Friday, 1 November 2019

जवाब दुःख की जननी है (महा-प्रयोग डे-3)

इस बार, मुंबई से रोज़ चालीस मिनट वाक करना, दाहोद से दोपहर को खाने के बाद सोना, और मेहसाणा से खाली बैठना सीख कर लौटा हूँ| महाप्रयोग के पहले दो दिन सुबह-सुबह वाक करने के लिए सिटी फारेस्ट गया था| लेकिन आज नहीं गया| ख़बर की माने तो दिल्ली में प्रदूष्ण का लेवल बहुत ही ज्यादा बढ़ गया है| कल वाक से आने के बाद मुझे भी बड़ा अजीब-सा फील हो रहा था-सर भारी हो रहा था, और सांस लेने में भी दिक्कत महसूस कर रहा था| इसीलिए आज से वाक के लिए जाना बंद कर दिया है| पुराने दिनों में लोगों ने जिस नर्क की परिकल्पना मरने के बाद आसमान के किसी सातवें लोक में की थी, उस नर्क को हमने शहरों के रूप में जमीन पर उतार लिया है| 
  
आज प्रयोग का तीसरा दिन है| कल का दिन अच्छा गुजरा| फोन समय पर ऑन और ऑफ किया था| रात सोने भी टाइम पर चला गया था| अगर कहीं कुछ चूका तो वो खाने में, परसों की तरह कल भी एक बार बिना चीनी की चाय पी| वैसे मैं कभी चाय नहीं पीता हूँ, मुझे कॉफ़ी पसंद है, पर पता नहीं क्यूं मैंने कल ख़ुद ही दिव्या से चाय बनाने को कहा| चाय पीने के बाद मैं घंटो सोचता रहा कि ऐसा मैंने क्यों किया? लाख कोशिशों के बाद भी मैं कोई ठोस जवाब नहीं ढूढ़ पाया| वैसे जवाब ना पाकर मैं काफी खुश था| अगर कोई जवाब मिल जाता तो शायद मैं दुखी हो जाता| मैं जीवन में सिर्फ उन्ही चीज़ों को लेकर दुखी होता हूँ जिसका जवाब मिल जाता है| उसके मामले में भी ऐसा ही हुआ था| जब वो एक दिन अचानक मुझे छोड़ कर चली गई, तो कुछ दिनों तक मैं बड़ा हैरान रहा था| उसका यूं अचानक बिना कुछ बताए चले जाने की वजह ढूंढता रहा| काफी दिनों तक मुझे कोई वजह नहीं मिली| महीनों तक उसका जाना मेरे लिए रहस्य बना रहा| मैं बहुत ही खुश था| इसलिए नहीं कि वह मुझे छोड़कर चली गई, बल्कि इसलिए कि मैं उसके जाने की कोई वजह नहीं ढूंढ पाया| फिर एक दिन मुझे वजह मिल गई- मेरे पास पैसे नहीं थे, और ना ही मैं पैसे कमाना चाहता था, इसलिए वो मुझे छोड़कर चली गई| फिर मैं बहुत दुखी हो गया| इसलिए नहीं कि वो मुझे पैसों की वजह से छोड़ कर चली गई, बल्कि इस लिए कि वो मुझे छोड़ कर चली गई| मुझे छोड़ कर वो जिस व्यक्ति के पास गई वह मुझसे भी ज्यादा गरीब और दरिद्र था| लेकिन वह उसके साथ खुश थी क्योंकि वह ढेर सारा पैसा कमाना चाहता था| असली सवाल 'चाह' का था| उन दिनों अगर मैंने कबीर को नहीं पढ़ा होता, तो शायद वह मुझे कभी छोड़कर नहीं जाती, 

"चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह । जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह|"-कबीर 

मुराकामी को पढ़ना काफी अच्छा लग रहा है| मेरा अनुमान सही था, मुराकामी के बारे में मैंने जैसा सोचा था वे वैसे ही निकले| मुराकामी की 'नोर्वेगैन वुड' के अलावा मेरे टेबल पर इन दिनों पांच और किताबें हैं-गीत चतुर्वेदी की 'न्यूनतम मैं, और सावंत आंटी की लड़कियां', लिओ तोल्स्तोय की 'वॉर एंड पीस', गोर्की की 'मदर', और निर्मल वर्मा की 'वे दिन'| इन पांच किताबों के अलावा टेबल एक और किताब है जो गिफ्ट रैप के अंदर बंद है| इस किताब को मैंने 'नोर्वेगैन वुड' के साथ मनवाई है| यह किताब दिव्या को उसके बर्थडे के दिन गिफ्ट दूंगा| दिव्या को उसके हर बर्थडे पर एक किताब गिफ्ट देता हूँ| अक्सर यह वो किताब होती है, जो मुझे पढ़नी होती है| 
इन छः किताबों के अलावा टेबल पर एक डायरी और दो पेन भी  हैं| यह डायरी और कलम उम्मेद स्वामी ने मुझे इस बार मेहसाणा में उपहार स्वरूप दिया| डायरी बहुत ही सुंदर है-ऊपर चमड़े की कवर है, और भीतर हैण्डमेड पेपर हैं| कलम भी मेरे पसंद की है| जबसे दिल्ली आया हूँ रोज़ कुछ-न-कुछ डायरी में लिख रहा हूँ| बहुत दिनों बाद कलम से लिखना बहुत ही सुखद लग रहा है| हालाँकि आदत छूट जाने की वजह से जल्दी ही उँगलियाँ दुखने लगती है|

पूरा दिन घर पर बैठा रहता हूँ, प्रदुषण की वजह से कहीं आने-जाने का मन नहीं करता है| कल शाम सोचा था कि पीवीआर पर कॉफ़ी पीने जाऊं, पर फिर यह सोच कर रुक गया कि वहां दूध वाली कॉफ़ी पीना पड़ेगा| बाहर की ब्लैक कॉफ़ी बहुत ही खरनाक और कड़वी  होती है| दो बार इस कड़वे अनुभव से मैं गुज़र चुका है| एक बार दो साल पहले अमोल स्वामी के साथ देहरादून में और अभी दिवाली पर पुष्कर में उम्मेद स्वामी के साथ|
पुष्कर घाट से ही लगा एक कैफ़े है 'मामासीता कैफ़े'| पुष्कर पहुँचने के बाद हम (उम्मेद स्वामी और मैं) थोड़ी देर घाट पर बैठकर बाते करते रहे| थोड़ी देर बाद हमें नींद आने लगी| हम घाट पर से उठ कर कैफ़े में आ गए|
'आप क्या लेंगे?' उम्मेद स्वामी ने मुझसे पूछा| 'लेना तो मैं ब्लैक कॉफ़ी चाहता हूँ, लेकिन ये लोग बहुत कड़वा बनाते हैं| एक बार मैंने देहरादून में अमोल स्वामी के साथ पी थी, नानी याद आ गई| चार लोटा गर्म पानी मिलाने के बाद भी वो कॉफ़ी ब्लैक से ब्राउन नहीं हुई|", मैंने उनसे मेन्यु देखते हुए कहा| "यहाँ ऐसा नहीं होगा, मैं उनसे बोल देता हूँ, आप के लिए बढियां लाइट कॉफ़ी बना देंगे|", मेरा डर दूर करते हुए उम्मेद स्वामी बोले| वेटर को बुलाकर उन्होंने मेरे लिए एक 'लाइट' ब्लैक कॉफ़ी और अपने लिए एक मसाला चाय आर्डर दिया| 
दस मिनट बाद वेटर कॉफ़ी लेकर आया है| कॉफ़ी एक ब्लैक थर्मस में बंद था| थर्मस में साथ वह एक सफेद कप-प्लेट और ब्राउन सुगर के कुछ पैकेट रख गया| उम्मेद स्वामी की चाय आने में अभी टाइम था| "भाई, ये गाना बदल कर कोई कैलासिक्ल सॉफ्ट म्यूजिक लगा दो", उम्मेद स्वामी ने वेटर से कहा| मैंने थर्मस से कॉफ़ी कप में उड़ेला, कप बहुत ही प्यारा था| कॉफ़ी का रंग देख कर मेरे चेहरे का रंग उड़ गया| मेरा अनुभव कहने लगा-यह कॉफ़ी बहुत ही खतरनाक  है| लेकिन फिर बुद्धि ने कहा-क्या पता बस ब्लैक दिख रहा हो, हो लाइट ही| मैंने आधे कप को कॉफ़ी से भरा, फिर उसमे दो पैकेट चीनी डाला-अगर कड़वा हुआ तो चीनी से थोड़ी कड़वाहट कम हो जाएगी| दो मिनट बाद मैंने पहला सिप लिया- याआआआक्क्क....!! गिलोई के जूस से भी ज्यादा कड़वा था ...येंआआआ...! दवाई की तरह जैसे तैसे मैंने उसको खत्म किया है| फिर उम्मेद स्वामी ने वेटर से कह कर दो कप गर्म पानी मंगवाया| थर्मस में गर्म पानी आया| मैंने पानी से अपने कप को भरा, फिर कॉफ़ी वाले थर्मस से दो बूँद कॉफ़ी उस पानी में डाला| कॉफ़ी वाले थर्मस में अभी जितना कॉफ़ी था उससे कम-से-कम मैं बीस कप कॉफ़ी अपने लिए तैयार कर सकता था| बचे हुए गर्म पानी से उम्मेद स्वामी ने अपने लिखे कॉफ़ी तैयार किया| "इतना कड़वा कॉफ़ी कौन पीता होगा, किसके लिए बनाते हैं ये लोग, अगर लाइट ऐसा है, तो डार्क कैसा होगा...", उम्मेद स्वामी ने मुझसे पूछा| मेरे पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं था| मैं बहुत खुश था| जवाब ढूंढ कर मैं दुखी नहीं होना चाहता था| "शायद जीवन की कड़वाहट को कम करने के लिए लोग इतनी कड़वी कॉफ़ी पीते हैं", कार में बैठते हुए उम्मेद स्वामी ने मुझसे कहा| उन्हें जवाब मिल गया था, और मैं देख सकता था कि जवाब मिलने के बाद वे काफी दुखी हो गए थे| सीट बेल्ट लगाते हुए मैंने उन्हें जीवन का एक सूत्र दिया-जवाब दुःख की जननी है| 



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