मेरे एक बहुत ही करीबी रिश्तेदार भारतीय रेल में बतौर
स्टेशन मास्टर कार्यरत हैं| जो वाकया मैं अभी
आपको सुनाने जा रहा हूँ वह आज से करीब 13 साल पहले की है| आप नये-नये रेलवे में बहाल हुए थे| वाराणसी के पास किसी छोटे स्टेशन पर उनकी पोस्टिंग
हुई थी| अपने एक मरहूम
मित्र, जिसके साथ मैं
मुंबई रहता था, का जिक्र मैं आप
से अक्सर करता रहता हूँ| पिछले कई
संस्मरणों में मैंने उसका जिक्र किया है| अगर आप भूल गए हों, तो आपको बता दूं यह मेरा वही मित्र है जिसने मुझसे
कहा था, "सिर्फ दो ही
लोगों से मिलो, एक जिनसे मिलकर
तुम्हे अच्छा लगता है, और दूसरा, जिनको तुमसे
मिलकर ख़ुशी होती है|" याद आ गया ना? बहुत ख़ूब, आपकी यादाश्त अच्छी है! अब आगे की कहानी सुनिए| तो, मेरा मित्र किसी
काम से वाराणसी गया था, तो वह वहीं से
उनसे मिलने चला गया| (विदित हो कि मेरा
यह मरहूम मित्र, और रलवे में
कार्यरत मेरे रिश्तेदार दोनों मेरे ग्रामीण है| और यही कारण है कि मैं दोनों में से किसी का भी नाम
यहाँ नहीं लिख रहा हूँ| चलिए एक काम करता
हूँ, दोनों का नाम बदल
कर काहनी को आगे बढ़ाता हूँ, बगैर नाम के
कहानी कहने में बड़ी तकलीफ हो रही है| अब से मेरे मरहूम मित्र का नाम धर्मेन्द्र है, और रेलवे वाले रिश्तेदार का नाम प्रकाश जी है|)
खैर, आगे बढ़ते
हैं...जब यह घटना घटी तो मेरा मित्र वहां मौजूद था| उसी ने मुझे मुंबई में यह वाकया सुनाया| हुआ यूं कि एक सुबह मेरा मित्र और प्रकाश जी दोनों
ऑफिस में बैठकर गावं-घर के बारे में बतिया रहे थे| बातचीत के दौरान मेरे मित्र ने चाय पीने की इच्छा
जाहिर की| प्रकाश जी 'राम इज़ अ गुड बॉय' टाइप के आदमी हैं, सो वे चाय-वाय नहीं पीते हैं| खैर, उन्होंने अपने
ऑफिस के चपरासी को घंटी बजाकर बुलाया| चपरासी का नाम भोला था| पांच मिनट बाद खरामा-खरामा चलते हुए भोला ऑफिस में
आया| प्रकाश जी ने
अपने जेब से दो रुपये का एक सिक्का निकालकर भोला को थमाते हुए कहा, "जाओ सामने नुक्कड़ पर जो दूकान है, वहां से धर्मेन्द्र जी के लिए एक कप बढ़िया चाय लेकर
आओ|" भोला ने पहले
सिक्के को अलट-पलट कर दो बार देखा, फिर बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में बोला, "झा साहेब, ऊ जमाना अब जात
रहे, जब बकरी के पकौड़ी
हगात रहे|" यह सुन कर धर्मेद्र जोर-जोर से हंसने लगा| भोला की बातों का भावार्थ समझ कर मुंह बनाते हुए प्रकाश
जी ने अपने जेब से उसे एक 10 का नोट निकाल कर
दिया| और फिर भोला के
जाने के बाद एक घंटा तक मेरे मित्र के सामने इस बात पर चिंता जताते रहे कि जमाना
कितना मंहगा हो गया है| आज से बीस साल
पहले 2 रूपया में क्या
कुछ नहीं मिल जाता था|
धर्मेद्र बम्बई में मुझे कई बार इस घटना का जिक्र
करता रहता था| भोला के बारे में
और उससे जुड़ी और भी बहुत-सी मजेदार किस्से वह सुनाया करता था| यह "ऊ जमाना अब जात रहे, जब बकरी के पकौड़ी हगात रहे'' हमारा पसंदीदा तकियाकलाम बन गया था| आज जब Gmail पर एक मित्र ने पूछा, "स्वामी जी क्या अब आप फ्री में जवाब नहीं देते हैं?" तो मुझे अचानक भोला की बात याद आ गई, मन हुआ कि जवाब में लिख दूं, "बच्चू, ऊ जमाना अब जात
रहे, जब बकरी के पकौड़ी
हगात रहे"|

खुला आसमान मुबारक हो भाई
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