Wednesday, 3 July 2019

मुक्ति सदा अनुभव से मिलती है, लोभ से नहीं

प्रश्न- स्वामीजी, जीवन में स्वास्थ्य, संगीत, गमो को श्रीण करने वाली विचारधारा इत्यादि पॉजिटिव बात मैं अपने में दोहरा सकता हूँ अभ्यास कर सकता हूँ| परिणामस्वरूप वो मेरी आदत बन जाएगी| परिणामस्वरूप उसके कुछ लाभ होंगे| इस तरह में कई आदतों को अपने में विकसित कर लूँगा| परंतु उस आदत में आनंद की कुछ सुगंध नहीं है| कुछ अप्रमाणिक कुछ कमी से महसूस होती है क्यों|
जवाब- मित्र, आनंद हमारा स्वाभाव है, उसके लिए कुछ करने की ज़रूरत नहीं है| आनंद को नहीं पाना है ‘दुःख’ के प्रति जागना है, और जैसे ही हम दुःख के प्रति जागते हैं, हम पाते हैं दुःख है ही नहीं| दुःख अहंकार की छाया है, और अहंकार यानि झूठ| पॉजिटिव विचार और नेगेटिव विचार दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं हो सकता है| कोई विचार पॉजिटिव है इसका बोध ही तभी हो सकता है, जब बैकग्राउंड में नेगेटिव विचार चल रहा हो| आदमी कभी भी पूर्णतया दुखी या सुखी नहीं हो सकता है, क्योंकि पूर्ण का कोई अनुभव नहीं होता है| सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, एक का अनुभव दूसरे के बिना नहीं हो सकता है| ‘अनुभव मात्र’ सदा विपरीत का होता है| इसीलिए मैं कहता हूँ कि कोई अभी अनुभव अध्यात्मिक नहीं होता है| सारे अनुभव मन के है| ‘आनंद’ का कोई अनुभव नहीं होता है- आनंद उस पावन दशा का नाम है, जब आप न तो दुखी होते हैं, और न ही सुखी| वस्तुतः जब आनंद होता है, तब हम वहां नहीं होते हैं| जब तक आप यह कहने के लिए मौजूद हैं कि ‘मैं आनंदित हूँ’ तब तक समझ लीजिए कि अभी आनंद नहीं घटा है|

इसीलिए आनंद पाने की फिकिर छोड़िये, कोशिश करके आनंद को नहीं पाया जा सकता है| जैसे कुत्ता लाख कोशिश के बावजूद भी अपनी पूछ नहीं पकड़ पाता है, वैस ही हम कितना भी कोशिश कर लें आनंदित नहीं हो सकते हैं| इसीलिए आनंद की चिंता लेनी वर्थ है| हम बस इतना कर सकते हैं कि जिस दुःख से डर कर हम भागते हैं, छुकारा पाना चाहते हैं, उसको एक बार जान लें, भागने से पहले एक बार उसका दर्शन कर लें| एक बार इस बात की तसल्ली कर लें कि दुःख सच में ही है, या फिर हम यूं ही भाग रहे हैं| अगली बार जब दुःख पकड़े तो एक छोटा सा प्रयोग कीजिए, आँख बंद करके भीतर इस बात की खोज कीजिए कि दुःख कहाँ है, और दुःख की वजह से शरीर में क्या-क्या घटित हो रहा है| ख़ुद से सवाल पूछिए कि इस वक़्त मैं क्या सोच रहा हूँ, और कैसा महूस कर रहा हूँ, शरीर में क्या-कुछ घटित हो रहा है| सब चीजों को भलीभांति समझने की कोशिश कीजिए| एक वैज्ञानिक की तरह निरपेक्ष भाव से बिना पहले से कोई राय कायम किये एक-एक विचार और भाव का इन्वेस्टीगेशन कीजिए...फिर जो कुछ भी आपकी पकड़ में आता है, जो भी अंतर दृष्टि मिलती है, उसको एक कागज़ में नोट कर के रख लीजिए... ऐसा सभी भावों के साथ आप कर सकते हैं| बेहतर हो कि सुख के साथ भी आप यह प्रयोग करके देखें| आप हैरान होंगे या जानकर कि शरीर सुख और दुःख दोनों में एक ही प्रकार से प्रतिकिया देता है| बस मन अलग-अलग व्याख्या कर लेता है|
बिना जाने बिना अनुभव किए हर चीज़ की व्याख्या कर लेना हमारी बीमारी है| अगर सुख या दुःख किसी के भी अनुभव में हम एक बार भी पूरे उतरें, तो एक अनुभव में ही मुक्ति संभव है| एक अगर हम क्रोध का ठीक से अनुभव कर लें, तो एक अनुभव में ही सदा के लिए क्रोध से मुक्ति मिल सकती है| मुक्ति सदा अनुभव से मिलती है, लोभ से नहीं| ‘मैं क्रोधी हूँ, और मुझे अक्रोधी होना है, यह लोभ की भषा है| इसीलिए जिज्ञासु बनिए, जीवन को समझने की कोशिश कीजिए, कुछ भी इतना जटिल नहीं जितना हमने मन से व्याख्या कर के बना दिया है|

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