10-Aug-2019
यूपी और एमपी इस बार गन्ने की अच्छी पैदावार हुई है। दरभंगा से दिल्ली और अब दिल्ली से पुणे की यात्रा के दौरान मुझे सबसे अधिक गन्ने के हरे-भरे खेत ही दिख रहे हैं। 12630 का पूरा रूट बेहद सुंदर है। दूर क्षितिज तक फैला मैदान, हरियाली ओढ़े खेत, जलप्रपात, मिट्टी के पहाड़, नदियाँ, सुंदर-सुंदर पुल, कहीं घने तो कहीं छिटपुट जंगल, छोटे-छोटे प्यारे गाँव, कहीं गौशला, कहीं दबड़ा, कही पानी में तैरते बत्तख़, कहीं पेड़ के ऊपर चढ़कर पत्तियाँ खाती बकरी, तो कहीं किसी पेड़ पर बैठकर जलावन तोड़ता किसान, कहीं कुँए पर बर्तन माँजती स्त्रियाँ...कहीं पेड़ से बल्ब की तरहें लटके नीड़ों से झांकती चिड़ियाँ, तो कहीं मंदिर वाले पोखर में नहाते गाँव के बच्चें, लाल और पीलें फूलों के खेतों में नाचता हुआ मोर, गाँव के बाहर खेतों में झुंड बना कर गश्त लगाते हुए आवारा कुत्ते। आह..! मुझे याद नहीं इससे सुंदर ट्रेन यात्रा पिछली बार मैंने कब की थी। ट्रेन के अंदर का माहौल भी ग़ैरभारतीय है, सीट से कम लोग, साफ़ बाथरूम, कैंटीन से उचित दाम पर सामान मिल रहा है, सीट, लाइट और पंखे सब दुरुस्त है। सबकुछ इतना सुकून और आरामदेह है कि यक़ीन ही नहीं हो रहा है मैं उसी मुल्क की ट्रेन में सफ़र कर रहा हूँ, जिस मुल्क की राजधानी में अभी दो दिन पहले भीड़, गर्मी, और प्रदूषण की वजह से मेरा सर चकरा गया था। अगर एक और मिनट मैं बस में बैठा रहता तो उलटी कर देता। बिहार से दिल्ली की यात्रा भी यातना ही थी। ट्रेन में बैठे पण्डित टाइप दिख रहे एक महानुभाव तंबाकू खा कर सीट के नीचे थूक दे रहे थे। पूरा ट्रैन किसी चलते-फिरते कूड़ेदान जैसा मालूम पड़ रहा था। एक टिकट पर चार सवारी और एक ट्रक सामान। अपने ही सीट पर बैठने के लिए लड़ाई।
अभी एक बड़ी नदी के ऊपर से स्लो मोशन में गुज़र रहा हूँ। नदी पूरी भरी हुई है। पक्षियों का झुंड पानी पर मँडरा रहा है। नदी के किनारे एक टापू पर सिल्ली अपने दो बच्चों के साथ बैठी हुई है। जल-पक्षियों की एक क़तार पानी किनारे अपना पंख सुखाने में व्यस्त हैं। गन्ने के बड़े खेत में बीच के कुछ गन्ने तेज़ी से हिल रहे हैं, शायद उसके नीचे कोई युगल अभिसार कर रहा है।
ये बादल, बारिश, ठंडी हवा, तितली, पीली धूप, नहाए-धोए पेड़, और पीले फूल....इन्हें देखते-दखते मर जाने का दिल कर रहा है।
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