Thursday, 15 August 2019

देखलि तऽ खेलि, देखलि तऽ खेलि.....

13-Aug-2019
2012 में जब मैं पहली बार पुणे आया था, तब आश्रम में HIV टेस्ट हुआ करता था, जिसका शुक्ल था 1000/- रुपया। इसके साथ नये आगंतुकों को ‘वेलकम मोरनिंग’ (इसमें आश्रम के तौर-तरीक़े और ध्यान विधियों के बारे में बताया जाता है।) का 500/- रुपया लिया जाता था। और उन दिनों भी एक दिन के प्रवेश पास का 750/- के आसपास ही चार्ज था। इस बार दिव्या से वेलकम मोरनिंग का शुक्ल नहीं लिया गया, क्योंकि मुझसे भी उन्होंने 5 दिन के प्रवेश पास और नये कार्ड का 3740/- रुपया ही लिया(और उससे भी इतना ही लिया)। सरकार के आदेश के बाद से HIV टेस्ट भी अब बंद हो गया है। मतलब अब 1500/- रुपये की राहत है। पहले मेरे ख़्याल से स्वमिंग का भी कुछ 280/- के क़रीब चार्ज था, वो भी इस बार प्रवेश-पास के साथ फ़्री है। 

7 बज कर 45 मिनट पर दिव्या ‘वेलकम’ के लिए चली गई। मैं अपनी जगह पर बैठकर उस स्टाफ़ के आने का इंतज़ार करता रहा जो मेरा कार्ड बनाता। ‘नाम के अनुरूप यह बिल्कुल एक resort जैसा है, आश्रम वाली फ़ीलिंग यहाँ नहीं आती है।’ अपने बग़ल में बैठे एक सज्जन से मैंने कहा। “मैं जब 2000 में यहाँ आया था, तब यहाँ की हवा कुछ और थी। अब यह बिल्कुल बदल गया है”, फुसफुसाते हुए उन्होंने मुझसे कहा। ‘ख़ैर, समय के साथ सब कुछ बदल जाता है’, एक गहरी साँस लेते हुए मैंने उनसे कहा। “आपका भी कार्ड खो गया है?”, उन्होंने मुझसे पूछा। ‘खोया नहीं है, मैं लाना ही भूल गया।’ मैंने उनके कान में धीरे से कहा। 
वहीं स्वागत कक्ष में बैठे-बैठे मेहसाणा आश्रम के कई मित्रों से मेरा मिलना हो गया। सुरेश स्वामी, नरेश स्वामी, सत्यम स्वामी, धर्मेंद्र स्वामी, अनीता माँ और राधेश्याम स्वामीजी से एक दिन पहले ही मिलना हो गया था।
स्वागत कक्ष से फ़्री होने के बाद मैं प्लाज़ा पर आ कर एक छतरी के नीचे बैठ गया। हल्की बारिश हो रही थी। दिव्या के वेलकम मोरनिंग से लौट कर आने में अभी बहुत समय बाँकी था। मैं चाहता तो कोई ध्यान करने जा सकता था, लेकिन अभी ध्यान करने का मेरा कोई मन नहीं था। 
प्लाज़ा पर खाने-पीने की चीज़ें मिलती है, जैसे, चाय, coffee, समोसा, और शाम को शराब। 
कुछ देर बाद सत्यम स्वामी भी अपने ग्रुप के साथ वहीं मेरे पास आकर बैठे गये। ‘यहाँ एक समोसा कितने का मिलता है?’, मैंने सत्यम स्वामी से पूछा। ‘शायद 80/- रुपये का है’, उन्होंने कहा। ‘तभी तो मैं कहूँ एक समोसे को तीन जन मिल कर क्यों खा रहे हैं।’ जब से मैं प्लाज़ा पर आया था, मैं यह नोटिस कर रहा था कि एक कप चाय और एक समोसे को दो-दो, तीन-तीन लोग आपस में मिल बाँट कर खा-पी रहे थे। 
आश्रम के भीतर कुछ भी खाने-पीने के लिए आपको मुख्यद्वार के पास कैश जमा करके कूपन लेना होता है। अपने पिछले अनुभवों के आधार पर मैंने इस बार कोई कूपन नहीं लिया था। last टाइम 320/- रुपये में दो चम्मच (दो चम्मच यहाँ तथ्य है, इसको कहावत की तरह ना लें) खाना खाकर मैं अपनी उँगली जला चुका था। 
आश्रम आने वाले 90 फ़ीसदी से ज़्यादा भारतीय और 70 फ़ीसदी से ज़्यादा विदेशी सन्यासी/ओशो प्रेमी आश्रम से बाहर ही अपने रहने और खाने-पीने का बंदोबस्त करते हैं। आश्रम में ठहरे का एक दिन का चार्ज क़रीब पाँच हज़ार रुपया है(यह घटता-बढ़ता रहता है)। अगर आप एक टाइम आश्रम/resort में ठीक से भर पेट भोजन करते हैं, तो 1500-200 के बीच ख़र्चा आएगा। कल मेरे तीन मित्रों ने 400 रुपए में 7 चम्मच दाल, और पाँच चम्मच सब्ज़ी और 6 रोटी (जितने आटे में हम अपने यहाँ मुश्किल से 2 रोटी बना पाते हैं, उतने में उन्होंने 6 रोटी बनाया था।) ख़रीद कर खाया। जितने खाना से एक आदमी का भी मुश्किल से पेट भरे, उतने को तीन लोगों ने मिलकर खाया। हैरान तो मैं हुआ जब उन्होंने कहा कि उतने में उनका पेट भर गया। मुझे लगता है जैसे बड़े होस्पिटल में इलाज करवा कर कुछ लोगों की बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं, वैसे महँगे भोजनालय में मेन्यू देखकर ही कुछ लोगों का पेट भर जाता है। इस बात को आप हल्के में नहीं ले सकते हैं, ऐसा सच में होता है। आपको एक कहानी सुनाता हूँ। 
मेरे गाँव जब कोई मर जाता है, तो दस दिन बाद मरे हुए व्यक्ति के परिवार के लोग गाँव के लोगों को भोज देते हैं, मतलब उनको अपने यहाँ बुलाकर खाना खिलाते हैं। आमतौर पर जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं, वे तीन दिन तक रोज़ शाम को गाँव के लोगों को बुला कर प्रीत भोज देते हैं। पहले दिन दाल, चावल और सब्ज़ी का भोज, दूसरे दिन चूड़ा(पोहा), दही और सब्ज़ी और तीसरे दिन माछ-भात (मछली चावल)। जो लोग अर्थ से उतने संपन्न नहीं होते हैं वे एक या दो दिन ही खिलाते हैं। 
मेरे घर के पास ही हरिजनों की बस्ती है, उनके यहाँ भी ऐसा ही होता है। मेरे छुटपन में हरिजन बहुत सुखी संपन्न नहीं हुआ करते हैं। सदियों से चली आ रही समजिक परम्परा और तथाकथित ब्राह्मणों की नीतियों ने उन्हें आर्थिक रूप से संपन्न होने का मौक़ा ही नहीं दिया था। वे लोग अमूमन एक या दो दिन का प्रीत भोज रखते थे। एक दिन दाल चावल खिलाते थे और दूसरे दिन दही-चूड़ा। दही-चूड़ा का भोज करना कुछ लोगों को बहुत भारी पड़ता था, क्योंकि आज ही की तरह दूध उन दिनों भी महँगा हुआ करता था। हरिजनों ने इसका हल निकाल रखा था। 
एक दिन किसी काम से मैं एक हरिजन के यहाँ गया हुआ था। कुछ दिन पहले ही उसके पिता की मृत्यु हुई थी। मैं जब उसके यहाँ पहुँचा तो देखा की बहुत से लोग भोज खाने के लिए पंक्ति में उसके यहाँ बैठे हुए थे। आज प्रीत भोज का दूसरा दिन था, यानी दही चूड़ा का भोज था। लोग अपने बग़ल में पानी का लोटा रखे ज़मीन पर सुखासन में बैठे हुए थे। सबके आगे केले का पत्ता बिछा हुआ था। दो लोग चंगेरा में चूड़ा लेकर बाँट रहे थे। जब सब के पत्ते पर चूड़ा पड़ गया, तब एक आदमी बाल्टी में सब्ज़ी लेकर आया और चूड़े के ऊपर करछुल से सब्ज़ी निकाल कर डालने लगा। यह देख कर मैं बड़ा हैरान हुआ। हमारे यहाँ (मतलब तथाकथित ब्राह्मणों के यहाँ) चूड़ा के ऊपर दही डाला जाता था, लेकिन ये लोग सब्ज़ी डाल रहे थे। उसके बाद जो कुछ मैंने देखा उसे कभी नहीं भूल सकता हूँ। जब सबके पत्तल पर सब्ज़ी डल गया, तब एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अपने हाथ में मिट्टी का एक मटका लेकर आए, जिसमें दही था। मुझे लगा अब शायद इन लोगों को दही दी जाएगी, लेकिन वे दही बाँटने के बजाय मटका लेकर पंक्ति में टहलने लगे। और उनको देख कर पंक्ति में बैठे सारे लोग एक सुर में चिल्लाने लगे, “देखलि तऽ खेलि, देखलि तऽ खेलि..... (देख लिया तो खा लिया, देख लिया तो खा लिया)।” इसी तरह दही लेकर और वे एक के बाद दूसरी पंक्ति में गए। और अंत में दही का पात्र लेकर एक रूम के अंदर चले गए। उनके जाने के बाद पंक्ति में बैठे लोग सब्ज़ी-चूड़ा मिला कर खाने लगे। 
यहाँ पुणे में भी मैं ऐसा ही देखता हूँ, मेन्यू देख कर ही बहुत से लोगों का पेट भर जा रहा है। वे लोग जो कुछ ज़्यादा पेटू हैं, वे थोड़ा टेस्ट करके अपना पेट भर ले रहे हैं।

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