प्रश्न- बुद्ध की वाईफ अच्छी थी,. He had a small child. He
was king, but still, he left his house and went to the jungle because he wanted
to find his truth. I don't love my husband because I m selfish. I want to find
my truth. I need someone as a catalytic agent in my religious journey and that
person is perfect for that I feel. I can't leave my journey for my husband n
family. I don't want to die like ordinary people die. I don't want to die
without finding the meaning of my life.
इक्क्यु- सबसे पहले, आप जो ऐतिहासिक भूल कर रही हैं,
मैं उसको सुधार दूं| घर छोड़ कर
गौतम भागा था ‘बुद्ध’ नहीं| इस बात को आप सदा याद रखिए| बुद्ध घर लौट कर आए थे,
और घर आते ही सबसे पहले अपनी पत्नी और बेटे से मिले थे| उनसे माफ़ी मांगी थी, उस भूल के लिए जो ‘गौतम’ ने किया था| बुद्ध
भगोड़े नहीं थे, भगौड़ा गौतम था| दूसरी बात जहाँ तक मैंने बौद्ध ग्रंथों को पढ़ा है, मुझे
इस बात का जिक्र कहीं नहीं मिला है कि घर छोड़ने से पहले गौतम ने किस से राय-मश्वरा
किया था| आपका मेरे से सवाल पूछना इस बात का सूचक है कि घर
छोड़ने से पहले गौतम की जो मनःस्थिति थी, उससे आपकी मनःस्थिति
बिलकुल भिन्न है| गौतम ने अपने बोध से घर छोड़ा था, किसी के अनुकरण में नहीं| इसीलिए, घर छोड़ने के ६ वर्ष बाद ही वह प्रबुद्ध हो गया| अगर
आपकी भी ऐसी ही संभावना है, तो शौक से घर छोड़िए| अगर ६ वर्ष बाद आप भी उस प्रकाश को उपलब्ध हो जाएंगी, जो ज्ञान का प्रकाश गौतम को मिला था, तो इतिहास आपके
भी घर छोड़ने की भूल को माफ़ कर देगा| लेकिन जैसा मैं जानता
हूँ, बुद्ध के पीछे हजारों लोगों ने घर छोड़ा, और उन हजारों में से एक भी आज तक उस ऊंचाई को नहीं छू पाया, जिस ऊंचाई को गौतम ने २६,०० पहले छुआ था|
अगर आप बुद्ध से ही प्रभावित हैं, तो उनकी सूत्रों
पर भी जरा ध्यान दीजिए| उन्होंने निर्वाण के लिए जो सूत्र और
विधि दिया है, उसका पालन करने के लिए घर छोड़ने की कहीं भी
अनिवार्यता नहीं है| बुद्ध के बाद भी सैकड़ों ऐसे जागृत
पुरुष/स्त्रियाँ हुई हैं, जिनके टीचिंग में घर छोड़ने की
अनिवार्यता नहीं हैं| पिछली सदी में ही, रामकृष्ण, रमण, कृष्णमूर्ति और
ओशो जैसे अनेकों ऐसे बुद्ध पुरुष हुए हैं, जिनका पूरा जोर इस
बात पर है कि घर छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है| मैं नहीं मानता
कि आप इन सब से परिचित नहीं होंगी|
जिस हालात और परिस्थिति में आप घर छोड़ने का निर्णय ले
रही, उससे
ऐसा कहीं से भी नहीं लग रहा है कि आपका घर छोड़ने का कारण/निर्णय कहीं से भी धार्मिक
है| आपका घर छोड़ने का निर्णय नितांत रूप से मानसिक है|
आपके इस वक्तव्य, “I don't want to die like ‘ORDINARY’ people die.” से यह साफ़ जाहिर होता है कि आप ‘श्रेष्टता की ग्रंथि’
का शिकार हो गई हैं| हीनता और श्रेष्टता दोनों रोग है| अपने को हीन या
श्रेष्ठ मानना मानसिक रुग्णता का लक्षण है| एक अति से दूसरी
अति में डोलना मन का स्वाभाव है| भारत में शास्त्र के लिए हम
एक शब्द का प्रयोग करते हैं ‘ग्रंथ’, ग्रन्थ का अर्थ होता है जो ग्रंथि खोल दें|
इसीलिए, जैन परम्परा में उपलब्ध व्यक्ति के लिए ‘निग्रंथ’ शब्द का इस्तेमाल किया
जाता है| ‘निग्रंथ’ का अर्थ होता है, एक ऐसा व्यक्ति जो न तो अपने को किसी से
श्रेष्ठ मानता, और न ही किसी को अपने हीन मानता है| वह superiority और inferiority दोनों complex से मुक्त होता है|
इस जगत में कोई भी ‘आर्डिनरी’ नहीं है|
इसीलिए, ‘असाधारण’ बनने
की चाह से बड़ी मुर्खतापूर्ण चाह और कोई है ही नहीं| यह चाह
ऐसे ही जैसे कोई परुष कहे कि वह पुरुष बनना चाहता है| और फिर
वह पुरुष बनने की दिशा में कोशिश भी करने लगे| परमात्मा की
फैक्ट्री में कुछ भी साधारण नहीं बनता है|
ख़ुद को असाधारण, दूसरों को साधारण या फिर ख़ुद को
साधारण और दूसरों को असाधारण देखना बंद कीजिए| दोनों ही
दृष्टि में भूल है| तिब्बत में ऐसी कहावत है, “राजा मरता है, तो सबको पता
चलता है, साधारण आदमी मरता है, तो गावं
वालों को पता चलता है| और जब कोई बुद्ध पुरुष या भिखारी मरता
है, तो शायद ही किसी को पता चलता है|” ग़ालिब का
एक शे’र है, “हुए मरके हम जो
रुस्वा, हुए क्यों न गर्के-दरिया, न
कभी जनाज़ा उठता, न कहीं माजर होता” साधक ऐसी मौत मरने की कामना करता है, न जनाजा उठे न
मज़ार बने, किसी को कानो कान ख़बर भी लगे| बुढा तलोत्जु अकेले मरने के लिए हिमालय की बर्फ में चला गया था|
"पड़िए गर बीमार तो कोई न
हो तीमारदार,
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ
कोई न हो"
अपनी दृष्टि को बदिलिए, सृष्टि अपने आप बदल जाएगी| जगह बदलने से अगर सत्य मिलता, तो मामला बहुत आसन
होता| ग़ालिब का एक शे’र है,
“कतरे में दिजला दिखाई ना दे और जुज़्व में कुल,
खेल लड़कों का
हुआ, दीदा-ऐ-बीना ना हुआ”
जबतक बूंद में सागर और अंड में
ब्रह्म ने दिखाई दे,
तब तक सब बचकानी बाते है, तब तक समझिए दृष्टि अभी गहरी नहीं हुई है|
“I don't want to die without
finding the meaning of my life.” कहाँ खो गया है ‘मीनिंग’ जिसको आप दूंढ़ रही हैं? और अगर खो ही गया है, तो आपको कैसे पता कि ‘बाहर’ खोया? पहले तो यह पता
कीजिए कि खोया भी या नहीं, और फिर अगर खोया है, तो कहाँ खोया है ‘भीतर या बाहर’| जब तक यह तय न हो जाए कि बहार खोया है, या भीतर, तब तक अँधेरे में टटोलने से कुछ भी नहीं मिलेगा|
दूसरी बात यह कौन है जो यह कह रहा है की ‘बिना
अर्थ जाने ‘मैं’ मरना नहीं चाहती हूँ’,
ये ‘मैं’ कौन है? इस खोजने वाले को ‘खोजिए’, क्योंकि
अगर खोजने वाले का ही पता नहीं है, तो खोजेगा कौन?

Yes, At initial stage of mediation "sense of superior" become the biggest hurdle for a Sadhak.
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