Monday, 4 November 2019

बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है (महा-प्रयोग डे- 4 & 5)

परसों पीवीआर पर कॉफ़ी पीने गया था| एक छोटा-सा लड़का एक मरे हुए चूहे को हाथ में लेकर सबको डराने की कोशिश कर रहा था| चूहा आकर में काफी बड़ा था, वह उसके पूछ को पकड़कर बैठे हुए लोगों पर उछाल रहा था| उसी लड़के के साथ एक और लड़का था, जो लोगों को पहले आगाह कर दे रहा था, "वो देखिये वह चूहा लेकर आपको डराने आ रहा है|" लोग डरने से पहले संभल जाते थे, इसीलिए संभल-संभल कर डरते थे और डर-डर कर संभलते थे| यह एक अच्छा खेल था, लेकिन मुझे इस तरह का खेल देखना पसंद नहीं है| मैं चूहों से नहीं डरता, इसीलिए मैंने कभी बिल्ली नई पाली| चूहे और बिल्ली दोनों (लिखता भले ही 'दोनों' हूँ, लेकिन मैं बोलता हमेशा 'दौनों' हूँ, बोलने में लिखने से ज्यादा गलतियाँ करता हूँ|) मुझे नापसंद है|
मौन के अलावा मैं किसी भी भाषा को ठीक से उच्चारित नहीं कर पाता हूँ| मुझे भाषओं से डर लगता हूँ| इन फैक्ट, हर बार बोलने से पहले मैं बहुत डर जाता हूँ| अक्सर बहुत बोल कर मैं अपने डर को छुपाने की कोशिश करता हूँ| लेकिन डर छुपाने से नहीं छिपता है| छिपाने की कोशिश में ही वह बाहर आ जाता है|
मौन मेरी अपनी भाषा है, इसे मैंने किसी से सीखा नहीं है| 9 महीने तक माँ के गर्भ में रह कर मैंने इसे साधा है| माँ के गर्भ से निकल कर मैं तुरंत नहीं चीखा था, रोने से पहले थोड़ी देर 'मौन' रहा था| मौन रहना, सुनना, रोना और मुस्कुराना ये चार चीज़े मैं अपने साथ लेकर आया था| इसके लिए मैंने कहीं से ट्रेनिंग नहीं ली थी| इसीलिए मैं जब भी मौन होता हूँ, 'मैं' नहीं होता हूँ-बस 'मौन' होता है, एक समग्र मौन| माँ के गर्भ में आने से पहले मैं मौन में था-मौन के गर्भ से ही मैं माँ के गर्भ में आया था| पहली बार जब मैंने 'माँ' शब्द का उच्चार किया था, तो वह कोई शब्द नहीं था, वो मेरे मौन का विस्तार था| इस जीवन से जाने से पहले भी अंतिम बार मैं इसी शब्द का उच्चार करके अनंत मौन के गर्भ में चला जाऊँगा| मेरे बाबा ने भी ऐसे ही किया था| मरने से पहले वे कोमा में चले गए थे| उनकी आँखे हमेशा बंद रहती थी| न वे किसी से कुछ बोलते थे, न ही किसी की कोई बात सुन सकते थे| बस कभी-कभी माँ शब्द का उच्चार करते थे| मरने के बाद वे बिलकुल 'मौन' हो गए थे|
कल शाम का खाना आदित्य के यहाँ खाया था| वे गाँव से मरुआ का आटा लेकर आए थे| इधर काफी दिनों से मैं मरुआ की रोटी खाना चाह रहा था| कल मरुआ की मोटी रोटी, देशी घी और गुड़ खाकर शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी तृप्ति मिली|
पिंज़रे के तोते की तरह मैं दिल्ली में छटपटा रहा हूँ| शहर की हवा शरीर और मन के साथ-साथ आत्मा को भी बीमार कर रही है| आदमी को कभी भी ऐसी जगह नहीं रहना चाहिए जहाँ वह कहीं भी पेशाब नहीं कर सकता हो| जंगल और गाँव मुझे इस लिए पसंद है कि वहां पेशाब करने के लिए किसी विशेष नियमों का पालन नहीं करना पड़ता है| खुले में पेशाब करना एक महान सुख है। शहर हमें ऐसे बहुत से सुखों से वंचित करता हैं| अनावश्यक 'dos और don'ts में रहना मुझे पसंद नहीं है- यहाँ से चलो, यहाँ से मत चलो, ये करो, ऐसा मत करो -शहरों में इन सब बातों से मैं बहुत थक जाता हूँ| शहर मनुष्यों के लिए नहीं मशीनों के लिए हैं| वही मनुष्य शहर में रह सकता है जो मशीन बनने को तैयार हो| आदित्य का बच्चा अभी सिर्फ आठ महीने का हैं| कल उनके बच्चे को देख कर मैंने उनसे वही कहा जो वानगोग ने अपने भाई थिओ से कहा था, "बच्चे को शहर में बड़ा करना एक दंडनीय अपराध है|" आदित्य मेरी बातों को नहीं समझे, लेकिन उनका बेटा मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था|
मेरा महा-प्रयोग बहुत ही सही ढंग से सफलता पूर्वक चल रहा है| आज पांचवा दिन है, बिस्तर पर जाने का समय और मोबाइल को ऑन और ऑफ करने के मामले में मैं एकदम सही जा रहा हूँ| खाने के मामले में 2% इधर-उधर हो जाता है| बांकी प्रगोय से काफी कुछ बदल रहा है जीवन में| बदलते-बदलते एक दिन मेरा जीवन बिलकुल वैसा ही हो जाएगा, जैसा अभी हैं| बहुत बदले के बाद चीज़ें एन अपने जैसी हो जाती हैं|

Friday, 1 November 2019

जवाब दुःख की जननी है (महा-प्रयोग डे-3)

इस बार, मुंबई से रोज़ चालीस मिनट वाक करना, दाहोद से दोपहर को खाने के बाद सोना, और मेहसाणा से खाली बैठना सीख कर लौटा हूँ| महाप्रयोग के पहले दो दिन सुबह-सुबह वाक करने के लिए सिटी फारेस्ट गया था| लेकिन आज नहीं गया| ख़बर की माने तो दिल्ली में प्रदूष्ण का लेवल बहुत ही ज्यादा बढ़ गया है| कल वाक से आने के बाद मुझे भी बड़ा अजीब-सा फील हो रहा था-सर भारी हो रहा था, और सांस लेने में भी दिक्कत महसूस कर रहा था| इसीलिए आज से वाक के लिए जाना बंद कर दिया है| पुराने दिनों में लोगों ने जिस नर्क की परिकल्पना मरने के बाद आसमान के किसी सातवें लोक में की थी, उस नर्क को हमने शहरों के रूप में जमीन पर उतार लिया है| 
  
आज प्रयोग का तीसरा दिन है| कल का दिन अच्छा गुजरा| फोन समय पर ऑन और ऑफ किया था| रात सोने भी टाइम पर चला गया था| अगर कहीं कुछ चूका तो वो खाने में, परसों की तरह कल भी एक बार बिना चीनी की चाय पी| वैसे मैं कभी चाय नहीं पीता हूँ, मुझे कॉफ़ी पसंद है, पर पता नहीं क्यूं मैंने कल ख़ुद ही दिव्या से चाय बनाने को कहा| चाय पीने के बाद मैं घंटो सोचता रहा कि ऐसा मैंने क्यों किया? लाख कोशिशों के बाद भी मैं कोई ठोस जवाब नहीं ढूढ़ पाया| वैसे जवाब ना पाकर मैं काफी खुश था| अगर कोई जवाब मिल जाता तो शायद मैं दुखी हो जाता| मैं जीवन में सिर्फ उन्ही चीज़ों को लेकर दुखी होता हूँ जिसका जवाब मिल जाता है| उसके मामले में भी ऐसा ही हुआ था| जब वो एक दिन अचानक मुझे छोड़ कर चली गई, तो कुछ दिनों तक मैं बड़ा हैरान रहा था| उसका यूं अचानक बिना कुछ बताए चले जाने की वजह ढूंढता रहा| काफी दिनों तक मुझे कोई वजह नहीं मिली| महीनों तक उसका जाना मेरे लिए रहस्य बना रहा| मैं बहुत ही खुश था| इसलिए नहीं कि वह मुझे छोड़कर चली गई, बल्कि इसलिए कि मैं उसके जाने की कोई वजह नहीं ढूंढ पाया| फिर एक दिन मुझे वजह मिल गई- मेरे पास पैसे नहीं थे, और ना ही मैं पैसे कमाना चाहता था, इसलिए वो मुझे छोड़कर चली गई| फिर मैं बहुत दुखी हो गया| इसलिए नहीं कि वो मुझे पैसों की वजह से छोड़ कर चली गई, बल्कि इस लिए कि वो मुझे छोड़ कर चली गई| मुझे छोड़ कर वो जिस व्यक्ति के पास गई वह मुझसे भी ज्यादा गरीब और दरिद्र था| लेकिन वह उसके साथ खुश थी क्योंकि वह ढेर सारा पैसा कमाना चाहता था| असली सवाल 'चाह' का था| उन दिनों अगर मैंने कबीर को नहीं पढ़ा होता, तो शायद वह मुझे कभी छोड़कर नहीं जाती, 

"चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह । जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह|"-कबीर 

मुराकामी को पढ़ना काफी अच्छा लग रहा है| मेरा अनुमान सही था, मुराकामी के बारे में मैंने जैसा सोचा था वे वैसे ही निकले| मुराकामी की 'नोर्वेगैन वुड' के अलावा मेरे टेबल पर इन दिनों पांच और किताबें हैं-गीत चतुर्वेदी की 'न्यूनतम मैं, और सावंत आंटी की लड़कियां', लिओ तोल्स्तोय की 'वॉर एंड पीस', गोर्की की 'मदर', और निर्मल वर्मा की 'वे दिन'| इन पांच किताबों के अलावा टेबल एक और किताब है जो गिफ्ट रैप के अंदर बंद है| इस किताब को मैंने 'नोर्वेगैन वुड' के साथ मनवाई है| यह किताब दिव्या को उसके बर्थडे के दिन गिफ्ट दूंगा| दिव्या को उसके हर बर्थडे पर एक किताब गिफ्ट देता हूँ| अक्सर यह वो किताब होती है, जो मुझे पढ़नी होती है| 
इन छः किताबों के अलावा टेबल पर एक डायरी और दो पेन भी  हैं| यह डायरी और कलम उम्मेद स्वामी ने मुझे इस बार मेहसाणा में उपहार स्वरूप दिया| डायरी बहुत ही सुंदर है-ऊपर चमड़े की कवर है, और भीतर हैण्डमेड पेपर हैं| कलम भी मेरे पसंद की है| जबसे दिल्ली आया हूँ रोज़ कुछ-न-कुछ डायरी में लिख रहा हूँ| बहुत दिनों बाद कलम से लिखना बहुत ही सुखद लग रहा है| हालाँकि आदत छूट जाने की वजह से जल्दी ही उँगलियाँ दुखने लगती है|

पूरा दिन घर पर बैठा रहता हूँ, प्रदुषण की वजह से कहीं आने-जाने का मन नहीं करता है| कल शाम सोचा था कि पीवीआर पर कॉफ़ी पीने जाऊं, पर फिर यह सोच कर रुक गया कि वहां दूध वाली कॉफ़ी पीना पड़ेगा| बाहर की ब्लैक कॉफ़ी बहुत ही खरनाक और कड़वी  होती है| दो बार इस कड़वे अनुभव से मैं गुज़र चुका है| एक बार दो साल पहले अमोल स्वामी के साथ देहरादून में और अभी दिवाली पर पुष्कर में उम्मेद स्वामी के साथ|
पुष्कर घाट से ही लगा एक कैफ़े है 'मामासीता कैफ़े'| पुष्कर पहुँचने के बाद हम (उम्मेद स्वामी और मैं) थोड़ी देर घाट पर बैठकर बाते करते रहे| थोड़ी देर बाद हमें नींद आने लगी| हम घाट पर से उठ कर कैफ़े में आ गए|
'आप क्या लेंगे?' उम्मेद स्वामी ने मुझसे पूछा| 'लेना तो मैं ब्लैक कॉफ़ी चाहता हूँ, लेकिन ये लोग बहुत कड़वा बनाते हैं| एक बार मैंने देहरादून में अमोल स्वामी के साथ पी थी, नानी याद आ गई| चार लोटा गर्म पानी मिलाने के बाद भी वो कॉफ़ी ब्लैक से ब्राउन नहीं हुई|", मैंने उनसे मेन्यु देखते हुए कहा| "यहाँ ऐसा नहीं होगा, मैं उनसे बोल देता हूँ, आप के लिए बढियां लाइट कॉफ़ी बना देंगे|", मेरा डर दूर करते हुए उम्मेद स्वामी बोले| वेटर को बुलाकर उन्होंने मेरे लिए एक 'लाइट' ब्लैक कॉफ़ी और अपने लिए एक मसाला चाय आर्डर दिया| 
दस मिनट बाद वेटर कॉफ़ी लेकर आया है| कॉफ़ी एक ब्लैक थर्मस में बंद था| थर्मस में साथ वह एक सफेद कप-प्लेट और ब्राउन सुगर के कुछ पैकेट रख गया| उम्मेद स्वामी की चाय आने में अभी टाइम था| "भाई, ये गाना बदल कर कोई कैलासिक्ल सॉफ्ट म्यूजिक लगा दो", उम्मेद स्वामी ने वेटर से कहा| मैंने थर्मस से कॉफ़ी कप में उड़ेला, कप बहुत ही प्यारा था| कॉफ़ी का रंग देख कर मेरे चेहरे का रंग उड़ गया| मेरा अनुभव कहने लगा-यह कॉफ़ी बहुत ही खतरनाक  है| लेकिन फिर बुद्धि ने कहा-क्या पता बस ब्लैक दिख रहा हो, हो लाइट ही| मैंने आधे कप को कॉफ़ी से भरा, फिर उसमे दो पैकेट चीनी डाला-अगर कड़वा हुआ तो चीनी से थोड़ी कड़वाहट कम हो जाएगी| दो मिनट बाद मैंने पहला सिप लिया- याआआआक्क्क....!! गिलोई के जूस से भी ज्यादा कड़वा था ...येंआआआ...! दवाई की तरह जैसे तैसे मैंने उसको खत्म किया है| फिर उम्मेद स्वामी ने वेटर से कह कर दो कप गर्म पानी मंगवाया| थर्मस में गर्म पानी आया| मैंने पानी से अपने कप को भरा, फिर कॉफ़ी वाले थर्मस से दो बूँद कॉफ़ी उस पानी में डाला| कॉफ़ी वाले थर्मस में अभी जितना कॉफ़ी था उससे कम-से-कम मैं बीस कप कॉफ़ी अपने लिए तैयार कर सकता था| बचे हुए गर्म पानी से उम्मेद स्वामी ने अपने लिखे कॉफ़ी तैयार किया| "इतना कड़वा कॉफ़ी कौन पीता होगा, किसके लिए बनाते हैं ये लोग, अगर लाइट ऐसा है, तो डार्क कैसा होगा...", उम्मेद स्वामी ने मुझसे पूछा| मेरे पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं था| मैं बहुत खुश था| जवाब ढूंढ कर मैं दुखी नहीं होना चाहता था| "शायद जीवन की कड़वाहट को कम करने के लिए लोग इतनी कड़वी कॉफ़ी पीते हैं", कार में बैठते हुए उम्मेद स्वामी ने मुझसे कहा| उन्हें जवाब मिल गया था, और मैं देख सकता था कि जवाब मिलने के बाद वे काफी दुखी हो गए थे| सीट बेल्ट लगाते हुए मैंने उन्हें जीवन का एक सूत्र दिया-जवाब दुःख की जननी है| 



सावंत आंटी की लडकियाँ (महा-प्रयोग डे- 2)

कल शाम 'सावंत आंटी की लड़कियां' समाप्त हुई| किताब मुझे बहुत ही अच्छी लगी, खासकर पहली (सावंत आंटी की लड़कियां) और अंतिम (साहिब है रंगरेज) कहानी बहुत ही कमाल की है| गाली-गलौज, और हगने-पादने को गीत ने इतने कलात्मक ढंग से कहानी में इस्तेमाल किया है कि मैं दंग रह गया| कहानियों में गालियों के प्रयोग से इतना ज्यादा प्रभावित मैं पहले कभी नहीं हुआ था| पूरी किताब में अगर मैंने कहीं कुछ अंडरलाइन किया है, तो वह गाली-गलौज और हगने पादने की बातें| कुछ अंडरलाइन आपके साथ यहाँ शेयर करता हूँ, हालाँकि इन लाइनों की महिमा आप बिना सन्दर्भ के समझ नहीं पाएँगे, फिर भी.... 

"इश्क़ छिपाए नहीं छिप पाया| पानी में हगे गए की तरह ऊपर आ गया"

"डिम्प की माँ की कुछ चीज़ें बहुत मशहूर थी- एक तो उसके भारी-भरकम नितम्ब, जो चलते समय बहुत नैसर्गिक तरीक़े से अप एंड डाउन होते थे और यह अफ़वाह फैलाते थे कि उसका पति पीछे से करता है|" 
"दीनानाथ कांबले के चेहरे पर तनाव तब और बढ़ गया, जब उन्हें पता चला कि उनका भाभड़ा और निरा चिम्हड़ी बेटा ऐसा चुतिया-बसंत टाइप एलान करके गया है|" (इस लाइन को पढ़ कर में दस मिनट तक पेट पकड़ कर हंसता रहा था|)

दूसरी कहानी 'साहिब हैं रंगरेज' बहुत ही अलग, थॉट-प्रोवोकिंग, और सुंदर कहानी है| किताब पढ़ते हुए मुझे कई बार मिलान कुंदेरा की किताब 'अन्बेरबल  लाइटनेस ऑफ़ बीइंग' की याद आई| कुंदेरा की तरह गीत भी हमें उन चीज़ों के बारे में सोचने के लिए मजबूर करते हैं, जिनको हम आम तौर पर बहुत ही हल्के में लेते हैं|  
इन दिनों गीत चतुर्वेदी मेरे सबसे पसंदीदा लेखक हैं, उनकी किताब 'न्यूनतम मैं' को मैं तकिये के नीचे रखकर सोता हूँ| इधर मेरा भोपाल जाकर उनसे मिलने का भी बड़ा मन था, सोचा था मेहसाना से सीधा भोपाल जाऊंगा, और वहां से फिर दिल्ली| लेकिन, आश्रम पहुँचने के बाद मन इतना निष्क्रिय हो गया कि कहीं आने-जाने का दिल ही नहीं किया| गीत से मिलकर उनका ऑटोग्राफ लेने लिए भक्तराज, रावसाहब और मैंने 'न्यूनतम मैं' की तीन नई प्रतियां भी मंगा ली थी| आश्रम का नशा मुझ पर ऐसा तारी हुआ कि मैं आश्रम के गेट से बाहर निकलने से पहले भी दो बार सोचता था| आश्रम में बिताए दस दिन मेरे इस साल के अब तक के सबसे बेहतरीन दिन थे| आश्रम के अन्दर मैं ऐसा ही फील करता हूँ जैसा बच्चा गर्भ में फील करता है| जैसे गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए माँ सांस लेती है, वैसे ही जब मैं आश्रम में होता हूँ, अस्तित्व मेरे लिए सांस लेता है| 

'सावंत आंटी की लड़कियां' समाप्त करने के बाद कल शाम ही मैंने एक नई किताब शुरू की है- मुराकामी की 'नार्वेजियन वुड'| पहला बीस पेज पढ़ कर ही मजा आ गया| मुराकामी को पहली बार पढ़ रहा हूँ| अभी तक उनके बारे जितना पढ़ा और सुना है, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उनकी किताब मुझे जमेगी| आगे पूरी किताब पढ़ने के बाद ही किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है| डी.टी सुजुकी के अलावा मुझे नहीं याद है कि इससे पहले किसी जपानी लेखक को मैंने  कभी पढ़ा है| जापान से मेरा संबंध झेन तक ही सिमित रहा है| और झेन के बारे मैंने जितना भी जाना, सुना और समझा है उसका क्रेडिट जाता है ओशो और एलन वाट्स को| डी.टी सुजुकी को पढ़कर मैंने झेन को बस जाना था, झेन से असली प्रेम मुझे ओशो और एलन वाट्स की वजह से हुआ| 
आज 'महा-प्रयोग' का दूसरा दिन है| कल का दिन क़रीब-क़रीब अच्छा बीता| पूरा दिन तो मेरा सही गया, बस शाम में थोड़ा गच्चा खा गया| 
कल मेरे साथ वैसा ही हुआ जैसा धर्मकोट में राव साहब के साथ हुआ था| एक दिन ऑर्गनिक थाली में खाना खाते समय राव साहब की मुलाकात एक अहमदाबादी लड़की से हुई| जहाँ वे खाना खा रहे थे वहीं बगल वाले टेबल पर लड़की रूमी को पढ़ रही थी| बहुत हिम्मत इकठ्ठा करके राव साहब ने उससे बात की| बातचीत से उनको यह पता चला कि लड़की उनके ही शहर अहमदाबाद से है, पिछले एक महीने के धर्मकोट में रह रही है, और कभी-कभी जब उसे घर पर खाना बनाने का मन नहीं होता है, तो वो यहाँ ऑर्गनिक थाली पर खाने चली आती है| राव साहब बड़े खुश हुए- अगर यह लड़की पट गई तो मजा आ जाएगा, अपने ही शहर की है, फिर तो रोज़ मिलना हो पाएगा, रूमी को पढ़ती है, मतलब समझदार टाइप की है, और एक महीने से यहाँ रह रही है, यानी की अपने टाइप की है| फिर क्या था उससे दुबारा मिलने के लिए राव साहब रोज ऑर्गनिक थाली का चक्कर लगाने लगे| संयोग ऐसा बना कि वह दुबारा नहीं आई| राव साहब ने रेस्टोरेंट के मनेजर को अपना नंबर भी दिया यह कह कर कि वह लड़की अगर कभी आए तो उसे इस नम्बर पर कॉल करने को बोलना, मुझे उसके मारफत कुछ अहमदाबाद भेजना है| आस-पास के सब्जी वालों को भी लड़की का हुलिया बता कर राव साहब ने यह पता करने की कोशिश की कि क्या ऐसी कोई लड़की उनके पास सब्जी लेने आती है| -अहमदाबाद की कोई लड़की हाथ में रूमी की किताब लेकर आपके यहाँ सब्जी लेने आती है? वह एक महीने से यहाँ रह रही है..उसके बाल कमर तक लम्बे हैं, चश्मा लगाती है, नाक पतले और होंठ मोटे हैं, बड़ी-बड़ी काली आँखें हैं| सिलिंडर बॉडी है, जब वो चलती है तो जमाना उसे रुक कर देखने लगता है| कुछ इस तरह से लड़की के बारे में राव साहब लोगों को बताते थे| राव साहब की रूमानी व्याख्या का असर यह हुआ था कि सब्जी वालों के साथ-साथ मास्टर उगवे भी लड़की को ढूँढने में बहुत रस लेने लगे| 

जब दस दिन की हंटिंग के बाद कहीं से लड़की का कुछ पता नहीं चला, तो राव साहब थोड़े ढीले पड़ गए| मास्टर उगवे भी बहुत उदास हो गए| एक दिन मास्टर उगवे मुझसे कहने लगे, "ये राव झूठ बोलता है, यह ऐसी किसी लड़की से नहीं मिला है| हम पर इम्प्रेशन डालने के अपने को झांसे में ले रहा है| जैसी लड़की ये बता रहा है, मैं नहीं मानता कि ऐसी कोई लड़की इस जनम में कभी इनके जैसे बबूचक से बात करेगी|" उगवे की बात सुनकर राव का मुंह उतर गया|  'लेकिन इजराइली ने तो की थी, बात तो छोड़ीये वो तो एक दिन इनसे हिंदी भी सीखी थी', मैंने मास्टर उगवे से कहा| "इजरायली ने बात की नहीं थी, तुमने इनकी बात उससे करवाई थी| अगर इनके गांड में गू था, तो ये दुसरे दिन उसको क्यों नहीं पढ़ा लिए, एक दिन पढ़ने के बाद दुसरे दिन उसने इनको क्यों नहीं बुलाया?", मुंह बनाते हुए मास्टर उगवे बोले| मास्टर उगवे की बात सुनकर राव साहब को ताव आ गया, " उगवे, गू तो मेर्मे भोत है| इदर कर देगा, तो तुम साला उसका बास से मर जाएंगा| अरे, मैं पादेंगा, तो उसका बास सैन नहीं होएंगा तेर्से, मेरे गू का क्या बात करता है रे तू ?" मैंने देखा मामला गर्म हो रहा है, इससे पहले राव साहब सच में हग देते और मास्टर उगवे सच में ही मारे बास के दम तोड़ देते, राव साहब को वहां से उठा कर मैं तुषिता की तरफ ले गया| हम रोड क्रॉस करके के उस तरफ जाने ही वाले थे कि एक ऑटो हमारे सामने से गुजरा| राव साहब एकदम से ख़ुशी के मारे चिल्लाए, "अरे अहमदाबादी थी उसमे" राव साहब की चिल्लाहट सुनकर मास्टर उगवे भी चाय वाले के पास से उठकर हमारे पास आ गए| राव के चेहरे को देखकर उगवे ने भांप लिया की लड़की मिल गई है| "तुम ऑटो पकड़ो और उसके पीछे जाओ'', उगवे ने राव को सुझाया| राव रोड पार करके ऑटो ढूँढने के लिए भागे| हमने उनका पीछा किया| ऑटो स्टैंड पर कोई भी ऑटो नहीं था| राव मुंह लटकाए खड़े थे| "अब क्या करोगे, साला इसीलिए बोला था कि एक बाइक रेंट पर लेलो, आज बाइक होता तो बबूचक की तरह यहाँ मुंह लटका कर खड़ा नहीं होना पड़ता|", मास्टर उगवे ने राव साहब को लताड़ते हुआ कहा| "कोई नहीं उस ऑटोवाले को लौटकर आने दीजिए, उससे पूछेंगे कि उसे कहाँ छोड़ कर आया| या फिर शाम तक इंतजार करते हैं, लौट कर यहीं तो आएगी|", राव साहब ने ख़ुद को और मास्टर उगवे को दिलासा देते हुए कहा| 'ऑटो वाले को कैसे पहचानेगे?' मैंने राव साहब से पूछा| मास्टर उगवे और राव दोनों मेरी और देखकर हंसने लगे, "हम तो चलती सुन्दरी के भी झांटे गिन लेते हैं, फिर ऑटो का नंबर क्या चीज़ है, " ऐंठ लेते हुए  राव साहब बोले|
ऑटोवाला जब लौट कर आया तो हमें यह पता चला कि वह डेलेक होस्पिटल गई है| होस्पिटल की बात सुनकर राव साहब का प्यार और बढ़ गया-बीमार थी इसीलिए बाहर नहीं निकल रही थी| तभी तो मैं कहूँ कि ऐसा कैसे हो गया कि इन दस दिनों में एक बार भी वहां खाना खाने नहीं आई| मैं अभी हॉस्पिटल के लिए निकलता हूँ, वहीं पर उससे मिल लूँगा| यह कहकर जैसे ही राव साहब ने ऑटो के लिए हाथ दिया मास्टर उगवे बोले, "मुझे भी मेकलोडगंज से एक चूरन लेता था, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ|" राव साहब और उगवे दोनों एक ही ऑटो में बैठ कर निकल लिए| मैं दो मिनट तक वहीं खड़ा राव साहब की दीवानगी और मास्टर उगवे की हरकतों के बारे में सोचता रहा-इनको सच में चूरन लेना था, या ये उस लड़की को देखने गए हैं?
शाम को मास्टर उगवे और राव साहब जब लौट कर आए तो पता चला कि इनके पहुंचे से पहले अस्पताल बंद हो गया था| लड़की का कुछ पता नहीं चला| राव साहब दुखी-दुखी से लग रहे थे| मास्टर उगवे का मानना था कि राव हवा में तीर मार रहा है, ऑटो में कोई और लड़की बैठी थी, राव को भ्रम हो रहा है कि वह अहमदाबादी थी| "जिस तरह की लड़की तुम उसको बता रहे हो, उससे मुझे नहीं लगता है कि वह फ्री वाले अस्पताल में जाएगी| या तो तुम झूठ बोल रहे हो, या फिर वो लड़की कोई और थी", उगवे ने राव से कहा| राव के पास कोई उत्तर नहीं था, वे मुंह लटकाए बैठे थे| उनके लटके हुए मूंह से मैंने अंदाज़ा लगाया कि ऑटो वाली लड़की सच में ही अहमदाबादी थी| 
दो दिन बाद, मास्टर उगवे धर्मकोट छोड़ कर चले गए| जाते समय उन्होंने राव से बस इतना कहा, "टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक ...." जवाब में राव साहब ने दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते किया| यह नमस्ते मुझे बड़ा सिम्बोलिक लगा| क्या मास्टर उगवे के जाने के बाद राव साहब का दिन फिरने वाला था? नहीं ऐसा कुछ भी होने वाला था| जैसा कि राव साहब ख़ुद ही कहते हैं, "मेरी तकदीर साली पोपटलाल जैसी है, लगता है यह जनम हंटिंग में ही जाएगी|" 
मास्टर उगवे के जाने के तीन दिन बाद राव साहब को तुषिता में एक कोर्स ज्वाइन करना था-इंट्रोडक्शन टू बुद्धिज्म' दस दिन के कोर्स का 6000 चार्ज था, रहना खाना अंदर ही था| "कोर्स के लिए जाने से पहले मैं बौद्ध भिक्षु की तरह बाल दाढ़ी मुंडवा लेना चाहता हूँ, आप क्या कहते हैं?", राव साहब ने मुझसे पूछा| 'मुंडवा लीजिए, वैसे भी आपने अंत समय में फॉर्म भरा था, बहुत कम चांस है कि आपका इस बार हो पाएगा| वेटिंग में और भी बहुत लोग होंगे| क्या पता भिक्षु वाले लुक से आप का चांस थोड़ा बढ़ जाए', मैंने राव साहब से कहा| "हाँ मैं भी ऐसा ही सोच रहा हूँ, और थोड़ा अहमदाबादी नहीं मिली इस ग़म में भी मैं बाल मुंडवाना चाहता हूँ, " गमगीन होते हुए राव साहब बोले| 
तुषिता के लिए जाने से एक दिन पहले राव साहब बाल और दाढ़ी मुंडवाकर आ गए| एकदम छिले हुए अंडे लग रहे थे| दिव्या उनके नए रूप को देख कर बहुत देर तक हंसती रही थी| मास्टर उगवे ने राव साहब को जो उपनाम दिया था 'बबूचक' उस का अर्थ तो मैं अभी तक नहीं समझा था, लेकिन साहब का नया लुक देखकर यह जरूर समझ आ गया कि गुण के साथ-साथ इस शब्द की अपनी एक शक्ल भी है| 
अगले दिन राव साहब नहा-धोकर तुषिता के लिए निकले| जिस रूम में रह रहे थे उस को खाली करके हिसाब चुकता कर दिया| हम सब से विदा लेकर गिरती बारिश में निकल पड़े| जब राव साहब जा रहे थे, तभी मैंने मकान मालिक के गाय और बछड़े को देखा| गाय अपने जीभ से चाट कर बछड़े को साफ़ कर रही थी| गाय के नवजात बछड़े को देखकर मैं बड़ा हैरान हुआ- बछड़ा एकदम बबूचक दिख रहा था| 

हमसे विदा लेकर जाने के ठीक एक घंटे बाद गिरती बारिश में राव साहब ससामान तुषिता से लौट कर आ गए, "वेटिंग कन्फर्म नहीं हुआ, यह इस साल का आखरी कोर्स था, सो बहुत कम लोगों ने केंसल किया", बैग रखते हुए राव साहब बोले| बल्ब की रौशनी में राव साहब का बेल एकदम चमक रहा था| जो रूम वे छोड़ कर गए थे, वही रूम उन्हें फिर से मिल गया| अपने सामान की ओर इशारा करते हुए मुझसे बोले, "सामान बाँध कर इस सोच में खड़ा हूँ कि जो लोग कहीं के नहीं रह जाते हैं, वे कहाँ जाते हैं?" 
तुषिता से निराश होने के बाद राव साहब का दिल बहुत बैठ गया था, "चलिए आज शाम में बाकसू चलते हैं, मुझे कुछ शोपिंग करनी है| अब मैं दो चार दिन से ज्यादा यहाँ नहीं रुकुंगा| लड़की भी नहीं मिली, इजरायली गच्चा दे गई, अहमदाबादी मिल नहीं रही है, तुषिता में एडमिशन हुआ नहीं, अब किस लिए रुकू मैं यहाँ?" 
शाम को हम तीनों (राव साहब, दिव्या और मैं) बाकसू गए| राव साहब और दिव्या ने शोपिंग की और मैंने जिस सलून में राव साहब ने बेल मुंडवाया था, उसी में बाल ढाढ़ी सेट करवाया| शोपिंग वगैरह करने के बाद पिज़्ज़ा-विज्ज़ा खाकर जब हम धर्मकोट की और लौट रहे थे, एक जगह अचानक से राव साहब जमीन पर लोटने लगे| मैं बड़ा हैरान हुआ इस तरह से नागिन डांस करते मैंने राव साहब को पहले कभी नहीं देखा था| "क्या हो गया इनको?" दिव्या मुझसे पूछी| इस बीच राव साहब उठकर खड़े हुए और बोले, "अहमदाबादी बैठी है उस सामने वाले शॉप में|" ये कह कर वे फिर जमीन पर लोटने लगे| 'इस तरह से जमीन पर लोटने से क्या होगा, जाकर बात कीजिए उससे', हाथ पकड़ कर उठाते हुए मैंने उनसे कहा| "अरे, मैं अब क्या बात करूं उससे", राव साहब अपने सिर और दाढ़ी पर हाथ फेरने लगे| उनका भाव समझ कर दिव्या जोर-जोर से हंसने लगी| अब मैं भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया| "इसी को कहते हैं सर मुंडवाया और ओले पड़े, अब ये बबूचक जैसी शक्ल लेकर क्या मिलूँ मैं उससे | पंद्रह दिन से ढूंढ रहा था तब तो मिली नहीं, अब जब बेल मुंडवा लिया तो मिली है,", राव साहब मुझसे बोले| मुझे पता नहीं क्यों मास्टर उगवे की वो बात याद आ गई जो उन्होंने जाते-जाते राव साहब से कही थी- टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक ....|   
ठीक यही चीज़ कल मेरे साथ हई| जैसे ही मैं आदित्य के रूम से उतर रहा था, उनके मकान मालिक ने मुझे बुला लिया| मेरे लाख मना करने के बाद भी अपनी पत्नी से मेरे लिए चाय बनाने के लिए बोल दिया| बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें चीनी डालने से रोका| फिर जैसे ही हम चाय पी रहे थे, उनकी बेटी एक थाल में मिठाइयाँ लेकर आ गई| थाल में वो सारी मिठाइयाँ थी जो मुझे पसंद है| कुछ देर मैं गौर से मिठाइयों को देखता रहा, पांच महीने बाद एक बार फिर से मुझे मास्टर उगवे की वो बात याद आ गई, जो उन्होंने राव साहब से कही थी, "टिक-टिक टिक, टिक-टिक टिक...."| 
                                            (01-Nov. 2019, 13:52 PM, Delhi) 



नोट- लाल रंग से लिखे सारे वक्तव्य गीत चतुर्वेदी की किताब 'सावंत आंटी की लड़कियाँ' से लिए गए हैं| 

Wednesday, 30 October 2019

महा-प्रयोग डे-1

आज महा-प्रयोग का पहला दिन है| कल शाम पांच बजे मोबाइल फोन बंद कर दिया था| और रात ठीक 10 बजकर 30 मिनट पर सोने चला गया था| शाम को मोबाइल बंद करने के बाद थोड़ी देर किताब (सावंत आंटी की लडकियाँ) पढ़ता रहा, लेकिन एक पॉइंट के बाद मन फोन का इस्तेमाल करने के लिए बेचैन होने लगा| बेचैनी इस बात का सबूत था कि मन मोबाइल फोन का आदी हो गया है| 
प्रयोग के हिसाब से मैं अगले 90 दिनों तक शाम पांच बजे से लेकर सुबह 9:30 तक मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करूँगा| साथ ही लैपटॉप, टीवी और रेडियो इत्यादि का इस्तेमाल भी नहीं करूँगा| दूसरा, रात 10:30 तक सो जाऊंगा| 
कल शाम मोबाइल फोन बंद करने के बाद सकारात्मक बात यह हुई कि दिव्या और मैं बड़ी देर तक सोफे पर बैठ कर बातें करते रहे| मोबाइल फोन के ऑन रहते इतनी लम्बी चर्चा निर्बाध रूप से बहुत कम ही हो पाती है| पीछे मेहसाना में भक्तराज, राव साहब और मैं एक दिन फोन भक्तराज के घर पर छोड़कर सीसीडी (संकूवाटरपार्क) गए थे| शाम 5:00 बजकर 30 मिनट पर हम घर से निकले थे| कोई आधा घंटा हमें सीसीडी पहुंचे में लगा होगा| कॉफ़ी आर्डर करने के बाद हम ब्रह्म-चर्चा में लग गए| शुरू में राव साहब थोड़े बेचैन लग रहे थे, उनकी चिंता यह थी अगर इस बीच उनकी होने वाली गर्लफ्रेंड ने मेसेज कर दिया तो क्या होगा-क्या वह इस बात को सहज रूप से स्वीकार कर पाएगी कि उसके मेसेज का राव साहब ने आनन-फ़ानन में जवाब नहीं दिया? भक्तराज और मुझे कोई तीस मिनट लगा राव साहब को सहज करने में- आप समझिये चौबीसों घंटे ढेल की तरह अगर आप उसके लिए बिछे रहेंगे तो वो कभी आपसे नहीं पटेगी| लड़कियां ऐसे लड़कों को कभी पसंद नहीं करती है जिसके पास कोई रीढ़ ना हो| जब हमने ऐसे अजीबों-गरीब कोई पचास तर्क दिए तब राव साहब थोड़े रिलैक्स हुए| हम (भक्तराज और मैं) दोनों इस बात से बहुत ही हैरान थे कि इस सदी में मोबाइल से दूर होने पर भी आदमी को सदमा लग सकता है|
हम तीनो में से किसी के भी पास घड़ी नहीं थी, सो हमें टाइम का कुछ पता नहीं चला| और हमने किसी से पूछा भी नहीं| हम अपने-अपने ढंग से ब्रह्म की व्याख्या करने में इतने तल्लीन थे कि कब शाम ढली और कब रात हुई हमें किसी भी चीज़ का कुछ पता नहीं चला| जब सीसीडी वाला भाई दूबारा आर्डर देने के लिए हमसे कहने आया, तब हमें अंदाज़ा लगा कि शायद हम बहुत देर से बैठे हैं|
घर पहुँच कर जब हमने समय देखा तो हम तीनो हैरान होने से ख़ुद को नहीं रोक पाए| रात के 11:00 बज रहे थे| मतलब अगर आने-जाने के एक घंटा को निकाल दिया जाए, तो हमने 4 घंटे से भी ज्यादा सीसीडी में ब्रह्मचर्चा करते हुए बिताया| अगर बिना घड़ी देखे कोई हमसे पूछता कि हम कितनी देर सीसीडी में बैठे थे, तो हम अंदाज़े से दो घंटे से ज्यादा नहीं बता पाते| हमें दो घंटे बोलते हुए भी डाउट ही होता| 

मोबाइल के इस्तेमाल को सिमित करने और सोने का समय तय करने के अलावा मैंने भोजन को भी महाप्रयोग में शामिल किया है| आज से तीन महीने के लिए मैं सफ़ेद, चीनी, गेंहू और दूध का सेवन बिलकुल बंद कर रहा हूँ| अभी तक मौका-बेमौका चीनी और दूध का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सेवन कर लेता था, लेकिन अब वो भी बंद कर रहा हूँ|    
मोबाइल का इस्तेमाल, सोने का तय समय और भोजन में मामूली सुधार लाने के अलावा और किसी चीज़ को बदलने पर मेरा कोई विशेष ज़ोर नहीं है| अगर कुछ अपने आप सजह रूप से बदलता है तो ठीक, वर्ना प्रयास से मैं किसी भी चीज़ में बदलाव नहीं लाना चाहता हूँ| 
जब से दिल्ली आया हूँ तभी से रोज़ सुबह उठ कर पार्क जाने की सोचता था और टाल देता था| रात लेट सोने की वजह से सुबह उठने में देर हो जाती थी| सुबह के पार्क जाने को शाम पर टाल देता था, और शाम आते-आते उसे अगली सुबह पर| लेकिन कल रात ठीक समय पर सो जाने की वजह से, आज सुबह जल्दी नींद खुल गई| नित्यकर्म से फ़ारिग होने के बाद बड़ी देर तक किताब (गीत चतुर्वेदी की सावंत आंटी की लड़कियां) पढ़ते हुए पौ फटने का इतज़ार करता रहा| बहुत दिन बाद किताब पढ़ते हुए ऐसी शान्ति अनुभव किया| 
अपने मुंबई, दाहोद और मेहसाना निवास के दौरान निरंतर वाक करते रहने की वजह से मैं बहुत ही सुगमता के साथ तेज गति से चल पा रहा था| काफी दिनों से निष्क्रिय रहने की वजह से दिव्या उतनी सुगमता से तेज़ नहीं चल पा रही थी| नतीजतन, मुझसे पीछे न रह जाए इसलिए, बीच-बीच में उसे दौड़ना पड़ता था| मुझे अपनी याद आ गई, बम्बई में ठीक ऐसी ही हालत मेरी थी| सर (पवन श्रीवास्तव) बहुत तेज चलते हैं, उनके साथ वाक करते समय मैं अक्सर पीछे छुट जाता था| मुझे तेज चलाने के लिए, सर कोई कई बार मुझे धक्का मारना पड़ता था| मैं सोचा करता था-इतनी तेज़ चलने तो अच्छा है कि दौड़ ही लूं| 
सुबह वाक पर जाने के अलावा एक और चीज़ जो सहज रूप से घट रही है, वह है 'लिखना'| एक अरसे से मेरा लिखना बंद हो गया था| आज बड़े ही सहज ढंग से यह फिर से शुरू हो गया है| आगे मेरी कोशिश यही रहेगी कि आने वाले 90 दिनों में महा-प्रयोग के जो भी छोटे-बड़े परिणाम होंगे उनसे आपको अवगत कराता रहूँ| 
                                                (दिल्ली- 31-10-2019, 12:08 PM)


सब एक वर्तुल में घूम रहा है

17-Oct. 2019 (Mehsana Aashram)
अनिरंतरता को छोड़ कर जीवन में कुछ भी निरंतर नहीं है, और मेरा जीवन इसका अपवाद नहीं है| चाहे वह लिखना, पढ़ना, घूमना या फिर फोटोग्राफी करना हो, सब कुछ एक मौसम की तरह जीवन में आता-जाता रहता है| एक मुझे छोड़कर जीवन में सब कुछ परिवर्तनशील है| धर्म-अधर्म, सुख-दुःख सब मन के मेहमान बन कर आते-जाते रहते हैं| शरीर भी अपने धर्म से नित बदल रहा है| बदलाब के इस भयंकर झंझावात में विश्व-साक्षी को छोड़कर सब एक वर्तुल में घूम रहा है|

इसी साल फरवरी में जब मेहसाणा को अलविदा कहा था तब यह सपनों में भी नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी फिर से लौट कर इस अंजुमन में आना होगा| आश्रम के गेट पर कदम रखते ही एक शेर, जो राधेश्याम स्वामी जी हर शिविर के अंत के सुनाते हैं, याद आ गई, “यह मय-कदा है ओशो का, हम सब यहाँ के रिंद है, जो जरा-सी पी कर बहक गया, उसे मय-कदे से निकाल दो, यही मय-कदे का निज़ाम है”, इस शेर के साथ ही वो एक बार यह लाइन जरूर दोहराते है, “इस अंजुमन में आपको आना है बार बार दीवार-ओ-दर को गौर से पहचान लीजिये”
मुंबई में करीब महिनाभर बिताने के बाद पांच दिन दाहोद में रहा| और अभी पिछले तीन दिनों से ओशो मनन नियो सन्यास कम्यून, मेहसाणा में हूँ| 2017 के दस जनवरी को, पूरा दो साल दो महीना रहने के बाद, आश्रम छोड़ा था| आश्रम में सबकुछ वैसे ही चल रहा है, जैसे पहले चलता था| थोड़ा-बहुत अगर कुछ बदला भी तो वो इतना गौण है कि उसकी वजह से बदलाब महसूस हो नहीं रहा है| ऐसा लग रहा है, दो साल पहले शतरंज की चाल को जहाँ पर छोड़ गया, वह आज भी वहीं है| एक-दो मोहरे जरूर बदल गए हैं, लेकिन राजा, मंत्री, ऊंट, और घोड़ा अपनी जगह पर ही हैं| वेलकम में घुसते ही अरविन्द स्वामी की और राबिया के पास से गुजरते हुए शिवाजी की बहुत याद आई|
आश्रम में प्रवेश करने के दो घंटे के बाद मैं यह भूल ही गया कि दो साल के लम्बे अन्तराल के बाद यहाँ आया हूँ| अगर रूप के पीछे छिपे अरूप से हम थोड़े-बहुत भी परिचित हों, तो समय के बोध से पूर्णतया मुक्त हुआ जा सकता है| समय, शरीर, मन, सुख, दुःख जीवन, मृत्यु, धर्म, अधर्म, माया, बन्धन, मुक्ति यह सब एक ही चीज़ के अलग-अलग नाम हैं|
आश्रम का पहला दिन इधर-उधर चक्कर लगाने, पुराने मित्रों से मिलने व जय-भगवन के साथ चर्चा करने में बीता| आज का दिन वैसा ही बीता जैसा मैं चाहता था| आश्रम आने से पहले मैंने तय किया था कि I will underplay, वही कर रहा हूँ| सालों बाद नितांत अकेले होने का अवसर मिला है, इस अवसर को मैं निम्बू की तरह नीचोड़ लेना चाहता हूँ| बिल्कुल लोड-फ्री होकर आश्रम में रह रहा हूँ|

मुंबई से समय ने मुझे ऐसे खींचकर अलग किया जैसे आदमी खून चूस रहे जोंक को अपने से अलग करता है| मुंबई का एक महीना बहुत ही सुख और चैन से गुजरा| 7 महीने की लम्बी यात्रा के बाद मैं जैसा समय बिताना चाह रहा था, वैसा मुंबई में रहते संभव हो पाया| सुस्त-सुस्त सा दिन, लम्बी राते, समंदर की ठंडी हवा, शाम को सर के साथ टहलना, फिल्म देखने जाना, बाज़-औक़ात सर, भाभी या फिर मुकेश जी के साथ ब्रह्म-चर्चा कर लेना, मेरे थके शरीर और यात्रा से ऊबे मन के लिए स्वाति की बूंदों जैसा था|
जोंक को अपने शरीर से अलग करने के बाद आदमी उसके मुंह पर नमक या तम्बाकू का पानी रख देता है| उस नमक के बाद जोंक खून की उलटी करके मर जाता है| लेकिन, समय ने मेरे साथ ऐसी बेरहमी नहीं की, उसने मुंबई से अलग करने के बाद मेरे मुंह पर शहद रख दिया| मुंबई से दाहोद आते समय वरोदरा स्टेशन पर स्वामी Atmo Govind Indachi से मिलना सडन सतोरी जैसा था| उस झटके से उबरने में मुझे काफी वक्त लगा| आत्मो का स्टेशन पर आना जितना अप्रत्यासित था, उनता ही उनका मेरे लिए थर्मस में भरकर चाय, सेब, और मेरे लिए कपड़े लाना था| अगर कुछ नोन था तो वो जाने से पहले उनका सेल्फी लेना| इस तरह से स्टेशन पर आकर इतने भावपूर्ण होकर मिलना आत्मो जैसे भक्त-हृदय व्यक्ति के लिए ही संभव है| अध्यात्म की दृष्टि से साधकों के दो प्रकार हैं- एक वे जिनका बेसिक मन बनिये का है, लेकिन लगे वे ध्यान, योग और भक्ति साधना में हैं| दूसरा वे जिनक बेसिक मन अध्यात्मिक हैं, लेकिन वे लगे हैं सांसारिक जोड़-घटाओ करने में| आत्मो दूसरे प्रकार में आते हैं| आत्मो आश्रम ना रहते हुए भी सदा आश्रम में हैं| मैं उनके दूकान पर भी गया हूँ, उन्होंने अपने दुकान और घर सब को आश्रम बना रखा है| और मैं ऐसे भी बहुत से लोगों को जानता हूँ, जिन्होंने आश्रम में दूकान सजा रखी है|
मेहसाणा पहुँच कर बिना मोबाइल फ़ोन के राव साहब और भक्त राज के साथ वार्टर पार्क वाले सीसीडी पर चार घंटे तक कॉफ़ी पर चर्चा करना बहुत ही पारलौकिक रहा है| दाहोद में मास्टर उगवे के साथ और रनत महल में स्वामी Ketan Raval के साथ बिताए गए पल और ब्रह्म-चर्चा बहुत ही आल्हादकारी रहा| स्वामी Anand Magan जी के यहाँ का भोजन इतना तृप्तिदायक था कि नाभि से सहज ही 'अन्नं ब्रह्म-अन्नम ब्रह्म' की नाद उठने लगता था| केतन स्वामी के हाथ की खिचड़ी भी अभूतपूर्व थी| दाहोद के गुलाब जामुन का स्वाद मैं अभी भी अपने मुंह में महसूस कर सकता हूँ| मास्टर उगवे के साथ बाऊका तंत्र मंदिर और काली डैम पर बिताया गया समय भी ज़ेहन पर अमिट छाप छोड़ गया है| सुबह उठकर सात बंगले तक टहलने जाना और फिर लौट कर बीरबल चाय वाले के यहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर मास्टर उगवे और उनके दोस्तों के बीच हो रही खुशगप्पियों की नशिस्त का मौन दर्शक बनने का अनुभव भी बहुत ही मजे का था|
कल सुबह आश्रम आने से पहले भक्त राज और राव साहब के साथ ‘बर्ड फोटोग्राफी’ भी काफी एन्जॉय किया| मेहसाना में जैसे भक्त राज, राव साहब और मेरी जोड़ी बनती है, वैसे ही मुंबई में सर, मुकेश जी, और मेरी जोड़ी बन गई थी| और दाहोद में जब मास्टर उगवे, स्वामी आनंद मगन हम एक ही बाइक पर बैठ कर रतनमहल जा रहे थे, तब मुझे राव साहब और भक्त राज के साथ की गई गोवा की ट्रिपलिंग याद आ गई| भक्त राज हमारी जोड़ी को ‘त्रिफला’ बुलाते हैं|
मेहसाणा से निकल कर मेरा भोपाल जाने का प्लान था, लेकिन अभी यहाँ इतना मजा आ रहा है कि भोपला जाने का प्लान मैंने टाल दिया है|

Friday, 6 September 2019

‘आत्मा की बात’(बेंगलोर डायरी)

सुख के गीत गाता हूँ, आनंद की बातें करता हूँ, इसका यह मतलब नहीं है कि जीवन के दुखों से, ग़रीबों की पीड़ाओं से, बीमारों की आँसुओं से, स्त्रियों की आहों से, अबलाओं की चाहों से अपरिचित हूँ। सबके प्रति सजग हूँ, जागरुक हूँ और जितना जागरुक हूँ उससे ज़्यादा होने की कोशिश में निरंतर लगा रहता हूँ। 
ख़ुद की सीमाओं और पाखंडों का भी बोध है मुझे। ख़ुद के भीतर कथनी और करनी का जो भेद है, उससे भी भली भाँति परिचित हूँ। 
ध्यान और अहिंसा की बातें कर लेता हूँ, फिर किसी होटल में जाकर मछली और मुर्ग़ा खा लेता हूँ। सादा जीवन पर एक घंटा लेक्चर दे देता हूँ, फिर चार हज़ार की जींस ख़रीद लेता हूँ। इसी तरह की हज़ार विरोधी तत्वों को ख़ुद के भीतर पाता हूँ। राम और रावण को एक साथ अपने भीतर सक्रीय पाता हूँ। कभी कोई घट जाता है, तो कभी कोई बढ़ जाता है, लेकिन मौजूद हमेशा दोनों होते हैं। एक पूरी भीड़ है मेरे भीतर, अगले क्षण मैं क्या करूँगा, या फिर मुझसे क्या हो जाएगा, इसका मुझे कुछ भी पता नहीं होता है। कल तक जिस चीज़ का विरोध कर रहा था, हो सकता है आज उसकी पूजा करने लगूँ। बहुत ही अजीब है सबकुछ।

इन दिनों, जब भी ज़रूरत से ज़्यादा सुख-सुविधाओं में ख़ुद को पाता हूँ, अंदर से बेचैन होने लगता हूँ। मुझे उन मासूम बच्चों की तस्वीरें दिखने लगती हैं, जो रोड किनारे भूख से बिलखते रहते हैं। रेल की पटरियों के किनारे जलती धूप में प्लास्टिक की छतों के नीचे सोये लोगों की याद आने लगती है। अस्पताल के बाहर बिना इलाज के दम तोड़ते मज़दूरों के चेहरे दिखाई पड़ने लगते हैं। हवस की शिकार स्त्रियों की चीख़ें सुनाई देने लगती है। बहुत सोचता हूँ इन सब के बारे, क्या हो सकता क्या किया जा सकता है, इसके बारे में अपने क़रीबी मित्रों से बातें करता हूँ, उनके साथ घंटों बहस करता हूँ। अपने लेवल पर जितना कर सकता हूँ उतना करने की कोशिश करता हूँ। बिजली की बचत करता हूँ, पानी बचाता हूँ, पलस्टिक का इस्तेमाल बहुत कम करता हूँ, बच्चा पैदा नहीं किया है, पेड़ लगाता रहता हूँ, खाना खाते समय सजग रहने की कोशिश करता हूँ, और ऐसी ही बहुत सी चीज़ें हैं जो करता रहता हूँ। लेकिन बहुत गहरे में जानता हूँ कि इस सबसे कुछ नहीं बदलेगा। 
मैं यहाँ घर में पानी और बिजली बचाता हूँ, और वहाँ बड़े-बड़े शोपिंग भवन में दिन दहाड़े हज़ारों लाइटें जल रही होती है। मैं पैदल चलता हूँ, और लोग महँगी कारों से तीन किलोमीटर जाने में एक लीटर पेट्रोल जला देते हैं। 
किसी भी क्रांति या आंदोलन से इस दुनिया को ठीक नहीं किया जा सकता है। जितना सोचता हूँ उतना पाता हूँ कि आध्यात्मिक समझ के अलावा इस दुनिया को और ख़ुद को किसी भी चीज़ से ठीक नहीं किया जा सकता है। आज अगर मैं ख़ुद के दोषों को देख पा रहा हूँ, उन्हें स्वीकार कर पा रहा हूँ, तो सिर्फ़ इस लिए कि मेरे भीतर होश का एक छोटा-सा दिया टिमटिमाने लगा है। 
जब तक होश का यह दिया कम-से-कम दुनिया के ३३ फ़ीसदी लोगों के भीतर नहीं जलने लगता है। इस पृथ्वी पर स्वर्ग को नहीं उतारा जा सकता है। धर्म आख़री विकल्प है। धर्म से मेरा मतलब हिंदू धर्म या इस्लाम धर्म या ऐसे ही किसी अन्य धार्मिक परंपरा और संगठन से नहीं है। धर्म से मेरा मतलब बोध की उस अवस्था से है, जब हम यह जान लेते हैं कि हमारा कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है। जब तक हमारे भीतर से ‘मैं और तू’ का भेद नहीं मिट जाता है, तब तक हम विरोधाभासों और पाखंडों से ख़ुद को नहीं बचा सकते हैं।

इमरोज मेरी दृष्टि में शरीर हैं! साहिर आत्मा और अमृता मन।

कल अमृता प्रीतम के बारे कुछ लिखना चाह रहा था। लेकिन उनकी वो दो किताबें जो मैंने पढ़ी है, उन में से एक का नाम याद ही नहीं आया। अभी भक से दूसरा नाम याद आ गया- मन मिर्ज़ा, तन साहिबा! इसके अलावा ‘रसीदी टिकट’ मैंने पढ़ी है, कुछ कहानियाँ भी पढ़ी है। मेरे एक मित्र ने तीन साल पहले अमृता प्रीतम की 17 किताबें मुझे गिफ़्ट की थीं। अभी तक उनमें से एक भी नहीं पढ़ी है। उनकी आत्मकथा मुझे कुछ ख़ास नहीं लगी थी-रसीदी टिकट कुछ ख़ास होती भी नहीं है। इस अर्थ में किताब ने मुझे बहुत प्रभावित किया। साहिर-अमृता और इमरोज में शरीर, मन और आत्मा जैसा भेद दिखा। इमरोज मेरी दृष्टि में शरीर हैं! साहिर आत्मा और अमृता मन। 
इमरोज का व्यक्तित्व मुझे हमेशा से आकर्षित करता है। रात को एक बजे उठकर चाय बनाना-किसी साधना से कम नहीं है। अमृता की छायावादी लेखन से इमरोज का चायवादी होना मुझे ज़्यादा प्रभावित करता है। जैसे थीयो के बिना मैं वानगोग के अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकता हूँ, वैसे ही इमरोज के बिना अमृता नहीं हो सकती हैं।

Thursday, 5 September 2019

जीवन के सभी सुख विकल्पों से आते हैं!


मुसलसल मसाफ़त से बहुत थक गया हूँ| और शहरों की तरह बेंगलोर भी बहुत आपाधापी वाला शहर है| बड़े शहरों की बेचैनी मुझे अच्छी नहीं लगती है| आश्रम से निकलने के बावजूद भी दो साल मेहसाणा में सिर्फ इसलिए टिक गया क्योंकि वहां सब-कुछ बहुत ठहरा-ठहरा-सा है| इस साल अभी तक जितनी भी यात्राएं की है, उसमे पोंडिचेरी मुझे सबसे अच्छा लगा| सिक्किम में ठहराव तो बहुत था, लेकिन सुविधाएँ कम थी| हम एक गाँव में रुके हुए थे| सबकुछ बहुत ही उत्तम और सुन्दर था, लेकिन खाना बनाने की आजादी नहीं थी| हम जिनके यहाँ रुके थे उन्ही के यहाँ खाना खाने के लिए हम वाध्य थे| गाँव में कहीं कोई भोजनालय वगैरह नहीं था| 
जिनके यहाँ हम रुके थे वे बहुत ही अच्छा, परंपरागत, और आर्गेनिक खाना बेहद प्यार से खिलाते थे| लेकिन, जबतक नर्क का विकल्प मौजूद ना हो, स्वर्ग दो कौड़ी का लगता है| जीवन के सभी सुख विकल्पों से आते हैं| जीत आपको तभी ख़ुशी देती है, जब आपको यह पता होता है कि आप हार भी सकते थे| अगर कभी ऐसा हो जाए कि आपका हारना असंभव हो जाए, तो तत्क्षण जीत का सारा गौरव और सौदंर्य विलीन हो जाएगा| मिसेज दोरजी के उत्तम-से-उत्तम भोजन का स्वाद हमें फीका लगने लगा था, क्योंकि हमारे पास उन भोजनों के अलावा और कोई विकल्प नहीं था| हम यह भी नहीं तय कर सकते थे कि आज हमें क्या खाना है, किसी के घर में मेन्यु नहीं होता है| कितने बजे खाना है, हम ये तय करने के लिए भी स्वतंत्र नहीं थे| ऐसा भी नहीं था कि हमारे निवास पर खाना पहुँचा दिया जाए, और हमें जैसे मर्जी हो हम खा लें| हमें प्रॉपर उनके डाइनिंग हॉल में जाना पड़ता था, 20 तरीके के पकवानों से टेबल सजा होता था| भोजन के दौरान हमें अकेला भी नहीं छोड़ा जाता था, बात करने के लिए हमेशा कोई न कोई मौजूद होता था| हमारे यहाँ दामाद की जैसी खातिरदारी होती है, वैसी ही खातिरदारी हमारी हो रही थी| तीन-चार दिन बाद हम सुख-सुविधा और उत्तम मेहमानवाजी से इतने उब गए कि लताड़े जाने, उपेक्षित होने, अनअटेंडेड छोड़े जाने के लिए तरसने लगे| पहली बार मुझे ऐसा लगा कि गरीबी से ज्यादा ख़तरनाक अमीरी होती है| दुःख की अतिरेकता को सुख की उम्मीद में काटा जा सकता है, लेकिन सुख की अतिरेकता से बच कर कहाँ जाए आदमी| एक पॉइंट के बाद सुखी आदमी के लिए आत्महत्या के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है|
मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं अपने किसी बहुत ही अमीर रिश्तेदार के यहाँ मेहमान हूँ| सब कुछ टॉप क्लास का था, लेकिन फिर भी दो-तीन दिन के बाद सब कुछ बोझ जैसा लगने लगा| हम पैसा पे कर रहे थे, फिर भी भूटिया फेमली के एहसानों तले दबे जा रहे थे| राव साहब कुछ ज्यादा ही दब गए थे| मिसेज दोरजी जब कभी भी चाय लेकर आती, और तिबतन स्टाइल में दोनों हाथों से कप को उठा कर माथे के पास ले जा कर हमारे सामने रखती थीं, तो राव साहब एकदम से जमीन पर बिछ जाते थे| बाद में तो राव साहब हमेशा बिछे-बिछे से ही रहने लगे| एक शाश्वत मुस्कान जो उनके चेहरे से हमेशा चिपकी रहती थी, भूटिया परिवार के किसी सदस्य को देख कर और भी चौड़ी हो जाती थी| मेरी और दिव्या की हालत भी कुछ-कुछ राव साहब जैसी ही थी, लेकिन ‘हम इस सबके लिए पैसा पे कर रहे हैं’ सोच कर हम दोनों ज़मीन पर फैलने से ख़ुद को थोड़ा बचा लेते थे| 
सुविधा के साथ अगर थोड़ी भी स्वतंत्रता होती तो, सिक्किम यात्रा को मैं सबसे ऊपर रखता| धर्मकोट में स्वतंत्रता और सुविधा दोनों थी, लेकिन दोनों की मात्रा बहुत कम थी| दोनों में से यदि एक को भी बढ़ाने की सोचो तो कीमत आसमान छू लेती थी| नेपाल में चूँकि हम आश्रम में ठहरे थे, इसलिए उसको लेखाजोखा में शामिल करना मैं ठीक नहीं समझता| एक आश्रम की तुलना सिर्फ दूसरे किसी आश्रम से हो सकती है| आश्रम का शहर से कोई लेना-देना नहीं होता है| इसलिए इस साल की पोरबंदर यात्रा के बारे में भी यहाँ बात नहीं करूँगा| पुणे के बारे में भी यही हाल है| दिल्ली को मैं बस बेस-कैंप मानता हूँ| इसीलिए बात सिर्फ सिक्किम, धर्मकोट, पोंडिचेरी, त्रिरूवन्नामलाई और बेंगलोर की हो सकती हैं| इन पांच जगहों में पोंडिचेरी को में 10 में से 10 स्टार दे सकता हूँ| सब कुछ इतना सही और सटीक था, कि इससे ज्यादा की आप मांग ही नहीं कर सकते हैं| सुख, दुःख, सुविधा और स्वंत्रता का ऐसा सुन्दर समन्वय इससे पहले मैंने कहीं और नहीं जाना था|

शहर का नाम बेंगलोर है

31-Aug, 2019


रमणाश्रम के बहुत से अनुभवों और घटनाओं के बारे में लिखना बाँकी रह गया है। लिखना कभी-कभी मुझे मछली फाँसने वाले जाल से हाथी को पकड़ने की कोशिश जैसा लगता है। 
बेंगलोर के लिए बस में बैठा हूँ| दो बजे तक बस बेंगलोर छोड़ देगी। बेंगलोर सिर्फ़ जाने के लिए जा रहा हूँ। इधर से गुज़र रहा तो सोचा इस शहर को भी सलाम करता चलूँ। अभी तक मन में कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं है। तिरुवन्नामलाई की तरह बेंगलोर को भी धप्पा मार कर, एक-दो दिन बाद, आगे निकल जाऊँगा। 
जीवन में पहली बार किसी लड़की से दिल्ली में क़ुतुबमीनार पर हाथ मिलाया था। लड़की विदेशी थी। अंग्रेज़ी सीखने के चक्कर में फिरंगियों से बात करने क़ुतुबमीनार पर जाया करता था। वही हाथ मिलाने वाली लकड़ी ने, मैं BCA कर रहा हूँ, जानने के बाद, मुझे बताया था कि बेंगलोर इलेक्ट्रोनिक सिटी है। तभी शायद मेरे अचतेन में एक बार बेंगलोर जाने की ललक उठी थी। 2005 में जो मन के अंदर बीज पड़ा है, आज 14 साल बाद वह अंकुरित हो रहा है। मिरदाद कहते हैं, “एक मक्खी भी हमारी मर्ज़ी के बिना हमारे नाक पर नहीं बैठ सकती है।”


31-Aug, 2019
हवा में खुनकी है, बादल छाए हुए हैं, शाम में थोड़ी विष्टि हुई थी। शहर का नाम बेंगलोर है। मैं अभी किसी कॉफ़ी हाउस में बैठा हूँ। शहर से अभी दोस्ती नहीं हुई है। वैसा ही महसूस कर रहा हूँ जैसा पहले दिन पोंडिचेरी में लगा था। थकान इतनी है कि कुछ भी अभी लिखने का मन नहीं कर रहा है।


“रजनीश कैसा है?”, महर्षि ने ख़ुद को पंखा झलते हुए मुझसे पूछा!

29-Aug,2019

11 रातें बिताने के बाद पोंडिचेरी को विदा बोलते हुए तिरुवन्नामलाई (भगवान श्री रमण महर्षि आश्रम) जा रहा हूँ। उदासी की मलिन चादर मन के ऊपर सुबह से तनी हुई है। भारी साँसों की बोझ से हृदय बैठा जा रहा है। 
बुद्ध कहते हैं, “प्रिय से बिछड़ना और अप्रिय से मिलना दुख है।” इन ११ दिनों में मन ने पुद्दूचेरी से गहरी प्रीत गाढ़ ली थी। 
रमण आश्रम यहाँ 110 किलोमीटर दूर है।


29-Aug,2019

“रजनीश कैसा है?”, महर्षि ने ख़ुद को पंखा झलते हुए मुझसे पूछा। एक बड़े से हॉल में, जिसमें ६ खिड़कियाँ और दो दरवाज़े थे, भगवान सोफ़े पर लेटे हुए थे। मेरे बाईं ओर दिव्या और दाएँ मे पॉल ब्रंटन बैठे थे। हाल में ही मैंने पॉल की किताब ‘गुप्त भारत की खोज’ पढ़ी थी। इसीलिए पॉल को मैं थोड़ा जानता था। बाँकी हॉल में बैठे सारे लोग मेरे लिए अजनबी थे। कोई तीस लोग बैठे थे। तीस में से बीस आँखे बंद किए हुए थे। जिनकी आँखे बंद नहीं थी, उनकी नज़रें भगवान पर टिकी हुई थी।
‘अच्छे हैं, आपको बहुत याद कर रहे थे। उनकी बड़ी इच्छा थी आपसे मिलने की, लेकिन नहीं आ पाए। इससे पहले कि वो आते १९५० में १४ अप्रैल की शाम ८ बजकर ४५ मिनट पर आप महापरिनिर्वाण को उपलब्ध हो गए।’, मैंने भगवान श्री से कहा। “वो मुझसे मिलने नहीं आ पाया, लेकिन महापरिनिर्वाण के बाद मैं उससे मिलने गया था। ‘सक्रीय ध्यान’ के तीसरे चरण में ‘मैं कौन हूँ-मैं कौन हूँ’ पूछने का सुझाव उसे मैंने ही दिया था।’, भगवान तमिल में अपने अनुवादक से बोले, अनुवादक ने इंग्लिश में ट्रांसलेट करके मुझे बताया। 
बोलने के बाद बड़ी देर तक मौन बैठे रहे हैं। मैं उनके चेहरे पर अपनी नज़रें टिका नहीं पा रहा था। “जब पुणे गए ही थे, तो मेहर से मिलने क्यूँ नहीं गए”, मौन से लौटते हुए भगवान मुझसे बोले। ‘पॉल ने अपनी किताब में मेहर बाबा के बारे में जो कुछ लिखा है, उसे पढ़ने के बाद से बाबा पर से मेरा भरोसा उठ गया है’, बोलते समय मेरी नज़रें नीचे थी। मेरे मुँह से आपना नाम सुनकर पॉल मेरी और देखने लगा। भगवान बिना कुछ बोले मौन लेटे रहे। 
भगवान के पास से उठकर मैं लक्ष्मी(भगवान की गाय) की समाधि पर गया। लक्ष्मी भगवान से दो साल पहले १९४८ में देह त्यागी थी। लक्ष्मी के बग़ल में एक कव्वे, कुत्ते और हिरण की समाधि भी थी। 
सात बजने में बस १५ मिनट रह गए थे। अँधेरा घिर गया था। “जल्दी चलो, ऑफ़िस बंद हो जाएगा तो हमें चप्पल नहीं मिलेगा, बाँकी आश्रम कल देखेंगे”, दिव्या मुझसे बोली। आश्रम से हमारा डेरा थोड़ा दूर है, हमें पैदल आना था। सो, हम आश्रम से निकल गए। 
“अगर आश्रम में रहना हो, तो दो महीना पहले बुकिंग करनी होती है। सिर्फ़ तीन के लिए अलाउ करते हैं। रहने का कोई चार्ज नहीं है,” आश्रम से निकलते समय दिव्या मुझसे बोली। ‘वो महर्षि की समाधि पर जो आचानक से गाने लगे, उनकी आवाज़ कितनी अच्छी थी’, रोड पार करते हुए मैंने दिव्या से कहा। “हाँ, मैं तो एकदम से खो गई थी।”
कल सुबह वो गुफा देखने जाऊँगा जहाँ रमण ध्यान किया करते थे। आश्रम से १.५ किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह ८ से शाम ४ बजे तक आप वहाँ जा सकते हैं।


30-Aug, 2019
महापरिनिर्वाण रूम में भगवान के बेड पर उनकी खाने-पीने के पात्र, छड़ी और पंखा पड़ा हुआ था। कमरा बहुत छोटा लेकिन सुंदर था। ध्यान हॉल में रखे सोफ़े की तरह यहाँ भी भगवान का बेड बस पर्याप्त था, न ज़रूरत से एक इंच बड़ा और न ही एक इंच छोटा। कमरे के ऊपर दो विशाल पेड़ों की छाया थी। छड़ी और पंखे के अलावा कमरे में क़रीब-क़रीब वो सब कुछ था जिसे भगवान अपने जीवन काल में उपयोग में लाते थे। 
‘महर्षि, इतने छोटे-से बेड पर आप कैसे सो लेते हैं?’, मैंने पूछा। भगवान बेड पर लेटे हुए थे, और मैं उनके पैरों के पास ज़मीन पर बैठा हुआ था। कमरे में मेरे और दिव्या के अलावा और कोई नहीं था। महर्षि ने कोई उत्तर नहीं दिया। बहुत देर तक जब महर्षि चुप रहे, तो हम वहाँ से उठकर बाहर आ गए। रूम से निकलते ही बाएँ में उनके दो प्रमुख शिष्यों की समाधि थी। सामने एक नारियल का पेड़ फलों से लदा खड़ा था।


महर्षि की समाधि पर पूजा चल रही थी। कुछ लड़के, जिनके शरीर का ऊपरी हिस्सा निवस्त्र था और माथे व शरीर पर जगह-जगह विभूत का तिलक लगा हुआ था, मंत्रोउच्चार के साथ शिवलिंग की पूजा कर रहे थे। हॉल के बाईं दीवार से लगकर पुरुष साधक बैठे थे, और दायीं दीवार के पास महिलाएँ बैठी थीं। निरपवाद रूप से देशी और विदेशी सभी साधक भारतीय परिधान में थे। 
पूजा समाप्त होने के बाद रमण के वचनों का पाठ शुरू हुआ। पाठ तमिल में हो रहा था, हमें कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जिस लय में वे पढ़ रहे थे, वह बड़ा अच्छा लगा।
महर्षि की समाधि से लगी हुई उनकी माँ की समाधि है। भगवान की समाधि की तरह उनकी समाधि में भी शिवलिंग स्थापित है।
माँ की समाधि में शिविलिंग के अलावा रमण की भी एक प्रतिमा रखी हुई है। जैसे ही आप समाधि में प्रवेश करते हैं, अपने बाईं ओर एक बेड पर आप रमण को बैठा हुआ देखते हैं-काले पत्थर से बनी मूर्ति बहुत ही भव्य और आकर्षक है।
दोनों समधियों (रमण और उनकी माँ की) पर लोग पूजा-अर्चना और परिक्रमा कर रहे थे। हमने भी रमण की समाधि का दो बार परिक्रमा की।

समाधि के ठीक सामने वह रूम (महापरिनिर्वाण रूम) है जिसमें रमण ने देह त्यागा था। जब हम वहाँ गए थे, रूम का गेट बंद था। गेट में लगे शीशे से झाँकने पर हमने देखा कि उस पार बेड के नीचे पीतल का एक दिया जल रहा है।
समाधि हॉल से सटा हुआ ही वह कक्ष है, जहाँ रमण दर्शन दिया करते थे। कक्ष में जिस सोफ़े पर रमण लेटा करते थे, वह आज भी यथावत-यथा-स्थान सुरक्षित रखा हुआ है। सोफ़े के ऊपर रमण की एक बहुत ही बड़ी पेंटिंग रखी हुई है। सोफ़े वाली जगह को लकड़ी के बाड़े से घेर दिया गया है। फ़ेंस के बाहर बैठ कर लोग ध्यान करते हैं। कक्ष में साधकों की सुविधा के लिए दो पंखे लटके हुए हैं। पंखा देखते समय मैंने नोटिस किया कि खिड़कियों की तरह लकड़ी के छत को संभालने वाले बरेरी(बीम) भी ६ हैं। 
कक्ष का दोनों गेट आमने सामने है। एक गेट अब शायद हमेशा बंद रहता है। गेट से लग कर कुछ लोग ध्यान में बैठे हुए थे। शाम के बाद रूम के अंदर पीली रौशनी जलने लगती है। 
हॉल के पास ही पुराना कुआँ और पुराना भोजनालय है। भोजनालय के सामने पुराना चिकित्सालय है, जिसके हर कमरे में अब बस रमण की तस्वीरें सजी हुई है। चिकित्सालय से बाहर निकलते ही बाएँ में नीम पेड़ के नीचे लक्ष्मी की समाधि है।


आज के आइस-क्रीम का स्वाद सबसे अलग लग राह है..है ना ?


लड़की-कोई आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता...(सोफे पर लेट कर छत को देखते हुए) कोई मुझे आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता.....
लड़का- पैसें नहीं है...और मेरा अभी आइस-क्रीम खाने का मन भी नहीं है..तुमको अकेले ही खाना हो तो ऑनलाइन आर्डर देकर माँगा लो?
लड़की- नहीं फिर रहने दो ...नमकीन होता तो, खा भी लेती, मीठा अकेले नहीं खाना| पैसे क्यूं नहीं है?
लड़का-नहीं है बस, जो थे वो बाइक वाले को दे दिये..कल एटीएम से निकालना होगा|
लड़की- (फिर से गाने लगती है..) कोई मुझे आइस-क्रीम भी नहीं खिलाता.....| 
लड़का-बस दो-दस के नोट पड़े हैं, मेरे पास| इतने में होगा तो चलो चलते हैं| 
लड़की- कुल्फी तीस का देता है| 
लड़का- (अपना जेब टटोलते हुए) एक पांच का सिक्का भी है|
लड़की-रुको... कुछ छुट्टे मेरे पास भी पड़े हैं..(भाग कर हॉल से कमरे में जाते हुए) बीस रूपये हैं (चिल्लड़ गिनते हुए)-टोटल कितना हुआ?
लड़का-हम्म...पचीस मेरे पास है, और बीस तुम्हारे पास तो..कुल हुआ 45 रुपया..| अरे..यार अगर पन्द्रह रूपये और मिल जाए तो मैं भी खाल लूं... रुको मैं अपने बैग में देखता हूँ..(भाग कर कमरे में जाता है, बैग सर्च करता है)..सात रूपये मिले!
लड़की- दो कुल्फी के लिए आठ रूपये और चाहिए..रुको मैं अपने बैग में भी देखती हूँ...
लड़का-कहीं तो कल पांच का एक सिक्का पड़ा देखा था!
लड़की- वही पांच का सिक्का जोड़ कर तो मेरा बीस रुपया हुआ है| मेरे बैग में एक भी रुपया नहीं नहीं है-तुम एक भी रुपया मेरे पास नहीं छोड़ते हो| 
लड़का-(अपना सब सामान देखते हुए, बेड के नीचे, टेबल पर, जींस के जेब में, सोफे के नीचे..) यार ऐसा कैसे हो गया कि अपने पास 8 रुपया भी नहीं है..कितना तो यहाँ वहां पड़ा देखता था|
लड़की- वही 'कितना' जोड़ कर तो 52 रुपये हुए हैं....| छोड़ों नहीं मिलेगा...एक काम करते हैं...उसकों बोल देंगे कि 8 रुपया बाद में दे देंगे| 
लड़का-(बे-मन से) हाँ चलो ये ठीक रहेगा(रूम से निकलते हुए) अरे...आई हैव एन आइडिया...ये जो अपने पास इतना अख़बार पड़ा है, चलो इसको बेच देते हैं..| 
लड़की- (चहकते हुए) हाँ...वहीं हैंडी मार्केट के पास ही रद्दी वाले का शॉप है...चलो फिर ज्यादा पैसे आ गए तो मैं एक कोण भी ले लुंगी..|
लड़का- (मन-ही-मन 'गाँव बसा नहीं की भिखारी आ गए)
-------थोड़ी देर बाद-------
लड़की- आज के आइस-क्रीम का स्वाद सबसे अलग लग राह है..है ना ?

नागफनी पर पीला फूल आया था


26-Aug,2016
अगर पांच मिनट और इंतजार करता तो आज किरण बेदी जी से मिलना हो जाता है, और उनके साथ एक फोटों भी खिच जाती | अगर फोटो को शेयर करता, निःसंदेह आम तस्वीरों की तुलना में उस तस्वीर पर लोगों के ज्यादा लाइक और कमेंट आ जाते| लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया| एन वक़्त पर जब किरण बेदी जी अपने मीटिंग से निकल कर आने ही वाली थीं, हम राज निवास से निकल कर बाहर आ गए| दिव्या इस बात से थोड़ी नाराज़ भी हुई उसे उनसे मिलकर तस्वीर बनवाने का बड़ा मन था| लेकिन मैं अपने वायदे से मजबूर था| उस दिन चाय पर जब हम (पी.डी ओस्पेंसकी, गुर्जेइफ़ और मैं) चर्चा कर रहे थे, तब G. ने मुझसे तीन वचन लिए थे, उसमे से एक वचन एक यह भी था कि मैं जीवन में कभी किसी फेमस व्यक्ति के साथ तस्वीर नहीं खिचवाउंगा| 
राज निवास में जाने के लिए आपको एक दिन पहले बुकिंग कराना होता है| यह बुकिंग ऑनलाइन होता है| फिर आपको अगले दिन 12:00 से 1:00 के बीच में बुलाया जाता है| 'राज निवास', 'पुदुच्चेरी संग्रहालय' के बगल में ही है| अंदर जाने पर एक उदास और जीवन से एकदम थकी हुई स्त्री आपको अंदर घुमाने ले जाती है| दिवार पर लगे कुछ पेंटिंग, फ़्रेच फर्नीचर, डाइनिंग हॉल, मीटिंग हॉल और एक सौ पचास साल पुराना पियानो और फर्श दिखाने के बाद वो आपको एक मंदिर में ले जाती है| मंदिर के बाहर खड़ा एक व्यक्ति जो कहीं से भी पंडित और भक्त टाइप नहीं दिखता है, आपको मंदिर के पास बुला कर एक कपूर जला कर भगवान् की आरती करता है, और फिर आरती का दिया आपके सामने लाकर आपसे कुछ पैसे पाने की उम्मीद करता है| इसी उम्मीद में वह आपके माथे पर तिलक भी लगा देता है| फ्रेंच स्टाइल में बना भवन सुन्दर और भव्य है| मेन हॉल में उस सब गवर्नर की तस्वीर लगी है, जो किरण बेदी से पहले वहां रह चुके हैं| बहुत से तस्वीरों में एक तस्वीर 'एन.एन झा' की थी| मैं खुश हुआ कि यहाँ अपने मिथिलांचल के भी कोई रह चुके हैं| 
डाइनिंग हॉल के टेबल पर एक विशाल कॉफ़ी कप रखा हुआ था, कप इतना बड़ा था कि एक छोटा बच्चा उसमे बैठ कर नाहा ले, "क्या मैडम इसमें कॉफ़ी पीती हैं", मैंने जीवन से उदास महिला से पूछा| जवाब देने के बजाय उसने कप में सामने हमें खड़ा करके अपने मोबाइल से एक फोटो लेकर हमारे व्हात्सप्प पर भेज दिया| 
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कल सुबह शमशान के पास वाले ओरोविल बीच पर सूर्योदय देखने गया था| हमसे पहले कई लोग बीच पर मौजूद थे| संभवतः हर कोई दिनकर को अरग देने ही आए थे| एक दम्पत्ति जो थर्मस में चाय भर कर लाए थे, शानदार कप में चाय का मजा ले रहे थे| उनकी ठाठ देखकर थोड़ी इर्ष्या भी हुई| 
मौसम सुहाना था, लोग कम थे, तीन कुत्ते रेत पर मस्ती कर रहे थे, नागफनी पर पीला फूल आया था|
छः बजकर तीस मिनट तक हमने इंतजार किया, लेकिन सूर्य महाराज बादलों की ओट से प्रगट नहीं हुए| अंत में निराश होकर हम लौट आए| हालाँकि सुबह इतनी सुन्दर थी कि सूरज को उगता हुआ न देख पाने का मलाल ज्यादा देर तक नहीं रहा|

घर से जब आईना देखकर निकलता था


मैं किसी भी सवाल का जवाब नहीं हूँ| लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, "तुम क्या हो?", और मैं बगले झाँकने लगता हूँ| घर से जब आईना देखकर निकलता था, तो वही था जिसे लोग 'आदमी, इन्सान, और मनुष्य' कहते हैं| पता नहीं पूछने वाले महानुभाव को इसका पता कैसे नहीं चलता है| फिर कुछ लोग पूछते हैं, "तुम क्या करते हो?", तो मैं एकदम से बिदक जाता हूँ| क्या बोलूं की मैं क्या करता हूँ| यदि सच बोलता हूँ कि 'मैं कुछ भी नहीं करता हूँ', तो सामने वाले को यकीन नहीं होता है| और यदि झूठ बोलता हूँ, तो मुझे अच्छा नहीं लगता है| 

गए साल अपनी बुआ से मिलने राजस्थान गया था, वो कहने लगीं, "सब पूछते रहते हैं कि आपका भतीजा क्या करता है, मुझे तो ख़ुद ही पता नहीं की तुम क्या करते हो, अब क्या बोलूं में लोगों को, क्या करते हो तुम?" मुझे कुछ समझ ही नहीं आया कि मैं उनसे क्या बोलूं| 'बौआता(भटकता) रहता हूँ, इधर-से-उधर, और तो कुछ करता नहीं', मैंने ने उनसे कहा| "इतना घूमने के लिए पैसा कहाँ से लाते हो?", बुआ बोली| 'ढक-पेंच से कमा लेता हूँ, या कह लो की GD करता हूँ', मैंने उनसे कहा| "ई जीडी क्या होता है?", मुंह बनाते हुए बुआ बोली| 'जीडी माने गोरख धंधा, यही करता हूँ मैं', मैंने उनसे कहा| "तुम्हारे बाप का भी कभी किसी को पता नहीं चला कि क्या करता है, और तुम्हारा भी वही हाल है..असल बेटे हो तुम'', चाय का कप उठाकर जाते हुए बुला बोली| 
उस दिन के बाद से अब जब भी कोई मुझसे मेरे कमाने का राज़ पूछता है तो जीडी कह देता हूँ| लेकिन मैं ख़ुद नहीं जानता कि ये जीडी क्या है, और मैं क्या करता हूँ| मैं बस इतना जानता हूँ कि कुछ-से-कुछ करता रहता हूँ, और उसके परिणाम स्वरूप कुछ-का-कुछ होता रहता है| या फिर इसको ऐसे कह सकता हूँ, 'करता-धरता कुछ भी नहीं हूँ, लेकिन होता बहुत कुछ रहता है'| 'तुम क्या करते हो के बजाय यदि मुझसे ये पूछा जाए कि तुम्हारे जीवन में क्या-क्या होता रहता है', तो बड़ी सहजता से बहुत कुछ बता सकता हूँ| 
मैं अपने जीवन में करता कुछ भी नहीं हूँ, और न ही मैं कुछ हूँ| जैसे सबके जीवन में होता है, वैसे ही मेरे जीवन में भी बहुत कुछ होता रहता है| और मेरे जीवन में शुरू से ही सब कुछ ऐसे ही है| मैंने जन्म लिया नहीं था, मेरा जन्म हुआ था, और जैसे अपने आप एक दिन जन्म हुआ था, वैसे ही बड़ा हो गया, और एक दिन ऐसे ही मर भी जाऊँगा| सब अपने आप हो रहा है| इसमें मैं कुछ कर नहीं रहा हूँ| इसीलिए 'करने' की बात उठा कर आप मुझे बड़ी असुविधा में डाल देते हैं| 

स्त्री हुए बिना सृजन संभव नहीं है

25-Aug, 2019

एक विडंबना- 

दुनिया के ज्यादातर प्रसिद्ध लेखक/कवि स्त्री प्रेमी हैं (या कम-से-कम ऐसा उनकी लेखनी से प्रगट होता है), जबकि अक्सर स्त्री कवयित्री/लेखिकाएँ पुरुष विरोधी होती हैं|


25-Aug,2019

जबसे पुदुच्चेरी आया हूँ, हिंदी पढ़ने के लिए तरस गया हूँ| अपने साथ बस एक किताब लेकर आया हूँ-वॉर एंड पीस| 'लाल टीन की छत' पढ़ने के बाद से निर्मल को पढ़ने की तलब बहुत बढ़ गई है| परसों यहाँ के लिब्रेरी में गया था| बड़ी मुश्किल से निर्मल की एक किताब मिली वो भी वही जो पहले से पढ़ रखी थी-लाल टीन की छत| 

कृष्णनाथ की 'अरुणाचल यात्रा' और मनोहर श्याम जोशी की 'क्या हाल हैं चीन के', लेकर पढ़ने के लिए बैठा| दोनों यात्रा-संस्मरण है| 'अरुणाचल यात्रा' कुछ ख़ास नहीं लगी| जोशी जी को पढ़ने में मज़ा आने लगा| कोई आधा घंटा मैंने किताब पढ़ी होगी कि सामने वाली कुर्सी पर दिव्या को पाउलो केओलो की किताब पर उंघते हुए पाया| जबसे उसने अलकेमिस्ट पढ़ी है, जहाँ कही भी जाती है, पाउलो की कोई किताब उठा लेती है| पाउलो की एडल्ट्री भी उसे अच्छी लगी थी| 
उसे ऊँघता देख मन-मसोस कर मुझे उठाना पड़ा| उठते-उठते मैंने किताब के कुछ पन्नो की फोटो खींच ली, सोचा रूम पर जा कर पढेंगे| सीढ़ियों से नीचे उतरते समय मेरी नज़र नेहरु जी की एक पेंटिंग पर अटक गई| पेंटिंग में मुझे कुछ अटपटा लगा| गौर करने पर पाया कि उनके नाक और होंठ के बीच जो मूंछ वाली जगह है, वह कुछ ज्यादा ही बड़ी हो गई है| मूर्ति और रास्ते पर लगे पोस्टरों से मेरा ऐसा अनुमान है कि यहाँ के लोगों को नेहरु परिवार से विशेष लगाव है| 
रास्ते में एक किताब की दुकान दिखी, अन्दर जाकर पता किया तो पाया कि उनके पास हिंदी की एक भी किताब नहीं थी| 
रूम पर पहुँचते-पहुँचते हिंदी में कुछ पढ़ने के लिए मन इतना अधीर हो उठा कि कमरे में घुसते ही 'हिंदीसमय.कॉम' खोल कर बैठ गया| एक घंटा राहुल सांकृतयान को पढ़ने के बाद थोडा आराम मिला| 
पढ़ने की ऐसी भीषण अभीप्सा इससे पहले मैंने पहले कभी नहीं जानी थी|


26-Aug, 2019
लेखक होना स्त्री के किए और स्त्री होना है, जबकि पुरुष के लिए लेखक होना अपने मूल स्वभाव से दूर जाना है। इसी में वह टूट जाता है, तलवार उठाना उसके लिए क़लम उठाने से ज़्यादा सहज है। जैसे ही पुरुष किसी भी प्रकार के कला में उत्सुक होने लगता है वह स्त्री जैसा होने लगता है। स्त्री हुए बिना सृजन संभव नहीं है। विध्वंस करना उसका/पुरुष का मूल स्वभाव है। अक्सर लेखक और कवि थोड़े पागल हो जाते हैं, यह स्वभाव से दूर जाने की वजह से होता है। इसी तरह वे स्त्रियाँ भी टूट जाती हैं, जो अपने स्वभाव से दूर जा कर पुलिस, आर्मी और इसी तरह के और पागलपन में पुरुषों के कंधे-से-कंधा मिलाने लगती हैं।



Saturday, 24 August 2019

गुलाब पर प्रभाकर की पहली किरण


सुबह उठकर 8:45 पैतालीस से पहले हमें विडियो रूम में पहुंचना था| इसीलिए बिना समय गवाएँ हम रात जल्दी सो गए| हम उत्साहित थे, गोल मंदिर के अन्दर जाना पोंडिचेरी का सबसे बड़ा आकर्षण था| जब भी गूगल में पोंडिचेरी या ओरोविल डालता था, सबसे पहले 'गोल मंदिर(मातृमंदिर) दिखता था| हमारे मेहसाना आश्रम निवास के दौरान संजय स्वामी जब पहली बार आश्रम में आए थे, तो वे हमसे जोरबा (आश्रम का टी-शॉप) पर ओरोविल की बहुत सी बातें किया करते थे| वे ओरोविल में 13 साल रहे थे| उन्ही से ओरोविल के बारे में सुन-सुन कर हमारे अन्दर यहाँ आने की वासना पैदा हुई थी| हाल-फ़िलहाल में मेरे एक जर्मन मित्र ने जब मुझसे जर्मनी छोड़ कर ओरोविल में आकर बसने की बात की, तब ओरोविल में मेरी उत्सुकता और बढ़ गई| एक मास्टर उगवे को छोड़ कर सबसे मैंने अब तक पोंडिचेरी के बारे में सकारात्मक बातें ही सुनी थी| अमोल  स्वामी से जब मेरी बात हुई तब उन्होंने भी ओरोविल के लिए काफी प्रेरित किया, साधना फारेस्ट में ठहरने पर भी उनका काफी जोर था| मानसून फेस्टिवल के दौरान पुणे में माँ मुक्ति से हमारी बात हुई तो उन्होंने भी पोंडिचेरी को काफी सराहा| हम 18 अगस्त को पोंडिचेरी पहुँच गए थे, चार दिन हमें मातृमन्दिर के अन्दर जाने का पास लेने में लग गया| सुबह ध्यान में नींद न आए इस लिए हम दस बजे से पहले ही, बिना कोई फिल्म देखे, सोने चले गए|
नींद में किसी के गेट पीटने की आवाज़ सुनाई दी, टाल कर मैं सो गया| एक मिनट बाद फिर से आवाज़ आई, अब दिव्या भी जाग गई| मुझे लगा सुबह हो गई है, रूम सर्विस वाला आया होगा| घड़ी में समय देखा था, तो सुबह के 3 बज रहे थे| इतनी सुबह कौन गेट पीट रहा है? मैंने ख़ुद से सवाल किया| रूम से निकल कर हॉल में आया| गेट में शीशा लगा है, लेकिन बाहर की लाईट बंद होने की वजह से मैं किसी को भी देख नहीं सकता था| थोड़ा संशय के साथ मैंने गेट खोला| लुंगी लपेटे दो अधेड़ उम्र के पुरुष खड़े थे| एक के मुंह से शराब की गंध आ रही थी| मुझे थोड़ा डर लगा| हम जिस बिल्डिंग में रह रहे हैं, वह है तो मुख्य सड़क के पास ही लेकिन थोड़ा सुनसान जैसा है| नीचे रिसेप्शन पर भी कोई नहीं रहता है| अपने बगल और नीचे वाले फ्लैटों में भी हमने अभी तक किसी को रहते नहीं देखा है| छत पर जिम है, जिसके लिए कई लड़कों को हमने ऊपर नीचे आते-जाते देखा है| रूम सर्विस के लिए चार बार कॉल करने पर एक बार दो लड़के आते हैं| वो भी तमिल में क्या बोलकर चले जाते हैं, हमें कुछ समझ में नहीं आता है| “आपने अपना आईडी कार्ड दिया है”, टूटी-फूटी अंग्रेजी में एक ने मुझसे पूछा| मैं अभी भी आधी नींद में था, दिमाग पूरी तरह से काम नहीं कर रहा था| ‘हाँ लड़के ने हमारे कार्ड का फोटों खींच कर ले गया था’, दिमाग पर जोर डालते हुए मैंने कहा| “ये लड़की यहाँ रह रही है?”, अपनी मोबाइल में एक फोटो दिखाते हुए उन्होंने मुझसे पुछा| फोटो वाली लड़की को मैं नहीं जानता था, उसका मुंह लम्बा था और बालों में फूलों का गजरा लगा हुआ था| ‘इस लड़की को मैं नहीं जानता’, मुझे अब थोड़ा गुस्सा आने लगा था| “क्या आप अपना आईडी कार्ड दिखा सकते हैं”, एक ने निवेदन करते हुए मुझसे कहा| उनके बातचीत के ढंग से मुझे लगा शायद ये गुंडे, ठग या बदमाश हैं| “यह लड़की गायब हो गई है, FIR दर्ज हुआ है”, इसीलिए हम जांचपड़ताल कर रहे हैं| अब मैंने थोड़ी राहत की सांस ली-पुलिस हैं| गेट बंद करके मैं अंदर ID कार्ड लेने आया| जब मैं कार्ड लेकर आया दिव्या भी मेरे साथ आ गई| उन्होंने हमारे कार्ड को देखा और फिर हमसे मांफी मांगने लगे, “सा’अरी हमने आपकी नींद ख़राब की|” इससे पहले कि मैं उनसे कुछ कहता “कोई बात नहीं” बोल कर दिव्या ने गेट बंद कर दिया|

रूम में आने के बाद दिव्या इस घटना के बारे में बात करना चाहती थी, वह थोड़ी डरी हुई भी थी| लेकिन कुछ भी बोल कर मैं नींद ख़राब नहीं करना चाहता था| सिर ढक कर मैं सो गया| सिर ढकते समय माधोपुर आश्रम में वकील साहब की कही एक बात मुझे याद आ गई, “किस-किस को याद करें, किस-किस को रोइए, आराम बड़ी चीज़ है, सिर ढक कर सोइये”, वाह...वकील साहब वाह...!
सुबह उठने के बाद रात के बारे में बिना कोई डिस्कशन किए, हम तैयार होकर मातृमन्दिर की ओर भागे| रास्ते में एक जगह मैं नारियल पानी पीना चाहता था, लेकिन दिव्या ने समय कम है कह कर टाल दिया| हालाँकि 8:15 पर हमने घर छोड़ दिया था, 8:30 तक हम ‘विडियो’ रूम तक पहुँच जाने वाले थे| हमारे हाथ में पन्द्रह मिनट फिर भी थे, मेरे ख्याल से नारियल पानी पीने के लिए इतना समय पर्याप्त होता है| खैर, मेरे पिता जी कहते हैं, ‘स्त्री, शराबी, पागल और नाबालिग से कभी भी किसी बात पर बहस नहीं करनी चाहिए| पिताजी के नसीहतों का पालन करते हुए, मैंने दिव्या से बहस नहीं की| अपने पसंदीदा गुलमोहर पास भी मेरा मन रुकने का था, लेकिन मैं गाड़ी भागता रहा|
ठीक आठ बजकर तीस मिनट पर हम विडियो रूम के बाहर खड़े थे| हमारे अलावा दस-बारह लोग और खड़े थे| दो लोगो को छोड़ कर सभी भारतीय थे, ज्यादातर बुजुर्ग थे, और जो नहीं थे वे दिख रहे थे| थोड़ी देर बाद एक भारतीय लड़की जिसकी उम्र कोई बीस साल होगी, एक विदेशी लड़की के साथ आई| विदेशी की उम्र तीस से ज्यादा लग रही थी| भारतीय बाला उसे ध्यान और समाधि के बारे में समझा रही थी| नए लोगों को, गेट के बाहर खड़ा स्टाफ पेड़ के नीचे बने पत्थर के बैंचों पर बैठ कर इंतजार करने को कह रहा था|
9 बजने के कुछ मिनट पहले हमें विडियो रूम में ले जाया गया| रूम किसी छोटे सिनेमा घर जैसा था| बैठने के लिए सीमेंट की सीढ़ी बनी हुई थी, जिसपर कुश (या कुश जैसी किसी दूसरे घास की) चटाई बिछी हुई थी| सामने एक छोटा पर्दा लगा हुआ था, जिस पर प्रोजेक्टर की रौशनी पड़ रही थी| थोड़ी देर बाद जब सारे लोग अन्दर आ गए तो सभी गेट और लाईट बंद कर दिये गये| लाईट बंद होने से पहले मैंने अपनी पंक्ति में बैठे लोगों की संख्या को गिना था | एक लाइन में 12 लोग बैठे थे| मतलब हॉल में कुल 60 लोग थे|
माता जी (श्री अरविन्द की अध्यात्म संगनी) की आवाज़ से साथ विडियो शुरू हुआ| फिर मेल वाईस-ओवर के साथ विडियो शुरू हुआ| विडियो में कोई ख़ास जानकारी नहीं थी| जितनी बातें विडियो में बाताई गई, वो सब दो दिन पहले सूचना भवन से हमें पता चल गई थी| फिर भी विडियो प्रभावशाली था, बैकग्राउंड संगीत, आवाज़ के संग चलने वाला क्लिप मन पर अच्छा प्रभाव छोड़ रहा था| विडियो ख़त्म होने के बाद हमें बस तक ले जाया गया| बस में बैठते समय मैंने नोटिस किया कि अन्दर बैठे 60 फीसदी से ज्यादा लोग उत्तर भारतीय हैं, हमारे आगे वाली सीट पर बैठा दम्पति संभवतः ब्रिटेन का था|
क़रीब पांच मिनट की बस यात्रा के बाद हम अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच गए| जिन लोगों के पास पर्स और मोबाइल था, वे उसे जमा करने के लिए ‘जमा काउंटर’ के सामने लाइन में लग गए थे| जो लोग अपना सामान हमारी तरह रूम पर छोड़ कर आए थे, वो पानी वाले मशीन से पानी पीने लगे| कुछ लोग इधर-उधर खड़े होकर अपने आसपास का मुआयना करने लगे| हम जहाँ खड़े थे मातृमन्दिर वहाँ से 200 मीटर की दूरी पर था| जब सभी लोगों का सामान जमा हो गया तब हमें एक पेड़ के नीचे ले जाया गया| वहीँ एक गोल घेरे में कटीले पेड़ों के अनेकों प्रजातियां लगी हुई थी| पेड़ के नीचे बैठने के लिए बैंच बना हुआ था| कुछ लोग बैंच के नीचे बैठ कर अगले निर्देश का इंतजार करने लगे|
थोड़ी देर बाद मध्यम हाईट की एक फिरंगी स्त्री, जिनकी उम्र 80 के करीब होगी, हमें बुला कर एक दूसरे पेड़ के नीचे ले गई| पेड़ के नीचे बने पत्थर के बैंचों पर हमसे बैठने को कहा गया| उनकी आवाज़ बहुत ही पतली और कमज़ोर थी| पीछे के बैंचों पर बैठे लोग उनको बहुत मुश्किल से सुन पा रहे थे| मजबूरन उन्हें कुछ लोगों को बुला कर अपने पास खड़ा करना पड़ा| खड़े होने वाले लोगों में हम दोनों भी थे| उन्होंने कोई बीस मिनट हमसे एकतरफा बातचीत की| उन्होंने जितनी बातें बताई, उनमे से करीब-करीब ७० फीसदी बातें हम अभी कुछ देर पहले ही विडियो रूम से सुन कर आए थे| अभी तक हमें जो कुछ बताया, समझाया या फिर दिखाया गया था, वो सब मुझे अनावश्यक लगा|
20 मिनट के उबाऊ भाषण के बाद हम उनके पीछे-पीछे मन्दिर के लिए विदा हुए| मंदिर से पहले एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ आया| पेड़ के अनेक जड़े जमीन से लग कर मोटे और मज़बूत तने बन गए थे| पेड़ के पास से गुज़रना मुझे बहुत ही सुखद और शान्तिदायक लगा| पेड़ के एक तने को छूकर मैंने अपना अनुग्रह प्रगट किया| बूढ़े और पूराने पेड़ों को देख कर कई बार अनायास ही मेरी आँखे भर आती है|
पेड़ से गुजरने के बाद हम मंदिर के नीचे आ गए| मंदिर को पास से देखना किसी बहुत ही बड़े करिश्मे को देखने जैसा था| ऐसा अभूतपूव और भव्य मंदिर मैंने इससे पहले कहीं नहीं देखा था| मंदिर के आसपास के आबोहवा में एक सघन शांति और मौन को मैंने महसूस किया| सूर्य के सामान देदीप्यमान पीतल के चक्रों से बने इस गोल मंदिर को देख कर मेरा दिमाग एकदम गोल हो गया| एक जगह हमसे चप्पल उतारने को कहा गया| चप्पल उतारने के बाद हमें मंदिर के नीचे ले जाया गया| मंदिर अब हमारे सिर के ऊपर था| नीचे जहाँ हम खड़े थे वहां एक गोल चबूतरा बना हुआ था, जिसके बीच में सफ़ेद पत्थरों का एक कमल फूल बना हुआ था, फूल के बीच में एक सफ़ेद गोला (क्रिस्टल) रखा हुआ था| कमल कुछ इस ढंग से बना था कि हुआ था कि उसके पत्तियां ऊपर की ओर जाने के वजाय नीचे की ओर जा रही थीं| ऊपर की पंक्तियों से होकर पानी का अविरल प्रवाह नीचे क्रिस्टल के गोले तक जा रहा था| पूरा दृश्य बड़ा ही सम्मोहक और मुग्ध कर देने वाला था| यहाँ हम सारे लोग गोलाकार बैठ गए| यहाँ हमें बीस मिनट ध्यान करना था| मेरे बाईं ओर जो दो लड़कियां बैठी थी, उनसे जींस की वजह से सुखासन में बैठा नहीं जा रहा था, मजबूरन उन्हें गोदुग्धा आसन (उकडू) बैठना पड़ा| कुछ लोगों ने अपनी आँखें बंद कर ली, कुछ आँखे खुली रख कर क्रिस्टल बॉल पर अपना ध्यान क्रेंद्रित करने की कोशिश कर रहे थे| मेरी आँखे आश्चर्य से इतनी फटी हुई थीं कि मैं चाह कर भी उन्हें बंद नहीं कर पाया| मेरी तरह ही एक फिरंगी युवक आखें फाड़े सबको देख रहा था| सामने लाल पत्थर का एक कमल की पंखुड़ी के आकर का भवन था, जिस पर काम चल रहा था, मजदूरों के बैठने व काम करने के लिए उसके चारों तरफ लोहे का टाट बंधा हुआ था| उसी टाट पर एक स्टील की केतली टंगी हुई थी| शायद केतली में थोड़ी चाय रह गई थी| दो कव्वे अपने चोंच से केतली को इधर उधर हिला रहे थे| सामने खम्भे के पास बैठी औरत बेमन से अपनी ड्यूटी निभा रही थी| दिव्या आँखे बंद करके ध्यान में लीन थी| उसके पुतलियों की हरकत से मुझे ऐसा लगा कि वह आँखे बंद कर के बड़ी तेज़ी से कुछ सोच रही है|    
बीस मिनट बाद घंटी की आवाज़ आई, हम सब उठकर खड़े हो गए| दो लोग हमारी अगुवाई के लिए सीढ़ीयों के पास खड़े थे| हमें पंखुड़ी नुमा लाल भवन में ले जाया गया है| पतली गलियों से गुजरते हुए मैंने देखा, एक बंद कमरे में बहुत से सफ़ेद गोल गद्दे रखे थे, एक व्यक्ति आखें बंद किये ध्यान कर रहा था| मुझे अजंता की याद आ गई वहां भी इसी तरह बौद्ध साधकों ने ध्यान करने के लिए सामूहिक जगह के अलावा पर्सनल चेम्बर्स बना रखे थे| शुरू-शुरू में समूह में ध्यान करना सहयोगी रहता है, लेकिन बाद में साधक को अकेले ही ध्यान करना चाहिए| ध्यान के लिए पर्सनल चेम्बर्स मेहसाणा के पास वाले गोयंका विपसना ध्यान केंद्र में भी था| गोल पगडंडीयों जैसे रास्ते से होते हुए हम एक सफ़ेद और लाल रौशनी वाले कमरे में पहुंचे| कमरे में सफ़ेद रंग का एक लम्बा बैठने का बैंच बना हुआ था| एक विदेशी महिला ने हमें बैंच पर बैठकर सफ़ेद मौजे पहनने का निर्देश दिया| पेंट के निचले हिस्से को मौजे के अन्दर डालना था| यह क्रिया ओशो की समाधि से थोडा भिन्न था, वहां सिर्फ सफ़ेद मौजे पहनने होते हैं, पतलून के निचले हिस्से को आप खुला रख सकते हैं| वैसे आमतौर पर रोब के नीचे बहुत कम सन्यासी ही पजामा पहनते हैं|
मौजे पहनने के बाद गोल सीढ़ियों से हम ग्लोबाकार मंदिर के अन्दर-अन्दर से उसके उपरी चैम्बर में जा रहे थे| सफ़ेद गद्देदार सीढ़ी (सीढ़ी कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि स्टेप्स नहीं थे, सिर्फ ऊपर उठता हुआ सफेद गद्देदार सोपान था), सफ़ेद रौशनी, और सफ़ेद मौजे में हम सब मौन साधे अवाक अवस्था में चल रहे थें| आँखों से जो दिख रहा था वह इतना अनूठा और अभूतपूर्व था कि हमारी आँखों में समा नहीं रहा था| यह सोच कर कि इतना बड़ा आयोजन सिर्फ ध्यान करने के लिए किया गया है, मेरे भीतर कुछ घटित हो रहा था| रह-रहकर मैं अपने भीतर मीठी सिहरन महसूस कर रहा था| ऐसा ही मैंने अजंता में भी महसूस किया था| वहां आखिरी मंदिर में, मरने से पहले बुद्ध एक पेड़ के नीचे लेटे हुए हैं, भिक्खु उनके चारों तरफ बैठे हैं, उस प्रतिमा को देखकर मैं फूट-फूट कर रोने लगा था|
इतना सब कुछ, ये सारा आयोजन ध्यान के लिए हैं, ये देखकर मेरा हृदय आल्हाद से फटा जा रहा था| मैं सुखद अनुभूतियों से गुज़र रहा था| कुछ देर पहले नीचे कमल के पत्त्तों के बीच प्रतिष्ठित गोल क्रिस्टल को देखते हुए जो मौन घटा था, उससे चीज़ों को देखने और महसूसने की क्षमता बढ़ गई थी| सौन्दर्यबोध सघन हो गया था| सीढीयों पर चलते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी मायालोक में चल रहे हैं| बस देवी-देवताओं की कमी थी, बांकी माहौल एक दम साकेत जैसा था|
कुछ मिनटों तक चलने के बाद हम एक विशाल हॉल में पहुंचे| यह मुख्य ध्यान कक्ष था| कक्ष के बीचो-बीच एक विशाल क्रिस्टल गेंद रखा हुआ था, जिस पर ऊपर से रौशनी गिर रही थी| पेड़ के नीचे विदेशी महिला ने हमसे कहा था कि यह सूरज की रौशनी है, आईनों की मदद से उन्हें, बॉल तक लाया जाता है| बॉल एक स्टैंड पर रखा हुआ था, जो मेरे ख्याल से पीतल का था, सोना भी हो सकता है| हॉल की क्षमता पांच सौ से ज्यादा लोगों की थी| बॉल के चारों तरफ बैठने के लिए कुशन बिछे हुए थे| हम लोग उन्ही कुशनों पर बैठ गए| दिव्या टेका लेने के लिए दिवार के लगे हुए कुशन पर बैठ गई| कुछ पीठ-रोगी पास लगे सफ़ेद कुर्सीयों पर जा बैठे| हॉल को खड़ा रखने के लिए चारों तरफ संगमरमर के मोटे-मोटे विशाल खम्भे लगे हुए थे|
जैसे ही मैं अपनी जगह पर बैठा मुझे मौन की आवाज़ सुनाई देने लगी| पूरे हॉल में गहन मौन पसरा हुआ था, बाहर से किसी भी प्रकार की कोई आवाज़ अन्दर नहीं आ रही थी| हॉल एकदम साउंडप्रूफ़ था| कुछ मिनटों के बाद मुझे अपने हृदय और रगों में दौड़ते लहू की आवाज़ सुनाई पड़ने लगी है| सन्नाटे की ऐसी सघन अनुभूति इससे पहले मैंने कहीं नहीं की थी| पूरा कक्ष सफेदी के अलौकिक आलोक में डूबा हुआ था| वाह! अति सुन्दर!
कुछ मिनटों के बाद मैं कमरे के मौन और शान्ति से बेचैन होने लगा| अचानक से मुझे किसी चीज़ की कमी खलने लगी| कमरे की शांति मुझे मरी हुई शान्ति लगने लगी, मौन मातमी लगने लगा| सबकुछ मरा-मरा-सा लगने लगा| मैंने पाया कि शांति के साथ संगीत का समन्वय होना बहुत ही ज़रूरी है| कक्ष में शान्ति तो थी, लेकिन संगीत नहीं| संगीत के बिना शान्ति शोर से भी ज्यादा बेहूदा लगने लगी| मैं फिर कल्पना करने लगा| काश! इन संग-ए-मरमर के खम्भों की जगह यहाँ पेड़ लगे हुए होते| पेड़ पर बैठे पक्षियों का संगीत होता, उनके गीत से ये मौन और गहरा हो जाता| इससे सुन्दर तो मरघट का मौन होता है| माना कि वहां के मौन में उदासी पसरी होती है, लेकिन प्रकृति का सानिध्य व संगीत तो होता है| कुछ नहीं तो कुत्ता ही भौंकता रहता है| रात झींगुरों की आवाज़ होती है| यहाँ तो कुछ भी नहीं था, संगीत के आभाव में मौन एकदम एकाकी और उदास लगा मुझे|

आँखे खोल कर मैं कुछ देर तक क्रिस्टल बॉल को देखता है| पलक नहीं झपकने की वजह से मेरी आँखों से पानी गिरने लगा| मैंने थोड़ी देर के लिए आँखे बंद कर ली| फिर मेरी खोपड़ी चलने लगी| कितना सुन्दर होता यदि यहाँ क्रिस्टल बॉल की जगह एक जीवंत कमल या गुलाब का फूल होता!
मुझे समझ में आ गया कि यह ध्यान कक्ष मेरे लिए नहीं है| परमात्मा मेरे लिए जीवन का पर्याय है, जीवन से अलग नहीं, जीवन विरोधी तो बिलकुल भी नहीं| पक्षी, पेड़, आकाश, बारिश, समंदर और झिगुरों के संगीत के दूर होकर इस कृतिम शान्ति में मेरा दम घुटने  लगा| ओशो आश्रम में हम ध्यान में बैठने से पहले नृत्य करते हैं, जीवन का उत्सव मानते हैं, गीत गाते हैं, यहाँ हमें सीधे ही सफ़ेद मौजा पहना कर बैठा दिया गया था| इतने नीरस तरीके से ध्यान में बैठना मुझे जम नहीं रहा था| उपनिषद ने हमें सिखाया है कि परमात्मा ‘रस रूप है-रसो वै सः! यहाँ मुझे सभी प्रकार के रस की कमी लगी| ऐसा ही मुझे पुणे आश्रम के पिरामिड में भी लगता है| वहां भी सब कुछ मरा-मरा-सा लगता है| इसीलिए पुणे में मैं सिर्फ ओशो की समाधि पर ध्यान करने जाता हूँ|
20 मिनट बाद एक पीली रौशनी दो बार जलकर बंद हो गई| यह इस बात का संकेत था कि हमारा समय पूरा हो गया| हम सब जिस रास्ते से आए थे, उसी रास्ते से मौजे वाले रूम में वापिस आ गए हैं| मौजे उतारने के बाद अपना-अपना चप्पल पहनने के लिए हमें बाहर लाया गया| चप्पल पहनने के बाद बरगद के पेड़ से गुजरते हुए हम फिर बस तक आ गए| इस बार मुझे बस की पहली सीट पर बैठने का मौका मिला| रास्ते में पेड़ों और हँसते खेलते परिंदों को देखकर मेरी साँसे वापिस लौटी| आँखों को आराम मिला, हृदय गति फिर से नार्मल हो गई| 
मनुष्य अपने हाथों से चाहे कितनी ही सुन्दर चीज़ें क्यों न बना ले, परमात्मा द्वारा रचित एक साधारण घास की पत्ती के सामने भी उसका सौन्दर्य दो-कौड़ी का हो जाता है| सुबह ओस से भीगे गुलाब पर प्रभाकर की पहली किरण जब उतरती है, तो उसके सौन्दर्य के सामने हजारों ताज़महल की रौशनी फीकी पड़ जाती है| 


जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...