Saturday, 27 July 2019

जिस चीज़ की भी हमें आदत हो जाती है, उससे हमें डर नहीं लगता है|



अभी जहाँ मैं रह रहा हूँ वह एक छोटा-सा ख़ूबसूरत द्वीप है| शायद यह दुनिया का सबसे छोटा द्वीप है| तीन तरफ पानी का अनंत फैलाव हैं| नज़रे उठाकर मैं जहाँ तक देख सकता हूँ वहां तक पानी-ही-पानी हैं, पानी का अंतहीन विस्तार और अनगिनत सफ़ेद लहरें...| पानी की सतहों पर सूरज की चमक देखने लिए मैं रोज़ सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाता हूँ| सुबह पानी की गोद से सूरज को उगता हुआ देखना, किसी प्रसाद से कम नहीं है| शाम का नज़ारा भी बहुत ही अलौकिक होता है| शाम के धुंधलके में पानी की स्याह सतह से सफ़ेद लहरों का उठना मंत्रमुग्ध करने वाला दृश्य होता है| रोज़ शाम मैं घंटों छत पर बैठकर लहरों को निहारा करता हूँ|
द्वीप के जिस तरफ पानी नहीं है, उधर एक बस्ती है| बस्ती तक जाने के लिए मुझे कमर भर पानी में 100 मीटर चलना पड़ता है| वैसे बस्ती तक मुझे बहुत कम ही जाना होता है (जब से आया हूँ, तीन दिन में, सिर्फ एक बार बस्ती जाना हुआ है), लेकिन अगर कभी जाना हो तो यह एक टास्क है| मैं तो जैसे-तैसे उस पार चला भी जाता हूँ, लेकिन दिव्या को बहुत डर लगता हैं| इस तरह के टापू पर रहने का उसका यह पहला अनुभव हैं| पानी में उसे सबसे ज्यादा जोंक का भय सताता है| उसके इसी भय की वजह से सिक्किम में मुझे जंगल में रहने का प्लान रद्द करना पड़ा था| सिक्किम की पहाड़ियों में बिना पानी के भी बारिश के दिनों में सब जगह जोंक हो जाता है|
‘धीरे-धीरे तुम्हे इस सब की आदत हो जाएगी, और जिस चीज़ की भी हमें आदत हो जाती है, उससे हमें डर नहीं लगता है| चाहे वह चीज़ कितनी ही ख़तरनाक क्यों न हो’, ऐसा जब-जब वह डरती है, तब मैं उससे कहता हूँ| “तुम कब इससे पहले टापू पर रहे, जो तुम्हारा डर ख़त्म हो गया है?”, वह मुझसे पूछती है| मैं उससे कहता हूँ, “मैं इससे पहले एक बार एक ‘नदी के द्वीप’ पर रहा हूँ, हीरानन्द सचिदानंद वात्सायन अज्ञेय भी उस द्वीप पर मेरे साथ थे|” यह सुनकर दिव्या विस्मय से आँखे बड़ी कर लेती है, उसे समझ नहीं आता है कि यह मैं क्या अनाप-सनाप बक रहा हूँ|
हमारा द्वीप काफी हरा-भरा है, इस पर 6 आम के पेड़ हैं, जिस पर अभी दो दिन पहले तक आम लगे हुए थे| मैं जिस दिन आया (24 जुलाई) को उस दिन मुझे ढेर सारा आम खाने को मिला| यहाँ के आम्रपाली का स्वाद गुजरात के केसर से 10 गुना ज्यादा अच्छा था| आम के अलावा अमरुद के भी दो पेड़ हैं| आज सुबह ही मैंने पेड़ से अमरुद तोड़कर खाया था| पेड़ पर हज़ारों अमरुद हैं, लेकिन ज्यादातर या तो ख़राब हो गए हैं, या फिर गिलहरी ने उन्हें आधा खाकर छोड़ दिया है| गिलहरी का यहाँ बहुत आतंक है| द्वीप के मूल निवासी आज मुझसे कह रहे थे, “हमने सोचा था तुम्हारे आ जाने के बाद आम तोड़ेंगे, लेकिन गिलहरीयों ने इतना परेशान कर दिया कि मजबूरन हमें तोड़ना पड़ा| रोज़ पांच-दस आम को वे खा कर गिरा देते थे| पहले तो हम गिलहरीयों के दाना ला लाकर खिलाते थे| लेकिन जब से इन्होने आम पर हमला शुरू किया है, तब से ये हमें सोहा नहीं रहे हैं|”  
खाने-पीने की चीज़ों में आम व अमरुद के अलावा खाने-पीने के लिए यहाँ भिंडी, बीन्स, पुदीना, खीरा, करेला निम्बू, गन्ना, पपीता (दो पपीता कल खाया था) और साग की खेती है| जब से आया हूँ तब से रोज़ एक टाइम भिन्डी की सब्जी खाने को मिल रही है| मूल निवासी बता रहे थे कि वे लोग पिछले दो महीने से लगातार रोज़ भिन्डी की सब्जी खा रहे हैं| “बाजार की भिन्डी को आप इतने दिनों तक रोज़ नहीं खा सकते हैं, लेकिन अपने खेत की भिन्डी आप कितना भी खा लें, उब पैदा नहीं होगी”| मुझे इनकी इस बात में सच्चाई लगती हैं, मैं भी तीन दिन से रोज़ भिन्डी खा रहा हूँ, लेकिन अभी तक उबा नहीं हूँ| यहाँ का निम्बू भी बहुत अलग है| सुबह एक पूरा निम्बू एक ग्लास पानी में निचोड़ कर पीता हूँ, फिर भी पानी खट्टा नहीं होता है| मेरे आने से दो दिन पहले इन लोगों के केले का घऊर भी पेड़ से उतारा था| आज सुबह जब मैंने केला खाया तो हैरान रह गया, इतना मीठा और स्वादिष्ट केला मुझे याद नहीं कब खाया था| मूल निवासी सुबह मुझसे कह रहे थे,
“हमारे यहाँ तुम्हे सब चीज़ों का स्वाद अलग मिलेगा, हम कोई भी खाद या केमिकल नहीं डालते हैं| सब कुछ बिलकुल ओर्गानिक व शुद्ध है|” पेड़ों में आम, अमरुद और पपीता के अलावा यहाँ नीम, बेल, पोपुलर (पहाड़ी पेड़), आंवला, गुलाब, रात की रानी, शहतूत, केला और मीठा नीम (करी पत्ता) का भी पेड़ हैं| नीम के दो बड़े-बड़े पेड़ हैं, जिन पर कौव्वे ने अपना घोसला बना रखा है| कल मूल निवासी का छोटा बेटा मुझसे कह रहा था, “कौव्वे ने चोंच से मार कर मेरा सिर फोड़ दिया है|” यह सुनकर मैं बड़ा हैरान हुआ| मुझे हैरान देखकर वह बोला, “नीम के पेड़ पर उनका घोसला है, और शायद उन्होंने नया-नया बच्चा दिया है| पेड़ के नीचे जाओ तो उन्हें लगता है कि तुम उनके बच्चे को नुकसान पहुँचाने आए हो, इसीलिए वे चोंच मार कर तुम्हे भगाते हैं|”
हरी सब्जी और फलों के अलावा यहाँ दूध की नदियाँ बह रही है| चार गायें हैं और चारों के चार बच्चे| चारों गायें अभी दूध दे रही हैं| दूध इतना हो जा रहा है कि हम समझ नहीं पा रहे हैं कि इतने दूध का क्या किया जाए| दिव्या रोज़ 5 लीटर दूध का पनीर फाड़ रही है| तीन दिन से लगातार पनीर की सब्ज़ी खाने को मिल रही है| पनीर बनाने के बाद भी रोज़ बहुत सारा दूध बच जा रहा है| शाम में बजे हुए दूध को गाय की नाद में डाल कर उन्हें पिला दिया जाता है|   
द्वीप के मूल निवासी से कह कर मैंने अपने लिए एक बंसी (मछली पकड़ने का काँटा) बनवाया है| कल से टापू के किनारे बैठकर मछली पकडूँगा|
टापू पर किसी भी मोबाइल का टॉवर यहाँ ठीक से नहीं पकड़ता है| इसीलिए, बाहर की दुनियां से मेरा संपर्क क़रीब-क़रीब टूट सा गया है| मेरे इस दुनिया से उस दुनिया के बीच अगर कोई सेतु है, तो वह है दैनिक अख़बार| रोज़ सुबह आठ बजे बस्ती के सकड़ से अखबार वाला आवाज़ लगाकर अख़बार ले जाने लिए हमें बुलाता है| यह वह पल होता है, तब टापू पर कुछ मिनटों के लिए कोहराम मच जाता है, “आज मैं नहीं जाऊँगा अखबार लाने, कल भी मैं ही गया था”, मूल निवासी का छोटा बेटा अपने पिताजी से कहता है| “बार-बार पानी में जाने से मेरा पैर सड़ गया है| आज तुम ले आओ, कल से मैं ला दूंगा”, मूल निवासी अपने बेटे से कहते हैं| “आप लोग अख़बार वाले को मना क्यों नहीं कर देते हैं, अगर रोज़ पानी हेल कर जाने में इतनी मुसीबत है तो”, मूल निवासी की पत्नी अपने बेटे और पति से कहती हैं| मूल निवासी की पत्नी के विचार से मैं भी सहमत हूँ| “न तो यहाँ टीवी है, न मोबाइल ठीक से काम करता है, ऐसे में अगर एक अख़बार भी नहीं आएगा तो दिन भर हम क्या करेंगे|”, मूल निवासी की छोटी बहु अपने पति से कहती है| अपने पत्नी की दलील सुनकर मूल निवासी का छोटा बेटा मुंह लटकाकर पानी हेलते हुए अखबार लाने चला जाता है|
और जैसे ही अख़बार आता है, घर के सारे सदस्य पढ़ने के लिए उसपर टूट पड़ते| हर सदस्य अखबार का एक-एक पन्ना आपस में बाँट लेता है, मनो वह अख़बार न होकर खाने की कोई चीज़ हो| मैं इस टापू के लोगों को अख़बार पढ़ने के लिये मारा-मारी करता हुआ देख कर टीवी और मोबाइल से पहले के दिनों को याद करने लगता हूँ| एक समय यह हर घर का आम दृश्य हुआ करता था| पहले टीवी, फिर मोबाइल और सबसे ज्यादा JIO ने पारिवारिक रिचुअल्स को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाया है|
आज के अख़बार में एक बड़ा ही दिलचस्प आर्टिकल छपा था| उस आर्टिकल के हिसाब से जिस जगह को हम टापू समझ कर पिछले तीन दिनों से रह रहे हैं, वस्तुतः वह एक बाढ़ पीड़ित गाँव का एक छोटा सा घर है| हमारे चारों तरफ जो पानी का पैलाव है, वह किसी झील का पानी नहीं बल्कि बाढ़ का पानी है| आगे उसी आर्टिकल में ऐसा भी लिखा था कि हम बहुत ही दीन और दुखी हालत में उस टापू पर रह रहे हैं| जो लोग शहरों रह रहे हैं, वे हमारी हालत पर बहुत दुखी है| कुछ लोग हमारी मदद के लिए आगे भी आए हैं| हमारे जैसे टापूओं पर रहने वाले लोगों को जल्द ही सरकार की तरफ से 6000 रूपये की मदद राशी दी जाएगी| राशी वाली बात पढ़कर मूल निवासी का छोटा बेटा यानि मेरा भाई साकेत बड़ा खुश हो गया है, (‘खुश’ हो जाने की बात से यह न समझें के मदद राशि के ऐलान से पहले वह दुखी था) और हिसाब लगाने लगा की हमारे घर में कितना पैसा आएगा| “तुम्हारे भाई को पैसा नहीं मिलेगा”, पिता जी साकेत को ज्यादा खुश होता हुआ देख कर बोलें| “भाई को क्यों नहीं मिलेगा” साकेत ने सवाल उठाया| “क्योंकि यह बाढ़ पीड़ित नहीं है,” पिताजी कहने लगे, “अभी दो दिन पहले आया है, और पांच दिन बाद चला जाएगा| अगर इसका नाम ऐड हुआ तो उनसब को ऐड करना पड़ेगा जो गाँव से बाहर रह रहे हैं|” पिताजी की बात सुनकर साकेत चुप हो गया| साकेत को चुप देखकर माँ बोलने लगी, “लेकिन ये बाहर रहता थोड़े है, घूमने जाता है, रहता तो गाँव में ही है|” माँ की बात सुनकर दिव्या सहमती में सिर हिलाने लगी| “तुम्हारे इस तर्क को कोई नहीं मानेगा, यह 5 दिन यहाँ रहता है, और दो महीना बाहर, ऐसा घूमना किसी को समझ नहीं आता है|”, साकेत बोला| साकेत की बात सुनकर उसकी पत्नी शगुन बोली, “पिछली बार भैया दस दिन का बोल कर गए थे, और दो महीने बाद आए हैं|” शुगुन की बात सुनकर सुरुचि (मेरी बहन) बिना लोल बजाए नहीं रह सकी, “यह तो है भाई को बऊ’अन्नी तो सब दिन से लगा है, कहीं एक जगह टिककर नहीं रह सकता है यह|”
घर के लोगों की बातचीत सुनकर मैं ज़ोर से हंसने लगता हूँ| ऐसी सुन्दर जगह, जहाँ रहने के लिए मैं हजारों खर्च करता हूँ/कर सकता हूँ, वहां रहने के लिए सरकार हमें पैसा क्यों देगी? यह झीलों का इतना सुन्दर शहर मुझे किसी ड्रीम लैंड जैसा लगता है| मैं चाहे इन्हें कितना ही क्यों न देखूं मेरी आँखे कभी अघाती नहीं है| बचपन से ही मुझे यह सब बहुत ही सुन्दर लगता है| मेरे छुटपन में जब मेरी उम्र के बच्चे दीवाली और होली का इंतज़ार किया करते थे, तब मैं गाँव में बाढ़ के आने का इंतजार किया करता था| मुझे हमेशा इस बात का गर्व रहता है कि 2004 में मैंने अपने गाँव का सबसे बड़ा बाढ़ देखा है| 2004 से पहले लोग अकसर मेरे सामने 1987, 1975 और 1954 के बाढ़ की कसीदे पढ़ा करते थे, मुझे उन लोगों से बड़ी इर्षा होती थी जिन्हों 1987 का बाढ़ देखा था| 1987 के बाढ़ में मैं सिर्फ 6 महीने का था| हालाँकि मुझे उस बाढ़ की थोड़ी-सी धुंधली यादें है, लेकिन मेरी माँ को यकीन ही नहीं होता कि कैसे 6 महीने के उम्र की यादें हो सकती है|
2004 के बाद, मैं पहली बार बाढ़ में गाँव में हूँ| सबकुछ बहुत ही रोमांचक और अह्लाद्पूर्ण है| विदित हो कि मैं अकेला नहीं हूँ जो बाढ़ में आनंदित है| गाँव में करीब-करीब सभी लोगों का यही हाल है| सिर्फ दो-चार लोग जो अख़बार पढ़ते हैं, और उसमे लिखी बातों को गंभीरता से लेते हैं, वे आपको यहाँ दुखी दिखेंगे| बांकी पूरा गाँव आनंद से झूम रहा है| यह सब पढ़कर आप को शायद अजीब लगे, लेकिन सब जगह यही होता है| सुख का परिस्थिती से उतना संबंध नहीं है, जितना आदत और दृष्टिकोण से है| मैंने मुंबई और दिल्ली जैसे गलीज़ जगहों में, जहाँ प्रदूष्ण की वजह से सांस लेने में भी तकलीफ होती है, भी लगों को खुश देखा है| मैंने कबूतरखानों (जिन्हें लोग फ्लैट कहते हैं) में रहने वाले लोगों को भी खुश देखा है| मैंने ऐसे-ऐसे हालातों में लोगों को खुश देखा है, जिसमे खुश होने की मैं परिकल्पना भी नहीं कर सकता हूँ| इसीसे मुझे ऐसा लगता है कि सुख दुःख दोनों ही व्यख्या की बात है| प्रेमी चाँद में अपनी प्रेमिका को देखता है, और भूखा रोटी|

(और भी बहुत कुछ लिखना चाह रहा हूँ, लेकिन दाहिने हाथ की कलाई में दो-तीन दिन से बड़ा दर्द रह रहा है, इसीलिए लिखने को यहीं विराम देता हूँ|)  

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