Tuesday, 16 July 2019

सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है

मित्र,
मानसिक हानि जैसी कोई चीज नहीं होती है| शरीर बच गया तो समझिये सब बच गया| शरीर और मन दो अलग-अलग चीज़े नहीं हैं| मन को ठीक करने की ज्यादा फिकिर मत लीजिए| मन जैसा भी, उसे वैसे ही स्वीकार कीजिए| ‘मन’ गंदे पानी जैसा है| गंदे पानी को जितना आप साफ़ करने की कोशिश कीजिएगा, वह उतना ही गंदा हो जाएगा है| कोशिश करने की वजह से ही गन्दा हो जाएगा| बस उदासीन होकर ‘विचारों’ को देखिए, करना कुछ भी नहीं है| ‘मन’ यानि भीतर चलने वाला विचार| आप कहते हैं, "ख़ुद को बदलना है, मन को ठीक करना है, मुझे अच्छा आदमी बनना है, बहुत हानि हो गई है", यह सब भी तो विचार ही है, की नहीं है? जो मन को बदलना चाहता है, वह भी मन ही है| चेतना सदा द्रष्टा है, साक्षी है| ‘उस’ साक्षी तत्व के प्रति जागिये| मन के प्रति उदासीन होइए| बस यह जानते रहिए कि मेरे भीतर अभी इस तरह के विचार चल रहे हैं| विचार का संबंध हमेशा भूत और भविष्य से होता| और शरीर सदा वर्तमान में होता है| इसीलिए जैसे ही आप शरीर के प्रति बोध से भरेंगे, विचार कम होने लगेंगे| ‘इनर बॉडी ध्यान’ की भी यही उपयोगिता है| शरीर का एंकर की तरह इसेमल कीजिए| जैसे एंकर जहाज को किनारे से बाँध कर रखता है, वैसे ही शरीर का बोध आपको वर्तमान से बाँध कर रखेगा|
अपने सुनने की क्षमता को विकसित कीजिए| कभी, आप जहाँ भी बैठे हों, उसके आसपास जितनी भी आवाज़े हो उसको सुनिये| सुनना बहुत ही अद्भुत चीज है, क्योंकि सुनना और सोचना एक साथ नहीं हो सकता है| इसी तरह कान के साथ साथ आपनी बांकी इन्द्रियों के प्रति भी होश को साधिये| शरीर जितना शुद्ध होगा, मन उतना ही पारदर्शी हो जाएगा| इसीलिए मैंने आपसे योग़ और प्राणायाम करने को कहा| किसी अच्छे योगी से अगर आप योग सीखते हैं, तो वह आपको हर क्रिया को होशपूर्वक करने और सांस के प्रति जागरूक रहना सिखाएगा|
पोर्न से मुक्त हो कर आपने ख़ुद को नया जन्म दिया है| पूरी दुनिया में लाखो लोग हैं, जो अपनी इस आदत की वजह से सड़ रहे हैं| शारीरिक का सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है| क्योंकि ‘मन’ ही रोग है|
आप, अब, अपने बारे में ज्यादा चिंता मत लीजिए| आप इस नर्क से निकल चुके हैं| अब अपना अनुभव लोगों के साथ शेयर करके, उनको इस नर्क से निकालने की कोशिश में लगिए| आपने दोस्तों, परिचितों को पोर्न देखने के ख़तरनाक परिणाम के बारे में बताइए| जो बोध और ज्ञान आपको मिला है, उसे दूसरों से बांटिये...
जो प्राणायाम आप कर रहे हैं, वो पर्याप्त है| उसको जारी रखिये| बस यह सब गंभीर हो कर मत कीजिए, हल्के होइए| दिन में कुछ समय अगर संभव हो तो, छोटे बच्चों के साथ बिताइये| उनके साथ खेलिए...इससे आपकी गंभीरता थोड़ी कम होगी..


योग के मामले में बाबा रामदेव सही हैं| लेकिन चूँकि आप उनकी विडियो देख कर करते हैं, इसीलिए आप ग़लत कर रहे हैं, या सही, इसका पता लगाना मुशिकल है| अगर समय हो तो किसी प्रतिष्ठित योग-स्कूल से कुछ दिन का कोर्स कर लीजिये| संदीप महेश्वरी के संबध में मेरे विचार कुछ ज्यदा अच्छे नहीं हैं| इसलिए उनकी विधि के बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं दूंगा|
सुनने की क्षमता विकसित करने से मेरा मतलब था, आवाज़ के प्रति जागरूक होना| निरंतर आ रही आवाज़ को धीरे-धीरे हम भूल जाते हैं, जैसे जब आप फैन on करते हैं, तो आपको फैन की आवाज़ सुनाई देती है, लेकिन थोड़े समय बाद आप उसे भूल जाते हैं| इसी तरह ‘शब्द’ को हम सुनते हैं, लेकिन दो शब्दों के बीच जो अन्तराल होता है, उसे के प्रति हम जागरूक नहीं होते हैं, जबकि अंतराल उनता ही महत्वपूर्ण है, जितना कि ‘शब्द’| ओशो का एक 15 मिनट का ‘सुनना ध्यान’ है, शायद उसकी ऑडियो आपको यूटूब पर मिल जाए, अगर ना मिले तो मुझे बताइयेगा, मैं मेल कर दूंगा| उस प्रयोग को कभी-कभी कीजिए|
एक और प्रयोग है, जिसे आप लोगों से बात करते समय कर सकते हैं| बात-चीत के दौरान, दो वाक्यों के बीच जो गैप होता है, उसके प्रति जागरूक होइए, उसको भी नोटिस में लीजिए| जैसे-जैसे आप बाहर के गैप के प्रति जागेंगे, वैसे-वैसे ही आपके भीतर भी एक गैप बनने लगेगा| आमतौर पर हमारा मन ‘ऑफ बीट’ को नहीं सुनता है, जैसे यदि में टेबल पीटता हूँ, तो टेबल को पीटने से जो आवाज़ पैदा होगी, वो तो आप सुनेंगे, लेकिन दो ध्वनियों के बीच जो मौन अन्तराल होगा, वह आपके नोटिस में नहीं आएगा| और अगर मैं टेबल लगातार पीटता ही चला जाऊं, तो थोड़ी देर में आपको वो भी सुनाई नहीं देगा|

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