प्रश्न- सर, एक बात है, हम आपसे शेयर करना चाहते हैं, कोई भी बात का कई साइड होता है, तो अगर कोई मेरे अपोजिट साइड पे बात करते हैं, ख़ासकर मेरा बॉयफ्रेंड तो हमारा बहुत दिमाग ख़राब होता है, और ये सारी बाते पॉलिटिक्स पर होती है, और हम दोनों एक दूसरे के अपोजिट होते तो हमें बहुत गुस्सा आ जाता है, हमें समझ नहीं आता हम क्या करे...
इक्क्यु- बहुत सी बातें हैं, जो आपको समझनी होगी| पहली बात तो यह कि जीवन में सब कुछ एक वर्तुल में घूमता है, जैसे सूरज को ही देखिये, रोज सुबह निकलता है और शाम को डूब जाता है, सूरज की ही तरह चाँद, तारे, पृथ्वी और मौसम सभी चीज़े एक वर्तुल में घूम रहे हैं| जो बाहर के सम्बन्ध में सच है, वही भीतर के संबंध में भी सही है| हमारे मन के सभी भाव और विचार एक वर्तुल में घुमते हैं|
अब आप एक काम कीजिए अपने पास एक नोट-पेड रखिए, और जब आपको गुस्सा आए तब उसे दिन, डेट और समय के साथ नोट कर लीजिए| जैसे- सोमवार, 23 तारिक को मुझे शाम के पांच बजे गुस्सा आया था| ऐसा आप एक-से-तीन महीने तक करिये| तीन महीने बाद आप यह जान कर हैरान हो जाएंगी कि आपके गुस्से का एक पैटर्न है| वह हर महीने तय दिन, तय तारिक और तय समय पर आता है| जैसे अगर सितम्बर में आपको 3 से 7 तारिक के बीच आपको अधिक गुस्सा आया था, तो अगस्त में भी 3 से चार के बीच ही आपको अधिक गुस्सा आएगा| फिर हर महीने के कुछ ऐसे दिन भी होंगे जिस दिन चाहे कुछ भी हो जाए, दुनिया इधर की उधर हो जाए आपको गुस्सा नहीं आएगा| तीन महीने के प्रयोग से आपको यह साफ़ हो जाएगा कि गुस्सा का बाहरी कारण से कोई सम्बन्ध है| मन को जब गुस्सा करना होता है, तब वह बाहर कारण खोज लेता है|
यह एक बुनियादी भ्रम है कि गुस्सा बाहरी कारणों की वजह से आता है, अगर कारणों को मिटा दिया जाए तो गुस्सा आना बंद हो जाएगा| ऐसा कभी नहीं होता है| अगर एक कारण को मिटा दिया जाए, तो मन दूसरा कारण ढूँढ लेता है| जिसको गुस्सा करना है, उसके लिए कारण सदा मौजूद है| और जिसको गुस्सा नहीं करना है, उसको कोई कारण भी उकसा नहीं सकता है| बुद्ध के मुंह पर कोई थूक कर चला जाता है, और बुद्ध मुस्कुराते रहते हैं| और हमें देख कर कोई अगर मुस्कुरा भी देता है, तो हम गुस्से से भर जाते हैं| इसीलिए ऐसा मत सोचिये कि आपका बॉयफ्रेंड आपका विरोध करता है, इसलिए आपको गुस्सा आता है| मामला ऐसा है कि जब आपको गुस्सा करना होता है, तब आपको आपकी बॉयफ्रेंड की बातों में विरोध दिखने लगता है|
जैसे अगर कोई खाली कुँए में बाल्टी डालें, तो बाल्टी खाली ही बाहर आएगा, वैसे ही जब आपके भीतर गुस्सा नहीं होगा तो कोई चाहे कुछ भी कर ले आपको गुस्सा नहीं आएगा| इस समझ के साथ ही कि गुस्सा मेरे भीतर है, बाहर मैं इसे आरोपित कर रह रहा हूँ, गुस्सा ख़त्म होने लगता है|
गुस्से के संबंध एक और बात समझने जैसी है, गुस्सा हम सदा अपने से कमज़ोर पर प्रगट करते हैं| अगर आपको आपके ऑफिस में बॉस आपसे कुछ कह दे, तो आप वहां गुस्से को प्रगट नहीं करेंगी, घर आकर अपने छोटे भाई, नौकरानी या फिर किसी निरीह और कमज़ोर व्यक्ति पर आप उसे प्रगट कर देंगी|
अगर गुस्सा कभी प्रगट ही करना हो, तो ऐसी चीज़ों पर करना चाहिए जिस पर आपके गुस्से का कम-से-कम असर हो| सबसे से अच्छा है, आपका तकिया| अगली बार जब आपको गुस्सा आए तो किसी व्यक्ति पर प्रगट करने के वजाय उसे तकिये पर प्रगट कर दें| जब हम किसी व्यक्ति पर गुस्सा प्रगट करते हैं, तो एक दुष्ट-चक्र निर्मित होता है| अगर सामने वाला व्यक्ति आपसे कमज़ोर है, तो वह आपकी सुन लेगा और फिर वह अपने से किसी कमज़ोर पर उसे प्रगट करेगा| इस तरह से एक दुष्ट-चक्र निर्मित हो जाता है| और अगर सामने वाला व्यक्ति बराबरी वाला है, जैसे कि आपका बॉयफ्रेंड, तो फिर वह पलट वार करेगा| फिर रिश्ते में कलह बढ़ेगी| इसीलिए ज़रूरी है कि पहले आप गुस्से की यांत्रिकता को समझें, इसके पैटर्न को देखें फिर इसे धीरे-धीरे अपने भीतर से खत्म करें| शुरू में इसे तकिये पर निकालें, फिर आकाश में फेंक दें| फिर बाद में सिर्फ इतना बोध कि ‘मुझे गुस्सा आ रहा है’ आपके गुस्से को प्रगट होने से पहले ही खत्म कर देगा|
जब तक आप जिम्मेवारी दूसरों पर थोपती रहेंगी, तब तक इस से मुक्त नहीं हुआ जा सकता है| कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थीती जिम्मेवार नहीं है| व्यक्ति, वस्तु और परिस्थीती का प्रभाव हम पर तब तक ही पड़ता है, जब तक हम बेहोश हैं| जैसे ही हम जागने लगते हैं, हम एक्सटर्नल इन्फ्लुंस से मुक्त होने लगते हैं| आप कुछ भी करके बुद्ध के भीतर गुस्सा पैदा नहीं कर सकती हैं, और इसका विपरीत भी सच है कुछ भी करके हम बुद्दू को शांत नहीं कर सकते हैं| कितने ही आइडियल सिचुएशन में आपको रख दिया जाए, लेकिन अगर आपके अन्दर गुस्सा है, तो वह निकलेगा ही| गुस्से वाला व्यक्ति स्वर्ग में भी नर्क निर्मित कर लेता है| और जो शांत है वह नर्क को भी स्वर्ग बना लेता है|
अंतिम बात- जब कोई हमारा विरोध करता है, तो ज़रूरी नहीं है कि वह हमारा विरोध कर रहा हो, हो सकता है वह सिर्फ हमारी बातों का विरोध कर रहा हो| लेकिन शरीर और मन के तरंगों (विचारों) से हमारा तादात्म्य इतना गहरा होता है कि कोई जब हमारे शरीर और हमारी मान्यताओं के खिलाफ कुछ कह देता है, तो हम तिलमिला जाते हैं| रमण महर्षि कहा करते थे, “So long as you are identified with your thoughts and body, you have to suffer.” बॉयफ्रेंड की बात अधिक चोट करती है, क्योंकि उससे अपेक्षा अधिक है| और अपेक्षा सदा दुःख लाती है| अपेक्षा एक घनचक्कर है| अगर यह पूरी हो तो भी दुःख ही लाती है, “इतना तो होना ही था, इसमें क्या बड़ी बात है, यह तो मैं पहले से जानता था”| और अगर न पूरी हो तो भयंकर दुःख लाता है| इसीलिए अपेक्षा में जीने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो पाता है|
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