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Wednesday, 15 April 2020

मैं एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था

प्रश्न-स्वामी जी, धार्मिक लोग आपस में इतना लड़ते क्यूं हैं?
इक्क्यु- मैं एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ था, आम मान्यता का अनुकरण करते हुए, बहुत सालों तक मैं इसी मुगालते में जीता रहा है कि मैं ब्राह्मण हूँ| सबसे श्रेष्ठ हूँ, विशिष्ट हूँ..मंदिर जाता था, पूजा करता था, शास्त्रों का अध्यन करता था|
जब तक गाँव में था तब तक मुझे पता था कि कौन सूद्र है, कौन डोम, कौन चमार और कौन मुसलमान| घर में जब कोई किसी और धर्म या जाति का आता था, तब माँ उसे अलग कप में चाय देती थी| कभी जब उन्हें खाना खिलाना होता था, तो माँ उन्हें अलग थाली में खिलाती थी| यह सब देख कर कभी-कभी मैं काफी उदास हो जाता था, और कई बार तो माँ से लड़ता भी था| लेकिन, माँ डांट-डपट कर मुझे चुप कर देती थी| सबसे बुरा मुझे तब लगा था, जब माँ ने मेरे एक मुसलमान दोस्त को अलग कप में चाय दी थी| लेकिन, वक़्त के साथ-साथ मैं माँ की बातों से सहमत होने लगा था-ख़ुद को श्रेष्ट और दूसरी जाति और धर्म के लोगों को अपने से नीचा मानने लगा था|

नीची जाति के लोग कभी भी, हमारे यहाँ आने पर, टेबल या कुर्सी पर नहीं बैठते थे| वे सदा नीचे ज़मीन पर बैठते थे| कुछ दुसाद जो मेरे घर पर आते थे, वे उम्र में काफी बड़े थे, उनके बाल सफ़ेद थे, लेकिन फिर भी हम उन्हें नाम लेकर ही बुलाते थे| ये मुझे थोड़ा अटपटा जरूर लगता था, लेकिन घर के सभी बच्चे ऐसा ही करते थे, सो मैं भी उन्हें नाम से ही बुलाता था, "माँ गुलमा आया है", गुलमा का पूरा नाम 'राम गुलाम दास था" वह हमारे घर का खानदानी नौकर था| हमारे घर के लोगों ने उसके घर के पूर्वजों को घर बनाने के लिए ज़मीन दी थी| वह हमारी ज़मीन पर बसा था, इसीलिए हमारे यहाँ गुलामी करता था| इस तरह की दास-प्रथा भारत में कैसे आई, यह सोचने वाली बात है| आज जब मैं इस प्रथा के बारे में सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि जरूर यूरोप के लोगों ने यह प्रथा भारत में शुरू करवाई होगी| गुलमा 'माँ को गृहस्तणी, और पिता जी तथा घर के सभी मर्द हज़रात, उसमें मैं भी शामिल था, को 'गृहस्त' बुलाता था| बचपन में मैं इस शब्द की महिमा से परिचित नहीं था, लेकिन इधर कुछ दिन पहले जब किसी ने मेरी माँ को 'गिरहसनी' बुलाया, तो अचानक मुझे ध्यान आया कि यह 'गिरहसनी' दरसल गृहस्तणी का बिगड़ा हुआ रूप है| फिर मुझे ध्यान आया कि संबोधन कितना पुराना है, और अब कितना निरर्थक है| बिना वानप्रस्थ और सन्यस्त हुए 'गृहस्त' होने का क्या अर्थ है| 'गृहस्त' तो उसी को कहा जा सकता है जो एक दिन वानप्रस्थ, फिर सन्यस्त भी होगा| फिर मुझे समझ में आया कि अदिकाल में गुलमा नौकर/या दास नहीं उन ब्राह्मणों का सेवक रहा होगा, जिनको एक दिन गृहस्त-आश्रम छोड़ कर सन्यस्त होना होता था| 'सेवक' होने और एक 'नौकर' होने में बड़ा फर्क है| समय के साथ सेवक दास हो गया और गृहस्त शोषक|
गाँव में रहते हुए किसी सूद्र, चमार, डोम या दुसाद से मेरी दोस्ती नहीं हुई| स्कूल में मेरे सारे दोस्त ब्राह्मण घर के ही बच्च्चे थे| नीची जाति के लड़कों के साथ उठने-बैठने तथा खेलने की मनाही थी| स्कूल में नीची जाति से कोई भी पढ़ने नहीं आता था| वे लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने की उम्र में किसी ब्राह्मण के यहाँ गाय-भैंस चराने के लिए चरवाही पर रख देते थे| उनका बच्चा वहीं बासी और बचा हुआ खाना खा कर पलता-बढ़ता था| कभी चोरी छिपे मैं अपने यहाँ के चरवाहे के साथ खेल लेता था, अगर कभी माँ पकड़ लेती थी, तो बहुत डांटती थी| दिल्ली आने के बाद, कई लड़कों से मेरी दोस्ती हुई, और मैंने सबसे बिना उनका सर नेम जाने दोस्ती की| 'रवि' नाम का एक लड़का मेरा बहुत ही करीबी दोस्त था| दो साल की लम्बी दोस्ती के बाद मुझे एक दिन पता चला कि जाति से वह चमार है| मैं बड़ा चौंका क्योंकि उसके रहन-सहन, खान-पान और पहनावे को देख कर मैं हमेशा अंदर-ही-अंदर ऐसा सोचता था कि यह ब्राह्मण है| मैंने कई बार उसके यहाँ खाना खाया था, उसने कई बार मेरे यहाँ खाया था| पहले तो, यह सोच कर मैं थोड़ा बेचैन हुआ कि चमार के साथ मैंने खाना खा लिया था| लेकिन एक दो दिन बाद मैं इन सब के बारे में ग़मभीरता से सोचने लगा| गाँव के चमार बहुत ही गंदगी में रहते थे, मरे हुए जानवर का मांस खाते थे, उनके घर गंदे थे, इन सब के बीच ख़ुद को अलग और महान समझना आसान था| लेकिन रवि का मामला अलग था...सच्चाई तो यह थी कि वह मुझसे भी ज्यादा साफ-सफाई में रहता था| पूजा-पाठ करता था, हारमोनियम बजता था| किसी भी अर्थों में मुझ से कम नहीं था| यह पहला मौका था जब मुझे अपने ब्राह्मणत्व' पर शक होने लगा| धीरे-धीरे यह शक इतना बढ़ गया कि मैंने अपने नाम के साथ वो सर नेम लगाना बंद कर दिया जिससे यह पता चलता था कि मैं ब्राह्मण हूँ| 'अगर यही ब्राह्मण होना है, तो यह तो दो कौड़ी का है'|

बहुत दिनों तक मैं अन्धकार में टटोलता रहा| मेरे अन्दर हजारों धार्मिक प्रश्न घुमते रहते थे| दिल्ली में ही मेरा एक दोस्त बना नासिर मैं उससे घंटों धार्मिक मुद्दों पर बहस करता रहता था| उसका मानना था कि धर्म का सम्बन्ध 'जन्म' से है, हम जिस परिवार, जाति में पैदा होते हैं, वही हमारा जाति और धर्म होता है| मैं इस तर्क से राज़ी नहीं होता था क्योंकि मुझे ख़ुद में, नासिर में और रवि में कोई भी अंतर नहीं दिखता था| फिर मुझे गाँव के वो लोग याद आते थे जिन्हें हम अपने से नीचा समझ कर उनके साथ अलग व्यवहार करते थे| अब मैं ख़ुद को उनसे अलग नहीं पाता था| उनका रंग रूप, मनः स्थिति, शरीर सब कुछ तो मेरे जैसा ही था| इतना तो मैं समझ गया था कि धर्म का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है| लेकिन, फिर किस चीज़ से धर्म का संबंध है, यह मेरे लिए एक यक्ष प्रश्न था| हिन्दू धर्म से मेरा मोह भंग हो रहा था, मेरे किसी भी प्रश्नों का जवाब हिन्दुओं के पास नहीं था| कम-से-कम उन हिन्दुओं के पास तो नहीं ही था, जिन्हें मैं जानता था| मेरा पूरा जीवन ही प्रश्न चिन्ह बन गया था| मैं इतना परेशान रहने लगा था कि मेरे करीबी और परिचितों को ऐसा शक होने लगा कि मैं पागल होता जा रहा हूँ| मेरा छोटा भाई एक दिन माँ को फोन करके बोला, " माँ, भाई पागल हो गया है, दिन भर अलबल कुछ भी बोलता रहता है|"
कई साल बाद, मैं दिल्ली में ही बौद्ध धर्म की एक शाखा से जुड़ा| शुरू-शुरू में मैं उनकी बातों और फिलोसोफी से बड़ा मुतासिर हुआ| कई लोगों को उस प्रैक्टिस से जोड़ा भी| लेकिन, कुछ ही दिनों में बाद मुझे बहुत सी ऐसी चीज़े दिखने लगी, जिससे मेरे सारे पुराने प्रश्न फिर से ताजे हो गए| हर मीटिंग में किसी न किसी से मेरी बहस हो जाती थी| कई बार बड़े लीडर मुझे समझाने आए, लेकिन मुझ से बहस करने के बाद वो ख़ुद ही कंफ्यूज हो जाते थे| धीरे-धीरे मैं ख़ुद को प्रैक्टिस से दूर कर लिया| नासिर के साथ कुछ दिन मैं मस्जिद में भी गया| बहुत सी किताबें पढ़ीं...बौद्ध प्रैक्टिस की तरह इस्लाम से भी मैं शुरू में बड़ा प्रभावित हुआ| लेकिन थोड़े दिनों बाद फिर वही बहस| वहां जाना भी छोड़ दिया| फिर बत्रा होस्पिटल के पास एक 'मैहर बाबा' का केंद्र था..कुछ महीने तक मैं वहां भी कीर्तन में गया| इस्कॉन में भी बहुत दिन अमित मामू के साथ गया| फिर आदित्य के साथ चर्च में भी...सब जगह एक ही कहानी, थोड़े दिनों बाद मैं वहां के लोगों से बहस करने लगता था| फिर धीरे-धीरे ख़ुद को दूर कर लेता था|
आज मेरा सम्बन्ध दुनिया के किसी भी धर्म से नहीं है| लेकिन मैं फिर भी धार्मिक हूँ| और मेरी यह धार्मिकता मेरे लिए कोई विश्वास या मान्यता नहीं है| बल्कि एक अस्तित्वगत प्यास है| अब मेरा धार्मिक होना मेरी पहचान नहीं है| मेरा धर्म मेरे अहंकार का विस्तार नहीं है| इसलिए, अपने धर्म की रक्षा करने के लिए मैं किसी की जान नहीं ले सकता हूँ| चूँकि मेरा धर्म किसी भी तरह के मान्यताओं और विश्वासों पर आधारित नहीं है, मैं किसी को भी अपने धर्म में कन्वर्ट नहीं कर सकता हूँ| ना ही किसी को भी अपने धर्म को मानने के लिए मजबूर कर सकता हूँ| यह ऐसे ही होगा जैसे कोई आँख वाला किसी अंधे को प्रकाश को मानने के लिए मजबूर करे| अँधा अगर प्रकाश को मान भी लेगा तो उसके जीवन में क्या फर्क पड़ेगा? क्या प्रकाश को मान भर लेने से अंधे का अंधापन दूर हो जाएगा? धर्म का जन्म से कोई भी सम्बन्ध नहीं है| धार्मिकता का सम्बन्ध हमेशा ही व्यक्ति से होता है, किसी भी जाति, धर्म या देश से नहीं| जन्म से हम सब एक जैसे ही होते हैं| पंच तत्व से ही हम सब का शरीर बना है, इसलिए हमारे शरीर में तो जन्म से कोई भेद हो नहीं सकता है| मन भी हम सब का एक ही जैसा है- क्या हिन्दू का क्रोध किसी मुस्लिम या इसाई के क्रोध से अलग होता है? फिर जन्म से अगर कुछ तय होता है तो वह हमारा भोजन, रहन-सहन, वस्त्र और कुछ मान्यताएं| लेकिन इन में से कोई भी धर्म नहीं है| एक हिन्दू जो कि ईश्वर को मानता है, और एक ईसाई जो कि जीसस को मानता है, में बुनियादी भेद क्या है? कुछ भी नहीं...!!!! रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता है| यह ऐसे ही जैसे एक अँधा प्रकाश को मानता हो, और दूसरा अँधा प्रकाश को नहीं मानता हो...इस मानने और न मानने से उनके जीवन के क्या अंतर आएगा? कुछ भी नहीं...!!! इसीलिए, जन्म से हिन्दू होना, मुस्लिम होना, या फिर ईसाई या यहूदी होना सांयोगिक घटना है, धर्मिक नहीं|
इसलिए, विवेक, दो धार्मिक लोग कभी भी आपस में नहीं लड़ सकते हैं| लड़ाई सिर्फ अंधों के बीच होती है| जहाँ भी लड़ाई दिखे समझ जाइए कि वहां धर्म नहीं है| और यह बात न सिर्फ बाहर के संबंध में सही है, बल्कि भीतर के संबंध में भी यही सूत्र लागू होता है| अगर आप अपने भीतर के क्रोध से लड़ रहे हैं, काम वासना से लड़ रहे हैं, लोभ से लड़ रहे हैं, इर्ष्या से लड़ रहे हैं, तो समझ जाइएये कि अभी आप धार्मिक नहीं हुए हैं| मेरी दृष्टि में, और यही सभी धार्मिक लोगों की दृष्टि है, लड़ाई अधर्म है, और स्वीकार धर्म|
धार्मिकता अनुभव है, जबकि धर्म सिर्फ एक मान्यता| 'मान्यता' से जीवन में कुछ भी नहीं बदलता है| इसीलिए, "धर्म के नाम पर दुनिया का कोई भी ऐसा पाप नहीं है जो न हुआ हो|" 

Monday, 4 November 2019

बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है (महा-प्रयोग डे- 4 & 5)

परसों पीवीआर पर कॉफ़ी पीने गया था| एक छोटा-सा लड़का एक मरे हुए चूहे को हाथ में लेकर सबको डराने की कोशिश कर रहा था| चूहा आकर में काफी बड़ा था, वह उसके पूछ को पकड़कर बैठे हुए लोगों पर उछाल रहा था| उसी लड़के के साथ एक और लड़का था, जो लोगों को पहले आगाह कर दे रहा था, "वो देखिये वह चूहा लेकर आपको डराने आ रहा है|" लोग डरने से पहले संभल जाते थे, इसीलिए संभल-संभल कर डरते थे और डर-डर कर संभलते थे| यह एक अच्छा खेल था, लेकिन मुझे इस तरह का खेल देखना पसंद नहीं है| मैं चूहों से नहीं डरता, इसीलिए मैंने कभी बिल्ली नई पाली| चूहे और बिल्ली दोनों (लिखता भले ही 'दोनों' हूँ, लेकिन मैं बोलता हमेशा 'दौनों' हूँ, बोलने में लिखने से ज्यादा गलतियाँ करता हूँ|) मुझे नापसंद है|
मौन के अलावा मैं किसी भी भाषा को ठीक से उच्चारित नहीं कर पाता हूँ| मुझे भाषओं से डर लगता हूँ| इन फैक्ट, हर बार बोलने से पहले मैं बहुत डर जाता हूँ| अक्सर बहुत बोल कर मैं अपने डर को छुपाने की कोशिश करता हूँ| लेकिन डर छुपाने से नहीं छिपता है| छिपाने की कोशिश में ही वह बाहर आ जाता है|
मौन मेरी अपनी भाषा है, इसे मैंने किसी से सीखा नहीं है| 9 महीने तक माँ के गर्भ में रह कर मैंने इसे साधा है| माँ के गर्भ से निकल कर मैं तुरंत नहीं चीखा था, रोने से पहले थोड़ी देर 'मौन' रहा था| मौन रहना, सुनना, रोना और मुस्कुराना ये चार चीज़े मैं अपने साथ लेकर आया था| इसके लिए मैंने कहीं से ट्रेनिंग नहीं ली थी| इसीलिए मैं जब भी मौन होता हूँ, 'मैं' नहीं होता हूँ-बस 'मौन' होता है, एक समग्र मौन| माँ के गर्भ में आने से पहले मैं मौन में था-मौन के गर्भ से ही मैं माँ के गर्भ में आया था| पहली बार जब मैंने 'माँ' शब्द का उच्चार किया था, तो वह कोई शब्द नहीं था, वो मेरे मौन का विस्तार था| इस जीवन से जाने से पहले भी अंतिम बार मैं इसी शब्द का उच्चार करके अनंत मौन के गर्भ में चला जाऊँगा| मेरे बाबा ने भी ऐसे ही किया था| मरने से पहले वे कोमा में चले गए थे| उनकी आँखे हमेशा बंद रहती थी| न वे किसी से कुछ बोलते थे, न ही किसी की कोई बात सुन सकते थे| बस कभी-कभी माँ शब्द का उच्चार करते थे| मरने के बाद वे बिलकुल 'मौन' हो गए थे|
कल शाम का खाना आदित्य के यहाँ खाया था| वे गाँव से मरुआ का आटा लेकर आए थे| इधर काफी दिनों से मैं मरुआ की रोटी खाना चाह रहा था| कल मरुआ की मोटी रोटी, देशी घी और गुड़ खाकर शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी तृप्ति मिली|
पिंज़रे के तोते की तरह मैं दिल्ली में छटपटा रहा हूँ| शहर की हवा शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी बीमार कर रही है| आदमी को कभी भी ऐसी जगह नहीं रहना चाहिए जहाँ वह कहीं भी पेशाब नहीं कर सकता हो| जंगल और गाँव मुझे इस लिए पसंद है कि वहां पेशाब करने के लिए किसी विशेष नियमों का पालन नहीं करना पड़ता है| खुले में पेशाब करना एक महान सुख है। शहर हमें ऐसे बहुत से सुखों से वंचित करता हैं| अनावश्यक 'dos और don'ts में रहना मुझे पसंद नहीं है- यहाँ से चलो, यहाँ से मत चलो, ये करो, ऐसा मत करो -शहरों में इन सब बातों से मैं बहुत थक जाता हूँ| शहर मनुष्यों के लिए नहीं मशीनों के लिए हैं| वही मनुष्य शहर में रह सकता है जो मशीन बनने को तैयार हो| आदित्य का बच्चा अभी सिर्फ आठ महीने का हैं| कल उनके बच्चे को देख कर मैंने उनसे वही कहा जो वानगोग ने अपने भाई थिओ से कहा था, "बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है|" आदित्य मेरी बातों को नहीं समझे, लेकिन उनका बेटा मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था|
मेरा महा-प्रयोग बहुत ही सही ढंग से सफलता पूर्वक चल रहा है| आज पांचवा दिन है, बिस्तर पर जाने का समय और मोबाइल को ऑन और ऑफ करने के मामले में मैं एकदम सही जा रहा हूँ| खाने के मामले में 2% इधर-उधर हो जाता है| बांकी प्रगोय से काफी कुछ बदल रहा है जीवन में| बदलते-बदलते एक दिन मेरा जीवन बिलकुल वैसा ही हो जाएगा, जैसा अभी हैं| बहुत बदले के बाद चीज़ें एन अपने जैसी हो जाती हैं|

Friday, 1 November 2019

सावंत आंटी की लडकियाँ (महा-प्रयोग डे- 2)

कल शाम 'सावंत आंटी की लड़कियां' समाप्त हुई| किताब मुझे बहुत ही अच्छी लगी, खासकर पहली (सावंत आंटी की लड़कियां) और अंतिम (साहिब है रंगरेज) कहानी बहुत ही कमाल की है| गाली-गलौज, और हगने-पादने को गीत ने इतने कलात्मक ढंग से कहानी में इस्तेमाल किया है कि मैं दंग रह गया| कहानियों में गालियों के प्रयोग से इतना ज्यादा प्रभावित मैं पहले कभी नहीं हुआ था| पूरी किताब में अगर मैंने कहीं कुछ अंडरलाइन किया है, तो वह गाली-गलौज और हगने पादने की बातें| कुछ अंडरलाइन आपके साथ यहाँ शेयर करता हूँ, हालाँकि इन लाइनों की महिमा आप बिना सन्दर्भ के समझ नहीं पाएँगे, फिर भी.... 

"इश्क़ छिपाए नहीं छिप पाया| पानी में हगे गए की तरह ऊपर आ गया"

"डिम्प की माँ की कुछ चीज़ें बहुत मशहूर थी- एक तो उसके भारी-भरकम नितम्ब, जो चलते समय बहुत नैसर्गिक तरीक़े से अप एंड डाउन होते थे और यह अफ़वाह फैलाते थे कि उसका पति पीछे से करता है|" 
"दीनानाथ कांबले के चेहरे पर तनाव तब और बढ़ गया, जब उन्हें पता चला कि उनका भाभड़ा और निरा चिम्हड़ी बेटा ऐसा चुतिया-बसंत टाइप एलान करके गया है|" (इस लाइन को पढ़ कर में दस मिनट तक पेट पकड़ कर हंसता रहा था|)

दूसरी कहानी 'साहिब हैं रंगरेज' बहुत ही अलग, थॉट-प्रोवोकिंग, और सुंदर कहानी है| किताब पढ़ते हुए मुझे कई बार मिलान कुंदेरा की किताब 'अन्बेरबल  लाइटनेस ऑफ़ बीइंग' की याद आई| कुंदेरा की तरह गीत भी हमें उन चीज़ों के बारे में सोचने के लिए मजबूर करते हैं, जिनको हम आम तौर पर बहुत ही हल्के में लेते हैं|  
इन दिनों गीत चतुर्वेदी मेरे सबसे पसंदीदा लेखक हैं, उनकी किताब 'न्यूनतम मैं' को मैं तकिये के नीचे रखकर सोता हूँ| इधर मेरा भोपाल जाकर उनसे मिलने का भी बड़ा मन था, सोचा था मेहसाना से सीधा भोपाल जाऊंगा, और वहां से फिर दिल्ली| लेकिन, आश्रम पहुँचने के बाद मन इतना निष्क्रिय हो गया कि कहीं आने-जाने का दिल ही नहीं किया| गीत से मिलकर उनका ऑटोग्राफ लेने लिए भक्तराज, रावसाहब और मैंने 'न्यूनतम मैं' की तीन नई प्रतियां भी मंगा ली थी| आश्रम का नशा मुझ पर ऐसा तारी हुआ कि मैं आश्रम के गेट से बाहर निकलने से पहले भी दो बार सोचता था| आश्रम में बिताए दस दिन मेरे इस साल के अब तक के सबसे बेहतरीन दिन थे| आश्रम के अन्दर मैं ऐसा ही फील करता हूँ जैसा बच्चा गर्भ में फील करता है| जैसे गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए माँ सांस लेती है, वैसे ही जब मैं आश्रम में होता हूँ, अस्तित्व मेरे लिए सांस लेता है| 

'सावंत आंटी की लड़कियां' समाप्त करने के बाद कल शाम ही मैंने एक नई किताब शुरू की है- मुराकामी की 'नार्वेजियन वुड'| पहला बीस पेज पढ़ कर ही मजा आ गया| मुराकामी को पहली बार पढ़ रहा हूँ| अभी तक उनके बारे जितना पढ़ा और सुना है, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उनकी किताब मुझे जमेगी| आगे पूरी किताब पढ़ने के बाद ही किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है| डी.टी सुजुकी के अलावा मुझे नहीं याद है कि इससे पहले किसी जपानी लेखक को मैंने  कभी पढ़ा है| जापान से मेरा संबंध झेन तक ही सिमित रहा है| और झेन के बारे मैंने जितना भी जाना, सुना और समझा है उसका क्रेडिट जाता है ओशो और एलन वाट्स को| डी.टी सुजुकी को पढ़कर मैंने झेन को बस जाना था, झेन से असली प्रेम मुझे ओशो और एलन वाट्स की वजह से हुआ| 
आज 'महा-प्रयोग' का दूसरा दिन है| कल का दिन क़रीब-क़रीब अच्छा बीता| पूरा दिन तो मेरा सही गया, बस शाम में थोड़ा गच्चा खा गया| 
कल मेरे साथ वैसा ही हुआ जैसा धर्मकोट में राव साहब के साथ हुआ था| एक दिन ऑर्गनिक थाली में खाना खाते समय राव साहब की मुलाकात एक अहमदाबादी लड़की से हुई| जहाँ वे खाना खा रहे थे वहीं बगल वाले टेबल पर लड़की रूमी को पढ़ रही थी| बहुत हिम्मत इकठ्ठा करके राव साहब ने उससे बात की| बातचीत से उनको यह पता चला कि लड़की उनके ही शहर अहमदाबाद से है, पिछले एक महीने के धर्मकोट में रह रही है, और कभी-कभी जब उसे घर पर खाना बनाने का मन नहीं होता है, तो वो यहाँ ऑर्गनिक थाली पर खाने चली आती है| राव साहब बड़े खुश हुए- अगर यह लड़की पट गई तो मजा आ जाएगा, अपने ही शहर की है, फिर तो रोज़ मिलना हो पाएगा, रूमी को पढ़ती है, मतलब समझदार टाइप की है, और एक महीने से यहाँ रह रही है, यानी की अपने टाइप की है| फिर क्या था उससे दुबारा मिलने के लिए राव साहब रोज ऑर्गनिक थाली का चक्कर लगाने लगे| संयोग ऐसा बना कि वह दुबारा नहीं आई| राव साहब ने रेस्टोरेंट के मनेजर को अपना नंबर भी दिया यह कह कर कि वह लड़की अगर कभी आए तो उसे इस नम्बर पर कॉल करने को बोलना, मुझे उसके मारफत कुछ अहमदाबाद भेजना है| आस-पास के सब्जी वालों को भी लड़की का हुलिया बता कर राव साहब ने यह पता करने की कोशिश की कि क्या ऐसी कोई लड़की उनके पास सब्जी लेने आती है| -अहमदाबाद की कोई लड़की हाथ में रूमी की किताब लेकर आपके यहाँ सब्जी लेने आती है? वह एक महीने से यहाँ रह रही है..उसके बाल कमर तक लम्बे हैं, चश्मा लगाती है, नाक पतले और होंठ मोटे हैं, बड़ी-बड़ी काली आँखें हैं| सिलिंडर बॉडी है, जब वो चलती है तो जमाना उसे रुक कर देखने लगता है| कुछ इस तरह से लड़की के बारे में राव साहब लोगों को बताते थे| राव साहब की रूमानी व्याख्या का असर यह हुआ था कि सब्जी वालों के साथ-साथ मास्टर उगवे भी लड़की को ढूँढने में बहुत रस लेने लगे| 

जब दस दिन की हंटिंग के बाद कहीं से लड़की का कुछ पता नहीं चला, तो राव साहब थोड़े ढीले पड़ गए| मास्टर उगवे भी बहुत उदास हो गए| एक दिन मास्टर उगवे मुझसे कहने लगे, "ये राव झूठ बोलता है, यह ऐसी किसी लड़की से नहीं मिला है| हम पर इम्प्रेशन डालने के अपने को झांसे में ले रहा है| जैसी लड़की ये बता रहा है, मैं नहीं मानता कि ऐसी कोई लड़की इस जनम में कभी इनके जैसे बबूचक से बात करेगी|" उगवे की बात सुनकर राव का मुंह उतर गया|  'लेकिन इजराइली ने तो की थी, बात तो छोड़ीये वो तो एक दिन इनसे हिंदी भी सीखी थी', मैंने मास्टर उगवे से कहा| "इजरायली ने बात की नहीं थी, तुमने इनकी बात उससे करवाई थी| अगर इनके गांड में गू था, तो ये दुसरे दिन उसको क्यों नहीं पढ़ा लिए, एक दिन पढ़ने के बाद दुसरे दिन उसने इनको क्यों नहीं बुलाया?", मुंह बनाते हुए मास्टर उगवे बोले| मास्टर उगवे की बात सुनकर राव साहब को ताव आ गया, " उगवे, गू तो मेर्मे भोत है| इदर कर देगा, तो तुम साला उसका बास से मर जाएंगा| अरे, मैं पादेंगा, तो उसका बास सैन नहीं होएंगा तेर्से, मेरे गू का क्या बात करता है रे तू ?" मैंने देखा मामला गर्म हो रहा है, इससे पहले राव साहब सच में हग देते और मास्टर उगवे सच में ही मारे बास के दम तोड़ देते, राव साहब को वहां से उठा कर मैं तुषिता की तरफ ले गया| हम रोड क्रॉस करके के उस तरफ जाने ही वाले थे कि एक ऑटो हमारे सामने से गुजरा| राव साहब एकदम से ख़ुशी के मारे चिल्लाए, "अरे अहमदाबादी थी उसमे" राव साहब की चिल्लाहट सुनकर मास्टर उगवे भी चाय वाले के पास से उठकर हमारे पास आ गए| राव के चेहरे को देखकर उगवे ने भांप लिया की लड़की मिल गई है| "तुम ऑटो पकड़ो और उसके पीछे जाओ'', उगवे ने राव को सुझाया| राव रोड पार करके ऑटो ढूँढने के लिए भागे| हमने उनका पीछा किया| ऑटो स्टैंड पर कोई भी ऑटो नहीं था| राव मुंह लटकाए खड़े थे| "अब क्या करोगे, साला इसीलिए बोला था कि एक बाइक रेंट पर लेलो, आज बाइक होता तो बबूचक की तरह यहाँ मुंह लटका कर खड़ा नहीं होना पड़ता|", मास्टर उगवे ने राव साहब को लताड़ते हुआ कहा| "कोई नहीं उस ऑटोवाले को लौटकर आने दीजिए, उससे पूछेंगे कि उसे कहाँ छोड़ कर आया| या फिर शाम तक इंतजार करते हैं, लौट कर यहीं तो आएगी|", राव साहब ने ख़ुद को और मास्टर उगवे को दिलासा देते हुए कहा| 'ऑटो वाले को कैसे पहचानेगे?' मैंने राव साहब से पूछा| मास्टर उगवे और राव दोनों मेरी और देखकर हंसने लगे, "हम तो चलती सुन्दरी के भी झांटे गिन लेते हैं, फिर ऑटो का नंबर क्या चीज़ है, " ऐंठ लेते हुए  राव साहब बोले|
ऑटोवाला जब लौट कर आया तो हमें यह पता चला कि वह डेलेक होस्पिटल गई है| होस्पिटल की बात सुनकर राव साहब का प्यार और बढ़ गया-बीमार थी इसीलिए बाहर नहीं निकल रही थी| तभी तो मैं कहूँ कि ऐसा कैसे हो गया कि इन दस दिनों में एक बार भी वहां खाना खाने नहीं आई| मैं अभी हॉस्पिटल के लिए निकलता हूँ, वहीं पर उससे मिल लूँगा| यह कहकर जैसे ही राव साहब ने ऑटो के लिए हाथ दिया मास्टर उगवे बोले, "मुझे भी मेकलोडगंज से एक चूरन लेता था, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ|" राव साहब और उगवे दोनों एक ही ऑटो में बैठ कर निकल लिए| मैं दो मिनट तक वहीं खड़ा राव साहब की दीवानगी और मास्टर उगवे की हरकतों के बारे में सोचता रहा-इनको सच में चूरन लेना था, या ये उस लड़की को देखने गए हैं?
शाम को मास्टर उगवे और राव साहब जब लौट कर आए तो पता चला कि इनके पहुंचे से पहले अस्पताल बंद हो गया था| लड़की का कुछ पता नहीं चला| राव साहब दुखी-दुखी से लग रहे थे| मास्टर उगवे का मानना था कि राव हवा में तीर मार रहा है, ऑटो में कोई और लड़की बैठी थी, राव को भ्रम हो रहा है कि वह अहमदाबादी थी| "जिस तरह की लड़की तुम उसको बता रहे हो, उससे मुझे नहीं लगता है कि वह फ्री वाले अस्पताल में जाएगी| या तो तुम झूठ बोल रहे हो, या फिर वो लड़की कोई और थी", उगवे ने राव से कहा| राव के पास कोई उत्तर नहीं था, वे मुंह लटकाए बैठे थे| उनके लटके हुए मूंह से मैंने अंदाज़ा लगाया कि ऑटो वाली लड़की सच में ही अहमदाबादी थी| 
दो दिन बाद, मास्टर उगवे धर्मकोट छोड़ कर चले गए| जाते समय उन्होंने राव से बस इतना कहा, "टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक ...." जवाब में राव साहब ने दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते किया| यह नमस्ते मुझे बड़ा सिम्बोलिक लगा| क्या मास्टर उगवे के जाने के बाद राव साहब का दिन फिरने वाला था? नहीं ऐसा कुछ भी होने वाला था| जैसा कि राव साहब ख़ुद ही कहते हैं, "मेरी तकदीर साली पोपटलाल जैसी है, लगता है यह जनम हंटिंग में ही जाएगी|" 
मास्टर उगवे के जाने के तीन दिन बाद राव साहब को तुषिता में एक कोर्स ज्वाइन करना था-इंट्रोडक्शन टू बुद्धिज्म' दस दिन के कोर्स का 6000 चार्ज था, रहना खाना अंदर ही था| "कोर्स के लिए जाने से पहले मैं बौद्ध भिक्षु की तरह बाल दाढ़ी मुंडवा लेना चाहता हूँ, आप क्या कहते हैं?", राव साहब ने मुझसे पूछा| 'मुंडवा लीजिए, वैसे भी आपने अंत समय में फॉर्म भरा था, बहुत कम चांस है कि आपका इस बार हो पाएगा| वेटिंग में और भी बहुत लोग होंगे| क्या पता भिक्षु वाले लुक से आप का चांस थोड़ा बढ़ जाए', मैंने राव साहब से कहा| "हाँ मैं भी ऐसा ही सोच रहा हूँ, और थोड़ा अहमदाबादी नहीं मिली इस ग़म में भी मैं बाल मुंडवाना चाहता हूँ, " गमगीन होते हुए राव साहब बोले| 
तुषिता के लिए जाने से एक दिन पहले राव साहब बाल और दाढ़ी मुंडवाकर आ गए| एकदम छिले हुए अंडे लग रहे थे| दिव्या उनके नए रूप को देख कर बहुत देर तक हंसती रही थी| मास्टर उगवे ने राव साहब को जो उपनाम दिया था 'बबूचक' उस का अर्थ तो मैं अभी तक नहीं समझा था, लेकिन साहब का नया लुक देखकर यह जरूर समझ आ गया कि गुण के साथ-साथ इस शब्द की अपनी एक शक्ल भी है| 
अगले दिन राव साहब नहा-धोकर तुषिता के लिए निकले| जिस रूम में रह रहे थे उस को खाली करके हिसाब चुकता कर दिया| हम सब से विदा लेकर गिरती बारिश में निकल पड़े| जब राव साहब जा रहे थे, तभी मैंने मकान मालिक के गाय और बछड़े को देखा| गाय अपने जीभ से चाट कर बछड़े को साफ़ कर रही थी| गाय के नवजात बछड़े को देखकर मैं बड़ा हैरान हुआ- बछड़ा एकदम बबूचक दिख रहा था| 

हमसे विदा लेकर जाने के ठीक एक घंटे बाद गिरती बारिश में राव साहब ससामान तुषिता से लौट कर आ गए, "वेटिंग कन्फर्म नहीं हुआ, यह इस साल का आखरी कोर्स था, सो बहुत कम लोगों ने केंसल किया", बैग रखते हुए राव साहब बोले| बल्ब की रौशनी में राव साहब का बेल एकदम चमक रहा था| जो रूम वे छोड़ कर गए थे, वही रूम उन्हें फिर से मिल गया| अपने सामान की ओर इशारा करते हुए मुझसे बोले, "सामान बाँध कर इस सोच में खड़ा हूँ कि जो लोग कहीं के नहीं रह जाते हैं, वे कहाँ जाते हैं?" 
तुषिता से निराश होने के बाद राव साहब का दिल बहुत बैठ गया था, "चलिए आज शाम में बाकसू चलते हैं, मुझे कुछ शोपिंग करनी है| अब मैं दो चार दिन से ज्यादा यहाँ नहीं रुकुंगा| लड़की भी नहीं मिली, इजरायली गच्चा दे गई, अहमदाबादी मिल नहीं रही है, तुषिता में एडमिशन हुआ नहीं, अब किस लिए रुकू मैं यहाँ?" 
शाम को हम तीनों (राव साहब, दिव्या और मैं) बाकसू गए| राव साहब और दिव्या ने शोपिंग की और मैंने जिस सलून में राव साहब ने बेल मुंडवाया था, उसी में बाल ढाढ़ी सेट करवाया| शोपिंग वगैरह करने के बाद पिज़्ज़ा-विज्ज़ा खाकर जब हम धर्मकोट की और लौट रहे थे, एक जगह अचानक से राव साहब जमीन पर लोटने लगे| मैं बड़ा हैरान हुआ इस तरह से नागिन डांस करते मैंने राव साहब को पहले कभी नहीं देखा था| "क्या हो गया इनको?" दिव्या मुझसे पूछी| इस बीच राव साहब उठकर खड़े हुए और बोले, "अहमदाबादी बैठी है उस सामने वाले शॉप में|" ये कह कर वे फिर जमीन पर लोटने लगे| 'इस तरह से जमीन पर लोटने से क्या होगा, जाकर बात कीजिए उससे', हाथ पकड़ कर उठाते हुए मैंने उनसे कहा| "अरे, मैं अब क्या बात करूं उससे", राव साहब अपने सिर और दाढ़ी पर हाथ फेरने लगे| उनका भाव समझ कर दिव्या जोर-जोर से हंसने लगी| अब मैं भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया| "इसी को कहते हैं सर मुंडवाया और ओले पड़े, अब ये बबूचक जैसी शक्ल लेकर क्या मिलूँ मैं उससे | पंद्रह दिन से ढूंढ रहा था तब तो मिली नहीं, अब जब बेल मुंडवा लिया तो मिली है,", राव साहब मुझसे बोले| मुझे पता नहीं क्यों मास्टर उगवे की वो बात याद आ गई जो उन्होंने जाते-जाते राव साहब से कही थी- टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक ....|   
ठीक यही चीज़ कल मेरे साथ हई| जैसे ही मैं आदित्य के रूम से उतर रहा था, उनके मकान मालिक ने मुझे बुला लिया| मेरे लाख मना करने के बाद भी अपनी पत्नी से मेरे लिए चाय बनाने के लिए बोल दिया| बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें चीनी डालने से रोका| फिर जैसे ही हम चाय पी रहे थे, उनकी बेटी एक थाल में मिठाइयाँ लेकर आ गई| थाल में वो सारी मिठाइयाँ थी जो मुझे पसंद है| कुछ देर मैं गौर से मिठाइयों को देखता रहा, पांच महीने बाद एक बार फिर से मुझे मास्टर उगवे की वो बात याद आ गई, जो उन्होंने राव साहब से कही थी, "टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक...."| 
                                            (01-Nov. 2019, 13:52 PM, Delhi) 



नोट- लाल रंग से लिखे सारे वक्तव्य गीत चतुर्वेदी की किताब 'सावंत आंटी की लड़कियाँ' से लिए गए हैं| 

Wednesday, 30 October 2019

महा-प्रयोग डे-1

आज महा-प्रयोग का पहला दिन है| कल शाम पांच बजे मोबाइल फोन बंद कर दिया था| और रात ठीक 10 बजकर 30 मिनट पर सोने चला गया था| शाम को मोबाइल बंद करने के बाद थोड़ी देर किताब (सावंत आंटी की लडकियाँ) पढ़ता रहा, लेकिन एक पॉइंट के बाद मन फोन का इस्तेमाल करने के लिए बेचैन होने लगा| बेचैनी इस बात का सबूत था कि मन मोबाइल फोन का आदी हो गया है| 
प्रयोग के हिसाब से मैं अगले 90 दिनों तक शाम पांच बजे से लेकर सुबह 9:30 तक मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करूँगा| साथ ही लैपटॉप, टीवी और रेडियो इत्यादि का इस्तेमाल भी नहीं करूँगा| दूसरा, रात 10:30 तक सो जाऊंगा| 
कल शाम मोबाइल फोन बंद करने के बाद सकारात्मक बात यह हुई कि दिव्या और मैं बड़ी देर तक सोफे पर बैठ कर बातें करते रहे| मोबाइल फोन के ऑन रहते इतनी लम्बी चर्चा निर्बाध रूप से बहुत कम ही हो पाती है| पीछे मेहसाना में भक्तराज, राव साहब और मैं एक दिन फोन भक्तराज के घर पर छोड़कर सीसीडी (संकूवाटरपार्क) गए थे| शाम 5:00 बजकर 30 मिनट पर हम घर से निकले थे| कोई आधा घंटा हमें सीसीडी पहुंचे में लगा होगा| कॉफ़ी आर्डर करने के बाद हम ब्रह्म-चर्चा में लग गए| शुरू में राव साहब थोड़े बेचैन लग रहे थे, उनकी चिंता यह थी अगर इस बीच उनकी होने वाली गर्लफ्रेंड ने मेसेज कर दिया तो क्या होगा-क्या वह इस बात को सहज रूप से स्वीकार कर पाएगी कि उसके मेसेज का राव साहब ने आनन-फ़ानन में जवाब नहीं दिया? भक्तराज और मुझे कोई तीस मिनट लगा राव साहब को सहज करने में- आप समझिये चौबीसों घंटे ढेल की तरह अगर आप उसके लिए बिछे रहेंगे तो वो कभी आपसे नहीं पटेगी| लड़कियां ऐसे लड़कों को कभी पसंद नहीं करती है जिसके पास कोई रीढ़ ना हो| जब हमने ऐसे अजीबों-गरीब कोई पचास तर्क दिए तब राव साहब थोड़े रिलैक्स हुए| हम (भक्तराज और मैं) दोनों इस बात से बहुत ही हैरान थे कि इस सदी में मोबाइल से दूर होने पर भी आदमी को सदमा लग सकता है|
हम तीनो में से किसी के भी पास घड़ी नहीं थी, सो हमें टाइम का कुछ पता नहीं चला| और हमने किसी से पूछा भी नहीं| हम अपने-अपने ढंग से ब्रह्म की व्याख्या करने में इतने तल्लीन थे कि कब शाम ढली और कब रात हुई हमें किसी भी चीज़ का कुछ पता नहीं चला| जब सीसीडी वाला भाई दूबारा आर्डर देने के लिए हमसे कहने आया, तब हमें अंदाज़ा लगा कि शायद हम बहुत देर से बैठे हैं|
घर पहुँच कर जब हमने समय देखा तो हम तीनो हैरान होने से ख़ुद को नहीं रोक पाए| रात के 11:00 बज रहे थे| मतलब अगर आने-जाने के एक घंटा को निकाल दिया जाए, तो हमने 4 घंटे से भी ज्यादा सीसीडी में ब्रह्मचर्चा करते हुए बिताया| अगर बिना घड़ी देखे कोई हमसे पूछता कि हम कितनी देर सीसीडी में बैठे थे, तो हम अंदाज़े से दो घंटे से ज्यादा नहीं बता पाते| हमें दो घंटे बोलते हुए भी डाउट ही होता| 

मोबाइल के इस्तेमाल को सिमित करने और सोने का समय तय करने के अलावा मैंने भोजन को भी महाप्रयोग में शामिल किया है| आज से तीन महीने के लिए मैं सफ़ेद, चीनी, गेंहू और दूध का सेवन बिलकुल बंद कर रहा हूँ| अभी तक मौका-बेमौका चीनी और दूध का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सेवन कर लेता था, लेकिन अब वो भी बंद कर रहा हूँ|    
मोबाइल का इस्तेमाल, सोने का तय समय और भोजन में मामूली सुधार लाने के अलावा और किसी चीज़ को बदलने पर मेरा कोई विशेष ज़ोर नहीं है| अगर कुछ अपने आप सजह रूप से बदलता है तो ठीक, वर्ना प्रयास से मैं किसी भी चीज़ में बदलाव नहीं लाना चाहता हूँ| 
जब से दिल्ली आया हूँ तभी से रोज़ सुबह उठ कर पार्क जाने की सोचता था और टाल देता था| रात लेट सोने की वजह से सुबह उठने में देर हो जाती थी| सुबह के पार्क जाने को शाम पर टाल देता था, और शाम आते-आते उसे अगली सुबह पर| लेकिन कल रात ठीक समय पर सो जाने की वजह से, आज सुबह जल्दी नींद खुल गई| नित्यकर्म से फ़ारिग होने के बाद बड़ी देर तक किताब (गीत चतुर्वेदी की सावंत आंटी की लड़कियां) पढ़ते हुए पौ फटने का इतज़ार करता रहा| बहुत दिन बाद किताब पढ़ते हुए ऐसी शान्ति अनुभव किया| 
अपने मुंबई, दाहोद और मेहसाना निवास के दौरान निरंतर वाक करते रहने की वजह से मैं बहुत ही सुगमता के साथ तेज गति से चल पा रहा था| काफी दिनों से निष्क्रिय रहने की वजह से दिव्या उतनी सुगमता से तेज़ नहीं चल पा रही थी| नतीजतन, मुझसे पीछे न रह जाए इसलिए, बीच-बीच में उसे दौड़ना पड़ता था| मुझे अपनी याद आ गई, बम्बई में ठीक ऐसी ही हालत मेरी थी| सर (पवन श्रीवास्तव) बहुत तेज चलते हैं, उनके साथ वाक करते समय मैं अक्सर पीछे छुट जाता था| मुझे तेज चलाने के लिए, सर कोई कई बार मुझे धक्का मारना पड़ता था| मैं सोचा करता था-इतनी तेज़ चलने तो अच्छा है कि दौड़ ही लूं| 
सुबह वाक पर जाने के अलावा एक और चीज़ जो सहज रूप से घट रही है, वह है 'लिखना'| एक अरसे से मेरा लिखना बंद हो गया था| आज बड़े ही सहज ढंग से यह फिर से शुरू हो गया है| आगे मेरी कोशिश यही रहेगी कि आने वाले 90 दिनों में महा-प्रयोग के जो भी छोटे-बड़े परिणाम होंगे उनसे आपको अवगत कराता रहूँ| 
                                                (दिल्ली- 31-10-2019, 12:08 PM)


Tuesday, 16 July 2019

सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है

मित्र,
मानसिक हानि जैसी कोई चीज नहीं होती है| शरीर बच गया तो समझिये सब बच गया| शरीर और मन दो अलग-अलग चीज़े नहीं हैं| मन को ठीक करने की ज्यादा फिकिर मत लीजिए| मन जैसा भी, उसे वैसे ही स्वीकार कीजिए| ‘मन’ गंदे पानी जैसा है| गंदे पानी को जितना आप साफ़ करने की कोशिश कीजिएगा, वह उतना ही गंदा हो जाएगा है| कोशिश करने की वजह से ही गन्दा हो जाएगा| बस उदासीन होकर ‘विचारों’ को देखिए, करना कुछ भी नहीं है| ‘मन’ यानि भीतर चलने वाला विचार| आप कहते हैं, "ख़ुद को बदलना है, मन को ठीक करना है, मुझे अच्छा आदमी बनना है, बहुत हानि हो गई है", यह सब भी तो विचार ही है, की नहीं है? जो मन को बदलना चाहता है, वह भी मन ही है| चेतना सदा द्रष्टा है, साक्षी है| ‘उस’ साक्षी तत्व के प्रति जागिये| मन के प्रति उदासीन होइए| बस यह जानते रहिए कि मेरे भीतर अभी इस तरह के विचार चल रहे हैं| विचार का संबंध हमेशा भूत और भविष्य से होता| और शरीर सदा वर्तमान में होता है| इसीलिए जैसे ही आप शरीर के प्रति बोध से भरेंगे, विचार कम होने लगेंगे| ‘इनर बॉडी ध्यान’ की भी यही उपयोगिता है| शरीर का एंकर की तरह इसेमल कीजिए| जैसे एंकर जहाज को किनारे से बाँध कर रखता है, वैसे ही शरीर का बोध आपको वर्तमान से बाँध कर रखेगा|
अपने सुनने की क्षमता को विकसित कीजिए| कभी, आप जहाँ भी बैठे हों, उसके आसपास जितनी भी आवाज़े हो उसको सुनिये| सुनना बहुत ही अद्भुत चीज है, क्योंकि सुनना और सोचना एक साथ नहीं हो सकता है| इसी तरह कान के साथ साथ आपनी बांकी इन्द्रियों के प्रति भी होश को साधिये| शरीर जितना शुद्ध होगा, मन उतना ही पारदर्शी हो जाएगा| इसीलिए मैंने आपसे योग़ और प्राणायाम करने को कहा| किसी अच्छे योगी से अगर आप योग सीखते हैं, तो वह आपको हर क्रिया को होशपूर्वक करने और सांस के प्रति जागरूक रहना सिखाएगा|
पोर्न से मुक्त हो कर आपने ख़ुद को नया जन्म दिया है| पूरी दुनिया में लाखो लोग हैं, जो अपनी इस आदत की वजह से सड़ रहे हैं| शारीरिक का सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है| क्योंकि ‘मन’ ही रोग है|
आप, अब, अपने बारे में ज्यादा चिंता मत लीजिए| आप इस नर्क से निकल चुके हैं| अब अपना अनुभव लोगों के साथ शेयर करके, उनको इस नर्क से निकालने की कोशिश में लगिए| आपने दोस्तों, परिचितों को पोर्न देखने के ख़तरनाक परिणाम के बारे में बताइए| जो बोध और ज्ञान आपको मिला है, उसे दूसरों से बांटिये...
जो प्राणायाम आप कर रहे हैं, वो पर्याप्त है| उसको जारी रखिये| बस यह सब गंभीर हो कर मत कीजिए, हल्के होइए| दिन में कुछ समय अगर संभव हो तो, छोटे बच्चों के साथ बिताइये| उनके साथ खेलिए...इससे आपकी गंभीरता थोड़ी कम होगी..


योग के मामले में बाबा रामदेव सही हैं| लेकिन चूँकि आप उनकी विडियो देख कर करते हैं, इसीलिए आप ग़लत कर रहे हैं, या सही, इसका पता लगाना मुशिकल है| अगर समय हो तो किसी प्रतिष्ठित योग-स्कूल से कुछ दिन का कोर्स कर लीजिये| संदीप महेश्वरी के संबध में मेरे विचार कुछ ज्यदा अच्छे नहीं हैं| इसलिए उनकी विधि के बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं दूंगा|
सुनने की क्षमता विकसित करने से मेरा मतलब था, आवाज़ के प्रति जागरूक होना| निरंतर आ रही आवाज़ को धीरे-धीरे हम भूल जाते हैं, जैसे जब आप फैन on करते हैं, तो आपको फैन की आवाज़ सुनाई देती है, लेकिन थोड़े समय बाद आप उसे भूल जाते हैं| इसी तरह ‘शब्द’ को हम सुनते हैं, लेकिन दो शब्दों के बीच जो अन्तराल होता है, उसे के प्रति हम जागरूक नहीं होते हैं, जबकि अंतराल उनता ही महत्वपूर्ण है, जितना कि ‘शब्द’| ओशो का एक 15 मिनट का ‘सुनना ध्यान’ है, शायद उसकी ऑडियो आपको यूटूब पर मिल जाए, अगर ना मिले तो मुझे बताइयेगा, मैं मेल कर दूंगा| उस प्रयोग को कभी-कभी कीजिए|
एक और प्रयोग है, जिसे आप लोगों से बात करते समय कर सकते हैं| बात-चीत के दौरान, दो वाक्यों के बीच जो गैप होता है, उसके प्रति जागरूक होइए, उसको भी नोटिस में लीजिए| जैसे-जैसे आप बाहर के गैप के प्रति जागेंगे, वैसे-वैसे ही आपके भीतर भी एक गैप बनने लगेगा| आमतौर पर हमारा मन ‘ऑफ बीट’ को नहीं सुनता है, जैसे यदि में टेबल पीटता हूँ, तो टेबल को पीटने से जो आवाज़ पैदा होगी, वो तो आप सुनेंगे, लेकिन दो ध्वनियों के बीच जो मौन अन्तराल होगा, वह आपके नोटिस में नहीं आएगा| और अगर मैं टेबल लगातार पीटता ही चला जाऊं, तो थोड़ी देर में आपको वो भी सुनाई नहीं देगा|

Monday, 15 July 2019

जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं..

(प्रश्न लम्बा और बहुत ही ज़्यादा व्यक्तिगत था, इसीलिए प्रश्न छोड़कर उत्तर का कुछ अंश आपके साथ share कर रहा हूँ।)
इक्क्यू-अपनी ग़लती को स्वीकारना, इस जगत की बड़ी-से-बड़ी घटनाओं में से एक| यह अघट सदियों में कभी एकाध बार घटता है| अपनी ग़लती स्वीकारना यानि बुद्धत्व की ओर कदम बढ़ाना| 'मेरे साथ जो भी हो रहा है, और जैसे भी हो रहा है, इसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ', यह बुद्धत्व से ठीक पहले की उद्घोष है... इस के बाद बस एक ही घोषणा रह जाती है, 'अहम् ब्रह्मास्मि'| बस बात खत्म हो गई..अपनी ग़लती को स्वीकारना ब्रह्म होने की तैयारी है...! आप अपने पिता की छोड़िये... क्या आप इस बात के लिए अभी तैयार हैं कि अपनी ग़लती को स्वीकार लें...? 'मेरे पिता मेरे साथ जैसा भी कर रहे हैं, उसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ, और-तो-और मेरे पिता जैसे भी हैं, इनके यहाँ जन्म लेने का निर्णय मेरा ही था, चाहे यह बात मुझे पता हो या न हो..', ऐसा कह पाएँगे आप? मिरदाद कहते हैं, "तुम्हारी नाक पर अगर एक मक्खी भी बैठती है, तो वह तुम्हारी मर्ज़ी से बैठती है| जैसे तुम को पता नहीं है कि तुम कैसे खाना पचाते हो, लेकिन तुम ही पचाते हो, तुमको मालूम नहीं कैसे तुम बाल बढ़ाते हो, लेकिन बढ़ाते हो, तुमको मालूम नहीं कि कैसे तुम लहू को नसों में दौड़ते हो, लेकिन तुम ही दौड़ते हो? इसी तरह बहुत कुछ है जो तुम अचेतन रूप से चाह लेते हो, जिसक तुम्हे कुछ पता ही नहीं| तुम्हारे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है, जो तुमने कभी चेतन और अचेतन रूप से नहीं चाहता हो...यह जगत तुम्हारी वासनाओं का विस्तार है|"... मिरदाद ठीक ही कहते हैं... यह जगत हमारी वासनाओं का विस्तार है.. इसे हमने अपनी मर्ज़ी से चुना है... दुःख हमारा चुनाव है, आपके पिता आपके चुनाव है... वह आपके साथ जैसा भी व्यवहार करते हैं, उस व्यवहार को स्वीकार करना या फिर अस्वीरकर करना आपका चुनाव है.. फिर वो गाली दे सकते हैं, गाली आपको लेनी है या नहीं लेनी है यह आपके निर्णय पर निर्भर करता है.. कोई भी इस जगत में आपको आपकी मर्ज़ी के बगैर सुखी या दुखी नहीं कर सकता है.. | 


अब प्रश्न यह उठता है कि अगर सब कुछ हमारा चुनाव ही है, और जो भी हमारे साथ हो रहा है उसको हमने अचेतन रूप से चुना है.. तब तो हम अचेतन रूप से कुछ भी चुन सकते हैं... हम आत्मघात चुन सकते हैं.. फिर इससे मुक्ति कैसे मिले? मुक्ति का मार्ग है..और वह है स्वीकार... जैसे ही आप जो है उसको स्वीकार कर लेते हैं, तो आपकी लड़ने में जो उर्जा खर्च हो रही थी, वह जागरण बनने लगता है... और धीरे-धीरे आप उन सब वासनाओं के प्रति जागने लगते हैं, जिन्हें अब तक आप अचेतन रूप से चाह रहे थे| इसीलिए साधक को जो भी है, उसे बिना किसी शिकायत के अहोभाव के साथ चुनाव करना चाहिए... अगर आपको देखकर कोई गाली देता है, तो सोचना चाहिए मैंने ही चाहा होगा.. दोस्तोवस्की तो यहाँ तक कहते थे कि दुनियां में अगर भी कुछ भी गड़बड़ हो रहा है, गलत हो रहा है, उस सब में आपकी जिम्मेवारी है| ऐसा होना भी चाहिए... हम सब में हैं, और सब हम में है... स्वामी राम कहते थे कि सूरज और चाँद को भी हम ही चला रहे हैं, सब हमारी मर्ज़ी से चल रहे हैं.... | 
जब तक हम अशांत हैं तब तक लोग हमें अशांत करते हैं, जिस दिन बुद्ध की भांति हम स्थिति-प्रज्ञ होकर अंगुलिमाल के सामने खड़े हो जाते हैं, उस दिन अंगुलिमाल ठिटक जाता है, और उसे हाथ से कटार गिर जाता है.. 
सुख और दुःख दोनों में अपने भीतर उस तत्व की तलाश कीजिए जो दोनों से विचलित नहीं होता है... अपने दुश्मन का चुनाव होश पूर्वक करना चाहिए.. क्योंकि जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं... अपने पिता में ज्यादा मत उलझिए अन्यथा अंत में आप उन्ही के जैसे हो जाएंगे...

Sunday, 14 July 2019

चीज़ों को ऐसे देखो मानो तुम उन्हें पहलीबार देख रहे हो


14-जुलाई 2019 
रात 11:30 की पठान कोट से दिल्ली की मेरी ट्रेन थी, ‘धौलाधार एक्सप्रेस”| धर्मकोट से धर्मशाला पहुँचने में 20-से-30 मिनट लगते है| हमारे पास दो विकल्प था| एक हम जिनके यहाँ रुके थे, उन्हीं की टैक्सी से धर्मशाला जाएँ, और दूसरा हम ऑटो से पहले मेक्लोड आ जाएँ, फिर वहां से बस या टैक्सी लेकर धर्मशाला चले जाएँ| दूसरा विकल्प पहले के अपेक्षा बहुत ही सस्ता था| अगर हम धर्मकोट से सीधा टैक्सी लेते हैं, तो उसका भाड़ा होता है 500/- और धर्मकोट से मेक्लोडल का ऑटो से 70 रुपया लगता है, फिर वहां से यदि आप बस से जाते हैं, तो 20 रुपया किराया है, और अगर टैक्सी लेते हैं तो उसका भाड़ा 250/- रुपया है| साफ़ है, हमने दूसरा विकल्प चुना था, लेकिन निकलने से ठीक 30 मिनट पहले हमने अपना इरादा बदला और जिनके यहाँ हम रुके थे उन्ही की टैक्सी में बैठकर बारह बजकर बीस मिनट पर हम धर्मकोट से निकल गए|

ऐन वक़्त पर निर्णय बदलने के पीछे तीन कारण था| एक सुबह से ही लगातार बारिश हो रही थी| बारिश में सामान लेकर ऑटो स्टेंड, जो कि बौद्ध ध्यान केंद्र ‘तुषिता’ के सामने है, तक पहुंचना कवायत हो जाता| दूसरा, शनिवार होने की वजह से ट्राफिक जाम में फसने के भी आसार थे| ऐसा भी हो सकता था कि हमें ऑटो मिलता ही नहीं, क्योंकि रोड जाम होने पर ऑटो को रोक दिया जाता है| धर्मशाला से 2:40 की हमारी बस थी, हमने हिमाचल परिवहन की वेबसाइट से एक दिन पहले ही टिकट बुक कर ली थी| इसीलिए समय से पहले हमें धर्मशाला पहुँच जाना था| तीसरा, 40 दिन तक प्रकाश भाई (बदला हुआ नाम) के यहाँ ठहरने के बाद, उनके टैक्सी से धर्मशाला न जाते हुए, थोड़ा अजीब लग रहा था| सो, ऑर्गेनिक थाली (यह रेस्तरां का नाम है) में नाश्ता करते हुए हमने तय किया की हम प्रकाश भाई की टैक्सी से ही धर्मशाला जाएँगे|
धर्मकोट से निकलने से पहले दिव्या को थोड़ी घबराहट हो रही थी, किसी भी जगह पर लम्बे समय तक ठहरने के बाद, उस जगह को छोड़ने से पहले उसे इस तरह की घबराहट पकड़ लेती है| वो कल कह रही थी, “पहले जब मैं जॉब करती थी, तब सुबह ऑफिस जाने से पहले भी मुझे ऐसी ही घबराहट पकड़ लेती थी, अब तो बहुत कम हो गया है| पहले मेरे पेट में तेज़ दर्द होने लगता था|” मुझे इस तरह की कोई घबराहट नहीं पकड़ती है, लेकिन मन थोड़ा बोझिल जरूर हो जाता है| ऐसे नाज़ुक वक़्त को मैं बहुत ही सजगता पूर्वक जागते हुए जीने की कोशिश करता हूँ| ओशो कहते हैं, “जब कोई तुम्हारा बहुत ही करीबी मित्र तुमसे दूर जा रहा हो, या फिर जब तुम किसी ऐसे जगह को छोड़कर जा रहे हो, जिस जगह से तुम्हे बहुत ही प्यार और लगाव है, तो स्वाभाविक है कि उस क्षण में तुम्हारे मन को अवसाद घेरेगा| तुम दुखी होओगे कि क्या पता अब कभी दुबारा मिलना (या लौट कर आना) हो भी या नहीं| उस क्षण को गंवाना मत, वह क्षण मृत्यु का क्षण है, कुछ है जो छूट रहा है, जो ज्ञात है उससे तुम दूर जा रहे है, यही तो मृत्यु में होगा| ज्ञात छूटेगा और तुम अज्ञात में प्रवेश करोगे| इन क्षणों में जागो| इन्ही छोटे-छोटे क्षणों में जागते-जागते तुम एक दिन मृत्यु के लिए तैयार हो पाओगे|” तो, ऐसे क्षण मेरे लिए साधना के क्षण होते हैं| पीछे जब मास्टर उगवे और राव साहब जा रहे थे, तब भी ऐसा शुभ क्षण आया था| ऐसे क्षण रोज़ ही हमारे जीवन में आते रहते हैं| जब भी नोन को छोड़ कर अनोन में जाना होता है, मन कंपता है| मन हमेशा ‘अज्ञात’ व नए से घबराता है| इसी घबराहट की वजह से बहुत से लोग, कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल घुमते हुए जीवन को घसीटते रहते हैं| विज्ञान भैरव तंत्र में शिव का एक ऐसा ही सूत्र है, वह सूत्र भी मुझे बहुत पसंद हैं| शिव कहते हैं, On joyously seeing a long absent friend permeate this joy”. पहला सूत्र अगर मृत्यु का अभ्यास है, तो यह सूत्र जीवन का अभ्यास है|

रास्ते में सिर्फ एक जगह, मेक्लोड से थोड़ा पहले, हमें ट्राफिक जाम का सामना करना पड़ा| गाड़ी में, मैं आगे की सीट पर प्रकाश भाई (गुजरात में रहने की वजह से नाम के पीछे ‘भाई’ लगाने की आदत पड़ गई है) के बगल में बैठा था, और दिव्या पीछे सामान के साथ बैठी थी| ‘हमारा 20 तक रुकने का प्लान था, लेकिन परसों इंडक्शन ख़राब हो गया, इसीलिए हम आज ही निकल रहे हैं’, मैंने प्रकाश जी से कहा| “अरे.. आपने मुझे क्यों नहीं बताया,” प्रकाश जी हमसे कहने लगे, “मैं आपको गैस दे देता, या फिर आप हमारे किचन में खाना बना लेते”, बोलते हुए उन्होंने आगे वाली गाड़ी को रास्ते देने के लिए अपनी गाड़ी को पीछे लिया| एकबार को मुझे लगा कहीं ये हमें घर वापिस तो नहीं ले जा रहे हैं| मैंने गर्दन घूमा कर पीछे दिव्या को देखा, वो आँखे बड़ी करके मुझे देख रही थी, मानो कह रही हो, “मैंने तुम्हे पहले ही कहा था, एक बार बात करके देख लो, क्या पता कुछ जुगाड़ हो जाए|” मैंने झट से गर्दन सीधी कर ली| ‘मैंने पहले ही कहा था’ दिव्या का पसंदीदा तकियाकलाम है| लालबुझकर की तरह इसको पहले से ही सब पता होता है| हालाँकि, जब भी कोई निर्णय लेने की बात होती है, तो इसका जुमला होता है, “तुम देख लो, जैसा ठीक लगे”|

हम 12:45 पर, बस की समय से करीब दो घंटा पहले, धर्मशाला पहुँच गए| घर से जल्दी निकलने का हमारा निर्णय गलत साबित हुआ| और टैक्सी से आने का निर्णय तो और अभी ज्यादा| जब हम धर्मकोट से निकल रहे थे, तब बारिश भी थम गई थी| और जब हम टैक्सी से तुषिता के पास से गुजर रहे थे, तब हमने एक लाइन से 6 ऑटो को एक साथ खड़ा देखा| खैर, अब कुछ भी नहीं किया जा सकता था| कोई भी निर्णय लेने से पहले कोई यह कैसे तय करे कि वह जो निर्णय ले रहा है वही सही ही होगा, There is no means of testing which decision is better; because there is no basis for comparison. We live everything as it comes, without warning, like an actor going on cold. And, what can life be worth if the first rehearsal for life is life itself?”  पिछे लौटकर, दिव्या की तरह, सही गलत का फैसला करना बहुत आसान है| लेकिन, जीवन में सही और गलत दोनों ही संयोग की बात है| और बहुत गहरा देखा जाए तो, जीवन में न तो कुछ सही होता है, न ही गलत| क्योंकि दोनों के लिए जो आधार चाहिए वह है ‘शुरूआत और अंत’| और जीवन में से यही दोनों चीज़ गायब है| किसी उपन्यास के बीच के 100 पेज पढ़कर आप किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँच सकते हैं| निर्णय लेने के लिए शुरुआत और अंत जानना अपरिहार्य है| जीवन घटनाओं का अनंत प्रवाह, और सब कुछ एक दूसरे पर पारस्परिकरूप से निर्भर है, लाओत्से कहा करते थे, 'जब तुम यहाँ एक पत्ता तोड़ते हो, तो उसकी झानाहट को वो जो दूर आकाश में तारे तुम्हे दिख रहे हैं, वे भी महसूस करते हैं|, ऐसे में किसी भी निर्णय पर पहुंचना असंभव है| इसीलिए, जिन्हें पूरे सत्य का पता होता है, वे कभी निर्णय नहीं देते हैं|

धर्मशाला से पठानकोट पहुँचने में करीब तीन घंटा लगता है| और हमारी ट्रेन 11:30 की थी, इसलिए हमने सोचा था की पांच बजे के करीब हम धर्मकोट से निकलेंगे, और फिर 6 के आसपास धर्मशाला से बस लेकर पठानकोट जाएँगे| लेकिन परसों सुबह जब मैंने हिमाचल परिवहन का वेबसाइट चेक किया तो पाया कि दो बजकर चालीस मिनट पर धर्मशाला से पठानकोट की आखरी बस है| इसका मतलब अगर हम धर्मकोट से शाम को निकलने की सोचते, तो हमें सीधा धर्मकोट से पठानकोट की टैक्सी करना पड़ता, जिसका भाड़ा करीब 45,00 होता| यह ऐसा ही होता जैसा हमारे यहाँ कहते हैं, “जतेक के बोहु’अ नै, तते के लहठी” (जितने की पत्नी नहीं उससे ज्यादा का उसका गहना)| इसलिए अब दो घंटे धर्मशाला में, और करीब 6 पठानकोट में बैठकर इंतज़ार करने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था|
प्रकाश जी के टैक्सी से उतरने के बाद हम बस स्टैंड से थोड़ी दूर रास्ते के किनारे बने लोहे के बैंच पर बैठने चले गए| बैठने से पहले हमने सुनिश्चित किया कि आसपास बारिश से बचने की कोई जगह है भी या नहीं| पास ही रोड के उस तरफ हमें एक घर दिख गया| तेज़ बारिश में हम वहां भाग कर जा सकते थे| लोहे के दो बैंच बने हुए थे, एक टूटा हुआ था और दूसरा थोड़ा दुरुस्त| टूटा हुआ बैंच काफी पुराना हो चला था| लोहे पर जंग लगना शुरू हो गया था| आधा से ज्यादा बैंच जंगली लताओं से घिरा हुआ था| दूसरा बैंच हरे रंग से पुता हुआ था और पहले की तुलना में काफी अच्छी हालत में था| टूटे हुए बैंच पर हमने अपना सामान रख दिया| और हरे रंग वाले बैंच को पेपर से पोछकर उस पर बैठ गए| सामने हिमालय का उतुंग शिखर दिख रहा था| जाने से पहले मैं अपनी आँखों को हिमालय की अलौकिक सौन्दर्य से भर लेना चाहता था| संयोग ऐसा था कि ठीक दस दिन पहले मैं इसी बैंच पर राव साहब के साथ बैठा हुआ था| उनकी बस सुबह 7:50 की थी, मैं उन्हें छोड़ने आया था| उस दिन हम एक घंटा पहले पहुँच गए थे| यहीं बैठकर हमने अपने तीन महीने के तवील सफ़र का आखरी घंटा बिताया था| समय बीतते देर नहीं लगती है, “दिवस जात नहिं लागिहि बारा”|

छः बजकर दस मिनट पर हम पठानकोट पहुंचे| जब हम बस स्टेंड में घुस ही रहे थे, तभी हमें दाहिनी ओर ‘कार्निवल’ सिनेमा दिख गया| बस से उतरते ही हम सीधा सिनेमा हॉल पर पहुँच गए| दिव्या ने पहले से सिनेमा देखने के मन बना रखा था| अक्टूबर टूर के दौरान जब मैंने सोशल मिडिया से दूरी बनाई थी, तब से मैंने सिनेमा देखना भी बंद कर दिया था| इस बीच सिर्फ दिल्ली में ही गोविन्द के साथ ‘गल्ली बॉय’ देखा था| उसके बाद धर्मकोट छोड़ने से पहले एक शाम हमने ‘दिल तो बच्च्चा है जी, और आखरी शाम ‘चश्मे बद्दूर’ (पुराना वाला) लैपटॉप पर देखा था| माफ कीजिए कुछ दिन पहले तुषिता के प्रभाव में आकर दलाई लामा की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘कुनदून’ भी देखी थी| 6:50 पर ‘सुपर 30’ शुरू होने वाला था|
टिकट बुक करने से पहले मैंने सामान का कन्फर्म कर लिया था, आपका लैपटॉप ऑफिस में जमा हो जाएगा, और बांकी सामान गार्ड अपने पास रख लेगा| पैसा और कार्ड आप अपने साथ अन्दर ले जा सकते हैं” मैंने दो टिकट कटाया और फिर सामान गार्ड को सुपुर्द करके खाने के लिए कुछ ढूंढने बाहर निकल गया| सुबह जो ऑर्गनिक थाली पर हमने नाश्ता किया था, उसके बाद अभी तक हमने कुछ नहीं खाया था| बाहर कुछ ही दूरी पर हमें एक जूस वाला दिख गया|
फिल्म अच्छी थी, लेकिन ऋतिक की एक्टिंग से मैं प्रभावित नहीं हुआ| डायरेक्शन भी मुझे थोड़ी कमज़ोर लगी| इतनी अच्छी कहानी थी, क्या कुछ नहीं किया जा सकता था, लेकिन ख़राब डायरेक्शन, पुअर स्क्रिप्ट और ऋतिक की कमज़ोर एक्टिंग की वजह से सब गोबर हो गया| खैर, सेकंड हाफ में फिल्म थोड़ी ग्रीपिंग है| हॉल से निकलने के बाद हम रेलवे स्टेशन का पता करने लगे, अभी घड़ी में 9:20 बज रहा था| हालाँकि टिकट बाबु ने हमें बताया था कि स्टेशन पास ही है, पैदल जाया सकता है| लेकिन फिर भी किधर है, और कैसे जाना है, यह हमें नहीं पता था| मैं एक दूकानदार से स्टेशन का पूछ ही रहा था कि एक ऑटो वाला आ गया, और कहने लगा, “बैठीये 20 रूपये में हम छोड़ देंगे”| हमने सोचा पता नहीं कितना चलना पड़े, सामान भी कम नहीं है, बैठ ही जाते हैं| हमारे ऑटो में बैठने के 20 सेकेण्ड बाद ही ऑटो वाला एक जगह गाडी रोक कर बोला, ‘वो रहा स्टेशन’| ऐसा हादसा हमारे साथ एक दो बार और घट चुका है|
स्टेशन पहुँचने के थोड़ी देर बाद, मैंने खाना दूंढने के लिए निकला| पठान कोट बहुत ही छोटा स्टेशन है| पुरे स्टेशन पर सिर्फ चार दूकाने हैं, एक सरकारी भोजनालय, जिसमे छोले भटूरे के अलावा और कुछ भी नहीं मिलता है, एक किताब घर, एक अमूल पारलर, और एक छोटा शॉप जिसमे पैकेट बंद चीज़ें मिलती है| मैं सकारी दूकान से हल्दीराम का एक चिप्स लेकर आया, दिव्या ने खाने से इंकार कर दिया| थोड़ी देर बाद मैं स्टेशन से बाहर खाना ढूँढने निकला| रोड किनारे दो ढाबा दिखा, भीड़ काफी थी उनके यहाँ, लेकिन रोटी की शक्ल देखकर ही लगा की यहाँ सही खाना नहीं मिलेगा| थोड़ा आगे बढ़ने पर मुझे एक और ढाबा दिखा, लेकिन वहां की हालत भी मुझे ठीक नहीं लगी| थोड़ा और आगे बढ़ने पर मैंने एक दवाई दूकानदार से पूछा, ‘यहाँ आस-पास सही खाना कहाँ मिल जाएगा|’ “थोड़ा और आगे जाइए बाएँ में ‘खालसा हिन्दू ढाबा’ है, वहां आपको सही खाना मिल जाएगा, हम भी वही से खाते है”, हाथ से आगे की ओर इशारा करते हुए दुकानदार ने मुझसे कहा| 100 कदम चलने के बाद ढाबा आ गया| काफ़ी बड़ा ढाबा था| गेट पर दो गार्ड खड़े थे| अन्दर पंहुचा तो काउंटर पर दो सरदार जी खड़े हैं| हॉल में कोई 25 स्थानिए निवासी बैठकर खा रहे थे| मैंने अपना आर्डर दिया और वही पास लगे चेयर पर बैठकर इंतजार करने लगा| 20 मिनट बाद मेरा खाना तैयार होकर आया| भुगतान करने के बाद, मैं तेजी से स्टेशन की और भागा| 11 बजने में अभी कुछ मिनट बांकी थे|
जब मैं स्टेशन पर पहुंचा तो देखा, दिव्या बेसब्री से खाने का इंतजार कर रही थी| वह गर्दन टेढ़ी करके बार-बार जिस गेट से मैं खाना लाने गया था, उस गेट की ओर देख रही थी| मैं दूसरी गेट से वापिस आया था, इसीलिए उसे पीछे से देख सकता था| उसके पास पहुँच कर मैंने पीछे से उसके सिर को हल्के से छुआ| वह चौंकते हुए पीछे मुड़ी और मेरे हाथ में खाने की थैली देखकर अकाल के कव्वे की तरह खुश हो गई| खाने को लेकर जैसी दीवानगी मैं इसमें और मास्टर उगवे में देखता हूँ, वैसी मैंने आज तक किसी में नहीं देखी है| सुबह का नाश्ता करते समय ही मास्टर उगवे रात के खाने में क्या खाना यह तय करने बैठ जाते थे| उनके खाऊँपन से हम इतने परेशान हो गए थे, जब वे हमारे पास से गए, तो उनकी जाने की ख़ुशी में हमने एक दिन का उपवास रखा था| खाने के मामले में मेरे मरहूम मित्र धर्मेद्र स्वामी बहुत अच्छे थे| हालाँकि मरने से कुछ दिन पहले खाने को लेकर उनका रवैया भी थोड़ा बदल गया था| जैसे मास्टर उगवे खाने के दीवाने हैं, वैसे ही धर्मेद्र स्वामी न खाने के दीवाने हो गए थे| कुछ लोग उनकी इसी दीवानगी को उनके मौत का जिम्मेवार मानते हैं| हालाँकि  मैं इस आम-राय से जरा भी इत्तेफाक नहीं रखता हूँ| मैं आज भी मानता हूँ कि उनकी मौत बंदगी करते वक़्त हुई थी| भक्त आदमी थे, भाव में आकर जान दे दिये| खाने के मामले में राव साहब का मामला थोड़ा ठीक है, लेकिन नमकीन और भजिये के प्रति उनकी दीवानगी अनूठी है| खाने को लेकर मेरा मामला भी गड़बड़ ही है| मीठा मेरी कमज़ोरी है| और अगर घर में मेरे पसंद की कोई चीज़ रखी हो, तो जबतक वह खत्म न हो जाए, मुझे चैन नहीं पड़ता है|
खाना खाने के बाद हम लोग ट्रेन में आकर बैठ गए| अभी ट्रेन खुलने में 15 मिनट का समय था| खाना खाने के बाद दिव्या का अमूल से आइस-क्रीम खाने का मन था, मैंने मना कर दिया| इसीलिए वह मुंह बनाकर बैठी थी| लेकिन मुझे मलाल नहीं था| ऐसी जिद को मैं नहीं समझ पाता हूँ, “मैं तभी खाऊँगी जब तुम भी खाओगे”| (इस जुमले का असली अर्थ यह है- क्योंकि अगर तुम नहीं खाओगे तो तुम मुझे सुनाओगे, तो इससे अच्छा है कि मैं नहीं खाती हूँ, और अगले तीन महीने तक तुम्हे सुनाती रहूंगी)| मैं अपने बैग से टॉलस्टॉय की ‘War and Peace’ निकालकर पढ़ने लगा|
जब भी सुबह साढ़े पांच के आसपास मेरी आँख खुलती है, और ऐसा करीब-करीब रोज़ होता है, तो मुझे आश्रम की याद आ जाती है| सुबह सक्रीय ध्यान की म्यूजिक चलाने के लिए मुझे रोज़ 5:30 पर उठाना पड़ता था| वह आदत आज भी कायम है| जब गावं में था, तब भी इतने बजे ही उठ जाया करता था| दरभंगा, दिल्ली और मुंबई के निवास के दौरान सोने और जागने के समय में काफी हेर-फेर हो गया था| मुंबई में रात के 3-4 बजे सोता था, और दिन के 1 बजे उठता था| बहुत बेकार हो गया था सब कुछ| जैसे ही मेरी आँख खुली मैंने सामान चेक किया| सब कुछ अपनी जगह पर मौजूद था| सिर्फ एक-दो लोग जागे थे, और बांकी सब सो रहे थे| मैंने अपना फ़ोन ऑन किया, वैसे इन दिनों मैं 10 बजे से पहले फोन ऑन नहीं करता हूँ, चूँकि कल यात्रा में था इसलिए ख़ुद को थोड़ी रियात दे दी| अन्यथा, आजकल मैं 4 आर्य कर्मों का पालन कर रहा हूँ| जबतक मेरे सुबह के तीन आर्य कर्म पूरे नहीं हो जाते हैं मैं फोन या लैपटॉप ऑन नहीं करता हूँ| (वो 4 आर्य कर्म क्या हैं, इसका जिक्र किसी दुसरे लेख में तफसील से करूँगा)| मोबाइल ऑन होने पर पता चला सुबह के 5:40 बज रहे थे| मैंने अपनी सीट से उतर कर नीचे आ गया और खिड़की के बहार का नज़ारा देखने लगा| पंजाब की सुबह बहुत ही हसीन थी| एक सरदार जी को पिली पगड़ी बाँध कर धान के खेत में टहलते देखकर बहुत कुछ याद आ गया|
दस बज कर बीस मिनट पर ट्रेन सराय रोहिल्ला पहुंची| स्टेशन से बाहर निकल कर हमने ओला बुक किया| और 11:15 पर हम अपने निवास स्थान पर पहुँच गए| इस बार मैंने पहाड़ पर ही तय कर लिया था कि दिल्ली को ऐसे देखूंगा जैसे ज़ोरबा दुनिया को देखता था, “लोगों और चीज़ों को ऐसे देखो मानो तुम उन्हें पहलीबार देख रहे हो” (नोट-विज्ञान भैरव तंत्र के एक सूत्र में शिव पार्वती से ऐसे ही जगत को देखते के लिए कहते हैं- See as if for the first time A beauteous person Or an ordinary object.”) रास्ते में सबकुछ नया-नया दिख रहा था| दिल्ली इससे ज्यादा खूबसूरत कभी नहीं दिखी थी| पूरे रास्ते को मैंने अलग ही ढंग से एन्जॉय किया| अपने निवास स्थान पर पंहुचा तो दो नए मेहमान, एक मिलान कुण्डेरा की ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ और दूसरी गाबरीयल गर्सीया मारकेस की ‘वन हण्ड्रेड यर्स ऑफ़ सॉलीत्युड’ बेड पर बंद पैकेट में मेरा इंतजार कर रहे थे| अभी 5 दिन पहले ही अमेज़न से मैंने इन्हें मंगाया था| पहाड़ पर मंगा नहीं सकता था, इसीलिए अपने अगले ठिकाने पर इन्हें मंगा लिया था| आते ही सबसे पहले मैंने रवायत के हिसाब से किताबों को पैकेट से निकाला और उन पर साइन किया|
खाना खाने के बाद थोड़ी देर सोया, फिर दोनों किताब को अलट-पलट कर देखने लगा| ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ की पहली ही लाइन पढ़कर मैं आगे पढ़ने से ख़ुद को रोक नहीं पाया| हालाँकि मैं ऐसा नहीं करना चाहता था| धर्मकोट पहुँचते ही ‘वार एंड पीस’ शुरू किया था| लेकिन दो दिन बाद तुषिता की लाइब्रेरी में ‘तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाईंग’ दिख गई| उसको समाप्त किया फिर रमण महर्षि ‘बी एज़ यू आर’ पढ़ने लगा| अब सोचा था कि जबतक इस 1400 पेज की ग्रन्थ को समाप्त न कर लूं, दूसरी कोई किताब बीच में शुरू नहीं करूँगा| लेकिन आज फिर फिसल गया| ‘अनबेरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ की अभी तक 50 पेज पढ़ी है, आई लव दिस बुक, अब इसको समाप्त किए बगैर नहीं रह सकता हूँ| ऊपर जो आपके साथ अंग्रेजी में एक कोट शेयर किया है, वह इसी किताब से है (There is no means of testing which decision is better; because there is no basis for comparison. We live everything...)| चालीस दिन पहाड़ पर बिताने के बाद मैं सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकता था कि दिल्ली में मेरा पहला दिन इतना अच्छा बीतेगा| इससे पहले जब भी दिल्ली आता था दिन आपाधापी में ही बीत जाता था|


ख़त- #3 राव साहब की शाश्वत बीमारी का सनातन इलाज

प्रिय आत्मन, 
[28 June, 2019]
कल राव साहब ने एक नई बात बताईज़ुकाम की वजह से मेरा पेट ख़राब हो गया है।  क्या ग़ज़ब की बात कही! कल से ही इस बात को सोच-सोच कर मैं सिर और दाढ़ी खुजा रहा हूँ।( मुझे इस तरह से सिर खुजाता देखदिव्या को लग रहा है कि शायद मैं डैन्ड्रफ की वजह से इतना सिर खुजा रहा हूँ। वह सुबह से मुझे चार बार डैन्ड्रफ का इलाज बता चुकी है। अब उसको क्या बताऊँ कि खुजली के इस भयंकर उत्पात का कारण डैन्ड्रफ नहीं हैयह दिमाग़ी चक्कर का असर है। ख़ैरजो चीज़ जिसके पास नहीं होउस चीज के बारे उससे बात करना मैं ठीक नहीं समझता हूँ)
पेट ख़राब का ज़ुकाम से मुझे कोई भी संबंध नहीं दिख रहा है। उनका कहना है कि,”जिस बेक्टीरिया की वजह से मुझे ज़ुकाम हुआ हैलूज़ मोशन के ज़रिए शरीर उसे बाहर फ़ेक रहा है। यह मैं पहली बार सुन रहा हूँ। उनका ज़ुकाम भी मुझे समझ नहीं आता हैन तो नाक से पानी बह रहा हैन ही तीन दिन में एक बार भी उन्होंने छींका है। इतनी ठंड में लूज़ मोशन का होना भी मुझे बड़ा असंभव-सा लगता है। इस मामले में राव साहब मुझे कोई बहुत बड़े कलाकार मालूम पड़ रहे है।
कल सुबह पानी भरते समय कहने लगेइस वीराने अब मेरा मन नहीं लग रहा हैलगता है मुझे बुख़ार हो गया है।” मैं सुनकर बड़ा हैरान हुआ। सुबह-सुबह राव साहब क्या अलबल बोल रहे हैं। मन नहीं लगने का बुख़ार से क्या संबंध है। और धर्मकोट वीरान कब से हो गया।  मुझे कुछ शक हुआ मैंने कहालाइए अपना हाथ दिखाइएदेखूँ बुख़ार है भी या आप यूँ ही माहौल बना रहे हैं। कहने लगेबुख़ार हाथ से नहीं माथा छूकर देखा जाता है। मैंने कहाठीक है माथा ही छू लेते हैं।  मैंने माथा छूकर देखाकोई बुख़ार नहीं था। कहने लगेआपको बुख़ार देखना आता ही नहीं है।  मैंने कहाबच्चूमेरे पास आपकी इस मनरोग का भी इलाज है। मैं झट अपने कमरे से थरमामीटर निकाल लाया। बुख़ार जाँचकर देखा 97.7 निकला। उनका चेहरा उतर गया। मुझे भांति-भांति का (कु)तर्क देकर यह समझाने की कोशिश करने लगे कि बुख़ार न होने के बावजूद भी उन्हें बुख़ार जैसा क्यों लग रहा है। मैंने उनसे कहादेखिए राव साहबसौ बात की एक बात अगर मास्टर उगवे जैसा अनुभवी और बुज़ुर्ग आदमी किसी को बबूचक’ बोलता हैतो ऐसे ही मुँह उठाकर कुछ भी नहीं बोल देता। कुछ आगे पीछे का सोच कर बोलता है। आज से आप मेरी नज़र में भी बबूचक’ ही हैं। मेरी बात सुनकर थोड़ी देर तक मुँह लटकाए बैठे रहेफिर उठकर अपने कमरे में चले गए। और अंदर से गेट बंद करके लड़कियों से चैट करने लगे। 
डीजी को जब राव साहब की बीमारी के बारे में लिखातो उन का जवाब आया राव साहेब की यह पुरानी बीमारी हैवह जो चाहते हैअगर वह नहीं हो पाता हैतो वह बीमार पड़ जाते है। मुझे लगता है इस बार इनकी बीमारी की वजह प्रेमिका का न मिलना है।” मुझे डीजी की बातों में थोड़ी सच्चाई नज़र आती है। अभी दो दिन पहले ही मैंने मेहुल के ख़त का जवाब देते हुए लिखा था‘कल का पूरा दिन Salvation Cafe में किताब (तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाइंग) पढ़ते हुए बितायासुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना वहीं खायायह कैफ़े ज़ोस्टल वाले चलाते हैखाना और कॉफ़ी दोनों बहुत सही था(सैल्वेशन कैफ़े की कॉफ़ी से याद आया। दो दिन पहलेशुक्रवार को, Joy food पर जो कॉफ़ी पी थी उसकी वजह से सुबह पाँच बजे तक सो नहीं पाया था। कुछ अलग ही तरह का कैपेचीनो पिला दिया था। ऊपर साबुन के जैसा झाग थाऔर नीचे पेंदी में एक इंच मोटा खड़ा कॉफ़ी बीन। पैसा लगा था इसीलिए जैसे-तैसे निगल गया था| वर्ना, कॉफ़ी गिलोई के जूस से कम न था)
वहां कैफ़े के काउंटर पर जो लकड़ी बैठी थीउससे बात-चीत की तो पता चला कि वह वहां वालंटियर हैदिन में ४-५ घंटा काम करना होता हैउसके बदले रहना और खाना फ्री होता है|उसी से पता चला की भारत और नेपाल को मिलाकर ज़ोस्टेल के कुल 38 ब्रांच हैं (नेपाल में दो ब्रांच है, एक काठमांडू और दूसरा पोखरा में। धर्मकोट के अलावा Zostel का दूसरा ब्रांच हमने खजुराहो में देखा था)वह लड़की दिल्ली से थीकमला नेहरु कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक करके यहाँ थोड़ा समय बिताने आई हैहमेशा की तरह इस बार भी राव साहब को कल उससे एकतरफ़ा प्यार हो गयाअब परसों से वे उसके चक्कर में ज़ोस्टल में रहने जा रहे हैं| ” लेकिन अफ़सोसअपनी अनोखी बीमारी की वजह से शायाद अब उनका जोस्टल जाना संभव नहीं हो पाएगा। 

पुनश्च- आज सुबह राव साहब को तिब्बतन हॉस्पिटल ‘DELEK’ ले गया था| खून और स्टूल जांच करके डॉक्टर ने बता कि कुछ गड़बड़ खा लेने की वजह से पेट में इन्फेक्शन हो गया है| उम्मीद है, कल तक ठीक हो जाएँगे, और शुक्रवार को Zostel जा पाएँगे|
आज जब मास्टर उगवे को राव साहब की बीमारी के बारे में बताया तो उनका कमेंट आया, “राव एक नंबर का ढकोसलाबाज़ है, कोई तबियत ख़राब नहीं है इसकी... प्रेम नहीं मिलने के कारण यह बौरा गया है|”

पुनश्च- अभी-अभी डीजी का मेल आया है, “राव साहेब से जब मैंने कल वीडियो कॉल पर बात की तो उनके हाथ में मैंने ORS के दो पाउच देखे। उससे मुझे अंदाजा आया की शायद उनको दस्त हो गए है।पर तुरंत मुझे आभास हुआ की मेडिकल साईन्स भले ही इसे दस्त लगना कहती होपर मेरे ख़याल में वह दस्त नहीं हैबल्किप्रेमिका के अभाव में जो स्ख(beep).. आगे से नहीं हो पाया और दमित रह गयावही reservior के उन्माद ने अपना निकलने का कोई और ही मार्ग खोज लिया। ख़ैरहकीकत क्या हैवह तो राव साहेब जाने।“

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...