Wednesday, 3 July 2019

प्रेम यानी ख़ुद को मिटाना..


प्रश्न- सर, क्या आप हमें प्रेम के बारे में सब कुछ बता सकते हैं, हम प्रेम को पूरी तरह से समझना चाहते हैं|

प्रेम करना तो आसन है लेकिन उसके बारे में बात करना बहुत ही कठिन है| इसीलिए प्रेम के बारे जितना कुछ भी कहा जाता है, उस सब में प्रेम पीछे छूट जाता है| इस जगत में चार ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में कभी भी शब्दों से कुछ भी ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता है| पहला है प्रेम, दूसरा 'ध्यान', तीसरा 'नींद' और चौथा 'मृत्यु' | इन चारों में एक बात आम है... ये तभी घटित होते हैं जब 'हम' नहीं होते हैं| आप यह कभी नहीं कह सकती हैं कि 'मैं अभी नींद में हूँ' या 'मैं अब मर गई हूँ'.. अगर ऐसा हम कहते हैं तो कहने मात्र से यह जाहिर हो जाता है कि घटना अभी नहीं घटी है..| इसी तरह जबतक 'मैं' होता है तब तक प्रेम नहीं होता है| 'मैं और तू' का रिश्ता लेन-देन का रिश्ता है... जब तक लेन-देन है, तब तक रिश्ता कायम है, जिस दिन ‘गिव’  एंड ‘टेक’ ख़त्म हुआ, रिश्ता खत्म हो जाता है| इसीलिए, साधारणतया जिसे हम प्रेम कहते हैं उसमे १% प्रेम और ९९% कचरा होता है|


संत कवि पल्टू का वचन है, " पल्टू' बड़े बेवकूफ बे, आशिक बनने जाए, शीश उतारे हाथ से, सहज आशिकी नाहिं'"... आशिकी सहज नहीं है..अपने हाथ से अपना सर काटना पड़ता है | और एक और आश्चर्य की बात कहूँ आपसे से जिसने प्रेम को जान लिया फिर उसकी कोई मृत्यु नहीं होती, और न ही फिर वो कभी नींद में सोता है| ऐसे ही प्रेमी के बारे में कृष्ण गीता में कहते हैं, " या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी " और जिसने प्रेम जान लिया 'ध्यानउसके जीवन में सहज ही घटित हो जाता हैजैसा ओशो कहते हैं, “प्रेम सत्य का द्वार है”, जिसने प्रेम जान लिया उसने सब जान लिया| जीसस का एक वचन है , “परमात्मा प्रेम है”|
अंत में आपसे यही कहूँगा कि प्रेम यानी ख़ुद को मिटाना...जब तक अहंकार (मैं हूँ ऐसा भाव)है तब तक प्रेम संभव नहीं है.. स्त्री पुरुष के बीच जो प्रेम घटित होता है, वह बस प्रेम की झलक मात्र है... असल्री प्रेम व्यक्ति और समष्टि के बीच घटता है.. जिस दिन अपने प्रेमी परमात्मा दिखने लगे, उस दिन समझना चाहिए की प्रेम घटित हुआ.. उससे पहले सब लफ्बाज़ी है|


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