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Sunday, 5 April 2020

जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?


प्रश्न - 24 घंटे आनंदित रहने का क्या मार्ग है ?
Ikkyu- सबसे पहले आपके भीतर 24 घंटे आनंदित रहने का जो लोभ है, उसे छोड़ना होगा..। दूसरी बात, आनंद का अपना कोई अनुभव नहीं होता है| सुख का अनुभव होता है, दुःख का भी अनुभव होता है, लेकिन आनंद का कोई अनुभव नहीं होता है, क्योंकि अनुभव के लिए ‘दो’ का होना ज़रूरी है। सुख के पीछे दुःख छिपा होता है, इसीलिए सुख का अनुभव होता है। इसी तरह दुःख के पीछे सुख छिपा होता है। अगर भीतर बिल्कुल ही सुख न हो तो आपको दुःख का पता नहीं चलेगा। तो, इस बात को बहुत ही अच्छे से समझ लीजिए कि अनुभव हमेशा विपरीत का होता है। साथ ही एक और बात गहरे उतार लीजिए,’कोई भी अनुभव आध्यात्मिक नहीं होता है’। कैसा भी अनुभव क्यों न हो सब अनुभव मन के हैं।
आनंद का अनुभव नहीं हो सकता है क्योंकि आनंद आपका होना है। आनंद चेतना का स्वभाव है। इसीलिए, जब तक चेतना सुख और दुःख के अनुभव में उलझी रहती है, वह अपने स्वभाव से वंचित रहती है। सुख में सुखी होना और दुःख में दुखी होना छोड़ दीजिए, फिर जो रह जाएगा वही अनन्द है।
प्रश्न- जीवन को किस प्रकार जीना चाहिए ?
इक्क्यू- जागकर जीना चाहिए...दो दृष्टिकोण मैं आपको देता हूँ, जो भी सही लगे उसे चुन लीजिए। दोनों का परिणाम एक जैसा है।
पहला- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखिये जैसे आप उन्हें पहली बार देख रहे हैं। हर दिन को ऐसे जीना शुरू कीजिये जैसे यह आपके जीवन का पहला दिन है।
दूसरा- चीज़ों और लोगों को ऐसे देखना शुरू कर दीजिए जैसे कि आप उन्हें आख़री बार देख रहे हैं। हर दिन को अपने जीवन का आख़री दिन समझिए।
दोनों ही दृष्टिकोण का एक ही लक्ष्य है-अतीत और भविष्य से मुक्ति..। जो भी आपको जमे उसे चुन लीजिए और कोई तीन महीने इस प्रयोग को कीजिए।
प्रश्न- आपका मूल संदेश क्या है ?
मेरा कोई संदेश नहीं है..। मैं कोई पैग़म्बर (पैग़ाम/मेसेज लाने वाला) नहीं हूँ..! संदेश लाना डाकिये का काम है। मैं कोई डाकिया-वग़ैरह नहीं हूँ। डाकिया एक जगह की ख़बर को दूसरी जगह पहुँचता है। यह बिचौलिये काम है। मुझे ऐसा काम पसंद नहीं है।
मैं अपने से ऊपर किसी को नहीं मानता हूँ, और ना ही कोई मुझसे नीचे है। फिर किसका संदेश किस तक पहुँचाऊँ?? मैं स्वयं संदेश हूँ।और यही मैं आपसे भी कहना चाहता हूँ, “अप्प दीपो भव:”


Saturday, 8 February 2020

हर पल सेक्स माइंड में चलता रहता है

प्रश्नकर्ता-माइंड बहुत डिस्टर्ब रहता है, हर पल सेक्स माइंड में चलता रहता है|
इक्क्यु- पोर्न देखते हैं?
प्रश्नकर्ता-जी, देखता हूँ|
इक्क्यु-पोर्न देखते हुए हस्तमैथुन/मैथुन करते हैं?
प्रश्नकर्ता- जी, करता हूँ|
इक्क्यु- जितनी जल्दी हो सके ये दोनों चीज़ छोड़ दीजिए...यह आपके सेक्स लाइफ को बर्बाद कर देगा..वैवाहिक जीवन को भी नष्ट कर देगा..साथ ही आपके दिमाग की संवेदनशीलता को हमेशा के लिए खत्म कर देगा| पोर्न का दिमाग पर वही असर पड़ता है, जो ड्रग्स या किसी और मादक द्रव का...पोर्न देखने वालों में शीघ्र-पतन, और erectile dysfunction की समस्या बहुत ही आम है.. पोर्न को जीवन से एकदम दूर कर दीजिए..कुछ दिन (कोई 30 दिन ) पत्नी के साथ भी सेक्स मत कीजिये...सब ठीक हो जाएगा...
प्रश्नकर्ता- मैं पत्नी के साथ 3----(बीप) करना चाहता हूँ.....मन में हमेशा यही सब चलता रहता है|
इक्क्यु- यह सब ख्याल आपके भीतर पोर्न देख कर पैदा हुआ है... इस सबसे से आप चीज़ों को बहुत ही मुश्किल बना देंगे... आप कुछ दिन वाइफ के साथ सेक्स मत कीजिए, पोर्न मत देखिये...हस्तमैथुन भी मत कीजिए ...कुछ दिनों में आपका ब्रेन नार्मल हो जाएगा...और फिर आपकी पत्नी भी आपके साथ पहले से ज्यादा खुश रहने लगेगी... सेक्स से कभी भी स्थाई सुख या आनंद नहीं मिल सकता है... थ्री...(बीप) जैसी चीजें लॉन्ग रन में आपको अपनी पत्नी की नज़रों में गिरा देगा...वो कभी भी आपकी इज्जत नहीं कर पाएगी... जीवन बहुत ही दुष्कर हो जाएगा... पोर्न छोड़ दीजिए सब ठीक हो जाएगा..और साथ ही कोशिश कीजिए की पत्नी के साथ महीने में सिर्फ दो बार सेक्स हो ...धीरज रखिये चीज़ें बेहतर हो जाएगी...
चित्र साभार- गूगल
सेक्स से सुख तभी मिल सकता है जब आप एक गैप के बाद इसमें उतरते हैं... पोर्न देखने की वजह से आदमी सेक्स का आदि हो जाता है .... और जितना अधिक इसके बारे में सोचता है, उतना ही रियल सेक्स उसके लिए मुश्किल हो जाता है
अकेले में फ़ोन का इस्तेमाल मत कीजिए, रात को बिलकुल ही नहीं... कोई 90 दिन जब आप बिलकुल पोर्न नहीं देखेगे और हस्तमैथुन भी नहीं करेंगे...तब आपका ब्रेन और शरीर नार्मल हो पाएगा...

Wednesday, 30 October 2019

महा-प्रयोग डे-1

आज महा-प्रयोग का पहला दिन है| कल शाम पांच बजे मोबाइल फोन बंद कर दिया था| और रात ठीक 10 बजकर 30 मिनट पर सोने चला गया था| शाम को मोबाइल बंद करने के बाद थोड़ी देर किताब (सावंत आंटी की लडकियाँ) पढ़ता रहा, लेकिन एक पॉइंट के बाद मन फोन का इस्तेमाल करने के लिए बेचैन होने लगा| बेचैनी इस बात का सबूत था कि मन मोबाइल फोन का आदी हो गया है| 
प्रयोग के हिसाब से मैं अगले 90 दिनों तक शाम पांच बजे से लेकर सुबह 9:30 तक मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करूँगा| साथ ही लैपटॉप, टीवी और रेडियो इत्यादि का इस्तेमाल भी नहीं करूँगा| दूसरा, रात 10:30 तक सो जाऊंगा| 
कल शाम मोबाइल फोन बंद करने के बाद सकारात्मक बात यह हुई कि दिव्या और मैं बड़ी देर तक सोफे पर बैठ कर बातें करते रहे| मोबाइल फोन के ऑन रहते इतनी लम्बी चर्चा निर्बाध रूप से बहुत कम ही हो पाती है| पीछे मेहसाना में भक्तराज, राव साहब और मैं एक दिन फोन भक्तराज के घर पर छोड़कर सीसीडी (संकूवाटरपार्क) गए थे| शाम 5:00 बजकर 30 मिनट पर हम घर से निकले थे| कोई आधा घंटा हमें सीसीडी पहुंचे में लगा होगा| कॉफ़ी आर्डर करने के बाद हम ब्रह्म-चर्चा में लग गए| शुरू में राव साहब थोड़े बेचैन लग रहे थे, उनकी चिंता यह थी अगर इस बीच उनकी होने वाली गर्लफ्रेंड ने मेसेज कर दिया तो क्या होगा-क्या वह इस बात को सहज रूप से स्वीकार कर पाएगी कि उसके मेसेज का राव साहब ने आनन-फ़ानन में जवाब नहीं दिया? भक्तराज और मुझे कोई तीस मिनट लगा राव साहब को सहज करने में- आप समझिये चौबीसों घंटे ढेल की तरह अगर आप उसके लिए बिछे रहेंगे तो वो कभी आपसे नहीं पटेगी| लड़कियां ऐसे लड़कों को कभी पसंद नहीं करती है जिसके पास कोई रीढ़ ना हो| जब हमने ऐसे अजीबों-गरीब कोई पचास तर्क दिए तब राव साहब थोड़े रिलैक्स हुए| हम (भक्तराज और मैं) दोनों इस बात से बहुत ही हैरान थे कि इस सदी में मोबाइल से दूर होने पर भी आदमी को सदमा लग सकता है|
हम तीनो में से किसी के भी पास घड़ी नहीं थी, सो हमें टाइम का कुछ पता नहीं चला| और हमने किसी से पूछा भी नहीं| हम अपने-अपने ढंग से ब्रह्म की व्याख्या करने में इतने तल्लीन थे कि कब शाम ढली और कब रात हुई हमें किसी भी चीज़ का कुछ पता नहीं चला| जब सीसीडी वाला भाई दूबारा आर्डर देने के लिए हमसे कहने आया, तब हमें अंदाज़ा लगा कि शायद हम बहुत देर से बैठे हैं|
घर पहुँच कर जब हमने समय देखा तो हम तीनो हैरान होने से ख़ुद को नहीं रोक पाए| रात के 11:00 बज रहे थे| मतलब अगर आने-जाने के एक घंटा को निकाल दिया जाए, तो हमने 4 घंटे से भी ज्यादा सीसीडी में ब्रह्मचर्चा करते हुए बिताया| अगर बिना घड़ी देखे कोई हमसे पूछता कि हम कितनी देर सीसीडी में बैठे थे, तो हम अंदाज़े से दो घंटे से ज्यादा नहीं बता पाते| हमें दो घंटे बोलते हुए भी डाउट ही होता| 

मोबाइल के इस्तेमाल को सिमित करने और सोने का समय तय करने के अलावा मैंने भोजन को भी महाप्रयोग में शामिल किया है| आज से तीन महीने के लिए मैं सफ़ेद, चीनी, गेंहू और दूध का सेवन बिलकुल बंद कर रहा हूँ| अभी तक मौका-बेमौका चीनी और दूध का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सेवन कर लेता था, लेकिन अब वो भी बंद कर रहा हूँ|    
मोबाइल का इस्तेमाल, सोने का तय समय और भोजन में मामूली सुधार लाने के अलावा और किसी चीज़ को बदलने पर मेरा कोई विशेष ज़ोर नहीं है| अगर कुछ अपने आप सजह रूप से बदलता है तो ठीक, वर्ना प्रयास से मैं किसी भी चीज़ में बदलाव नहीं लाना चाहता हूँ| 
जब से दिल्ली आया हूँ तभी से रोज़ सुबह उठ कर पार्क जाने की सोचता था और टाल देता था| रात लेट सोने की वजह से सुबह उठने में देर हो जाती थी| सुबह के पार्क जाने को शाम पर टाल देता था, और शाम आते-आते उसे अगली सुबह पर| लेकिन कल रात ठीक समय पर सो जाने की वजह से, आज सुबह जल्दी नींद खुल गई| नित्यकर्म से फ़ारिग होने के बाद बड़ी देर तक किताब (गीत चतुर्वेदी की सावंत आंटी की लड़कियां) पढ़ते हुए पौ फटने का इतज़ार करता रहा| बहुत दिन बाद किताब पढ़ते हुए ऐसी शान्ति अनुभव किया| 
अपने मुंबई, दाहोद और मेहसाना निवास के दौरान निरंतर वाक करते रहने की वजह से मैं बहुत ही सुगमता के साथ तेज गति से चल पा रहा था| काफी दिनों से निष्क्रिय रहने की वजह से दिव्या उतनी सुगमता से तेज़ नहीं चल पा रही थी| नतीजतन, मुझसे पीछे न रह जाए इसलिए, बीच-बीच में उसे दौड़ना पड़ता था| मुझे अपनी याद आ गई, बम्बई में ठीक ऐसी ही हालत मेरी थी| सर (पवन श्रीवास्तव) बहुत तेज चलते हैं, उनके साथ वाक करते समय मैं अक्सर पीछे छुट जाता था| मुझे तेज चलाने के लिए, सर कोई कई बार मुझे धक्का मारना पड़ता था| मैं सोचा करता था-इतनी तेज़ चलने तो अच्छा है कि दौड़ ही लूं| 
सुबह वाक पर जाने के अलावा एक और चीज़ जो सहज रूप से घट रही है, वह है 'लिखना'| एक अरसे से मेरा लिखना बंद हो गया था| आज बड़े ही सहज ढंग से यह फिर से शुरू हो गया है| आगे मेरी कोशिश यही रहेगी कि आने वाले 90 दिनों में महा-प्रयोग के जो भी छोटे-बड़े परिणाम होंगे उनसे आपको अवगत कराता रहूँ| 
                                                (दिल्ली- 31-10-2019, 12:08 PM)


Thursday, 5 September 2019

आज के आइस-क्रीम का स्वाद सबसे अलग लग राह है..है ना ?


लड़की-कोई आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता...(सोफे पर लेट कर छत को देखते हुए) कोई मुझे आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता.....
लड़का- पैसें नहीं है...और मेरा अभी आइस-क्रीम खाने का मन भी नहीं है..तुमको अकेले ही खाना हो तो ऑनलाइन आर्डर देकर माँगा लो?
लड़की- नहीं फिर रहने दो ...नमकीन होता तो, खा भी लेती, मीठा अकेले नहीं खाना| पैसे क्यूं नहीं है?
लड़का-नहीं है बस, जो थे वो बाइक वाले को दे दिये..कल एटीएम से निकालना होगा|
लड़की- (फिर से गाने लगती है..) कोई मुझे आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता.....| 
लड़का-बस दो-दस के नोट पड़े हैं, मेरे पास| इतने में होगा तो चलो चलते हैं| 
लड़की- कुल्फी तीस का देता है| 
लड़का- (अपना जेब टटोलते हुए) एक पांच का सिक्का भी है|
लड़की-रुको... कुछ छुट्टे मेरे पास भी पड़े हैं..(भाग कर हॉल से कमरे में जाते हुए) बीस रूपये हैं (चिल्लड़ गिनते हुए)-टोटल कितना हुआ?
लड़का-हम्म...पचीस मेरे पास है, और बीस तुम्हारे पास तो..कुल हुआ 45 रुपया..| अरे..यार अगर पन्द्रह रूपये और मिल जाए तो मैं भी खाल लूं... रुको मैं अपने बैग में देखता हूँ..(भाग कर कमरे में जाता है, बैग सर्च करता है)..सात रूपये मिले!
लड़की- दो कुल्फी के लिए आठ रूपये और चाहिए..रुको मैं अपने बैग में भी देखती हूँ...
लड़का-कहीं तो कल पांच का एक सिक्का पड़ा देखा था!
लड़की- वही पांच का सिक्का जोड़ कर तो मेरा बीस रुपया हुआ है| मेरे बैग में एक भी रुपया नहीं नहीं है-तुम एक भी रुपया मेरे पास नहीं छोड़ते हो| 
लड़का-(अपना सब सामान देखते हुए, बेड के नीचे, टेबल पर, जींस के जेब में, सोफे के नीचे..) यार ऐसा कैसे हो गया कि अपने पास 8 रुपया भी नहीं है..कितना तो यहाँ वहां पड़ा देखता था|
लड़की- वही 'कितना' जोड़ कर तो 52 रुपये हुए हैं....| छोड़ों नहीं मिलेगा...एक काम करते हैं...उसकों बोल देंगे कि 8 रुपया बाद में दे देंगे| 
लड़का-(बे-मन से) हाँ चलो ये ठीक रहेगा(रूम से निकलते हुए) अरे...आई हैव एन आइडिया...ये जो अपने पास इतना अख़बार पड़ा है, चलो इसको बेच देते हैं..| 
लड़की- (चहकते हुए) हाँ...वहीं हैंडी मार्केट के पास ही रद्दी वाले का शॉप है...चलो फिर ज्यादा पैसे आ गए तो मैं एक कोण भी ले लुंगी..|
लड़का- (मन-ही-मन 'गाँव बसा नहीं की भिखारी आ गए)
-------थोड़ी देर बाद-------
लड़की- आज के आइस-क्रीम का स्वाद सबसे अलग लग राह है..है ना ?

Saturday, 27 July 2019

जिस चीज़ की भी हमें आदत हो जाती है, उससे हमें डर नहीं लगता है|



अभी जहाँ मैं रह रहा हूँ वह एक छोटा-सा ख़ूबसूरत द्वीप है| शायद यह दुनिया का सबसे छोटा द्वीप है| तीन तरफ पानी का अनंत फैलाव हैं| नज़रे उठाकर मैं जहाँ तक देख सकता हूँ वहां तक पानी-ही-पानी हैं, पानी का अंतहीन विस्तार और अनगिनत सफ़ेद लहरें...| पानी की सतहों पर सूरज की चमक देखने लिए मैं रोज़ सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाता हूँ| सुबह पानी की गोद से सूरज को उगता हुआ देखना, किसी प्रसाद से कम नहीं है| शाम का नज़ारा भी बहुत ही अलौकिक होता है| शाम के धुंधलके में पानी की स्याह सतह से सफ़ेद लहरों का उठना मंत्रमुग्ध करने वाला दृश्य होता है| रोज़ शाम मैं घंटों छत पर बैठकर लहरों को निहारा करता हूँ|
द्वीप के जिस तरफ पानी नहीं है, उधर एक बस्ती है| बस्ती तक जाने के लिए मुझे कमर भर पानी में 100 मीटर चलना पड़ता है| वैसे बस्ती तक मुझे बहुत कम ही जाना होता है (जब से आया हूँ, तीन दिन में, सिर्फ एक बार बस्ती जाना हुआ है), लेकिन अगर कभी जाना हो तो यह एक टास्क है| मैं तो जैसे-तैसे उस पार चला भी जाता हूँ, लेकिन दिव्या को बहुत डर लगता हैं| इस तरह के टापू पर रहने का उसका यह पहला अनुभव हैं| पानी में उसे सबसे ज्यादा जोंक का भय सताता है| उसके इसी भय की वजह से सिक्किम में मुझे जंगल में रहने का प्लान रद्द करना पड़ा था| सिक्किम की पहाड़ियों में बिना पानी के भी बारिश के दिनों में सब जगह जोंक हो जाता है|
‘धीरे-धीरे तुम्हे इस सब की आदत हो जाएगी, और जिस चीज़ की भी हमें आदत हो जाती है, उससे हमें डर नहीं लगता है| चाहे वह चीज़ कितनी ही ख़तरनाक क्यों न हो’, ऐसा जब-जब वह डरती है, तब मैं उससे कहता हूँ| “तुम कब इससे पहले टापू पर रहे, जो तुम्हारा डर ख़त्म हो गया है?”, वह मुझसे पूछती है| मैं उससे कहता हूँ, “मैं इससे पहले एक बार एक ‘नदी के द्वीप’ पर रहा हूँ, हीरानन्द सचिदानंद वात्सायन अज्ञेय भी उस द्वीप पर मेरे साथ थे|” यह सुनकर दिव्या विस्मय से आँखे बड़ी कर लेती है, उसे समझ नहीं आता है कि यह मैं क्या अनाप-सनाप बक रहा हूँ|
हमारा द्वीप काफी हरा-भरा है, इस पर 6 आम के पेड़ हैं, जिस पर अभी दो दिन पहले तक आम लगे हुए थे| मैं जिस दिन आया (24 जुलाई) को उस दिन मुझे ढेर सारा आम खाने को मिला| यहाँ के आम्रपाली का स्वाद गुजरात के केसर से 10 गुना ज्यादा अच्छा था| आम के अलावा अमरुद के भी दो पेड़ हैं| आज सुबह ही मैंने पेड़ से अमरुद तोड़कर खाया था| पेड़ पर हज़ारों अमरुद हैं, लेकिन ज्यादातर या तो ख़राब हो गए हैं, या फिर गिलहरी ने उन्हें आधा खाकर छोड़ दिया है| गिलहरी का यहाँ बहुत आतंक है| द्वीप के मूल निवासी आज मुझसे कह रहे थे, “हमने सोचा था तुम्हारे आ जाने के बाद आम तोड़ेंगे, लेकिन गिलहरीयों ने इतना परेशान कर दिया कि मजबूरन हमें तोड़ना पड़ा| रोज़ पांच-दस आम को वे खा कर गिरा देते थे| पहले तो हम गिलहरीयों के दाना ला लाकर खिलाते थे| लेकिन जब से इन्होने आम पर हमला शुरू किया है, तब से ये हमें सोहा नहीं रहे हैं|”  
खाने-पीने की चीज़ों में आम व अमरुद के अलावा खाने-पीने के लिए यहाँ भिंडी, बीन्स, पुदीना, खीरा, करेला निम्बू, गन्ना, पपीता (दो पपीता कल खाया था) और साग की खेती है| जब से आया हूँ तब से रोज़ एक टाइम भिन्डी की सब्जी खाने को मिल रही है| मूल निवासी बता रहे थे कि वे लोग पिछले दो महीने से लगातार रोज़ भिन्डी की सब्जी खा रहे हैं| “बाजार की भिन्डी को आप इतने दिनों तक रोज़ नहीं खा सकते हैं, लेकिन अपने खेत की भिन्डी आप कितना भी खा लें, उब पैदा नहीं होगी”| मुझे इनकी इस बात में सच्चाई लगती हैं, मैं भी तीन दिन से रोज़ भिन्डी खा रहा हूँ, लेकिन अभी तक उबा नहीं हूँ| यहाँ का निम्बू भी बहुत अलग है| सुबह एक पूरा निम्बू एक ग्लास पानी में निचोड़ कर पीता हूँ, फिर भी पानी खट्टा नहीं होता है| मेरे आने से दो दिन पहले इन लोगों के केले का घऊर भी पेड़ से उतारा था| आज सुबह जब मैंने केला खाया तो हैरान रह गया, इतना मीठा और स्वादिष्ट केला मुझे याद नहीं कब खाया था| मूल निवासी सुबह मुझसे कह रहे थे,
“हमारे यहाँ तुम्हे सब चीज़ों का स्वाद अलग मिलेगा, हम कोई भी खाद या केमिकल नहीं डालते हैं| सब कुछ बिलकुल ओर्गानिक व शुद्ध है|” पेड़ों में आम, अमरुद और पपीता के अलावा यहाँ नीम, बेल, पोपुलर (पहाड़ी पेड़), आंवला, गुलाब, रात की रानी, शहतूत, केला और मीठा नीम (करी पत्ता) का भी पेड़ हैं| नीम के दो बड़े-बड़े पेड़ हैं, जिन पर कौव्वे ने अपना घोसला बना रखा है| कल मूल निवासी का छोटा बेटा मुझसे कह रहा था, “कौव्वे ने चोंच से मार कर मेरा सिर फोड़ दिया है|” यह सुनकर मैं बड़ा हैरान हुआ| मुझे हैरान देखकर वह बोला, “नीम के पेड़ पर उनका घोसला है, और शायद उन्होंने नया-नया बच्चा दिया है| पेड़ के नीचे जाओ तो उन्हें लगता है कि तुम उनके बच्चे को नुकसान पहुँचाने आए हो, इसीलिए वे चोंच मार कर तुम्हे भगाते हैं|”
हरी सब्जी और फलों के अलावा यहाँ दूध की नदियाँ बह रही है| चार गायें हैं और चारों के चार बच्चे| चारों गायें अभी दूध दे रही हैं| दूध इतना हो जा रहा है कि हम समझ नहीं पा रहे हैं कि इतने दूध का क्या किया जाए| दिव्या रोज़ 5 लीटर दूध का पनीर फाड़ रही है| तीन दिन से लगातार पनीर की सब्ज़ी खाने को मिल रही है| पनीर बनाने के बाद भी रोज़ बहुत सारा दूध बच जा रहा है| शाम में बजे हुए दूध को गाय की नाद में डाल कर उन्हें पिला दिया जाता है|   
द्वीप के मूल निवासी से कह कर मैंने अपने लिए एक बंसी (मछली पकड़ने का काँटा) बनवाया है| कल से टापू के किनारे बैठकर मछली पकडूँगा|
टापू पर किसी भी मोबाइल का टॉवर यहाँ ठीक से नहीं पकड़ता है| इसीलिए, बाहर की दुनियां से मेरा संपर्क क़रीब-क़रीब टूट सा गया है| मेरे इस दुनिया से उस दुनिया के बीच अगर कोई सेतु है, तो वह है दैनिक अख़बार| रोज़ सुबह आठ बजे बस्ती के सकड़ से अखबार वाला आवाज़ लगाकर अख़बार ले जाने लिए हमें बुलाता है| यह वह पल होता है, तब टापू पर कुछ मिनटों के लिए कोहराम मच जाता है, “आज मैं नहीं जाऊँगा अखबार लाने, कल भी मैं ही गया था”, मूल निवासी का छोटा बेटा अपने पिताजी से कहता है| “बार-बार पानी में जाने से मेरा पैर सड़ गया है| आज तुम ले आओ, कल से मैं ला दूंगा”, मूल निवासी अपने बेटे से कहते हैं| “आप लोग अख़बार वाले को मना क्यों नहीं कर देते हैं, अगर रोज़ पानी हेल कर जाने में इतनी मुसीबत है तो”, मूल निवासी की पत्नी अपने बेटे और पति से कहती हैं| मूल निवासी की पत्नी के विचार से मैं भी सहमत हूँ| “न तो यहाँ टीवी है, न मोबाइल ठीक से काम करता है, ऐसे में अगर एक अख़बार भी नहीं आएगा तो दिन भर हम क्या करेंगे|”, मूल निवासी की छोटी बहु अपने पति से कहती है| अपने पत्नी की दलील सुनकर मूल निवासी का छोटा बेटा मुंह लटकाकर पानी हेलते हुए अखबार लाने चला जाता है|
और जैसे ही अख़बार आता है, घर के सारे सदस्य पढ़ने के लिए उसपर टूट पड़ते| हर सदस्य अखबार का एक-एक पन्ना आपस में बाँट लेता है, मनो वह अख़बार न होकर खाने की कोई चीज़ हो| मैं इस टापू के लोगों को अख़बार पढ़ने के लिये मारा-मारी करता हुआ देख कर टीवी और मोबाइल से पहले के दिनों को याद करने लगता हूँ| एक समय यह हर घर का आम दृश्य हुआ करता था| पहले टीवी, फिर मोबाइल और सबसे ज्यादा JIO ने पारिवारिक रिचुअल्स को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाया है|
आज के अख़बार में एक बड़ा ही दिलचस्प आर्टिकल छपा था| उस आर्टिकल के हिसाब से जिस जगह को हम टापू समझ कर पिछले तीन दिनों से रह रहे हैं, वस्तुतः वह एक बाढ़ पीड़ित गाँव का एक छोटा सा घर है| हमारे चारों तरफ जो पानी का पैलाव है, वह किसी झील का पानी नहीं बल्कि बाढ़ का पानी है| आगे उसी आर्टिकल में ऐसा भी लिखा था कि हम बहुत ही दीन और दुखी हालत में उस टापू पर रह रहे हैं| जो लोग शहरों रह रहे हैं, वे हमारी हालत पर बहुत दुखी है| कुछ लोग हमारी मदद के लिए आगे भी आए हैं| हमारे जैसे टापूओं पर रहने वाले लोगों को जल्द ही सरकार की तरफ से 6000 रूपये की मदद राशी दी जाएगी| राशी वाली बात पढ़कर मूल निवासी का छोटा बेटा यानि मेरा भाई साकेत बड़ा खुश हो गया है, (‘खुश’ हो जाने की बात से यह न समझें के मदद राशि के ऐलान से पहले वह दुखी था) और हिसाब लगाने लगा की हमारे घर में कितना पैसा आएगा| “तुम्हारे भाई को पैसा नहीं मिलेगा”, पिता जी साकेत को ज्यादा खुश होता हुआ देख कर बोलें| “भाई को क्यों नहीं मिलेगा” साकेत ने सवाल उठाया| “क्योंकि यह बाढ़ पीड़ित नहीं है,” पिताजी कहने लगे, “अभी दो दिन पहले आया है, और पांच दिन बाद चला जाएगा| अगर इसका नाम ऐड हुआ तो उनसब को ऐड करना पड़ेगा जो गाँव से बाहर रह रहे हैं|” पिताजी की बात सुनकर साकेत चुप हो गया| साकेत को चुप देखकर माँ बोलने लगी, “लेकिन ये बाहर रहता थोड़े है, घूमने जाता है, रहता तो गाँव में ही है|” माँ की बात सुनकर दिव्या सहमती में सिर हिलाने लगी| “तुम्हारे इस तर्क को कोई नहीं मानेगा, यह 5 दिन यहाँ रहता है, और दो महीना बाहर, ऐसा घूमना किसी को समझ नहीं आता है|”, साकेत बोला| साकेत की बात सुनकर उसकी पत्नी शगुन बोली, “पिछली बार भैया दस दिन का बोल कर गए थे, और दो महीने बाद आए हैं|” शुगुन की बात सुनकर सुरुचि (मेरी बहन) बिना लोल बजाए नहीं रह सकी, “यह तो है भाई को बऊ’अन्नी तो सब दिन से लगा है, कहीं एक जगह टिककर नहीं रह सकता है यह|”
घर के लोगों की बातचीत सुनकर मैं ज़ोर से हंसने लगता हूँ| ऐसी सुन्दर जगह, जहाँ रहने के लिए मैं हजारों खर्च करता हूँ/कर सकता हूँ, वहां रहने के लिए सरकार हमें पैसा क्यों देगी? यह झीलों का इतना सुन्दर शहर मुझे किसी ड्रीम लैंड जैसा लगता है| मैं चाहे इन्हें कितना ही क्यों न देखूं मेरी आँखे कभी अघाती नहीं है| बचपन से ही मुझे यह सब बहुत ही सुन्दर लगता है| मेरे छुटपन में जब मेरी उम्र के बच्चे दीवाली और होली का इंतज़ार किया करते थे, तब मैं गाँव में बाढ़ के आने का इंतजार किया करता था| मुझे हमेशा इस बात का गर्व रहता है कि 2004 में मैंने अपने गाँव का सबसे बड़ा बाढ़ देखा है| 2004 से पहले लोग अकसर मेरे सामने 1987, 1975 और 1954 के बाढ़ की कसीदे पढ़ा करते थे, मुझे उन लोगों से बड़ी इर्षा होती थी जिन्हों 1987 का बाढ़ देखा था| 1987 के बाढ़ में मैं सिर्फ 6 महीने का था| हालाँकि मुझे उस बाढ़ की थोड़ी-सी धुंधली यादें है, लेकिन मेरी माँ को यकीन ही नहीं होता कि कैसे 6 महीने के उम्र की यादें हो सकती है|
2004 के बाद, मैं पहली बार बाढ़ में गाँव में हूँ| सबकुछ बहुत ही रोमांचक और अह्लाद्पूर्ण है| विदित हो कि मैं अकेला नहीं हूँ जो बाढ़ में आनंदित है| गाँव में करीब-करीब सभी लोगों का यही हाल है| सिर्फ दो-चार लोग जो अख़बार पढ़ते हैं, और उसमे लिखी बातों को गंभीरता से लेते हैं, वे आपको यहाँ दुखी दिखेंगे| बांकी पूरा गाँव आनंद से झूम रहा है| यह सब पढ़कर आप को शायद अजीब लगे, लेकिन सब जगह यही होता है| सुख का परिस्थिती से उतना संबंध नहीं है, जितना आदत और दृष्टिकोण से है| मैंने मुंबई और दिल्ली जैसे गलीज़ जगहों में, जहाँ प्रदूष्ण की वजह से सांस लेने में भी तकलीफ होती है, भी लगों को खुश देखा है| मैंने कबूतरखानों (जिन्हें लोग फ्लैट कहते हैं) में रहने वाले लोगों को भी खुश देखा है| मैंने ऐसे-ऐसे हालातों में लोगों को खुश देखा है, जिसमे खुश होने की मैं परिकल्पना भी नहीं कर सकता हूँ| इसीसे मुझे ऐसा लगता है कि सुख दुःख दोनों ही व्यख्या की बात है| प्रेमी चाँद में अपनी प्रेमिका को देखता है, और भूखा रोटी|

(और भी बहुत कुछ लिखना चाह रहा हूँ, लेकिन दाहिने हाथ की कलाई में दो-तीन दिन से बड़ा दर्द रह रहा है, इसीलिए लिखने को यहीं विराम देता हूँ|)  

बॉयफ्रेंड की बात अधिक चोट करती है|

प्रश्न- सर, एक बात है, हम आपसे शेयर करना चाहते हैं, कोई भी बात का कई साइड होता है, तो अगर कोई मेरे अपोजिट साइड पे बात करते हैं, ख़ासकर मेरा बॉयफ्रेंड तो हमारा बहुत दिमाग ख़राब होता है, और ये सारी बाते पॉलिटिक्स पर होती है, और हम दोनों एक दूसरे के अपोजिट होते तो हमें बहुत गुस्सा आ जाता है, हमें समझ नहीं आता हम क्या करे...

इक्क्यु- बहुत सी बातें हैं, जो आपको समझनी होगी| पहली बात तो यह कि जीवन में सब कुछ एक वर्तुल में घूमता है, जैसे सूरज को ही देखिये, रोज सुबह निकलता है और शाम को डूब जाता है, सूरज की ही तरह चाँद, तारे, पृथ्वी और मौसम सभी चीज़े एक वर्तुल में घूम रहे हैं| जो बाहर के सम्बन्ध में सच है, वही भीतर के संबंध में भी सही है| हमारे मन के सभी भाव और विचार एक वर्तुल में घुमते हैं|
अब आप एक काम कीजिए अपने पास एक नोट-पेड रखिए, और जब आपको गुस्सा आए तब उसे दिन, डेट और समय के साथ नोट कर लीजिए| जैसे- सोमवार, 23 तारिक को मुझे शाम के पांच बजे गुस्सा आया था| ऐसा आप एक-से-तीन महीने तक करिये| तीन महीने बाद आप यह जान कर हैरान हो जाएंगी कि आपके गुस्से का एक पैटर्न है| वह हर महीने तय दिन, तय तारिक और तय समय पर आता है| जैसे अगर सितम्बर में आपको 3 से 7 तारिक के बीच आपको अधिक गुस्सा आया था, तो अगस्त में भी 3 से चार के बीच ही आपको अधिक गुस्सा आएगा| फिर हर महीने के कुछ ऐसे दिन भी होंगे जिस दिन चाहे कुछ भी हो जाए, दुनिया इधर की उधर हो जाए आपको गुस्सा नहीं आएगा| तीन महीने के प्रयोग से आपको यह साफ़ हो जाएगा कि गुस्सा का बाहरी कारण से कोई सम्बन्ध है| मन को जब गुस्सा करना होता है, तब वह बाहर कारण खोज लेता है|
यह एक बुनियादी भ्रम है कि गुस्सा बाहरी कारणों की वजह से आता है, अगर कारणों को मिटा दिया जाए तो गुस्सा आना बंद हो जाएगा| ऐसा कभी नहीं होता है| अगर एक कारण को मिटा दिया जाए, तो मन दूसरा कारण ढूँढ लेता है| जिसको गुस्सा करना है, उसके लिए कारण सदा मौजूद है| और जिसको गुस्सा नहीं करना है, उसको कोई कारण भी उकसा नहीं सकता है| बुद्ध के मुंह पर कोई थूक कर चला जाता है, और बुद्ध मुस्कुराते रहते हैं| और हमें देख कर कोई अगर मुस्कुरा भी देता है, तो हम गुस्से से भर जाते हैं| इसीलिए ऐसा मत सोचिये कि आपका बॉयफ्रेंड आपका विरोध करता है, इसलिए आपको गुस्सा आता है| मामला ऐसा है कि जब आपको गुस्सा करना होता है, तब आपको आपकी बॉयफ्रेंड की बातों में विरोध दिखने लगता है|
जैसे अगर कोई खाली कुँए में बाल्टी डालें, तो बाल्टी खाली ही बाहर आएगा, वैसे ही जब आपके भीतर गुस्सा नहीं होगा तो कोई चाहे कुछ भी कर ले आपको गुस्सा नहीं आएगा| इस समझ के साथ ही कि गुस्सा मेरे भीतर है, बाहर मैं इसे आरोपित कर रह रहा हूँ, गुस्सा ख़त्म होने लगता है|
गुस्से के संबंध एक और बात समझने जैसी है, गुस्सा हम सदा अपने से कमज़ोर पर प्रगट करते हैं| अगर आपको आपके ऑफिस में बॉस आपसे कुछ कह दे, तो आप वहां गुस्से को प्रगट नहीं करेंगी, घर आकर अपने छोटे भाई, नौकरानी या फिर किसी निरीह और कमज़ोर व्यक्ति पर आप उसे प्रगट कर देंगी|
अगर गुस्सा कभी प्रगट ही करना हो, तो ऐसी चीज़ों पर करना चाहिए जिस पर आपके गुस्से का कम-से-कम असर हो| सबसे से अच्छा है, आपका तकिया| अगली बार जब आपको गुस्सा आए तो किसी व्यक्ति पर प्रगट करने के वजाय उसे तकिये पर प्रगट कर दें| जब हम किसी व्यक्ति पर गुस्सा प्रगट करते हैं, तो एक दुष्ट-चक्र निर्मित होता है| अगर सामने वाला व्यक्ति आपसे कमज़ोर है, तो वह आपकी सुन लेगा और फिर वह अपने से किसी कमज़ोर पर उसे प्रगट करेगा| इस तरह से एक दुष्ट-चक्र निर्मित हो जाता है| और अगर सामने वाला व्यक्ति बराबरी वाला है, जैसे कि आपका बॉयफ्रेंड, तो फिर वह पलट वार करेगा| फिर रिश्ते में कलह बढ़ेगी| इसीलिए ज़रूरी है कि पहले आप गुस्से की यांत्रिकता को समझें, इसके पैटर्न को देखें फिर इसे धीरे-धीरे अपने भीतर से खत्म करें| शुरू में इसे तकिये पर निकालें, फिर आकाश में फेंक दें| फिर बाद में सिर्फ इतना बोध कि ‘मुझे गुस्सा आ रहा है’ आपके गुस्से को प्रगट होने से पहले ही खत्म कर देगा|
जब तक आप जिम्मेवारी दूसरों पर थोपती रहेंगी, तब तक इस से मुक्त नहीं हुआ जा सकता है| कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थीती जिम्मेवार नहीं है| व्यक्ति, वस्तु और परिस्थीती का प्रभाव हम पर तब तक ही पड़ता है, जब तक हम बेहोश हैं| जैसे ही हम जागने लगते हैं, हम एक्सटर्नल इन्फ्लुंस से मुक्त होने लगते हैं| आप कुछ भी करके बुद्ध के भीतर गुस्सा पैदा नहीं कर सकती हैं, और इसका विपरीत भी सच है कुछ भी करके हम बुद्दू को शांत नहीं कर सकते हैं| कितने ही आइडियल सिचुएशन में आपको रख दिया जाए, लेकिन अगर आपके अन्दर गुस्सा है, तो वह निकलेगा ही| गुस्से वाला व्यक्ति स्वर्ग में भी नर्क निर्मित कर लेता है| और जो शांत है वह नर्क को भी स्वर्ग बना लेता है|
अंतिम बात- जब कोई हमारा विरोध करता है, तो ज़रूरी नहीं है कि वह हमारा विरोध कर रहा हो, हो सकता है वह सिर्फ हमारी बातों का विरोध कर रहा हो| लेकिन शरीर और मन के तरंगों (विचारों) से हमारा तादात्म्य इतना गहरा होता है कि कोई जब हमारे शरीर और हमारी मान्यताओं के खिलाफ कुछ कह देता है, तो हम तिलमिला जाते हैं| रमण महर्षि कहा करते थे, “So long as you are identified with your thoughts and body, you have to suffer.” बॉयफ्रेंड की बात अधिक चोट करती है, क्योंकि उससे अपेक्षा अधिक है| और अपेक्षा सदा दुःख लाती है| अपेक्षा एक घनचक्कर है| अगर यह पूरी हो तो भी दुःख ही लाती है, “इतना तो होना ही था, इसमें क्या बड़ी बात है, यह तो मैं पहले से जानता था”| और अगर न पूरी हो तो भयंकर दुःख लाता है| इसीलिए अपेक्षा में जीने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो पाता है|

Sunday, 21 July 2019

मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा



“कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा”
-अहमद नदीम क़ासमी

“Planning for the future is like going fishing in a dry gulch; nothing ever works out as you wanted, so give up all your schemes and ambitions. If you have got to think about something ~ Make it the uncertainty of the hour of your death.” - The Tibetan Book of Living and Dying

'तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाईंग' पढ़ने के बाद मैंने फेसबुक पर विडियो रिव्यु शेयर किया था| लेकिन किसी तकनिकी खामी की वजह से वह विडियो ठीक से नहीं चल पाया| मजबूरन मुझे विडियो हटाना पड़ा| सोचा था कि कुछ दिन बाद अपने ब्लॉग (www.ikkyutalk.blogspot.com) पर तब्सिरा डाल दूंगा| लेकिन, दिल्ली आने के बाद Milan Kundera की किताब 'The Unbearable Lightness of Being' पढ़ने में ऐसा खोया कि लिखना क्या किसी भी चीज़ का होश नहीं रहा|

What is born will die, what has been gathered will be dispersed, What has been accumulated will be exhausted, what has been built up will collapse and what has been high will be brought low.” -The Tibetan Book of Living and Dying

Sogyal Rinpoche की किताब The Tibetan Book of Living and Dying (1992)' एक समयातीत किताब है| यह किताब उन सब लोगों के लिए 'must read' है, जिनको एक दिन मरना है| फिर यह फर्क नहीं पड़ता की आप किस धर्म या मजहब से ताल्लुक रखते हैं| नास्तिक, आस्तिक, अस्तित्ववादी और अज्ञेवादी सभी के लिए यह किताब समान रूप से पठनीय है| जैसे बीमार का इलाज़ दवाई है, उसी तरह मरने वालों का इलाज़ यह किताब है| आपने लोगों को यह कहते हुआ सुना होगा कि "मौत का कोई इलाज़ नहीं है", लेकिन मैं आप से कहता हूँ 'मौत का इलाज़ है' और वह इलाज है- 'तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाईंग'|

“This world can seem marvellously convincing until death collapses the illusion and evicts us from our hiding place.” - The Tibetan Book of Living and Dying

अगर आप एक दिन (और वह एक दिन कभी भी आ सकता है) मरने वाले हैं, तो मरने से पहले यह किताब एक बार ज़रूर पढ़ लीजिए| यह किताब मृत्यु की यात्रा पर जा रहे यात्रियों के लिए पाथेय है| बच्चन जी ने कहीं गाया है, "इस पार प्रिय तुम हो, मधु है, उस पार न जाने क्या होगा", अगर आपके मन को भी यही भय पकड़ता है, तो यह किताब न सिर्फ आपको उस पार की ठीक-ठीक ख़रब देगी, बल्कि शरीर में रहते हुए, मौत में प्रवेश करने की कला भी सिखाएगी| फिर मौत को जानने के लिए आपको सुकरात की तरह उस शुभ घड़ी का इंतजार नहीं करना होगा, जब मौत आपके दरवाज़े पर दस्तक देगा| इस किताब को बढ़ने के बाद आप ख़ुद ही रोज़ मौत के दरवाज़े पर दस्तक देने लगेंगे|
एक दिन मौत में जो घटेगा, वह प्रति दिन नींद में घटता है| नींद तो क्या वह प्रति पल घट रहा है| दो विचारों के बीच जो अन्तराल है, वह उस अन्तराल में घट रहा है| हर उच्छ्वास में घट रहा है| सिर्फ मूढ़ मौत को भविष्य में देखते हैं, ज्ञानी उसे हर पल जीवन के साथ क़दम-से-कदम मिलाकर साथ चलता हुआ देखता है|

“The gift of learning to meditate is the greatest gift you can give yourself in this life. For it is only through meditation that you can undertake the journey to discover your true nature, and so find the stability and confidence you will need to live, and die, well. Meditation is the road to enlightenment.”
यह किताब आपको वह दृष्टि देगी, जिससे आप मौत और जीवन को एक साथ देख पाएंगे| फिर आप ऐसा नहीं कहेंगे कि जीवन के एक छोड़ पर जन्म है और दूसरे छोड़ पर मृत्यु| यह भ्रांत दृष्टि है, अस्तित्व में जीवन और मौत दो विपरीत चीज़ें नहीं है| मौत एक क्षण के लिए भी जीवन से जुदा नहीं है|
जब तक हमारी दृष्टि इतनी गहरी नहीं जो जाती है कि हम जन्म में छिपे मृत्यु को देख सकें, तब तक जीवन से दुःख का नाश नहीं हो सकता है| ओशो कहते हैं, "मरघट को गाँव से बाहर बनाकर तुमने बहुत बड़ी ग़लती की हैं, मरघट गाँव के बीचो-बीच होना चाहिए| ताकि तुम्हारे जीवन में प्रति पल मौत का बोध बना रहे|" मन मौत को झुठलाने की पूरी कोशिश करता हैं| हमारे जीवन का सारा आयोजन मौत को चकमा देने का आयोजन है| लेकिन हम कितना ही क्यूँ न भाग लें, मौत से नहीं बचा जा सकता है| अपने छाया से दूर आदमी कैसे भाग सकता है?
जो जानते हैं, उनका कहना है कि भागने में ही भूल है| क्योंकि जिन्होंने भी ठहर कर मौत के आँखों में आँखें डालकर देखा है, उनका कहना है कि इस जगत में जन्म और मृत्यु से ज्यादा झूठी चीज़ और कुछ भी नहीं है| सारा धर्म मौत के आँखों में आँखे डाल देखने की कला के सिवाय और कुछ भी नहीं है| अगर मृत्यु न हो तो आदमी कभी धर्म में उत्सुक न हो| ओशो की 'मैं मृत्यु सिखाता' पढ़ने के बाद से ही मेरे जीवन में धर्म का सूत्रपात हुआ था| अंसल प्लाजा के 'ओशो गैलरी' से खरीदी हुई यह मेरी पहली किताब थी| कुछ दिन बाद मैंने इसी किताब का ऑडियो प्रवचन भी खरीदा था| प्रवचन के अंत में ओशो 'मृत्यु ध्यान' करवाते हैं, “शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें, छोड़ दें, शरीर गिरता है तो गिर जाने दें, और भाव करें की आप मर रहे हैं...ख़ुद को चिता पर जलता हुआ देखें, आपने प्रियजनों को रोता हुआ देखें........” रोज रात सोने से पहले मैं वह ध्यान किया करता था|
अपने इंस्टिट्यूट में जहाँ मैं बैठता था वहां मैंने के सामने दीवार पर 'I am going to die next moment (मैं अगले क्षण मरने वाला हूँ).' लिखकर चिपका रखा था| इसस प्रयोग का मुझ पर बड़ा गहरा असर पड़ा था|

शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर घूसा लेने से आप मृत्यु से नहीं बच जाएँगे | विश्वास की नाव में बैठकर उस पार की यात्रा नहीं की जा सकती है| समय रहते तैयारी शुरूकर दीजिए| विश्वास की नाव कागज़ की नाव है, अपने अनुभव की नाव तैयार कीजिए| आइये हम सब सोगयाल रिन्पोचे की नव में बैठकर मौत के उस पार चले|
                                                                      ‘निमंत्रण’
PRACTICING AWARENESS IN DAILY LIFE


(OSHO MEDITATION CAMP)


From 31st August to 4th September.


Facilitated by Swami Dhyan Viram (Ikkyu Tzu)


Place- In Manali, Osho Neo Vipassana Meditation Center


Limited seats. Advance booking only.


For booking call at +91 8839996078


”You have more time than any age, and you are not exhausted because of the world. You are exhausted because you have lost the inner contact- because you do not know how to go deeper in your self and be revitalized.”- Osho

Always recognize the dreamlike qualities of life and reduce attachment and aversion. Practice good-heartedness toward all beings. Be loving and compassionate, no matter what others do to you. What they will do will not matter so much when you see it as a dream. The trick is to have positive intention during the dream. This is an essential point. This is true spirituality.’ - The Tibetan Book of Living and Dying


Tuesday, 16 July 2019

सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है

मित्र,
मानसिक हानि जैसी कोई चीज नहीं होती है| शरीर बच गया तो समझिये सब बच गया| शरीर और मन दो अलग-अलग चीज़े नहीं हैं| मन को ठीक करने की ज्यादा फिकिर मत लीजिए| मन जैसा भी, उसे वैसे ही स्वीकार कीजिए| ‘मन’ गंदे पानी जैसा है| गंदे पानी को जितना आप साफ़ करने की कोशिश कीजिएगा, वह उतना ही गंदा हो जाएगा है| कोशिश करने की वजह से ही गन्दा हो जाएगा| बस उदासीन होकर ‘विचारों’ को देखिए, करना कुछ भी नहीं है| ‘मन’ यानि भीतर चलने वाला विचार| आप कहते हैं, "ख़ुद को बदलना है, मन को ठीक करना है, मुझे अच्छा आदमी बनना है, बहुत हानि हो गई है", यह सब भी तो विचार ही है, की नहीं है? जो मन को बदलना चाहता है, वह भी मन ही है| चेतना सदा द्रष्टा है, साक्षी है| ‘उस’ साक्षी तत्व के प्रति जागिये| मन के प्रति उदासीन होइए| बस यह जानते रहिए कि मेरे भीतर अभी इस तरह के विचार चल रहे हैं| विचार का संबंध हमेशा भूत और भविष्य से होता| और शरीर सदा वर्तमान में होता है| इसीलिए जैसे ही आप शरीर के प्रति बोध से भरेंगे, विचार कम होने लगेंगे| ‘इनर बॉडी ध्यान’ की भी यही उपयोगिता है| शरीर का एंकर की तरह इसेमल कीजिए| जैसे एंकर जहाज को किनारे से बाँध कर रखता है, वैसे ही शरीर का बोध आपको वर्तमान से बाँध कर रखेगा|
अपने सुनने की क्षमता को विकसित कीजिए| कभी, आप जहाँ भी बैठे हों, उसके आसपास जितनी भी आवाज़े हो उसको सुनिये| सुनना बहुत ही अद्भुत चीज है, क्योंकि सुनना और सोचना एक साथ नहीं हो सकता है| इसी तरह कान के साथ साथ आपनी बांकी इन्द्रियों के प्रति भी होश को साधिये| शरीर जितना शुद्ध होगा, मन उतना ही पारदर्शी हो जाएगा| इसीलिए मैंने आपसे योग़ और प्राणायाम करने को कहा| किसी अच्छे योगी से अगर आप योग सीखते हैं, तो वह आपको हर क्रिया को होशपूर्वक करने और सांस के प्रति जागरूक रहना सिखाएगा|
पोर्न से मुक्त हो कर आपने ख़ुद को नया जन्म दिया है| पूरी दुनिया में लाखो लोग हैं, जो अपनी इस आदत की वजह से सड़ रहे हैं| शारीरिक का सेक्स बहुत ही पवित्र चीज़ है, लेकिन मानसिक सेक्स रोग है| क्योंकि ‘मन’ ही रोग है|
आप, अब, अपने बारे में ज्यादा चिंता मत लीजिए| आप इस नर्क से निकल चुके हैं| अब अपना अनुभव लोगों के साथ शेयर करके, उनको इस नर्क से निकालने की कोशिश में लगिए| आपने दोस्तों, परिचितों को पोर्न देखने के ख़तरनाक परिणाम के बारे में बताइए| जो बोध और ज्ञान आपको मिला है, उसे दूसरों से बांटिये...
जो प्राणायाम आप कर रहे हैं, वो पर्याप्त है| उसको जारी रखिये| बस यह सब गंभीर हो कर मत कीजिए, हल्के होइए| दिन में कुछ समय अगर संभव हो तो, छोटे बच्चों के साथ बिताइये| उनके साथ खेलिए...इससे आपकी गंभीरता थोड़ी कम होगी..


योग के मामले में बाबा रामदेव सही हैं| लेकिन चूँकि आप उनकी विडियो देख कर करते हैं, इसीलिए आप ग़लत कर रहे हैं, या सही, इसका पता लगाना मुशिकल है| अगर समय हो तो किसी प्रतिष्ठित योग-स्कूल से कुछ दिन का कोर्स कर लीजिये| संदीप महेश्वरी के संबध में मेरे विचार कुछ ज्यदा अच्छे नहीं हैं| इसलिए उनकी विधि के बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं दूंगा|
सुनने की क्षमता विकसित करने से मेरा मतलब था, आवाज़ के प्रति जागरूक होना| निरंतर आ रही आवाज़ को धीरे-धीरे हम भूल जाते हैं, जैसे जब आप फैन on करते हैं, तो आपको फैन की आवाज़ सुनाई देती है, लेकिन थोड़े समय बाद आप उसे भूल जाते हैं| इसी तरह ‘शब्द’ को हम सुनते हैं, लेकिन दो शब्दों के बीच जो अन्तराल होता है, उसे के प्रति हम जागरूक नहीं होते हैं, जबकि अंतराल उनता ही महत्वपूर्ण है, जितना कि ‘शब्द’| ओशो का एक 15 मिनट का ‘सुनना ध्यान’ है, शायद उसकी ऑडियो आपको यूटूब पर मिल जाए, अगर ना मिले तो मुझे बताइयेगा, मैं मेल कर दूंगा| उस प्रयोग को कभी-कभी कीजिए|
एक और प्रयोग है, जिसे आप लोगों से बात करते समय कर सकते हैं| बात-चीत के दौरान, दो वाक्यों के बीच जो गैप होता है, उसके प्रति जागरूक होइए, उसको भी नोटिस में लीजिए| जैसे-जैसे आप बाहर के गैप के प्रति जागेंगे, वैसे-वैसे ही आपके भीतर भी एक गैप बनने लगेगा| आमतौर पर हमारा मन ‘ऑफ बीट’ को नहीं सुनता है, जैसे यदि में टेबल पीटता हूँ, तो टेबल को पीटने से जो आवाज़ पैदा होगी, वो तो आप सुनेंगे, लेकिन दो ध्वनियों के बीच जो मौन अन्तराल होगा, वह आपके नोटिस में नहीं आएगा| और अगर मैं टेबल लगातार पीटता ही चला जाऊं, तो थोड़ी देर में आपको वो भी सुनाई नहीं देगा|

Monday, 15 July 2019

जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं..

(प्रश्न लम्बा और बहुत ही ज़्यादा व्यक्तिगत था, इसीलिए प्रश्न छोड़कर उत्तर का कुछ अंश आपके साथ share कर रहा हूँ।)
इक्क्यू-अपनी ग़लती को स्वीकारना, इस जगत की बड़ी-से-बड़ी घटनाओं में से एक| यह अघट सदियों में कभी एकाध बार घटता है| अपनी ग़लती स्वीकारना यानि बुद्धत्व की ओर कदम बढ़ाना| 'मेरे साथ जो भी हो रहा है, और जैसे भी हो रहा है, इसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ', यह बुद्धत्व से ठीक पहले की उद्घोष है... इस के बाद बस एक ही घोषणा रह जाती है, 'अहम् ब्रह्मास्मि'| बस बात खत्म हो गई..अपनी ग़लती को स्वीकारना ब्रह्म होने की तैयारी है...! आप अपने पिता की छोड़िये... क्या आप इस बात के लिए अभी तैयार हैं कि अपनी ग़लती को स्वीकार लें...? 'मेरे पिता मेरे साथ जैसा भी कर रहे हैं, उसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ, और-तो-और मेरे पिता जैसे भी हैं, इनके यहाँ जन्म लेने का निर्णय मेरा ही था, चाहे यह बात मुझे पता हो या न हो..', ऐसा कह पाएँगे आप? मिरदाद कहते हैं, "तुम्हारी नाक पर अगर एक मक्खी भी बैठती है, तो वह तुम्हारी मर्ज़ी से बैठती है| जैसे तुम को पता नहीं है कि तुम कैसे खाना पचाते हो, लेकिन तुम ही पचाते हो, तुमको मालूम नहीं कैसे तुम बाल बढ़ाते हो, लेकिन बढ़ाते हो, तुमको मालूम नहीं कि कैसे तुम लहू को नसों में दौड़ते हो, लेकिन तुम ही दौड़ते हो? इसी तरह बहुत कुछ है जो तुम अचेतन रूप से चाह लेते हो, जिसक तुम्हे कुछ पता ही नहीं| तुम्हारे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है, जो तुमने कभी चेतन और अचेतन रूप से नहीं चाहता हो...यह जगत तुम्हारी वासनाओं का विस्तार है|"... मिरदाद ठीक ही कहते हैं... यह जगत हमारी वासनाओं का विस्तार है.. इसे हमने अपनी मर्ज़ी से चुना है... दुःख हमारा चुनाव है, आपके पिता आपके चुनाव है... वह आपके साथ जैसा भी व्यवहार करते हैं, उस व्यवहार को स्वीकार करना या फिर अस्वीरकर करना आपका चुनाव है.. फिर वो गाली दे सकते हैं, गाली आपको लेनी है या नहीं लेनी है यह आपके निर्णय पर निर्भर करता है.. कोई भी इस जगत में आपको आपकी मर्ज़ी के बगैर सुखी या दुखी नहीं कर सकता है.. | 


अब प्रश्न यह उठता है कि अगर सब कुछ हमारा चुनाव ही है, और जो भी हमारे साथ हो रहा है उसको हमने अचेतन रूप से चुना है.. तब तो हम अचेतन रूप से कुछ भी चुन सकते हैं... हम आत्मघात चुन सकते हैं.. फिर इससे मुक्ति कैसे मिले? मुक्ति का मार्ग है..और वह है स्वीकार... जैसे ही आप जो है उसको स्वीकार कर लेते हैं, तो आपकी लड़ने में जो उर्जा खर्च हो रही थी, वह जागरण बनने लगता है... और धीरे-धीरे आप उन सब वासनाओं के प्रति जागने लगते हैं, जिन्हें अब तक आप अचेतन रूप से चाह रहे थे| इसीलिए साधक को जो भी है, उसे बिना किसी शिकायत के अहोभाव के साथ चुनाव करना चाहिए... अगर आपको देखकर कोई गाली देता है, तो सोचना चाहिए मैंने ही चाहा होगा.. दोस्तोवस्की तो यहाँ तक कहते थे कि दुनियां में अगर भी कुछ भी गड़बड़ हो रहा है, गलत हो रहा है, उस सब में आपकी जिम्मेवारी है| ऐसा होना भी चाहिए... हम सब में हैं, और सब हम में है... स्वामी राम कहते थे कि सूरज और चाँद को भी हम ही चला रहे हैं, सब हमारी मर्ज़ी से चल रहे हैं.... | 
जब तक हम अशांत हैं तब तक लोग हमें अशांत करते हैं, जिस दिन बुद्ध की भांति हम स्थिति-प्रज्ञ होकर अंगुलिमाल के सामने खड़े हो जाते हैं, उस दिन अंगुलिमाल ठिटक जाता है, और उसे हाथ से कटार गिर जाता है.. 
सुख और दुःख दोनों में अपने भीतर उस तत्व की तलाश कीजिए जो दोनों से विचलित नहीं होता है... अपने दुश्मन का चुनाव होश पूर्वक करना चाहिए.. क्योंकि जिससे भी हम लड़ते हैं देर अबेर उसी के जैसे हो जाते हैं... अपने पिता में ज्यादा मत उलझिए अन्यथा अंत में आप उन्ही के जैसे हो जाएंगे...

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...