Saturday, 27 July 2019

जिस चीज़ की भी हमें आदत हो जाती है, उससे हमें डर नहीं लगता है|



अभी जहाँ मैं रह रहा हूँ वह एक छोटा-सा ख़ूबसूरत द्वीप है| शायद यह दुनिया का सबसे छोटा द्वीप है| तीन तरफ पानी का अनंत फैलाव हैं| नज़रे उठाकर मैं जहाँ तक देख सकता हूँ वहां तक पानी-ही-पानी हैं, पानी का अंतहीन विस्तार और अनगिनत सफ़ेद लहरें...| पानी की सतहों पर सूरज की चमक देखने लिए मैं रोज़ सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाता हूँ| सुबह पानी की गोद से सूरज को उगता हुआ देखना, किसी प्रसाद से कम नहीं है| शाम का नज़ारा भी बहुत ही अलौकिक होता है| शाम के धुंधलके में पानी की स्याह सतह से सफ़ेद लहरों का उठना मंत्रमुग्ध करने वाला दृश्य होता है| रोज़ शाम मैं घंटों छत पर बैठकर लहरों को निहारा करता हूँ|
द्वीप के जिस तरफ पानी नहीं है, उधर एक बस्ती है| बस्ती तक जाने के लिए मुझे कमर भर पानी में 100 मीटर चलना पड़ता है| वैसे बस्ती तक मुझे बहुत कम ही जाना होता है (जब से आया हूँ, तीन दिन में, सिर्फ एक बार बस्ती जाना हुआ है), लेकिन अगर कभी जाना हो तो यह एक टास्क है| मैं तो जैसे-तैसे उस पार चला भी जाता हूँ, लेकिन दिव्या को बहुत डर लगता हैं| इस तरह के टापू पर रहने का उसका यह पहला अनुभव हैं| पानी में उसे सबसे ज्यादा जोंक का भय सताता है| उसके इसी भय की वजह से सिक्किम में मुझे जंगल में रहने का प्लान रद्द करना पड़ा था| सिक्किम की पहाड़ियों में बिना पानी के भी बारिश के दिनों में सब जगह जोंक हो जाता है|
‘धीरे-धीरे तुम्हे इस सब की आदत हो जाएगी, और जिस चीज़ की भी हमें आदत हो जाती है, उससे हमें डर नहीं लगता है| चाहे वह चीज़ कितनी ही ख़तरनाक क्यों न हो’, ऐसा जब-जब वह डरती है, तब मैं उससे कहता हूँ| “तुम कब इससे पहले टापू पर रहे, जो तुम्हारा डर ख़त्म हो गया है?”, वह मुझसे पूछती है| मैं उससे कहता हूँ, “मैं इससे पहले एक बार एक ‘नदी के द्वीप’ पर रहा हूँ, हीरानन्द सचिदानंद वात्सायन अज्ञेय भी उस द्वीप पर मेरे साथ थे|” यह सुनकर दिव्या विस्मय से आँखे बड़ी कर लेती है, उसे समझ नहीं आता है कि यह मैं क्या अनाप-सनाप बक रहा हूँ|
हमारा द्वीप काफी हरा-भरा है, इस पर 6 आम के पेड़ हैं, जिस पर अभी दो दिन पहले तक आम लगे हुए थे| मैं जिस दिन आया (24 जुलाई) को उस दिन मुझे ढेर सारा आम खाने को मिला| यहाँ के आम्रपाली का स्वाद गुजरात के केसर से 10 गुना ज्यादा अच्छा था| आम के अलावा अमरुद के भी दो पेड़ हैं| आज सुबह ही मैंने पेड़ से अमरुद तोड़कर खाया था| पेड़ पर हज़ारों अमरुद हैं, लेकिन ज्यादातर या तो ख़राब हो गए हैं, या फिर गिलहरी ने उन्हें आधा खाकर छोड़ दिया है| गिलहरी का यहाँ बहुत आतंक है| द्वीप के मूल निवासी आज मुझसे कह रहे थे, “हमने सोचा था तुम्हारे आ जाने के बाद आम तोड़ेंगे, लेकिन गिलहरीयों ने इतना परेशान कर दिया कि मजबूरन हमें तोड़ना पड़ा| रोज़ पांच-दस आम को वे खा कर गिरा देते थे| पहले तो हम गिलहरीयों के दाना ला लाकर खिलाते थे| लेकिन जब से इन्होने आम पर हमला शुरू किया है, तब से ये हमें सोहा नहीं रहे हैं|”  
खाने-पीने की चीज़ों में आम व अमरुद के अलावा खाने-पीने के लिए यहाँ भिंडी, बीन्स, पुदीना, खीरा, करेला निम्बू, गन्ना, पपीता (दो पपीता कल खाया था) और साग की खेती है| जब से आया हूँ तब से रोज़ एक टाइम भिन्डी की सब्जी खाने को मिल रही है| मूल निवासी बता रहे थे कि वे लोग पिछले दो महीने से लगातार रोज़ भिन्डी की सब्जी खा रहे हैं| “बाजार की भिन्डी को आप इतने दिनों तक रोज़ नहीं खा सकते हैं, लेकिन अपने खेत की भिन्डी आप कितना भी खा लें, उब पैदा नहीं होगी”| मुझे इनकी इस बात में सच्चाई लगती हैं, मैं भी तीन दिन से रोज़ भिन्डी खा रहा हूँ, लेकिन अभी तक उबा नहीं हूँ| यहाँ का निम्बू भी बहुत अलग है| सुबह एक पूरा निम्बू एक ग्लास पानी में निचोड़ कर पीता हूँ, फिर भी पानी खट्टा नहीं होता है| मेरे आने से दो दिन पहले इन लोगों के केले का घऊर भी पेड़ से उतारा था| आज सुबह जब मैंने केला खाया तो हैरान रह गया, इतना मीठा और स्वादिष्ट केला मुझे याद नहीं कब खाया था| मूल निवासी सुबह मुझसे कह रहे थे,
“हमारे यहाँ तुम्हे सब चीज़ों का स्वाद अलग मिलेगा, हम कोई भी खाद या केमिकल नहीं डालते हैं| सब कुछ बिलकुल ओर्गानिक व शुद्ध है|” पेड़ों में आम, अमरुद और पपीता के अलावा यहाँ नीम, बेल, पोपुलर (पहाड़ी पेड़), आंवला, गुलाब, रात की रानी, शहतूत, केला और मीठा नीम (करी पत्ता) का भी पेड़ हैं| नीम के दो बड़े-बड़े पेड़ हैं, जिन पर कौव्वे ने अपना घोसला बना रखा है| कल मूल निवासी का छोटा बेटा मुझसे कह रहा था, “कौव्वे ने चोंच से मार कर मेरा सिर फोड़ दिया है|” यह सुनकर मैं बड़ा हैरान हुआ| मुझे हैरान देखकर वह बोला, “नीम के पेड़ पर उनका घोसला है, और शायद उन्होंने नया-नया बच्चा दिया है| पेड़ के नीचे जाओ तो उन्हें लगता है कि तुम उनके बच्चे को नुकसान पहुँचाने आए हो, इसीलिए वे चोंच मार कर तुम्हे भगाते हैं|”
हरी सब्जी और फलों के अलावा यहाँ दूध की नदियाँ बह रही है| चार गायें हैं और चारों के चार बच्चे| चारों गायें अभी दूध दे रही हैं| दूध इतना हो जा रहा है कि हम समझ नहीं पा रहे हैं कि इतने दूध का क्या किया जाए| दिव्या रोज़ 5 लीटर दूध का पनीर फाड़ रही है| तीन दिन से लगातार पनीर की सब्ज़ी खाने को मिल रही है| पनीर बनाने के बाद भी रोज़ बहुत सारा दूध बच जा रहा है| शाम में बजे हुए दूध को गाय की नाद में डाल कर उन्हें पिला दिया जाता है|   
द्वीप के मूल निवासी से कह कर मैंने अपने लिए एक बंसी (मछली पकड़ने का काँटा) बनवाया है| कल से टापू के किनारे बैठकर मछली पकडूँगा|
टापू पर किसी भी मोबाइल का टॉवर यहाँ ठीक से नहीं पकड़ता है| इसीलिए, बाहर की दुनियां से मेरा संपर्क क़रीब-क़रीब टूट सा गया है| मेरे इस दुनिया से उस दुनिया के बीच अगर कोई सेतु है, तो वह है दैनिक अख़बार| रोज़ सुबह आठ बजे बस्ती के सकड़ से अखबार वाला आवाज़ लगाकर अख़बार ले जाने लिए हमें बुलाता है| यह वह पल होता है, तब टापू पर कुछ मिनटों के लिए कोहराम मच जाता है, “आज मैं नहीं जाऊँगा अखबार लाने, कल भी मैं ही गया था”, मूल निवासी का छोटा बेटा अपने पिताजी से कहता है| “बार-बार पानी में जाने से मेरा पैर सड़ गया है| आज तुम ले आओ, कल से मैं ला दूंगा”, मूल निवासी अपने बेटे से कहते हैं| “आप लोग अख़बार वाले को मना क्यों नहीं कर देते हैं, अगर रोज़ पानी हेल कर जाने में इतनी मुसीबत है तो”, मूल निवासी की पत्नी अपने बेटे और पति से कहती हैं| मूल निवासी की पत्नी के विचार से मैं भी सहमत हूँ| “न तो यहाँ टीवी है, न मोबाइल ठीक से काम करता है, ऐसे में अगर एक अख़बार भी नहीं आएगा तो दिन भर हम क्या करेंगे|”, मूल निवासी की छोटी बहु अपने पति से कहती है| अपने पत्नी की दलील सुनकर मूल निवासी का छोटा बेटा मुंह लटकाकर पानी हेलते हुए अखबार लाने चला जाता है|
और जैसे ही अख़बार आता है, घर के सारे सदस्य पढ़ने के लिए उसपर टूट पड़ते| हर सदस्य अखबार का एक-एक पन्ना आपस में बाँट लेता है, मनो वह अख़बार न होकर खाने की कोई चीज़ हो| मैं इस टापू के लोगों को अख़बार पढ़ने के लिये मारा-मारी करता हुआ देख कर टीवी और मोबाइल से पहले के दिनों को याद करने लगता हूँ| एक समय यह हर घर का आम दृश्य हुआ करता था| पहले टीवी, फिर मोबाइल और सबसे ज्यादा JIO ने पारिवारिक रिचुअल्स को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाया है|
आज के अख़बार में एक बड़ा ही दिलचस्प आर्टिकल छपा था| उस आर्टिकल के हिसाब से जिस जगह को हम टापू समझ कर पिछले तीन दिनों से रह रहे हैं, वस्तुतः वह एक बाढ़ पीड़ित गाँव का एक छोटा सा घर है| हमारे चारों तरफ जो पानी का पैलाव है, वह किसी झील का पानी नहीं बल्कि बाढ़ का पानी है| आगे उसी आर्टिकल में ऐसा भी लिखा था कि हम बहुत ही दीन और दुखी हालत में उस टापू पर रह रहे हैं| जो लोग शहरों रह रहे हैं, वे हमारी हालत पर बहुत दुखी है| कुछ लोग हमारी मदद के लिए आगे भी आए हैं| हमारे जैसे टापूओं पर रहने वाले लोगों को जल्द ही सरकार की तरफ से 6000 रूपये की मदद राशी दी जाएगी| राशी वाली बात पढ़कर मूल निवासी का छोटा बेटा यानि मेरा भाई साकेत बड़ा खुश हो गया है, (‘खुश’ हो जाने की बात से यह न समझें के मदद राशि के ऐलान से पहले वह दुखी था) और हिसाब लगाने लगा की हमारे घर में कितना पैसा आएगा| “तुम्हारे भाई को पैसा नहीं मिलेगा”, पिता जी साकेत को ज्यादा खुश होता हुआ देख कर बोलें| “भाई को क्यों नहीं मिलेगा” साकेत ने सवाल उठाया| “क्योंकि यह बाढ़ पीड़ित नहीं है,” पिताजी कहने लगे, “अभी दो दिन पहले आया है, और पांच दिन बाद चला जाएगा| अगर इसका नाम ऐड हुआ तो उनसब को ऐड करना पड़ेगा जो गाँव से बाहर रह रहे हैं|” पिताजी की बात सुनकर साकेत चुप हो गया| साकेत को चुप देखकर माँ बोलने लगी, “लेकिन ये बाहर रहता थोड़े है, घूमने जाता है, रहता तो गाँव में ही है|” माँ की बात सुनकर दिव्या सहमती में सिर हिलाने लगी| “तुम्हारे इस तर्क को कोई नहीं मानेगा, यह 5 दिन यहाँ रहता है, और दो महीना बाहर, ऐसा घूमना किसी को समझ नहीं आता है|”, साकेत बोला| साकेत की बात सुनकर उसकी पत्नी शगुन बोली, “पिछली बार भैया दस दिन का बोल कर गए थे, और दो महीने बाद आए हैं|” शुगुन की बात सुनकर सुरुचि (मेरी बहन) बिना लोल बजाए नहीं रह सकी, “यह तो है भाई को बऊ’अन्नी तो सब दिन से लगा है, कहीं एक जगह टिककर नहीं रह सकता है यह|”
घर के लोगों की बातचीत सुनकर मैं ज़ोर से हंसने लगता हूँ| ऐसी सुन्दर जगह, जहाँ रहने के लिए मैं हजारों खर्च करता हूँ/कर सकता हूँ, वहां रहने के लिए सरकार हमें पैसा क्यों देगी? यह झीलों का इतना सुन्दर शहर मुझे किसी ड्रीम लैंड जैसा लगता है| मैं चाहे इन्हें कितना ही क्यों न देखूं मेरी आँखे कभी अघाती नहीं है| बचपन से ही मुझे यह सब बहुत ही सुन्दर लगता है| मेरे छुटपन में जब मेरी उम्र के बच्चे दीवाली और होली का इंतज़ार किया करते थे, तब मैं गाँव में बाढ़ के आने का इंतजार किया करता था| मुझे हमेशा इस बात का गर्व रहता है कि 2004 में मैंने अपने गाँव का सबसे बड़ा बाढ़ देखा है| 2004 से पहले लोग अकसर मेरे सामने 1987, 1975 और 1954 के बाढ़ की कसीदे पढ़ा करते थे, मुझे उन लोगों से बड़ी इर्षा होती थी जिन्हों 1987 का बाढ़ देखा था| 1987 के बाढ़ में मैं सिर्फ 6 महीने का था| हालाँकि मुझे उस बाढ़ की थोड़ी-सी धुंधली यादें है, लेकिन मेरी माँ को यकीन ही नहीं होता कि कैसे 6 महीने के उम्र की यादें हो सकती है|
2004 के बाद, मैं पहली बार बाढ़ में गाँव में हूँ| सबकुछ बहुत ही रोमांचक और अह्लाद्पूर्ण है| विदित हो कि मैं अकेला नहीं हूँ जो बाढ़ में आनंदित है| गाँव में करीब-करीब सभी लोगों का यही हाल है| सिर्फ दो-चार लोग जो अख़बार पढ़ते हैं, और उसमे लिखी बातों को गंभीरता से लेते हैं, वे आपको यहाँ दुखी दिखेंगे| बांकी पूरा गाँव आनंद से झूम रहा है| यह सब पढ़कर आप को शायद अजीब लगे, लेकिन सब जगह यही होता है| सुख का परिस्थिती से उतना संबंध नहीं है, जितना आदत और दृष्टिकोण से है| मैंने मुंबई और दिल्ली जैसे गलीज़ जगहों में, जहाँ प्रदूष्ण की वजह से सांस लेने में भी तकलीफ होती है, भी लगों को खुश देखा है| मैंने कबूतरखानों (जिन्हें लोग फ्लैट कहते हैं) में रहने वाले लोगों को भी खुश देखा है| मैंने ऐसे-ऐसे हालातों में लोगों को खुश देखा है, जिसमे खुश होने की मैं परिकल्पना भी नहीं कर सकता हूँ| इसीसे मुझे ऐसा लगता है कि सुख दुःख दोनों ही व्यख्या की बात है| प्रेमी चाँद में अपनी प्रेमिका को देखता है, और भूखा रोटी|

(और भी बहुत कुछ लिखना चाह रहा हूँ, लेकिन दाहिने हाथ की कलाई में दो-तीन दिन से बड़ा दर्द रह रहा है, इसीलिए लिखने को यहीं विराम देता हूँ|)  

बॉयफ्रेंड की बात अधिक चोट करती है|

प्रश्न- सर, एक बात है, हम आपसे शेयर करना चाहते हैं, कोई भी बात का कई साइड होता है, तो अगर कोई मेरे अपोजिट साइड पे बात करते हैं, ख़ासकर मेरा बॉयफ्रेंड तो हमारा बहुत दिमाग ख़राब होता है, और ये सारी बाते पॉलिटिक्स पर होती है, और हम दोनों एक दूसरे के अपोजिट होते तो हमें बहुत गुस्सा आ जाता है, हमें समझ नहीं आता हम क्या करे...

इक्क्यु- बहुत सी बातें हैं, जो आपको समझनी होगी| पहली बात तो यह कि जीवन में सब कुछ एक वर्तुल में घूमता है, जैसे सूरज को ही देखिये, रोज सुबह निकलता है और शाम को डूब जाता है, सूरज की ही तरह चाँद, तारे, पृथ्वी और मौसम सभी चीज़े एक वर्तुल में घूम रहे हैं| जो बाहर के सम्बन्ध में सच है, वही भीतर के संबंध में भी सही है| हमारे मन के सभी भाव और विचार एक वर्तुल में घुमते हैं|
अब आप एक काम कीजिए अपने पास एक नोट-पेड रखिए, और जब आपको गुस्सा आए तब उसे दिन, डेट और समय के साथ नोट कर लीजिए| जैसे- सोमवार, 23 तारिक को मुझे शाम के पांच बजे गुस्सा आया था| ऐसा आप एक-से-तीन महीने तक करिये| तीन महीने बाद आप यह जान कर हैरान हो जाएंगी कि आपके गुस्से का एक पैटर्न है| वह हर महीने तय दिन, तय तारिक और तय समय पर आता है| जैसे अगर सितम्बर में आपको 3 से 7 तारिक के बीच आपको अधिक गुस्सा आया था, तो अगस्त में भी 3 से चार के बीच ही आपको अधिक गुस्सा आएगा| फिर हर महीने के कुछ ऐसे दिन भी होंगे जिस दिन चाहे कुछ भी हो जाए, दुनिया इधर की उधर हो जाए आपको गुस्सा नहीं आएगा| तीन महीने के प्रयोग से आपको यह साफ़ हो जाएगा कि गुस्सा का बाहरी कारण से कोई सम्बन्ध है| मन को जब गुस्सा करना होता है, तब वह बाहर कारण खोज लेता है|
यह एक बुनियादी भ्रम है कि गुस्सा बाहरी कारणों की वजह से आता है, अगर कारणों को मिटा दिया जाए तो गुस्सा आना बंद हो जाएगा| ऐसा कभी नहीं होता है| अगर एक कारण को मिटा दिया जाए, तो मन दूसरा कारण ढूँढ लेता है| जिसको गुस्सा करना है, उसके लिए कारण सदा मौजूद है| और जिसको गुस्सा नहीं करना है, उसको कोई कारण भी उकसा नहीं सकता है| बुद्ध के मुंह पर कोई थूक कर चला जाता है, और बुद्ध मुस्कुराते रहते हैं| और हमें देख कर कोई अगर मुस्कुरा भी देता है, तो हम गुस्से से भर जाते हैं| इसीलिए ऐसा मत सोचिये कि आपका बॉयफ्रेंड आपका विरोध करता है, इसलिए आपको गुस्सा आता है| मामला ऐसा है कि जब आपको गुस्सा करना होता है, तब आपको आपकी बॉयफ्रेंड की बातों में विरोध दिखने लगता है|
जैसे अगर कोई खाली कुँए में बाल्टी डालें, तो बाल्टी खाली ही बाहर आएगा, वैसे ही जब आपके भीतर गुस्सा नहीं होगा तो कोई चाहे कुछ भी कर ले आपको गुस्सा नहीं आएगा| इस समझ के साथ ही कि गुस्सा मेरे भीतर है, बाहर मैं इसे आरोपित कर रह रहा हूँ, गुस्सा ख़त्म होने लगता है|
गुस्से के संबंध एक और बात समझने जैसी है, गुस्सा हम सदा अपने से कमज़ोर पर प्रगट करते हैं| अगर आपको आपके ऑफिस में बॉस आपसे कुछ कह दे, तो आप वहां गुस्से को प्रगट नहीं करेंगी, घर आकर अपने छोटे भाई, नौकरानी या फिर किसी निरीह और कमज़ोर व्यक्ति पर आप उसे प्रगट कर देंगी|
अगर गुस्सा कभी प्रगट ही करना हो, तो ऐसी चीज़ों पर करना चाहिए जिस पर आपके गुस्से का कम-से-कम असर हो| सबसे से अच्छा है, आपका तकिया| अगली बार जब आपको गुस्सा आए तो किसी व्यक्ति पर प्रगट करने के वजाय उसे तकिये पर प्रगट कर दें| जब हम किसी व्यक्ति पर गुस्सा प्रगट करते हैं, तो एक दुष्ट-चक्र निर्मित होता है| अगर सामने वाला व्यक्ति आपसे कमज़ोर है, तो वह आपकी सुन लेगा और फिर वह अपने से किसी कमज़ोर पर उसे प्रगट करेगा| इस तरह से एक दुष्ट-चक्र निर्मित हो जाता है| और अगर सामने वाला व्यक्ति बराबरी वाला है, जैसे कि आपका बॉयफ्रेंड, तो फिर वह पलट वार करेगा| फिर रिश्ते में कलह बढ़ेगी| इसीलिए ज़रूरी है कि पहले आप गुस्से की यांत्रिकता को समझें, इसके पैटर्न को देखें फिर इसे धीरे-धीरे अपने भीतर से खत्म करें| शुरू में इसे तकिये पर निकालें, फिर आकाश में फेंक दें| फिर बाद में सिर्फ इतना बोध कि ‘मुझे गुस्सा आ रहा है’ आपके गुस्से को प्रगट होने से पहले ही खत्म कर देगा|
जब तक आप जिम्मेवारी दूसरों पर थोपती रहेंगी, तब तक इस से मुक्त नहीं हुआ जा सकता है| कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थीती जिम्मेवार नहीं है| व्यक्ति, वस्तु और परिस्थीती का प्रभाव हम पर तब तक ही पड़ता है, जब तक हम बेहोश हैं| जैसे ही हम जागने लगते हैं, हम एक्सटर्नल इन्फ्लुंस से मुक्त होने लगते हैं| आप कुछ भी करके बुद्ध के भीतर गुस्सा पैदा नहीं कर सकती हैं, और इसका विपरीत भी सच है कुछ भी करके हम बुद्दू को शांत नहीं कर सकते हैं| कितने ही आइडियल सिचुएशन में आपको रख दिया जाए, लेकिन अगर आपके अन्दर गुस्सा है, तो वह निकलेगा ही| गुस्से वाला व्यक्ति स्वर्ग में भी नर्क निर्मित कर लेता है| और जो शांत है वह नर्क को भी स्वर्ग बना लेता है|
अंतिम बात- जब कोई हमारा विरोध करता है, तो ज़रूरी नहीं है कि वह हमारा विरोध कर रहा हो, हो सकता है वह सिर्फ हमारी बातों का विरोध कर रहा हो| लेकिन शरीर और मन के तरंगों (विचारों) से हमारा तादात्म्य इतना गहरा होता है कि कोई जब हमारे शरीर और हमारी मान्यताओं के खिलाफ कुछ कह देता है, तो हम तिलमिला जाते हैं| रमण महर्षि कहा करते थे, “So long as you are identified with your thoughts and body, you have to suffer.” बॉयफ्रेंड की बात अधिक चोट करती है, क्योंकि उससे अपेक्षा अधिक है| और अपेक्षा सदा दुःख लाती है| अपेक्षा एक घनचक्कर है| अगर यह पूरी हो तो भी दुःख ही लाती है, “इतना तो होना ही था, इसमें क्या बड़ी बात है, यह तो मैं पहले से जानता था”| और अगर न पूरी हो तो भयंकर दुःख लाता है| इसीलिए अपेक्षा में जीने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो पाता है|

Sunday, 21 July 2019

मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा



“कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा”
-अहमद नदीम क़ासमी

“Planning for the future is like going fishing in a dry gulch; nothing ever works out as you wanted, so give up all your schemes and ambitions. If you have got to think about something ~ Make it the uncertainty of the hour of your death.” - The Tibetan Book of Living and Dying

'तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाईंग' पढ़ने के बाद मैंने फेसबुक पर विडियो रिव्यु शेयर किया था| लेकिन किसी तकनिकी खामी की वजह से वह विडियो ठीक से नहीं चल पाया| मजबूरन मुझे विडियो हटाना पड़ा| सोचा था कि कुछ दिन बाद अपने ब्लॉग (www.ikkyutalk.blogspot.com) पर तब्सिरा डाल दूंगा| लेकिन, दिल्ली आने के बाद Milan Kundera की किताब 'The Unbearable Lightness of Being' पढ़ने में ऐसा खोया कि लिखना क्या किसी भी चीज़ का होश नहीं रहा|

What is born will die, what has been gathered will be dispersed, What has been accumulated will be exhausted, what has been built up will collapse and what has been high will be brought low.” -The Tibetan Book of Living and Dying

Sogyal Rinpoche की किताब The Tibetan Book of Living and Dying (1992)' एक समयातीत किताब है| यह किताब उन सब लोगों के लिए 'must read' है, जिनको एक दिन मरना है| फिर यह फर्क नहीं पड़ता की आप किस धर्म या मजहब से ताल्लुक रखते हैं| नास्तिक, आस्तिक, अस्तित्ववादी और अज्ञेवादी सभी के लिए यह किताब समान रूप से पठनीय है| जैसे बीमार का इलाज़ दवाई है, उसी तरह मरने वालों का इलाज़ यह किताब है| आपने लोगों को यह कहते हुआ सुना होगा कि "मौत का कोई इलाज़ नहीं है", लेकिन मैं आप से कहता हूँ 'मौत का इलाज़ है' और वह इलाज है- 'तिब्बतन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाईंग'|

“This world can seem marvellously convincing until death collapses the illusion and evicts us from our hiding place.” - The Tibetan Book of Living and Dying

अगर आप एक दिन (और वह एक दिन कभी भी आ सकता है) मरने वाले हैं, तो मरने से पहले यह किताब एक बार ज़रूर पढ़ लीजिए| यह किताब मृत्यु की यात्रा पर जा रहे यात्रियों के लिए पाथेय है| बच्चन जी ने कहीं गाया है, "इस पार प्रिय तुम हो, मधु है, उस पार न जाने क्या होगा", अगर आपके मन को भी यही भय पकड़ता है, तो यह किताब न सिर्फ आपको उस पार की ठीक-ठीक ख़रब देगी, बल्कि शरीर में रहते हुए, मौत में प्रवेश करने की कला भी सिखाएगी| फिर मौत को जानने के लिए आपको सुकरात की तरह उस शुभ घड़ी का इंतजार नहीं करना होगा, जब मौत आपके दरवाज़े पर दस्तक देगा| इस किताब को बढ़ने के बाद आप ख़ुद ही रोज़ मौत के दरवाज़े पर दस्तक देने लगेंगे|
एक दिन मौत में जो घटेगा, वह प्रति दिन नींद में घटता है| नींद तो क्या वह प्रति पल घट रहा है| दो विचारों के बीच जो अन्तराल है, वह उस अन्तराल में घट रहा है| हर उच्छ्वास में घट रहा है| सिर्फ मूढ़ मौत को भविष्य में देखते हैं, ज्ञानी उसे हर पल जीवन के साथ क़दम-से-कदम मिलाकर साथ चलता हुआ देखता है|

“The gift of learning to meditate is the greatest gift you can give yourself in this life. For it is only through meditation that you can undertake the journey to discover your true nature, and so find the stability and confidence you will need to live, and die, well. Meditation is the road to enlightenment.”
यह किताब आपको वह दृष्टि देगी, जिससे आप मौत और जीवन को एक साथ देख पाएंगे| फिर आप ऐसा नहीं कहेंगे कि जीवन के एक छोड़ पर जन्म है और दूसरे छोड़ पर मृत्यु| यह भ्रांत दृष्टि है, अस्तित्व में जीवन और मौत दो विपरीत चीज़ें नहीं है| मौत एक क्षण के लिए भी जीवन से जुदा नहीं है|
जब तक हमारी दृष्टि इतनी गहरी नहीं जो जाती है कि हम जन्म में छिपे मृत्यु को देख सकें, तब तक जीवन से दुःख का नाश नहीं हो सकता है| ओशो कहते हैं, "मरघट को गाँव से बाहर बनाकर तुमने बहुत बड़ी ग़लती की हैं, मरघट गाँव के बीचो-बीच होना चाहिए| ताकि तुम्हारे जीवन में प्रति पल मौत का बोध बना रहे|" मन मौत को झुठलाने की पूरी कोशिश करता हैं| हमारे जीवन का सारा आयोजन मौत को चकमा देने का आयोजन है| लेकिन हम कितना ही क्यूँ न भाग लें, मौत से नहीं बचा जा सकता है| अपने छाया से दूर आदमी कैसे भाग सकता है?
जो जानते हैं, उनका कहना है कि भागने में ही भूल है| क्योंकि जिन्होंने भी ठहर कर मौत के आँखों में आँखें डालकर देखा है, उनका कहना है कि इस जगत में जन्म और मृत्यु से ज्यादा झूठी चीज़ और कुछ भी नहीं है| सारा धर्म मौत के आँखों में आँखे डाल देखने की कला के सिवाय और कुछ भी नहीं है| अगर मृत्यु न हो तो आदमी कभी धर्म में उत्सुक न हो| ओशो की 'मैं मृत्यु सिखाता' पढ़ने के बाद से ही मेरे जीवन में धर्म का सूत्रपात हुआ था| अंसल प्लाजा के 'ओशो गैलरी' से खरीदी हुई यह मेरी पहली किताब थी| कुछ दिन बाद मैंने इसी किताब का ऑडियो प्रवचन भी खरीदा था| प्रवचन के अंत में ओशो 'मृत्यु ध्यान' करवाते हैं, “शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें, छोड़ दें, शरीर गिरता है तो गिर जाने दें, और भाव करें की आप मर रहे हैं...ख़ुद को चिता पर जलता हुआ देखें, आपने प्रियजनों को रोता हुआ देखें........” रोज रात सोने से पहले मैं वह ध्यान किया करता था|
अपने इंस्टिट्यूट में जहाँ मैं बैठता था वहां मैंने के सामने दीवार पर 'I am going to die next moment (मैं अगले क्षण मरने वाला हूँ).' लिखकर चिपका रखा था| इसस प्रयोग का मुझ पर बड़ा गहरा असर पड़ा था|

शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर घूसा लेने से आप मृत्यु से नहीं बच जाएँगे | विश्वास की नाव में बैठकर उस पार की यात्रा नहीं की जा सकती है| समय रहते तैयारी शुरूकर दीजिए| विश्वास की नाव कागज़ की नाव है, अपने अनुभव की नाव तैयार कीजिए| आइये हम सब सोगयाल रिन्पोचे की नव में बैठकर मौत के उस पार चले|
                                                                      ‘निमंत्रण’
PRACTICING AWARENESS IN DAILY LIFE


(OSHO MEDITATION CAMP)


From 31st August to 4th September.


Facilitated by Swami Dhyan Viram (Ikkyu Tzu)


Place- In Manali, Osho Neo Vipassana Meditation Center


Limited seats. Advance booking only.


For booking call at +91 8839996078


”You have more time than any age, and you are not exhausted because of the world. You are exhausted because you have lost the inner contact- because you do not know how to go deeper in your self and be revitalized.”- Osho

Always recognize the dreamlike qualities of life and reduce attachment and aversion. Practice good-heartedness toward all beings. Be loving and compassionate, no matter what others do to you. What they will do will not matter so much when you see it as a dream. The trick is to have positive intention during the dream. This is an essential point. This is true spirituality.’ - The Tibetan Book of Living and Dying


Tuesday, 16 July 2019

गमले में भी दर्द उगाया जा सकता है


16-07-2019, 17:25
कुछ महीने पहले (पिछले साल अक्टूबर में) जब मेरा बोधगया जाना हुआ था, तब वहाँ रह रहे अपने एक परिचित से मिलने मैं उनके घर गया था। काफ़ी दिनों से फ़ोन करके वो मुझसे मिलने आने को कह रहे थे। मेरा भी बोधगया जाने का सालों से मन था, हर साल प्लान बनाता था, लेकिन किसी-न-किसी कारण से प्लान रद्द हो जाता था। लेकिन इस बार, बहुत ही आश्चर्यजनक संयोग के कारण बोधगया जाना संभव हो पाया। बौधगया पहुँचने से पहले मैंने अपने मित्र को कॉल किया, मेरे आने की ख़बर सुनकर ख़ुशी के मारे वे अपना पोन पीटने लगे। कहाँ पर रुकेंगे?”, फ़ोन के उस ओर से उनकी आवाज़ आई। बोधिवृक्ष के आसपास कहीं रुकूँगा’, मैंने उनसे कहा। संडे तक तो रुकेंगे ना?”, उन्होंने पुछा|  मैंने कहा, जी हाँ रुकेंगे। (यह ग़ौर-ए-तलब है कि उन्होंने एक बार भी मुझे अपने यहाँ रुकने को नही कहा, औपचारिकरूप से भी नहीं।) तो, आइये फिर संडे को, मैं घर पर ही रहूँगा, मेरा घर बोधिवृक्ष से बस चार किलोमीटर की दूरी पर है|”, फिर फ़ोन के उस तरफ़ से उनकी आवाज़ आई। फ़ोन पर बात करने के थोड़ी देर बाद मेरे मोबाइल पर उनका एक मेसेज आया जिसमें उन्होंने अपना पता लिखकर भेजा था।
संडे को मिलने जाने से पहले मैंने गूगल मैप पर उनका ऐड्रेस डालकर देखा। मेरे करंट लोकेशन, जो बोधिवृक्ष से 300 मीटर की दूरी पर था, से उनका घर सिर्फ़ दो किलोमीटर की दूरी पर बता रहा था। मुझे बड़ी हैरानी हुई क्योंकि उस दिन उन्होंने बताया था कि उनका घर मंदिर से चार किलोमीटर की दूरी पर है| मैंने सोचा हो सकता है, सुनने में मुझसे भूल हो गई हो|
होटल से बाहर निकलकर मैंने एक ऑटो को हाथ दिया| ऑटोवाले ने ठीक मेरे पैर के पास आकर ऑटो रोका| पता बताकर जब मैंने भाड़ा पूछा, तो उसने 60 रुपया बतया| “दो किलोमीटर का साठ रुपया किस हिसाब से हो गया भाई?”, थोड़ा चौंकते हुए मैंने उससे पूछा| “बात दूरी का नहीं है भाई जी, अभी उधर ढेर जाम होता है, कम-से-कम 20 से 30 मिनट लग जाएगा वहां पहुँचने में”, पान का पीक सकड़ पर फेकते हुए वह मुझसे बोला| उसकी ‘ढेर जाम’ वाली बात सुनकर मैं मुस्कुराने लगा| मुझे अपने मुंबई निवास के वे दिन याद आ गए, जब मैं अँधेरी में पटना के तीन लड़कों के साथ रह रहा था| उनकी पटनिया भाषा सुनने में मुझे बड़ा मजा आता था| अपने सुनहरे दिनों को याद करते हुए, मैं ऑटो में बैठ गया| ‘ठीक है चलो पचास ले लेना’, बैठते हुए मैंने उससे कहा| “आप से बेसी भाड़ा नहीं मांग रहे हैं भाई जी, जितना उचित है उतना ही आपसे बोले हैं|”, गाड़ी बढ़ाते हुए वह बोला|
30 मिनट तो नहीं लेकिन 20 मिनट जरूर लग गया पहुँचने में| ऑटो से उतरकर मैंने एक सौ का नोट निकालकर ऑटोवाले को दिया, उसने मुझे 40 रुपया वापिस किया| रूपया वापिस लेते हुए मैंने उसके मुंह को गौर से देखा, हल्की दाढ़ी पर चंद्रशेखर आज़ाद टाइप मूंछ में वह ऑटो ड्राइवर कम विदूषक ज्यादा लग रहा था| जहाँ मैं ऑटो से उतरा वही रोड किनारे एक पान की दूकान थी| मैंने अपने जेब से मोबाइल निकाला और पता देखकर दूकानदार से पते के बारे में पूछा| “सामने वाली गली में तीसरा मकान ओझा जी का है”, पान पर चूना लगते हुए, दूकानदार ने मुझसे कहा| ऑटो ड्राईवर की तरह दूकानदार का मुंह भी पान के थूक से भरा हुआ था, बड़ी मुश्किल से वह बोल पा रहा था| इसकी मूंछ और शक्ल-ओ-सूरत तारक मेहता के पत्रकार पोपटलाल जैसी थी| 
रोड पार करके मैं गली में पहुंचा| पहला मकान किसी राय जी का था, दूसरे मकान के बाहर लगे नेम प्लेट पर ‘एडवोकेट सुमन यादव’ लिखा हुआ था, और तीसरे मकान के बाहर लगे बोर्ड पर लिखा था, “आनंद निवास, कृष्ण मोहन ओझा’ (बदला हुआ नाम)” यह मेरे मित्र का मकान था| चूँकि यह सरकारी कॉलोनी थी, इसीलिए सारे मकान का पैटर्न एक जैसा था| सड़क किनारे घर का मुख्य द्वार था; दो सीमेंट के खम्भे के बीच एक लोहे का छोटा-सा फाटक| दाहिने खम्भे पर रखे गमले में नागफनी उगा हुआ था| नागफनी देखकर मुझे मेहशर अफरीदी साहब का एक शेर याद आ गया, “जब से कैक्टस को देखा है, सोच रहा हूँ गमले में भी दर्द उगाया जा सकता है”| पता नहीं कृषमोहन जी ने अपने किस दर्द को गमले में उगा रखा था| मुख्यद्वार इतना छोटा था कि यदि आप नियमित रूप से योग करते हैं, तो उसे आसानी सी टांग उठाकर फांद सकते थे| मुख्य द्वार और घर के बीच थोड़ी खाली जमीन थी, जिसमे में चार आम के पेड़, एक अर्जुन का पेड़, एक लीची और दो अमरुद के पेड़ लगे थे| घर के ठीक बाहर क्यारी बनी हुई थी, जिसमे गुलाब, गेंदा और बेला के छोटे और बड़े पौधे लगे हुए थे| घर के दाहिने भाग में भी थोड़ी खाली जमीन थी, उसमे कृष्ण मोहन जी ने धनिया, पुदीना, और मूली उगा रखा था| मकान के पीछे सीरिष्ट के दो बड़े-बड़े पेड़ थे, पेड़ की छाया से उनका पूरा मकान ढका हुआ था| कृष्ण मोहन जी के मकान की तरह ही गली के सारे मकान पेड़-पौधों से घिरे हुए थे| कृषमोहन जी के बाद गली का चौथा मकान किसी ‘अमरकांत झा’ का था| अमकांत जी और कृष्णमोहन जी के मकान के बीच जो दीवार थी उस पर लौकी और करेला लटका हुआ था| आनंद निवास के ठीक सामने सड़क के उस तरफ SBI का एटीएम था, यह कृष्णमोहन जी के घर का लैंडमार्क था| मुझे SMS करके जो पता उन्होंने भेजा था, उसमे इस एटीएम का भी जिक्र था| मुख्य द्वार का फाटक खोलकर मैं अन्दर उनकी मकान की और बढ़ा|

घर के प्रवेश द्वार पर ‘सुस्वागतम्’ का एक टिनही बोर्ड लगा हुआ था| बोर्ड मेरे नोटिस में आया, क्योंकि एक कील निकल जाने की वजह से वह नीचे झूल गया था| गेट के बायीं ओर बने खिड़की से एक लोहे का कूलर लगा हुआ था, जिसकी तेज़ आवाज़ मेरे कानो को चुभ रही थी| कूलर का पानी टपककर नीचे फूलों की क्यारी में जा रहा था| क्यारी के जमा पानी में दो बगरी (स्पैरो) पंख फड़फड़ा कर नाहा रही थी| गेट के सामने खड़े होकर मैंने घंटी बजाई| अन्दर कमरे से घंटी के बजने की आवाज़ आई, ‘ॐ भूर्भुवः...’| “अरे...सुमन देखो तो कौन है”, अन्दर से कृष्णमोहन जी की आवाज़ आई| कमरे के अन्दर से आ रही टीवी की आवाज़ को सुनकर मैंने अंदाज़ा लगाया कि कृष्ण मोहन जी कमरे में टीवी देख रहे हैं| पांच सेकेण्ड बाद कमरे का दरवाज़ा खुला| कृष्णमोहन जी का 7 वर्षीय बेटा सुमन अपरिचित निगाहों से मुझे घूरने लगा| तभी सोफे पर बैठे हुए कृष्णमोहन जी ने टीवी से नज़रे हटाकर मेरी ओर देखा| मुझे देखते ही एकदम से हडबडाकर उठे, “आइये-आइये कब से इंतज़ार कर रहा था”, बोलते हुए मेरे पास आए और हाथ मिलाने के लिए अपना दाहिना हाथ मेरी ओर बढाया| तीन साल आश्रम में रहने के बाद, मैं लोगों हाथ मिलाना भूल गया था| आश्रम में या तो हम लोगों से गले मिलते थे (कुछ लोग गले पड़ भी जाते थे), या फिर हाथ जोड़कर नमस्ते किया करते थे| बड़े ही अटपटे ढंग से मैंने अपना हाथ उनकी और बढाया| मुझे वह दिन याद आ गया जब जीवन में पहली बार मैंने किसी से हाथ मिलाया था| अपने एक दोस्त के साथ मैं गावं का ‘महावीर मेला’ देखने गया था| मेरे दोस्त का एक पुराना दोस्त नवीन नया-नया दिल्ली से आया था| वह हमें मेले में मिल गया| मिलते ही उसने हम दोनों के सामने अपना हाथ बढ़ाया| हमें एकदम से समझ नहीं आया कि करना क्या हैं, वो तो अच्छा था कि हमने फ़िल्मों में लोगों को हाथ मिलाते देखा था| हडबडाते हुए हम दोनों ने उससे हाथ मिलाया| आज जब कृषमोहन जी ने अचानक अपना हाथ मेरी और बढ़ाया, तो मैं वैसे ही हडबडा गया| 7 साल दिल्ली में और तीन साल मुंबई में रहने के बाद हाथ मिलाना मेरे लिए सहज हो गया था, लेकिन आश्रम में रहने के बाद अब फिर से मुझे यह अटपटा और अजीब लगने लगा है| अब या तो ओशो की तरह हाथ जोड़कर मंद-मंद मुस्कुराते हुए मिलना अच्छा लगता है, या फिर करीबी मित्रों के साथ गले मिलकर| यहाँ कृष्णमोहन जी मेरे इतने करीबी मित्र तो जरूर थे कि मैं उनसे गले मिल सकता था, लेकिन हाथ बढ़ाकर उन्होंने सब ख़राब कर दिया| अच्छा, एक मिनट रुकिए...!!! कहानी आगे बढ़ाने से पहले आपको एक शेर सुनाना चाहता हूँ, हाथ मिलाने से संबंधित शेर है इसिलिये अभी अचानक याद आ गया, बहुत अच्छा शेर है, पहले शे’र सुनिए फिर आगे की कहानी सुनेंगे, तो अर्ज़ किया है,
“आँख उठाकर भी न देखूँ, जिससे मेरा दिल न मिले
रस्मन सबसे हाथ मिलाना, मेरे बस की बात नहीं”
वा-वाह क्या शेर है...!!
हैण्डशेक करने के बाद कृष्णमोहन जी मेरा हाथ पकड़कर मुझे कमरे में ले आए| और फिर जिस सोफे पर वे बैठे थे, उस के बगल वाले सोफे से अपने बेटे का स्कूल बैग हटाकर मुझे बिठाया| फिर, अपनी पत्नी को आवाज़ लगाते हुए बोले, “सुनती हो, इक्क्यु जी आए हैं|” उनकी आवाज़ काफी तेज़ थी, लेकिन इतनी नहीं की टीवी से आ रहे शोर को दबा दे| “हाँ बस लाती हूँ बस दो मिनट और रुको”, अन्दर से सीमा भाभी की आवाज़ आई| “ये पता नहीं क्या समझ रही है, मैं बोल रहा हूँ इक्क्यु जी आये हैं, तो यह बोल रही है लाती हूँ”, मेरी ओर देखते हुए कृषमोहन जी बोले| टीवी चालू था, ‘सब टीवी’ पर तारक मेहता का उलटा चश्मा चल रहा था| 
“बोधगया कैसा लगा, पहलीबार आए हैं ना आप?”, टीवी का चैनल बदलते हुए उन्होंने मुझसे पुछा| “पापा, रहने दो न मुझे देखना है”, टीवी के नीचे जमीन पर बैठा सुमन बोला| “बेटा अभी ऐड दे रहा है, थोड़ी देर स्कोर देख लेने दो, फिर लगा दूंगा”, टीवी पर नज़रे टिकाये कृष्णमोहन जी बोलें| ‘स्कूल जाता है सुमन’, मैंने सुमन की ओर देखते हुए पुछा| (कृष्णमोहन जी ने मुझसे जो सवाल पूछा था, उसका जवाब न तो मैंने दिया न ही उन्होंने दूबारा पूछा, वह सवाल दो चैनलों के बीच दबकर मर गया|) सुमन ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया| चैनल बदले जाने की वजह से वह मुंह फुलाए बैठा था| “बेटा, अंकल कुछ पूछ रहे हैं, जवाब दो”, कृष्णमोहन जी ने सुमन से कहा| ‘अच्छा ये देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लेकर आया हूँ’, अपने बैग से चोकॉलेट निकालकर देते हुए मैंने सुमन से कहा| “अरे क्या बात है, कितना बड़ा चॉकलेट लेकर आए हैं अंकल जी सुमन के लिए|”, अपनी आवाज़ में पुचकार लाते हुए कृष्णमोहन जी ने अपने मुंह फुलाए बेटे से बोला| मेरे हाथ में चॉकलेट देखकर सुमन का गुस्सा गायब हो गया| वह झट से चॉकलेट लिया और अन्दर की और भागा| अब कमरे में बस हम तीन लोग रह गए थे, एक मैं, दूसरा कृष्णमोहनजी और तीसरा टीवी| “कोहलिया आजकर कमाल कर रहा है, आप क्रिकेट देखते हैं की नहीं”, एड आ जाने की वजह से टीवी को म्यूट करते हुए कृष्णमोहन जी ने मुझसे पूछा| इससे पहले की मैं जवाब देता, उनके मोबाइल की घंटी बजी| उन्होंने झट से कॉल उठाया और फोन पर बात करने लगे| उनको कॉल पर बात करते देख मुझे अपने मोबाइल की याद आई| बैग से मैंने मोबाइल निकाला, ‘साकेत ब्रो JIO 4 मिस्ड कॉल’| फोन साइलेंट होने की वजह से मुझे कॉल का पता नहीं चला था| किसी दोस्त से मिलने आया हूँ, भाई| दो घंटे बाद कॉल करता हूँ’, मैंने साकेत को SMS किया| “अरे सन्डे है भाई घर पर बैठे हैं, मन क्या लगेगा टीवी पर मैच देख रहे हैं”, कृष्णमोहन जी फोन पर बोल रहे थे|
करीब 10 मिनट तक कृषमोहन जी फोन पर बात करते रहें| इस बीच उनकी पत्नी आई और मुझसे मिलकर फिर से किचन में काम करने चली गई| कुछ देर पहले जब कृषमोहन जी ने आवाज़ लगा कर मेरे बारे उन्हें बताया था तब, सीमा भाभी को ऐसा लगा था कि कृष्णमोहन जी चाय के लिए उन्हें आवाज़ लगा रहे हैं, इसीलिए उन्होंने दो मिनट में लेकर आने की बात कही थी| फिर जब सुमन चॉकलेट लेकर अन्दर गया तो उन्हें पता चला कि कोई अंकल जी आए हैं| अमन की बातों से उन्हें अंदाज़ा लग गया था कि अजनबी अंकल जी मैं ही हूँ, (कृष्णमोहन जी ने उन्हें पहले से मेरे आने के बारे में बता रखा था|), इसीलिए जब वह हॉल में आई तो एक ट्रे में दो कप चाय और दो कटोरे में नमकीन और बिस्कुट ले कर आईं| करीब दो घंटे तक मैं कृष्णमोहन जी के यहाँ रुका| इस दो घंटे में उनकी पत्नी ने मेरे मना करने के बावजूद दो बार चाय पिलाया और एक बार खाना खिलाया| मैं जबतक रहा तब तक कृष्णमोहन जी का टीवी चलता रहा, कुछ देर ‘सब टीवी चलता था, तो कुछ देर क्रिकेट’| इसके अलावा दो घंटे में उन्होंने छः लोगों से फोन पर बात की| एक्स्ट्रा एक्टिवि में सुमन ने भाभी जी के कहने पर मुझे दो पोएम्स सुनाए| हालचाल पूछने और सुनाने के अलावा कृषमोहन जी से मेरी किसी और विषय पर कोई बात नहीं हुई| हद तो तब हो गई जब कृष्णमोहन जी मुझे छोड़ने के लिए अपने मकान के मुख्य द्वार तक भी नहीं आए, गली से बारह ऑटो तक छोड़ने की बात तो भूल ही जाइए| ये बाहर आकर छोड़ने वाली बात पहले मेरे नोटिस में नहीं आती थी, लेकिन एक बार मेरे एक ग्रामीण मित्र ने जब मुझे एक वाकया सुनाया तब से मैं इसे नोट करने लगा हूँ| वो वाकया क्या था? आइये सुनाता हूँ....
सन 2003 की बात है, मैं दरभंगा के MLSM कॉलेज से आई.एस.सी.(मैथ्स) कर रहा था| काश तब मुझे पता होता कि आर्ट्स/लिटरेचर पढ़ना शर्म की नहीं गर्व की बात है, तो मैं कभी साइंस में एडमिशन नहीं लेता| हालाँकि मेरे चाचा ने मुझे 10th के बाद यह सलाह दी थी कि आर्ट से आगे की पढ़ाई करो, लेकिन मैं अपने इस तर्क में कि मेरा जो विषय कमज़ोर है मुझे उसे मजबूत करना है, मैथ्स में एडमिशन ले लिया| साला ये तर्क बहुत ही ख़तरना चीज़ होता है, कब आपको डूबा दे कुछ पता नहीं| सुकरात ठीक ही कहते थे, “तर्क वेश्या है”| खैर, क्या करना चाहिए था, और क्या नहीं करना चाहिए था यह बताने के लिए अभी मैं आपको यह कहानी नहीं सुना रहा हूँ| कहानी पर लौटते हैं| दरभंगा चूँकि मेरे घर से 25 किलोमीटर दूर है, पढ़ाई करने के लिए मुझे गावं छोड़कर वहां शिफ्ट होना पड़ा, घर से रोज़ जाना आना संभव नहीं था| आज-कल की तरह अगर मोटर बाइक का चलन उन दिनों आम होता, तो आना-जाना मुश्किल नहीं है| लेकिन साइकल से यह नामुमकिन था| हालाँकि मेरे दादा अपने समय में गावं से रोज़ 13 किलोमीटर कमतौल हाईस्कूल पैदल जाते और आते थे| फिर साइकल से 25 किलोमीटर बहुत ज्यादा दूर नहीं था| लेकिन मेरे समय में आम रवायत यह था कि लड़के गाँव से दसवीं पास करने के बाद आगे की पढ़ाई करने के लिए दरभंगा रहने चले जाते थे|
दोनार में गोविन्द (गोविन्द का जिक्र बहुत से संस्मरणों आ चूका है, इसीलिए मैं मानता हूँ अबतक आपको यह पता लग गया होगा कि गोविन्द मेरे बचपन का मित्र/ग्रामीण और चचेरा भाई है, और बहुत दूर के रिश्ते में वह मेरा मामा भी लगता है| गोविन्द का नानी गाँव और मेरी माँ का नानी गाँव एक ही है|) का अपना घर था| दरभंगा में मैंने वहीं शरण लिया| घर का छत सीमेंट के चदरे का था, जिसपर गोबिंद ने लौकी का लता चढ़ा रखा था| गर्मी में छत से आग, बारिश में पानी और सर्दी में ओस टपकता था| सभी मौसम में घर में बहार आया रहता था| गोविन्द कक्षा में मेरे से एक वर्ष आगे था| मेरे से एक साल पहले, जब वह वहां रहना शुरू किया, तब मकान पूरा बनकर तैयार नहीं हुआ था| अधबने मकान में ही गोविन्द अपने चार दोस्तों के साथ रहना शुरू कर दिया था| टॉयलेट न होने की वजह से ये लोग सुबह घर से एक किलोमीटर दूर रलवे स्टेशन जाते थे| वहां वाशिंग के लिए खड़ी ट्रेन में फ़ारिग होते थे| एक बार तो यूं हुआ कि गोविन्द का एक दोस्त राकेश (बदला हुआ नाम), जोकि अब इस दुनिया में नहीं है 3 वर्ष पहले एक रोड एक्सीडेंट में उसकी मौत हो गई,  ट्रेन के टॉयलेट में बंद था, और ट्रेन चल दी| वह इतना खोया था कि जब तक ट्रेन तेज नहीं हो गई उसे पता ही न चला कि ट्रेन चल रही है| अगले स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो वह दूसरी ट्रेन पकड़ कर तीन घंटे बाद वापिस आया| ऑटो से वापिस आने के लिए उसके पास पैसे ही नहीं थे, इसीलिए ट्रेन से वापिस आना उसकी मजबूरी थी| खैर, जब मैं रहने आया तब तक वह मकान पूरा बनकर तैयार हो गया| मुझे इस तरह की दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा| हाँ, बारिश, आग और ओस का सुख सदैव मिलता रहा|
गोविन्द के जिस मकान में हम रह रहे थे, उस मकान से थोड़ी दूर पर मेरे एक और ग्रामीण का मकान था| उस ग्रामीण का नाम ‘शिवपाल’ (बदला हुआ नाम) था| शिवपाल अपने मकान से रोज़ 9 बजे हमारे मकान पर आता था| उसके रोज़ आने का कारण यह था कि वह हमारे यहाँ से सुबह का अख़बार लेकर अपने यहाँ जाता था| शिवपाल का ऐसा करने के पीछे गहरी राजनीति और चालाकी थी|
हमारे मकान पर रोज़ सुबह 6 बजे अख़बार आ जाता था| एक दिन शिवपाल जब हमारे यहाँ आया तो हमारा अख़बार देखकर उसके दिमाग में एक खुराफाती आइडिया आया| “तुम लोग कितने बजे तक अख़बार पढ़ लेते हो”, शिवपाल ने हम सब से पूछा| “9 बजे हम उस पर सुबह का नाश्ता करते हैं”, मेरे एक दोस्त ने जवाब दिया| “तो फिर ठीक है, 9 बजे तक तुम सब अख़बार पढ़कर उस पर नाश्ता कर लेते हो”, शिवपाल बोलने लगा, “और रोज़ 9 बजे मैं घर से दादाजी के लिए अख़बार लेने निकलता हूँ, अगर तुम लोग मुझे अपना अख़बार दे दो तो मुझे अख़बार खरीदना नहीं पड़ेगा| मेरा इससे थोड़ा पॉकेट मनी बन जाएगा, तुम लोग तो जानते ही हो कि मेरे दादा कितने कंजूस हैं| इसके बदले महीने में एक दिन मैं तुम लोगों को फिल्म दिखा दिया करूँगा|”, शिवपाल ने अपना प्लान हमारे सामने रखा| हमें शिवपाल का प्लान अच्छा लगा| “लेकिन अगर तुम हमारा अख़बार लेकर चले जाओगे, तो फिर महीने के अंत में हम क्या बेचेंगे? हर महीना 20 रुपया का अख़बार बिकता है| जितने का तुम हमें फ़िल्म दिखाओगे उतना तो हम हर महीना अख़बार बेचकर कमा लेते हैं(उन दिनों दरभंगा में सिनेमा का सबसे मंहगा टिकट 7 या 9 रूपये का था| हम लोग अक्सर 5 या सात वाला टिकट कटाते थे|)”, ऐसा मेरा रूममेट विजय बोला| विजय MLSM कॉलेज से ही कॉमर्स में पढ़ाई कर रहा था| हम सब विजय की चतुराई से सहमत हुए| मुझे भी इस बात का गर्व हुआ कि मैं एक शातिर आदमी के साथ रूम शेयर कर रहा हूँ| हालाँकि गोविन्द विजय की ऐसी हरकत को ‘छूछ काइयांपन’ कहा करता था| गोविन्द का ऐसा सोचने के पीछे कारण यह था कि विजय कभी भी गोविन्द को रूम रेंट टाइम पर नहीं देता था| “अगर ऐसा है तो रोज़ सुबह मैं पिछले दिन का अख़बार तुम लोगों के लिए ले आऊंगा| एकबार पढ़ने के बाद दादाजी इस बात की फिकिर नहीं करते हैं कि अख़बार कहाँ गया”, शिवपाल ने विजय की ओर देखते हुए कहा| इस बार शिवपाल की बात का काट हम में से किसी के भी पास नहीं था| हम सब एक मत से राज़ी हो गए| अब शिवपाल रोज़ सुबह हमारे यहाँ नया अखबार लेने और पुराना अखबार देने आने लगा|
अब तक शिवपाल से मेरी कोई खास दोस्ती नहीं थी| इन फैक्ट, गोविन्द और पारितोष के अलावा शिवपाल की हमारे मकान पर किसी से भी ज्यदा बातचीत नहीं थी| लेकिन अब धीरे-धीरे शिवपाल से सबकी दोस्ती होने लगी थी| मेरे से भी उसकी अच्छी बातचीत होने लगी| एक शाम शिवपाल हमारे मकान पर आया| कुछ दिनों से वह हर शाम बेडमिन्टन खेलने हमारे यहाँ आ जाता था| हालाँकि गोविन्द का कहना था कि वह खेलने कम और सामने वाली आंटी को देखने ज्यादा आता था| मकान मालिक होने की वजह से गोविन्द हर चीज़ को अलग और गूढ़ तरीके से देखने लगा था| उस दिन मेरे आलावा सब लोग बाहर गए हुए थे| शातिर विजय गाँव गया हुआ था, गोविन्द किसी से मिलने गया था| पराग और मोहित कोचिंग करने गए थे| एक बस अकेला में घर पर था|
बेडमिन्टन खेलने के बाद, थोड़ी देर हम ने इधर-उधर की बातें की फिर मैंने उससे बोला, “विश्वनाथ, यहीं पास वाली गली में अभी दो दिन पहले शिफ्ट हुआ है, कल मैं उसके यहाँ से एक किताब ले कर आ गया था, चलो किताब वापिस करके आते हैं|” शिवपाल की तरह विश्वनाथ भी मेरा ग्रामीण ही है| वह पहले हमसे दूर किसी और मुहल्ले में रहता था| अभी दो दिन पहले यहाँ शिफ्ट हुआ था| “मैं उससे मिलने नहीं जा सकता”, शिवपाल कहने लगा,  “उसको मिलने की तमीज़ नहीं है| पहले जब वह छपकी में रहता था, तो मैं एक बार उससे मिलने गया था| जब मैं उसके घर से निकला तो वह गेट तक भी छोड़ने नहीं आया|” ऐसा मैं पहली बार सुन रहा था| गेट तक छोड़ने नहीं आना मतलब मिलने की तमीज़ नहीं होना| पहले मैंने नहीं सुना था|
इस घटना के बाद से मैं गौर करने लगा कि मिलने जाने पर कौन मेजबान बहार तक छोड़ने आता है, और कौन नहीं आता है| दिल्ली में जब नासिर से मेरी दोस्ती हुई तो, जब भी उसका फोन आता था कि वह आ रहा है, तो मैं उसके घर तक उसको लेने के लिए चला जाता था| और जाते वक़्त ठीक उसके गेट के बाहर तक उसको छोड़कर आता था| इसलिए आज कृष्णमोहन जी का छोड़ने के लिए बाहर तक नहीं आना मुझे खला| अगर आज यहाँ कृष्णमोहन जी की जगह मेरे राव साहब होते तो गेट क्या मुझे मेरे होटल तक छोड़ने आ जाते| ऐसा मेरे और राव साहब के बीच कई बार हो चूका है| कभी जब मैं उनसे मिलने अहमदाबाद जाता था, तो वे घर से अदालच तक मुझे छोड़ने आते थे और अंत में मेरे साथ ही मेहसाना चले आते थे| एक बार तो स्कूटी से वे हमें योग युनिवर्सिटी तक छोड़ने आए, फिर जब हम निकलने लगे तो हमारे जरा सी इसरार पर, युनिवर्सिटी के बाहर स्कूटी खड़ी करके, वे हमारे साथ अहमदाबाद से 70 किलोमीटर दूर मेहसाना आ गए|
कृष्णमोहन जी के घर से निकलकर होटल के लिए ऑटो में बैठने के बाद, पूरे रास्ते यही सोचता रहा कि आखिर मैं मिलने किससे गया था? कृष्णमोहन जी या उनकी टीवी से? या फिर उनके बेटे सुमन से? नहीं मैं मिलने नहीं गया था, मैं भाभी जी के हाथ का खाना खाने और सुमन की पोएट्री सुनने गया था| ना..ह.. मैं ये देखने गया था कि कृष्णमोहन जी का घर कितना बड़ा है, और वे दो घंटे में कितनी बार फोन पर बात करते हैं| .....नहीं ऐसा भी नहीं है....., दी फैक्ट इज़ जहाँ मैं गया था वहां न तो कोई घर था, न ही कोई आदमी| वह एक शमशान था, जहाँ कुछ मुर्दे रह रहते हैं...., मैं उन्ही मुर्दों से मिलने गया था| हाँ यह ठीक है, मैं मुर्दों से मिलने गया था.... | ट्रिंग...ट्रिंग...ट्रिंग....मेरे फोन की घंटी बजी (ऑटो में बैठने से पहले मैंने मोबाइल को साइलेंट मोड़ से ‘रिंग’ मोड’ पर डाल दिया था), मैंने बैग से फ़ोन निकला, ‘कृष्णमोहन जी कॉलिंग.....’ मैंने फोन उठाया... “इक्क्यु जी, आप अपने साथ जो किताब लेकर आए थे..क्या नाम लिखा है इस पर ‘इन द सर्च ऑफ़ मिरैक्युलस, यहीं छुट गई है”, उधर से आवाज़ आई| ‘कृष्णमोहन जी, छूटी नहीं है, मैंने जानबूझकर छोड़ दी है आपके लिए, मोबाइल और टीवी से अगर कभी फुर्सत मिले तो इस किताब को एक बार पढ़ लीजिएगा| शायद इस किताब को पढ़ने के बाद आप मशीन से थोड़े मनुष्य बन जाएँ|’, इतना कहकर मैंने फोन काट दिया और उनका नम्बर ब्लाक कर दिया| और कृष्णमोहन जी को अपने दिमाग से हमेशा के लिए इरेज़ कर दिया|
दस महीने बाद....
कल शाम जब मैंने अपने फेसबुक पेज पर सितम्बर में होने वाले मनाली कैंप (प्रक्टिसिंग अवेअरनेस इन डेली लाइफ, 31st Aug to 4 Sep, 2019.) के बारे में डाला, तो उसके दो घंटे बाद मनाली वाले स्वामीजी का मुझे फोन आया, “स्वामी आज हम ने पोस्ट डाला और आज ही एक बुकिंग कन्फर्म हो गई|” उनकी आवाज़ से लगा वे काफी खुश हैं| ‘कहाँ से बुकिंग हुई है’, मैंने उनसे पूछा| “बोधगया के कोई हैं, अपना नाम उन्होंने ‘कृष्णमोहन ओझा’ लिखवाया है, कहते हैं वो आपको जानते हैं| आप जानते हैं क्या उनको?”, फिर उस तरफ से मनाली वाले स्वमी जी की आवाज़ आई| कृष्णमोहन...! मैं एकदम से चौंक गया| ‘हाँ, मैं उन्हें जानता हूँ’, खोई हुई आवाज़ में मैंने उनसे कहा| फोन रखने के बाद बड़ी देर तक मैं सोच-विचार में खोया रहा| यह चमत्कार कैसे हुआ, ‘कृष्णमोहन ओझा कैंप करने मनाली आ रहा है’....!!!! मुझे यह बात पच नहीं रही थी| रात सोने से पहले मैंने अपने फोन का कांटेक्ट लिस्ट खोला और कृष्णमोहन के नंबर को कल दस महीने बाद अनब्लॉक किया|
आज सुबह चार में से तीन आर्य कर्मों को निपटने के बाद 10 बजे जब फोन ऑन किया तो पता नहीं मुझे क्या सूझा मैंने कृष्णमोहन के व्हात्सप्प पर एक मेसेज भेजा, मनुष्यों की दुनिया में आपका स्वागत है, कृष्णमोहन जी|’ बीस मिनट बाद उधर से उनका रिप्लाई आया, “प्रणाम स्वामी जी, आप तो हमें भूल ही गए... अच्छा हुआ कि कल मैंने आपके कैंप का पोस्टर देख लिया, वर्ना इस शनिवार को ‘टी टॉक’ पर आपसे मिलने मैं दिल्ली आने वाला था| उस दिन उस किताब को मेरे यहाँ छोड़कर आपने मेरे उपर बड़ा उपकार किया, उसको पढ़ने के बाद से मेरी ज़िन्दगी बदल गई है| अब मैं टीवी नहीं देखता हूँ| मोबाइल का इस्तेमाल भी बहुत कम कर दिया है| सिर्फ सुबह 10 बजे से लेकर शाम के 6 बजे तक ऑफिस टाइम में मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल करता हूँ|  ऑफिस में जब भी टाइम मिलता है www.ikkyutalk.blogspot.com पर आपका ब्लॉग पढ़ता रहता हूँ| आपकी बताई हुई सारी किताबें मंगाकर पढ़ चुका हूँ| जीवन में सब कुछ बड़ी तेजी से बदल रहा है| बहुत दिनों से आपसे मिलकर आपका शुक्रिया अदा करना चाह रहा था| कल कैंप का पोस्टर देखा तो सोचा चलो इससे अच्छा मिलने का मौका और कुछ नहीं हो सकता है|” इस मेसेज के बाद उन्होंने चार-पांच और मेसेज किये| अलग-अलग तरह से वे अपना आभार प्रगट करने की कोशिश कर रहे थे| अंतिम मेसेज था , I can’t express it in words, I just want see you asap.”
जीवन बहुत है अजीब और अनूठा है| कौन-सी बात कब किस को छू जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है| उस दिन मैंने किताब जानबूझकर नहीं छोड़ा था| मुझे किताब लेने न जाना पड़े या फिर उनको किताब देने न आना पड़े इस वजह से मैंने उन्हें ऐसा बोल दिया था| या फिर शायद मैं उनसे दूबारा नहीं मिलना चाह रहा था| बाद में बहुत दिनों तक मुझे ख़िताब खोने का अफ़सोस रहा था| कल रात से ही चमत्कृत और हतप्रभ हूँ| ऐसा भी होता है क्या?
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PRACTICING AWARENESS IN DAILY LIFE 

(OSHO MEDITATION CAMP)

From 31st August to 4th September.

Facilitated by Swami Dhyan Viram (Ikkyu Tzu)

Place- In Manali, Osho Neo Vipassana Meditation Center 

Limited seats. Advance booking only. 

For booking call at +91 8839996078

”You have more time than any age, and you are not exhausted because of the world. You are exhausted because you have lost the inner contact- because you do not know how to go deeper in your self and be revitalized.”- Osho

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...