जब से सेल्फी का जमाना आया, पर्यटन का कुछ ज्यादा ही क्रेज़ हो गया
है| 90 फीसदी लोग सिर्फ फोटों खीचने के लिए घूमने जाते हैं| अगर उन्हें फोटों खींचने से रोक दिया जाए, तो शायद ही वे कहीं घूमने जाएँगे| लिन यूतांग अपनी
किताब ‘इम्पोर्टेंस ऑफ़ लिविंग’ में लिखते हैं, “अच्छा
यात्री वह होता है, जिसे अब आगे कहाँ जाना है, इसका कुछ पता नहीं होता है| और
श्रेष्ट यात्री वह होता है, जिसे यह भी पता नहीं होता है कि वह कहाँ से आया है| वह
अपना पद, पहचान, और नाम सब पीछे छोड़कर यात्रा पर निकलता है|” कुछ-कुछ ऐसा ही थॉट ग़ालिब के इस शेर में भी है,
प्लान
बना कर यात्रा करने वालों, यात्रा में फ़ोटो खींचने वालों, और घर पहुँच कर लोगों से
अपने यात्रा की बखान करने वालों को लिन यूतांग यात्रियों में गिनती नहीं करते
हैं| उनका कहना है कि ऐसे लोग सिर्फ भीड़ बढ़ाने का काम करते हैं| ये पवित्र व
सुन्दर स्थानों की उर्जा को ख़राब करते हैं| भविष्य में ऐसे लोगों को पवित्र व सुन्दर
जगहों पर जाने की आजादी नहीं होनी चाहिए| अब मेरे एक मित्र है, ग़जब के सेल्फी
एडिक्ट हैं| आप दिल्ली में रहते हैं| अगर उनको यह पता चल जाए कि आप दिल्ली से अगर सिर्फ
गुजर भी रहे हैं, तो वे आपसे मिलने थर्मस में चाय भरकर स्टेशन पर आ जाएँगे| आपको
लगेगा की जनाब मित्रतावश आपसे मिलने आएं हैं, आप एकदम भावावेश होकर उनसे मिलेंगे|
लेकिन उनका आपसे मिलने का कुल उदेश्य सेल्फी लेना होता है| ऐसा मैं दो बार उनके
चक्कर में आ चुका हूँ| एक बार तो उन्होंने मुझे सिर्फ सेल्फी लेने के चक्कर में खानपुर
से दो घंटे की दूरी पर स्थित अपने दुकान पर बुला लिया| मैं खानपुर में अपने भाई के
यहाँ रुका हुआ था| कहीं से उनको ख़बर लग गई कि मैं एक दिन के लिए दिल्ली आया हुआ
हूँ| तुरंत मुझे उनका फोन आया| पहले तो इस बात पर नाराजगी जताई कि मैंने आने से पहले
उनको इतिला क्यों नहीं दिया| फिर कहने लगे, “आप दिल्ली आएं हैं, मेरा बड़ा
मन है आपसे मिलने का| कोई है नहीं जिसके हवाले दूकान छोड़ कर आपसे मिलने आऊँ| आप कल
जा भी रहे हैं| क्या करूँ मैं समझ नहीं आ रहा है!” मैं उनके शब्दों के जाल
में आकर उनसे मिलने उनके दूकान पर चला गया| हालाँकि पिछली बार का स्टेशन पर मिलना
मुझे याद था| लेकिन फिर सोचा, हो सकता है उनका हृदयपरिवर्तन हो गया हो| जलती गर्मी
में दो घंटे की बस यात्रा करके मैंने उनसे मिलने उनके दूकान पर गया| 30 मिनट तक उनके
दूकान पर बैठा रहा| वे पूरे समय अपने ग्राहक के साथ व्यस्त रहे| उनको मेरे से कोई
काम नहीं था, ना ही मिलने में कोई दिलचस्पी थी| औपचारिकता वश पड़ोस की दूकान से
उन्होंने मेरे लिए एक कप घटिया कॉफ़ी मंगा दी| जब मैं वहां से निकलने लगा तो, अपने
पड़ोस के दूकान से उन्होंने आवाज़ लगाकर एक लड़के को बुलाया| और मुझसे कहने लगे, “एक
सेल्फी हो जाए, पता नहीं अब फिर आप से कब दुबारा मिलने का मुहूर्त बने|” मेरे
साथ सेल्फी लेने के अलावा मुझसे मिलने का उनका कोई और प्रयोजन नहीं था| फेसबुक पर
जब उन्हें वो सेल्फी चस्पा किया तो, कैप्शन में लिखा था, “With Great Soul
Ikkyu केंशो Tzu”| इस बार जब मैं दिल्ली से गुजर रहा था, तो फिर से उन्होंने मुझे
झांसे में लेना चाहा| बड़ी मुश्किल से उनके शब्द जाल से मैंने ख़ुद को बचाया|
“रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो”
अगले शे'र में ग़ालिब लिन से एक क़दम और आगे बढ़ जाते हैं
"पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो"
ये लीजिए, क्या सुनाना
शुरू किया था आपको, और क्या कह रहा हूँ| यह मेरी गजब की बीमारी है, उन्वान कुछ
होता है, और लेख कुछ और, कहना कुछ शुरू करता, और थोड़ी देर बाद पाता हूँ कि जो कहना
शुरू किया था उसके अलावा और सब कुछ कह दिया| आइये मूल विषय पर लौटते हैं....| तो, मैं
आपसे यह कह रहा था कि लोग जब कहीं घूमने जाते हैं तो अपने प्रिय सगे-संबंधियों को
याद करते हैं| लेकिन, मेरे साथ कुछ गजब ही हो रहा है| पिछले कुछ दिनों से मैं किसी
व्यक्ति नहीं बल्कि दो किताबों को बड़ी शिद्दत से याद कर रहा हूँ| हर क्षण उनकी कमी
को महसूस कर रहा हूँ| सोचता रहता हूँ, काश वो किताब साथ लाया होता, तो आज ऐसे
सुहाने मौसम में उन्हें पढ़ने का आनंद कुछ और ही होता| जिन किताबों को मैं याद कर
रहा हूँ, उनमे से एक है मेरे पसंदीदा लेखक निर्मल वर्मा की ‘अंतिम अरण्य’ और दूसरी अज्ञये की ‘नदी के द्वीप’| दूसरी किताब का तब्सिरा मैं
आपके साथ अपने ब्लॉग (www.ikkyutalk.blogspot.com) पर साझा कर चूका
हूँ| हैरानी की बात है कि ‘अंतिम अरण्य’ के बारे में मैंने अभी तक कहीं कुछ भी
शेयर नहीं किया है| संभतः मैंने यह किताब तब पढ़ी होगी, जब सोशल मिडिया और इंटरनेट
से ख़ुद को दूर कर लिया था| अन्यथा, कोई कारण नहीं है कि मैं आपसे से अपने इस सबसे
अज़ीज़ किताब के बारे में बात न करूँ|
मेरे लिए निर्मल और ‘अंतिम
अरण्य’ एक दुसरे के पर्याय हैं| एक को सोचता हूँ दुसरे की याद आनायास ही आ जाती
है| हमारे यहाँ बिहार में लोग मिठाई (खासकर रसगुल्ला) खाने के बाद कुछ और खाना
पसंद नहीं करते हैं, उनका मानना है कि इससे मुंह का जयका ख़राब हो जाता है| मेरे
पिताजी अक्सर कहते है, “जिस मुंह में रसगुल्ला खा लिया, अब उसमे और कुछ कैसे
खा सकता हूँ|” रसगुल्ले को मिथिलांचल और बंगाल में श्रेष्ठतम भोज्य पदार्थ
माना जाता है| सिर्फ मिथिलांचल में ही नहीं संभतः दुनियां के सभी हिस्सों में
मिठाई को सर्वोत्तम भोज्य-पदार्थ माना जाता है| ऐसा माने जाने के पीछे वैज्ञानिक
कारण भी है| आदमी जन्म से ही ‘मीठे’ का आदी होता है| हमारा ब्रेन ‘मीठे’ की भाषा ही समझता है| इसीलिए, जब आपको जबरदस्त भूख लगी हो, तब अगर आप कुछ मीठा
खा लें, तो भूख खत्म हो जाती| ब्रेन ऐसा समझ लेता है कि भोजन मिल गया| शायद इसीलिए
चाय पीने से भूख खत्म हो जाती है| भूख कम करने में चाय पत्ती की भूमिका कम और चीनी
की भूमिका ज्यादा है| मिठाई से जुड़ी एक कहानी मैंने बचपन में पढ़ी थी, मैं अक्सर यह
कहानी अपने दोस्तों को अलग-अलग सन्दर्भ में सुनाता रहता हूँ| जब में छठी कक्षा में
पढ़ता था, तब हमारे किताब में एक नाटक हुआ करता था, “बलकरण’’| बलकरण एक 12 साल का
लकड़ा है, वह अपने आंगन में बैठा चाकू पर धार चढ़ा रहा है, उसकी माँ उससे पूछती, “तू,
चाकू पर धार क्यों चढ़ा रहा है?” तो वह कहता है, “सुना है गाँव में तैमूर
लंग आने वाला है, उसी से लड़ने के लिए मैं चाकू पर धार चढ़ा रहा हूँ|” अपने
बहादुर बेटे की बात सुन कर माँ उसे गले से लगा लेती है, और उससे कहती है, “बेटा
शायद तू भूल गया है कि आज तेरा जन्म दिन है, जा किसान के यहाँ से दूध लेकर आ,
तुम्हारे लिए मिठाई बनानी है|” बलकरण जन्म दिन से ज्यादा मिठाई खाने की बात
सुन कर, खुशी से नाचते हुए दूध लाने चला जाता है| थोड़ी देर बाद जब वह दूध लेकर आता
है, तो उसकी माँ उसके लिए मिठाई (संभवतः रसगुल्ला) बनाना शुरू करती है| मिठाई बन
कर तैयार ही होता है कि ख़बर आती है, “तैमूर के लूटेरे गाँव में घुस चुके हैं”|
बलकरण की माँ मिठाई को ढक कर, आनन-फानन में बलकरण को लेकर जान बचाने के लिए जंगल
की ओर भागती है| कहानी का अगला दृश्य है कि जब तैमूर बलकरण के में घर में आता है,
तो मिठाई देख कर वह बड़ा ख़ुश होता है| वह तीन दिन का भूखा है, लूट-पाट में वह खाना
पीना सब भूल चुका है| मिठाई देखकर वह उसे खाना चाहता है| तभी उसका सेनापति उसे
आगाह करता है, “मिस्टर लंग, हो सकता है गाँव वालों ने मिठाई जानबूझ कर छोड़ा हो,
बहुत संभावना है कि इसमें जहर मिला हो|” तैमूर अपने मुर्ख सेनापति की बचकानी
बात सुन कर हँसते हुए उससे कहता है, “तुम मुर्ख हो, पहली तो बात यह कि गाँव के
लोग इतने चालाक नहीं होते हैं कि इसमें जहर मिला दें| दूसरी बात यदि इसमें जहर
मिला भी हो तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है| मरते
समय मुझे इस बात की ख़ुशी होगी की मैं मिठाई खा कर मरा|” अगर
मैं ईश्वर होता, और मुझे तैमूर के गुनाहों का हिसाब करना होता, तो सिर्फ इस एक
वक्तव्य के आधार पर मैं उसके सारे गुनाहों को माफ़ कर देता| “मरते समय मुझे इस बात की ख़ुशी होगी की मैं मिठाई खा कर मरा|”
वाह...!इस एक वक्तव्य से यह साबित होता है कि इस आदमी के कर्म भले ही अच्छे नहीं
रहे हों, लेकिन यह आदमी बहुत अनूठा था| इस नाटक से मेरी एक और याद जुड़ी हुई
है| मेरे छुटपन में दिवाली के दिन मेरे मुहल्ले के लड़के यह नाटक खेला करते थे| हर
कोई तैमूर की भूमिका अदा करने के लिए आतुर रहता था| उनकी आतुरता का कुल कारण इतना था
कि जो तैमूर की भूमिका निभाता था उसे बलकरण की मिठाई खाने को मिलती थी| हर बार मिठाई
खाने को लेकर झंझट हो जाती थी| बाद में उन लोगों ने मिठाई हटा कर सिर्फ दूध कर
दिया| लेकिन, फिर दूध पीने के लिए लड़ाई होने लगी| फिर दिमाग लगा कर यह तय किया गया
कि दूध असली नहीं होगा, स्त्रियाँ अपने मुंह पर जो पावडर थोपती हैं, उस पावडर को
घोल कर दूध बनाया जाएगा| एक साल पावडर वाले दूध के साथ नाटक हुआ, लेकिन अगले साल
से नाटक होना बंद हो गया| बिना मिठाई और दूध के कोई भी नाटक खेलने को तैयार नहीं
था| “‘अंतिम अरण्य’ को पढने के बाद मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ था| बीस दिन
तक मैंने कोई दूसरी किताब नहीं पढ़ी| मुझे डर था कि कहीं मेरे ज़ेहन का जयका न ख़राब
हो जाए| मेरे ख्याल से उस किताब को पढ़े हुए अब 6 महीने से अधिक हो चूका है, इस बीच
मैंने पंचासों किताबें पढ़ी होगी, लेकिन ‘अंतिम अरण्य’ का स्वाद अभी तक जेहन में
बना हुआ है| अभी तक दूसरी कोई ऐसी किताब पढ़ने को नहीं मिली जो ‘अंतिम अरण्य’ के
स्वाद को भुला दे| किताब पढ़कर मैं इतना तृप्त महसूस कर रहा था कि जब बीस दिन बाद
निर्मल की दूसरी किताब ‘लाल टीन की छत’ शुरू की तो, लाख कोशिशों के बावजूद भी बीस पेज
से आगे नहीं पढ़ पाया|
निर्मल के शिल्प का
दीवाना हूँ| उनका कहानी को कहने का अंदाज़ इतना निराला है की आप भूल ही जाते हैं,
की वो क्या कह रहे हैं| आप अंदाज और भाषा की मधुरता में इतना खो जाते हैं कि कहानी
क्या है, और आगे क्या होगा इसकी फिकर ही खो जाती है| निर्मल भावनाओं के जादूगर और
कलम के मदारी हैं| कहानियां दो तरह की होती है, एक जिसमे घटनाएँ होती है, घटनाओं
का एक क्रम होता है, टर्न और ट्विस्ट होता है, रोमांच होता है| ऐसी कहानियों को अच्छे
पाठक छिछली कहानी मानते हैं| क्योंकि इन कहानियों को आप एक बार से अधिक नहीं पढ़
सकते हैं| एक बार भी आप फस जाने की वजह से पढ़ते हैं| जैसे मैं चेतन भगत की ‘रूम
नंबर 105 पढ़ते हुए फस गया था| मुझे ऐसी किताबें पसंद नहीं है, जो एक बिंदु से शुरू
होकर दूसरे बिंदु पर खत्म हो जाती हैं| मुझे ऐसी किताबें पसंद हैं, जिनको अगर आपने
एक बार पढ़ लिया तो जीवन भर वो आपके साथ रहती हैं| इसीलिए, मैं तनहाई में भी कभी
अकेला महसूस नहीं करता हूँ| जब में समंदर के पास जाता हूँ, तो ‘ज़ोरबा दी ग्रीक’ का
ज़ोरबा मेरे साथ होता है, जब मैं पहाड़ पर होता हूँ, तो ‘अंतिम अरण्य’ और ‘नदी के
द्वीप’ के कई पात्र मेरे साथ होते हैं, जब मैं गाँव में होता हूँ, तो ‘फादर्स एंड संस’
का बजारोव मेरे साथ होता है| जब मैं आश्रम में होता हूँ, तो हर्मन हेस का
सिद्धार्थ मेरे साथ होता है| ऐसे हजारों लोग हैं जो किताबों से निकल कर मेरे जीवन
और मेरी यात्रा के साथी बन गए हैं|
तो, मैं आपसे कहानी के
प्रकार की बात कर रहा था| दूसरी तरह की कहनी बिलकुल अनूठी होती है| ये कहानियाँ भाव
तथा विचार प्रधान होती है| मन के भाव नहीं, आत्मा की उर्मियाँ| ये मानसिक विचारों
व भावों का रेचन नहीं होती हैं| ये कहानियां आत्म-अभिव्यक्ति होती है| इसीलिए इन
कहानियों के जरिये आप आत्म-साक्षात्कार करते हैं| ये कहानियां आपको आपके अचेतन की
सैर कराती हैं| इनका उदेश्य आपका मनोरंजन करना नहीं, बल्कि ये कहानियां इसलिए लिखी
जाती हैं कि इनको पढ़कर आपका मनोभंजन हो सके| इन कहानियों का उदेश्य आपकी धारणाएं तोड़ना
और आपकी बुद्धि को थोड़ा खोलना होता है| निर्मल दूसरी तरह की कहानियां लिखते हैं|
मैंने आपसे यह नहीं
कहूँगा कि आप ‘अंतिम अरण्य’ को पढ़िए, ऐसा मैं नहीं कह सकता| मैं आपसे ऐसा निवेदन
करूँगा कि न सिर्फ आप इस किताब को पढ़िए बल्कि इसको हमेशा अपने साथ रखिए| जहाँ भी
जाइये इस किताब को अपने साथ लेकर जाइएये| खासकर तब जब आप पहाड़ पर जा रहे हों| अगर
आपका इरादा इधर आने का है, जिधर मैं इन दिनों रह रहा हूँ, तो प्लीज मेरे लिए भी ‘अंतिम
अरण्य’ और ‘नदी के द्वीप’ की प्रति लेते आइयेगा| पैसा मैं दे दूंगा (वैसे ऐसा ही
बोल कर मेरे एक मित्र से मेरे से अपने प्रश्न का जवाब ले लिया, अभी तक उनका पैसा
नहीं आया, इसीलिए इस बात पर भरोसा नहीं कीजिएगा| मैं भी ऐसा बोल कर ‘पैसा मैं दे
दूंगा’, किसी को चूना लगाना चाहता हूँ)| जितनी जल्दी हो सके इस किताब को पढ़ लीजिए,
अन्यथा आपको बहुत अफ़सोस करना पड़ सकता है| मुझे सदा इस बात का अफ़सोस रहेगा कि आज से
पंद्रह साल पहले मुझे ज़ोरबा पढ़ने को क्यों नहीं मिला|
वह कुछ देर इसकी
ओर आँखें टिकाए लेटे रहे। फिर कुछ सोचते हुए कहा, “हो सकता है — हमारी असली जगह
कहीं और हो और हम ग़लती से यहाँ चले आएँ हों?” उनकी आवाज़ में
कुछ ऐसा था कि मैं हकबका सा गया।
“कौन सी असली जगह?” मैंने कहा, “इस दुनिया के
अलावा कोई और जगह है?”
“मुझे नहीं मालूम, लेकिन जहाँ पर
तुम हो, मैं हूँ, निरंजन बाबू हैं, ज़रा सोचो, क्या हम सही जगह
पर हैं? निरंजन बाबू ने
एक बार मुझे बड़ी अजीब घटना सुनायी…तुम जानते हो, उन्होंने
फ़िलोसफ़ी तो छोड़ दी, लेकिन साधु-सन्यासियों से मिलने की धुन सवार हो गयी…जो भी मिलता, उससे बात करने
बैठ जाते! एक बार उन्हें पता चला की कोई बूढ़ा बौद्ध भिक्षुक उनके बग़ीचे के पास
ही एक झोंपड़ी में ठहरा है…वह उनसे मिलने गए, तो भिक्षुक ने
बहुत देर तक उनके प्रश्नों का कोई जवाब नहीं दिया…फिर भी जब निरंजन
बाबू ने उन्हें नहीं छोड़ा, तो उन्होंने कहा — पहले इस कोठरी
में जहाँ तुम्हारी जगह है, वहाँ जाकर बैठो…निरंजन बाबू को
इसमें कोई कठिनाई नहीं दीखी। वह चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ गए। लेकिन कुछ ही देर
बाद उन्हें बेचैनी महसूस होने लगी। वह उस जगह से उठ कर दूसरी जगह जाकर बैठ गए, लेकिन कुछ देर
बाद उन्हें लगा, वहाँ भी कुछ ग़लत
है और वह उठ कर तीसरी जगह जा बैठे…उनकी बेचनी बढ़ती रही और वह बराबर एक जगह से दूसरी
जगह बदलते रहे…फिर उन्हें लगा
जैसे एक ही जगह उनके लिए बची थी, जिसे उन्होंने पहले नहीं देखा था, दरवाज़े की देहरी
के पास, जहाँ पहले अँधेरा
था और अब हल्की धूप का चकत्ता चमक रहा था…वहाँ बैठते ही
उन्हें लगा, जैसे सिर्फ़ कुछ
देर के लिए — कि यह जगह सिर्फ़
उनके लिए थी, जिसे वह अब तक
खोज रहे थे…जानते हो — वहाँ बैठ कर
उन्हें क्या लगा…एक अजीब-सी शांति
का बोध — उन्हें लगा
उन्हें भिक्षुक से कुछ भी नहीं पूछना, उन्हें सब उत्तर मिल गए हैं, मन की सारी
शंकाएँ दूर हो गयी हैं — वह जैसे कोठरी में आए थे, वैसे ही बाहर
निकल आए…” –अंतिम अरण्य

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