निर्मल उनके लिए नहीं लिखते हैं, जो जीवन से ऊब गए..और ना ही वे उनके लिये लिखते हैं जो जीवन से जूझ रहे हैं। वे उनके लिये लिखते जो जीवन को जी रहे हैं।
बुद्धिहीनों के लिए जीवन एक समस्या है, जिसका हल वे जीवन भर ढूंढ़ते रहते हैं। लेकिन जो जानते हैं, उनके लिए जीवन एक रहस्य है, एक ऐसा रहस्य जिसे जिया तो जा सकता है, लेकिन जाना नहीं जा सकता है।
निर्मल वर्मा की ‘लाल टीन की छत’ एक ऐसी छत है, जिसके ऊपर लेट करके आप खुले आकाश को निहार सकते हैं, चीड़, ओक और देवदार के पेड़ों से आने वाली हवाओं को अपने चेहरे पर महसूस कर सकते हैं। और, अगर कभी अचानक बारिश होने लगे तो छत के नीचे खड़े होकर टीन पर पड़ने वाली बारिश के बूँदों की टीप-टाप-टिप सुन सकते हैं।
अगर मार्च की पीली धूप में ‘लाल टीन की छत’ पर बैठकर चीड़ के वृक्षों से गुज़रने वाली हवाओं का संगीत सुनना आपके लिए पर्याप्त नहीं है, तो फिर निर्मल आपके लिए नहीं हैं। उनके पास इससे ज़्यादा आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है। फिर निर्मल एक बहुत ही ग़रीब लेखक हैं। और लेखकों की तरह आपको देने के लिए उनके पास न तो मनोरंजन की चाशनी है, और ना ही ससपेंस और रोमांस की रोचकता। रहस्य के आलोक के अलावा निर्मल के पास कुछ भी नहीं है।
कल शाम किताब ख़त्म करने के बाद से मैं अपने छत के ऊपर ही बैठा हूँ। नीचे उतरने का मन नहीं कर रहा है। नीचे बहुत शोर और अशांति है। और ऊपर सिर्फ़ सन्नाटा! मैं भी नहीं हूँ! सिर्फ़ सन्नाटा है!


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