Sunday, 14 July 2019

बारिश, पहाड़ और आरुषी


iKKyuTzu Kensho, [24.06.19 20:19]
आरुषी, मैं जिनके यहाँ ठहरा हुआ हूँ उनके बड़े बेटे विकास (बदला हुआ नाम) की ४ वर्षीया बेटी, अपने बुआ से लड़ रही है। कभी किसी बात पर चिल्लाने लगती है, तो कभी कोई गीत गाने लगती है। ले.. अब अपनी गाड़ी में बैठकर दादी के आस-पास चक्कर लगा रही है। वहीं उसकी माँ गेहूँ से कंकड़ निकाल रही हैं। और उसकी दादी खुले आँगन में बैठकर ऊन का स्वेटर बुन रही है। और मैं, इक्क्यु केंशो तजु, बरामदे में बैठकर ग्रीन-टी पी रहा हूँ। अभी बस दो मिनट पहले राव साहब यहाँ से उठकर अपने कमरे में गए हैं। तबियत ख़राब होने की वजह से उन्हें बाहर ठंड लग रही थी। दिव्या भी कमरे में बैठी है, शायद लैप्टॉप पर कुछ काम कर रही हैं। ये देखिए...., अदिति के दादा हाथ में बाल्टी लिए कहीं से लहराते हुए आ रहे है। शायद गाय को पानी पिला कर आ रहे हैं। आरुषी की मम्मी ने अपने ससुर को देखकर सिर पल्लू से ढक लिया है। आरुषी के दो चाचा हैं, और दोनो अपने आप में एक केरेक्टर हैं। बड़ा चाचा प्रकाश (बदला हुआ नाम), जिस दिन से मैं यहाँ आया हूँ (मुझे यहाँ आए आज २२ दिन हो गया), पिली टीशर्ट और छोटा वाला चाचा पप्पू एक ग्रीन टीशर्ट पहनकर घूम रहा है। राव साहब ने दोनों का नाम चमड़ी रख दिया है। वैसे यहाँ आकर राव साहब को भी एक नया नाम मिला है। उनकी दिलफेंकी वाली आदत को देखते हुए, मास्टर उगवे ने उन्हें बबूचक’ बुलाना शुरू कर दिया है। अल्लाह जाने ये ‘बबूचक’ का क्या अर्थ होता है।
आरुषी की बड़ी बुआ की भी मुझे कोई कहानी लगती है। छोटी के बिल्कुल विपरीत वह अक्सर शांत-शांत और थोड़ी उदास जैसी रहती है। उनके चेहरे को देखकर लगता हैं कि वो किसी गहरे ग़म में जी रही है| हो सकता है, मेरा अनुमान ग़लत हो..गॉड नोज़ क्या सच है| अरे....ये देखिए बारिश शुरू हो गई। पूरा पहाड़ बादलों से ढक गया है। मेरे मेज़बान यानि आरुषी के दादा पानी गिरता देख कोई पहाड़ी गीत गुनगुना रहे हैं। वैसे उनके मयनोशी का वक़्त भी हो चला है। आप रोज़ शाम को जाम पीते हैं। ७० के क़रीब उनकी उम्र है, सिर पर पहाड़ी टोपी पहनते हैं, और अक्सर हाथ में सिगरेट जलाए इधर-से-उधर घुमते रहते है, सेहत से बड़े फ़िट और दुरुस्त हैं। बारिश से बचने के लिए आरुषी की दादी भी आँगन से उठकर अपने कमरे में जा रही है| आरुषी ऊन का गोला उठाए उनके पीछे-पीछे चल रही है| अपने नन्हे हाथों से बड़ी मुश्किल से गोले को संभाल पा रही है| मुझे अपना बचपन याद आ गया| माँ को स्वेटर बुनने का बहुत शौक है| कभी जब ऊन का गोला उनकी गोद से लुढ़ककर नीचे चला जाता था, तो हमें उठाकर लाने के लिए कहती थी| आरुषी की तरह मैं भी बड़ी मुश्किल से बड़े गोले को अपने हाथों में संभाल पाता था| वो कथई रंग की स्वेटर जो माँ ने मेरे लिए बुनी थी, मुझे आज भी याद है| माँ ने गलती से गला छोटा बुन दिया था| बड़ी मुश्किल से मेरा सिर उसमे घुस पाता था, पहना और निकालना दोनों किसी कवायत से कम नहीं था| फिर भी बहुत सालों तक मैंने उसे पहनता रहा था| साइकल सीखते समय जिस दिन मेरा हाथ टूटा था, उस दिन भी मैंने वही स्वेटर पहन रखा था| बाद में जब स्वेटर मुझे छोटा होने लगा, तो माँ ने उसे उधेड़कर साकेत के लिए, नहीं शायद सुरुचि के लिए उसका स्वेटर और टोपी बुन दिया| जब हम थोड़े बड़े हो गए, तो हमें हाथ से बुना हुआ स्वेटर पहनने में शर्म आने लगी| अब सब बाजार से स्वेटर खरीद कर पहनने को अच्छा मानने लगे थे| जमाना बड़ी तेजी से बदल रहा था| कुछ दिनों तक माँ जबरदस्ती हाथ से बुना हुआ स्वेटर और टोपी पहना देती थी| लेकिन बाद में हमारे जिद के आगे हार मान गई| और फिर ऐसा भी हुआ कि ज्यादा देर बुनाई करने से उनको आँखों में तकलीफ होने लगती थी|
मेरे सामने टेबल पर आज का अख़बार (जिसे पढ़कर मैं सुबह से दुखी हूँ), केले का छिलका, चाक़ू, ग्रीन-टी का कप और सोग्यल रिंपोचे की विश्व प्रसिद्ध किताब ‘The Tibetan book of Living and dying’ पड़ी है। आधी से ज़्यादा किताब ख़त्म कर चुका हूँ। १० दिन पहले तुषिता की लाइब्रेरी से ६०० रुपया जमा कर के, १० रुपये सप्ताह किराए पर किताब इशू कराया था। सोचा था ४०० पेज की किताब है ४ दिन में पढ़कर लौटा दूँगा। लेकिन किताब इतनी प्रफ़ाउंड है कि एकदम से निगल नहीं पाया।
किताब पूरी करने के बाद तबसिरा (www.ikkyutalk.blogspot.com) पर किताब का अनुभव आपसे शेयर करूँगा। रुकिए मुझे शाम के खाने के लिए दही लाने जाना होगा। दिव्या का आज पंजाबी करी बनाने का प्लान है। दही लेकर आता हूँ, फिर आपको आगे की कहानी सुनाऊँगा।
लीजिए मैं दही लेकर आ गया। अरूषी अब फूल के गुलदस्ते से खेल रही। गुलदस्ते में दो फूल है, एक का रंग हरा है दूसरे का पीला। मज़ा यह है कि आरूषी ने जो कपड़े पहन रखें हैं, उसका रंग भी हरा और पीला है।
दही लाने दिव्या भी मेरे साथ गई थी। हम तुषिता तक गए थे। अभी जहाँ हम ठहरे हुए हैं, वहां से तुषिता पहुँचने में २ से ३ मिनट लगते हैं| तुषिता के मेन गेट के बाहर ही हिमालय टी शॉप है (धर्म कोट में सबसे अच्छी और सस्ती चाय यहीं मिलती है), वहीं से दही लिया। जाते समय रास्ते में एक चीज़ देख कर बड़ा हैरान हुआ कि अपनी छतरी के नीचे दिव्या आरुषी के दादा की तरह गाना गुनगुनाने लगी, ‘घर से निकलते ही कुछ दूर.....’। ऐसे तो कभी नहीं गाती है। लगता है बारिश और संगीत का कोई गहरा व अनूठा सम्बंध है। रुकिए अँधेरा घिरने लगा है, कान और पैर को ढकने के लिए कुछ पहन लेता हूँ। वैसे भी यहाँ नंगे पैर घूमना ठीक नहीं है। कुछ दिन पहले मेरे बिस्तर पर एक बिच्छू बैठा हुआ था। रास्ते पर बिच्छू को कई बार यूँ ही टहलते हुए देख चुका हूँ।
चित्र साभार-गूगल
ओह! झींगुर की आवाज़ आनी शुरू हो गई..रात के सन्नाटे में मुझे झिंगरों का ब्रह्मनाद सुनना बहुत पसंद है। गाने की आवाज़ थोड़ा कम करना, ये मैं दिव्या से कह रहा हूँ। वह अंदर कमरे में जगजीत सिंह को सुन रही है। खाना बनाते समय उसे संगीत सुनने की आदत है। मुझे याद है जिस दिन जगजीत सिंह ने इस दुनिया से विदा लिया था, मैं मुंबई में था। कांदीवली से चारकोप सेक्टर -८ की बस में बैठने के लिए, बस स्टॉप पर लाइन में खड़ा था। मेरे एक दोस्त ने तभी फ़ोन करके मुझे जगजीत सिंह जी के शरीर छोड़ने की ख़बर दी। (खो..खो...खो... माफ़ कीजिएगा, किसी दोस्त ने फ़ोन नहीं किया था, वो वही थी जिसकी कहानी मैंने 'डोंट आस्क मी वेन' में लिखा है|) मैं वहीं बस की लाइन में खड़े-खड़े रोने लगा। काफ़ी दिनों तक उनकी मौत पर उदास रहा था। लेकिन, इस वक़्त पहाड़ के इस गहन मौन में उनकी गीतों से ज़्यादा मैं झींगुरों सुनना पसंद करूँगा।
आरुषी के बड़े चाचा, प्रकाश जी (अभी नाम देखकर याद आया पी-से पीला, पी से प्रकाश), अभी उसे गोद में उठाकर आँगन में घूमा रहे हैं। इस वक़्त उन्होंने अपने पीले टीशर्ट के ऊपर एक पीला जैकेट पहन रखा है। लगता है जैसे कर्ण को वरदान में कवच मिला था, वैसे ही किसी ने इनको पीला टीशर्ट दे दिया है। कमरे से पकौड़ों की ख़ुशबू आ रही है, अब मैं और नहीं लिख सकता हूँ। लाइव राइटिंग यहीं बंद करके पकौड़े खाने जा रहा हूँ।

पुनश्च- बारिश थम गई है। आरुषी अपनी दादी के साथ भंसाघर में बैठी है| राव साहब अपने कमरे में बीमारी का बहाना करके लेटे हैं, और लड़कियों से चैट कर रहे हैं। अदिति की छोटी बुआ गाय को चारा खिलाने जा रही है। आरुषी के दादा अपने दोस्त के साथ जाम का मज़ा ले रहे हैं। पहाड़ बिल्कुल शांत और मौन खड़ा है। आकाश में काले बादल छाए हुए हैं। मेरे सामने खड़े पेड़ का एक भी पत्ता नहीं हिल रहा है। शायद वह अभी ओशो सक्रिय ध्यान के चौथे चरण में खड़ा है। दिव्या अभी कमरे में गाना सुन रही है, ‘मैंने सोचा न था....। आरुषी के आँगन में बने मंदिर की बल्ब टिमटिमा रहे हैं। बल्ब की टिमटिमाहट देखकर मुझे अपनी बा (दादी) की याद आ रही, वो भी सालों से इसी तरह टिमटिमा रही ही, ख़ुदा जाने कब ऑफ हो जाएगी|


No comments:

Post a Comment

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...