Monday, 15 July 2019

जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं..

(प्रश्न लम्बा और बहुत ही ज़्यादा व्यक्तिगत था, इसीलिए प्रश्न छोड़कर उत्तर का कुछ अंश आपके साथ share कर रहा हूँ।)
इक्क्यू-अपनी ग़लती को स्वीकारना, इस जगत की बड़ी-से-बड़ी घटनाओं में से एक| यह अघट सदियों में कभी एकाध बार घटता है| अपनी ग़लती स्वीकारना यानि बुद्धत्व की ओर कदम बढ़ाना| 'मेरे साथ जो भी हो रहा है, और जैसे भी हो रहा है, इसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ', यह बुद्धत्व से ठीक पहले की उद्घोष है... इस के बाद बस एक ही घोषणा रह जाती है, 'अहम् ब्रह्मास्मि'| बस बात खत्म हो गई..अपनी ग़लती को स्वीकारना ब्रह्म होने की तैयारी है...! आप अपने पिता की छोड़िये... क्या आप इस बात के लिए अभी तैयार हैं कि अपनी ग़लती को स्वीकार लें...? 'मेरे पिता मेरे साथ जैसा भी कर रहे हैं, उसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ, और-तो-और मेरे पिता जैसे भी हैं, इनके यहाँ जन्म लेने का निर्णय मेरा ही था, चाहे यह बात मुझे पता हो या न हो..', ऐसा कह पाएँगे आप? मिरदाद कहते हैं, "तुम्हारी नाक पर अगर एक मक्खी भी बैठती है, तो वह तुम्हारी मर्ज़ी से बैठती है| जैसे तुम को पता नहीं है कि तुम कैसे खाना पचाते हो, लेकिन तुम ही पचाते हो, तुमको मालूम नहीं कैसे तुम बाल बढ़ाते हो, लेकिन बढ़ाते हो, तुमको मालूम नहीं कि कैसे तुम लहू को नसों में दौड़ते हो, लेकिन तुम ही दौड़ते हो? इसी तरह बहुत कुछ है जो तुम अचेतन रूप से चाह लेते हो, जिसक तुम्हे कुछ पता ही नहीं| तुम्हारे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है, जो तुमने कभी चेतन और अचेतन रूप से नहीं चाहता हो...यह जगत तुम्हारी वासनाओं का विस्तार है|"... मिरदाद ठीक ही कहते हैं... यह जगत हमारी वासनाओं का विस्तार है.. इसे हमने अपनी मर्ज़ी से चुना है... दुःख हमारा चुनाव है, आपके पिता आपके चुनाव है... वह आपके साथ जैसा भी व्यवहार करते हैं, उस व्यवहार को स्वीकार करना या फिर अस्वीरकर करना आपका चुनाव है.. फिर वो गाली दे सकते हैं, गाली आपको लेनी है या नहीं लेनी है यह आपके निर्णय पर निर्भर करता है.. कोई भी इस जगत में आपको आपकी मर्ज़ी के बगैर सुखी या दुखी नहीं कर सकता है.. | 


अब प्रश्न यह उठता है कि अगर सब कुछ हमारा चुनाव ही है, और जो भी हमारे साथ हो रहा है उसको हमने अचेतन रूप से चुना है.. तब तो हम अचेतन रूप से कुछ भी चुन सकते हैं... हम आत्मघात चुन सकते हैं.. फिर इससे मुक्ति कैसे मिले? मुक्ति का मार्ग है..और वह है स्वीकार... जैसे ही आप जो है उसको स्वीकार कर लेते हैं, तो आपकी लड़ने में जो उर्जा खर्च हो रही थी, वह जागरण बनने लगता है... और धीरे-धीरे आप उन सब वासनाओं के प्रति जागने लगते हैं, जिन्हें अब तक आप अचेतन रूप से चाह रहे थे| इसीलिए साधक को जो भी है, उसे बिना किसी शिकायत के अहोभाव के साथ चुनाव करना चाहिए... अगर आपको देखकर कोई गाली देता है, तो सोचना चाहिए मैंने ही चाहा होगा.. दोस्तोवस्की तो यहाँ तक कहते थे कि दुनियां में अगर भी कुछ भी गड़बड़ हो रहा है, गलत हो रहा है, उस सब में आपकी जिम्मेवारी है| ऐसा होना भी चाहिए... हम सब में हैं, और सब हम में है... स्वामी राम कहते थे कि सूरज और चाँद को भी हम ही चला रहे हैं, सब हमारी मर्ज़ी से चल रहे हैं.... | 
जब तक हम अशांत हैं तब तक लोग हमें अशांत करते हैं, जिस दिन बुद्ध की भांति हम स्थिति-प्रज्ञ होकर अंगुलिमाल के सामने खड़े हो जाते हैं, उस दिन अंगुलिमाल ठिटक जाता है, और उसे हाथ से कटार गिर जाता है.. 
सुख और दुःख दोनों में अपने भीतर उस तत्व की तलाश कीजिए जो दोनों से विचलित नहीं होता है... अपने दुश्मन का चुनाव होश पूर्वक करना चाहिए.. क्योंकि जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं... अपने पिता में ज्यादा मत उलझिए अन्यथा अंत में आप उन्ही के जैसे हो जाएंगे...

No comments:

Post a Comment

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...