Wednesday, 21 August 2019

उदासी, घुमकड़ी और पुदुच्चेरी!

21-Aug-2019
पहली बार जब गोवा गया था, तो वहां कोई 5-6 दिन रहा था| जब वहां से निकलने लगा तो दिल बड़ा उदास था, पता नहीं क्यों वहां से जाने का मन ही नहीं कर रहा था| उसी उदासी को मिटाने एक साल बाद फिर से गोवा गया, इस बार 15 दिन से भी ज्यादा रहा| पन्द्रह दिन में इतना उब गया गया कि इस साल दोस्तों ने जब गोवा चलने के बात की तो मैंने सिरे से खारिज कर दिया|
तरसों जब पुदुच्चेरी पहुंचा तो मैं कुछ बहुत खुश नहीं था| खुश नहीं था इसका मतलब ये नहीं है कि उदास था, लेकिन कुछ-कुछ उदासीन जैसा ज़रूर था| शहर बड़ा पराया-पराया लग रहा था, अजनबी लोग, अजनबी जबान और अपने उद्देश्य का भी ठीक-ठीक पता नहीं था कि हम यहाँ क्यों आए हैं| यहाँ आना बिलकुल जीवन में आने जैसा था, हम क्यों और कहाँ से आते हैं, कुछ भी तो पता नहीं होता है|
अरविन्द को मैंने थोड़ा पढ़ा है, सावित्री को कई बार उलट-पुलट कर देखा है, लेकिन जैसा लगाव मुझे रविन्द्रनाथ से है, वैसा अपनत्व मैंने कभी अरविन्द के साथ महसूस नहीं किया| अरविन्द के लिए मेरे हृदय में सम्मान जरूर है, लेकिन उनसे प्रेम मुझे बिलकुल भी नहीं है|
‘पास’ मिलने के पास जब हम मातृमन्दिर के लिए जा रहे थे, रास्ते पर चलते हुए मुझे देवघर के रास्ते की याद आ गई| वाहं भी ऐसी ही लाल मिट्टी पर चला करते थे| मातृमन्दिर का रास्ता कुछ-कुछ देवघर जैसा था| सुन्न, शांत, और सघन जंगल में चलते हुए कई बार ऐसा लगा जैसे अब कोई बोल-बम करता हुआ बगल से गुजरेगा|
रास्ते में पुराने बरगद और उसी के पास नारियल के पत्तों से बने पिरामिड को देखकर मन गदगद हो उठा| इतना पुराना बरगद बहुत दिन बाद देखा, 50 से अधिक जड़े ज़मीन में घुस कर तने बन गए थे| पेड़ के पास 'पेड़ पर न चढ़े' का बोर्ड लगा देख कर मन खिन्न हो गया| राव साहब जब मेरे गाँव आए थे, तब हम रोज़ सुबह गावं के सबसे पुराने तालाब के पास वाले मौलसिरी के वृक्ष के ऊपर बैठ जाते थे| वहां बैठ कर जैसी ब्रह्मचर्चा हम किया करते थे, वैसी गहन चर्चा पहले कहीं नहीं हुई थी| 'पहले मैं और साकेत साथ ही पास वाले स्कूल में पढ़ते थे, वह मेरे से तीन दर्ज़ा पीछे था| जब में चौथी कक्षा में आया तो दादाजी ने कहा कि अब इसका नाम सरकारी स्कूल में लिखा दो| एक दर्ज़ा छोड़ कर मेरा नाम पांचवी कक्षा में लिखवा दिया गया| घर से हम दोनों भाई साथ स्कूल के लिए निकले| आज मुझे अलग स्कूल में जाना था| साकेत मुझे नए स्कूल तक छोड़ने के लिए इसी पेड़ के नीचे तक आया था| इस टहनी के नीचे हम दोनों खड़े थे| हमारा पुराना स्कूल सड़क के उस तरफ था| जब साकेत यहाँ तक मुझे छोड़ कर जाने लगा, तो मैं रोने लगा| पहली बार उससे दूर हो रहा था| आज भी मैं ख़ुद को इस पेड़ के नीचे खड़ा रोता हुआ देख सकता हूँ| साकेत मेरा थियो है|', पेड़ के ऊपर बैठे-बैठे मैंने राव साहब से कहा| आज यहाँ बरगद के पेड़ को देख कर मेरा उस पर चढ़ कर बैठने का बड़ा मन था, लेकिन उस बोर्ड ने मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया|
बतौर विजिटर आप मातृमन्दिर को सिर्फ दूर से देख सकते हैं| अंदर जाने के लिए आपको अलग से 'पास' लेना होता है| सुबह ८:३० से ११:३० तक अन्दर ध्यान होता है, जिसके लिए सूचना भवन के पास वाली ईमारत के पहली मंजिल से आपको 'अनुमति पत्र लेना होता है| हम जहाँ से खड़े हो कर मन्दिर को देख रहे थे, वहां से मंदिर आग के गोले की तरह दिख रहा था| 'आज चल के पास ले लेते हैं, कल ध्यान करने के लिए आएँगे', मैंने दिव्या से कहा| मेरी बात सुनकर उसने ऊँगली से एक ओर इशारा किया हैं| लकड़ी की एक प्रतिमा मुंह पर ऊँगली रख कर चुप रहने को कह रहा था| मंदिर के लिए आते समय हमारी दोस्ती एक हैदराबादी दंपत्ति से हो गई थी, वे लोग पोज़ दे कर तस्वीर खींचने में व्यस्त थे| हम एक पेड़ के नीचे बैठ कर मंदिर को देखने लगे|
‘हैदराबादी लोगों की हिंदी कॉमेडी लगती है मुझे”, दिव्या बोली| ‘यही मैं उस प्रोफेसर से कह रहा था| इनके यहाँ की दो फिल्म मैंने देखी है, ‘हैदराबादी बिरयानी और अँगरेज़’ दोनों मुझे अच्छी लगी थी|’, मैंने दिव्या से कहा| “वो प्रोफेसर हैं? उनकी पत्नी मुझसे कह रही थी कि वो अपने पति से बहुत परेशान है| घर पर तो ठीक रहते हैं, पता नहीं कहीं घूमने आने पर उनको क्या हो जाता है|”, दिव्या बोली| ‘यात्रा में अक्सर लोगों के व्यक्तित्व का नया पहलु खुल कर सामने आता है, शांत बातूनी हो जाता है, बातूनी बदमाश और बदमाश सज्जन|, चीन में कहते हैं अगर किसी व्यक्ति को पूरा-पूरा जानना हो तो उसके साथ यात्रा पर ज़रूर जाना चाहिए’, धीरे से मैंने कहा| “अब यहाँ से चलो, कल के ध्यान के लिए पास ले लेंगे, फिर पुदुच्चेरी कौतुकालय चलेंगे, वहीं एक पुराना चर्च (Basilica of the Sacred Heart of Jesus) भी है, हम वहां भी चल सकते हैं|”, दिव्या बोली| ‘नहीं, तुम पहले ‘अरविन्द आश्रम का पता करो कि वह कहाँ है, यहाँ से हम पहले वहीं चलेंगे|’, मैंने कहा|
इंफोर्मेशन सेंटर से पता चला कि पास के लिए कल सुबह आना होगा| मंगलवार को पास नहीं मिलता है| ‘चलो कैफे में चल कर कॉफ़ी पीते हैं’, मैंने दिव्या से कहा| हमने एक होममेड समोसा और मद्रासी कॉफ़ी ऑर्डर किया| एक समोसा 30 रूपये का था, और कॉफ़ी 40 रूपये का| ओशो आश्रम की तरह कैपेचिनो यहाँ भी 130 रूपये की थी| थोड़ी देर बाद, हमारा आर्डर आ गया| पीतल के कटोरे में एक पीतल का ही ग्लास था, जिसमे कॉफ़ी भरा था| ऐसी कॉफ़ी हमने एक बार राव साहब के साथ खजुराहो में पी थी| मेरे ख्याल से जिस कैफे में हमने ये कॉफ़ी पी थी, उसका नाम ‘मद्रास कैफे’ था| समोसे के अंदर डोसे का मसाला भरा हुआ था| “अरविन्द आश्रम, पुदुच्चेरी संग्रहालय के पास ही है”, मोबाइल देखते हुए दिव्या बोली| “आश्रम 2 से 6 खुला रहता है| अब चलो यहाँ से, घर चल कर खाना आर्डर कर देते हैं, फिर खा कर आश्रम चलेंगे”, दिव्या बोली| ‘पहले कॉफ़ी तो खत्म कर लूं’, मैंने कहा| पीतल का पात्र काफी गर्म हो गया था| ‘कॉफ़ी कम और झाग ज्यादा था’, ग्लास रखते हुए मैंने दिव्या से कहा|


No comments:

Post a Comment

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...