09-Aug-2019
सालों पहले दिल्ली में तूफ़ैल चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका ‘लफ़्ज़’ में जोशी जी के बारे में पहली बार पढ़ा था। उनके निधन पर लफ़्ज़ का वह अंक उन्ही को समर्पित था। पहले ही पृष्ठ पर जोशी जी की तस्वीर के नीचे एक शेर छपा था, “बड़े ग़ौर से सुन रहा था ज़माना, तुम ही सो गए दास्ताँ कहते-कहते” भीतर के सफ़हों पर जोशी जी के ऊपर कई लेख और उनकी कुछ बातें छपी थी। कुछ बातें मुझे अभी तक याद है, “नर के लिए प्रेम का उन्माद तभी तक होता है, जब तक उसे स्वीकृति न मिल जाए, मादा के लिए स्वीकृति ही शुरुआत है।” एक जगह कहीं लिखा था, ‘प्रेम खसरे का रोग है, जितनी कम उम्र में हो जाए, हवा हो जाए”।
चित्र साभार- गूगल

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