Saturday, 24 August 2019

पोंडिचेरी में बैठे-बैठे पुणे की याद

23-Aug-2019

समाधि के अन्दर जाने के लिए हम जहाँ से एंट्री करते हैं, उस हॉल में ओशो की एक रोल्सरॉय खड़ी है, जिसका नंबर मेरे ख्याल से MV2041 है| वहीं गाड़ी के पास लगे कुर्सियों पर बैठकर आप को सफ़ेद मौजे पहनने होते हैं, ताकि अन्दर समाधी में लगे सफ़ेद संगमरमर ख़राब न हो जाए| मौजा पहनने के बाद आप एक रूम में प्रवेश करते हैं, जिसके बाईं ओर एक सीढ़ी ऊपर को जाती हैं| फिर आप जिस रूम में प्रवेश करते हैं, उसके दीवारों से लगे शीशों की आलमारी में ओशो की किताबें सजी हुई हैं| ये वो किताबें हैं, जिन्हें ओशो ने अपने जीवन काल में पढ़ी थी| जहाँ तक मुझे पता है, करीब दो लाख किताबें हैं| ज्योति माँ ने अपनी किताब 'दस हज़ार बुद्धों की एक सौ कथाएँ' में लिखा है कि ओशो एक दिन में 6 से भी ज्यादा किताबें पढ़ते थे| यह असंभव नहीं है| एक जर्मन अनुवादक, मेरे ख्याल से Paul Deussen, किसी किताब के सम्बन्ध में विवेकानंद से बात करना चाहते थे| विविकानन्द ने कहा, "मैंने किताब नहीं पढ़ी है, आप इसे यहाँ छोड़ जाइए, मैं पढ़ लेता हूँ, फिर इस पर बात करेंगे|" पॉल किताब छोड़ कर चले गए| किताब बहुत मोटी थी, उनका अनुमान था कोई पन्द्रह दिन के बाद विवेकानंद से इस किताब पर चर्चा हो पाएगी| इससे कम में किताब पूरी नहीं की जा सकती हैं| लेकिन अगले दिन जब वे विवेकानंद से मिलने आए, तो हैरान रह गए| "मैंने किताब पढ़ ली है, आप चाहे तो आज हम उस पर चर्चा कर सकते हैं", विवेकानंद ने डेयुसन से कहा| उन्हें यकीन नहीं हुआ, "इतनी मोटी किताब आप एक रात में कैसे खत्म कर सकते हैं", पॉल ने आश्चर्य प्रगट करते हुए कहा| "अगर विचारों की बाधा न हो, तो यह बिलकुल संभव है, मुझे किताब खत्म करने में एक घंटा भी नहीं लगा", विवेकानंद ने पॉल से कहा| पॉल को काटो तो खून नहीं| "तुम एक काम करो, किताब खोल कर तुम मुझसे पेज नम्बर कहो, मैं तुम्हे बता दूंगा कि उस पर क्या लिखा है", टेबल पर से किताब उठा कर पॉल को देते हुए विवेकानंद ने कहा| पॉल ने ऐसा ही किया, उसने किताब पलट कर एक पेज नम्बर विवेकानंद से बोला, विवेकानंद ने उसे बता दिया कि उस पेज पर क्या लिखा है|
कुछ हद तक ऐसा मेरे और आपके जीवन में भी होता है, हम जब कुछ पढ़ रहे होते हैं, उस वक्त अगर हमारा दिमाग बहुत अशांत है, तो दस पेज पढ़ जाते हैं और कुछ भी समझ में नहीं आता है| और कभी जब मन शांत होता है, तो सट से बीस पेज खत्म हो जाता है, और सब समझ में भी आ जाता है| बहुत से लोग किताब नहीं पढ़ पाते हैं क्योंकि उनका बेचैन मन किताब के पन्नों पर उनके ध्यान को टिकने नहीं देता है| 
किताबों के जंगल से गुजरते हुए आप एक ऐसे रूम में पहुँचते हैं, जहाँ हरे रंग की एक डेंटल-चेयर रखी हुई है| ओशो के जब दांतों का इलाज़ चलता था, तब वे इसी चेयर पर बैठते थे| मेरे ख्याल से उनकी किताब 'नोट्स ऑफ़ मैड मैन' इसी चेयर पर की गई बातचीत है| चेयर रूम के बाद एक और रूम-जैसी जगह पार करके आप समाधि तक पहुँचते हैं| समाधि का द्वार उलटे यू (U) जैसा है| गेट पर सेंसर इत्यादि लगे हुए हैं| 
शीशे के गेट को खोल कर जब आप अन्दर पहुँचते हैं, तो आपके दायीं ओर आपको एक शीशे का बेड दिखता है| यही ओशो की समाधि है| वहीं बेड के पास ओशो की एक मूर्ति बनी हुई है-सिर्फ गर्दन के ऊपर का हिस्सा| अपने मरने से कुछ दिन पहले दो-तीन दिनों तक इस बेड पर ओशो सोए थे| समाधि एक बहुत बड़ा हॉल है, जिसके फर्श सफेद और खम्भे ग्रीन मार्बल से आच्छादित हैं| ऊंचाई कोई 40 से पचास फीट होगी| गोलाकार समाधि के तीन हिस्से में शीशे लगे हुए है, शीशे के उस पार हरा-भरा बगीचा दिखता है| ऊपर एक बड़ा गोल झूमर लगा हुआ है, जिसमे हमेशा लाइट जलती रहती है| ध्यान के दौरान उसके लाईट को थोडा कम कर दिया जाता है| समाधि वाले बेड के पास ही हॉल का एक दूसरा गेट है, यह गेट ओशो की बाथरूम में खुलता है| जब समाधि पर ध्यान करने वाले सन्यासियों की संख्या ज्यादा हो जाती है, तो कुछ सन्यासियों को बाथरूम में भी बिठाया जाता है| मुझे भी एक दिन अन्दर बैठने का मौका मिला| इतना आलीशान बाथरूम मैंने पहले कभी नहीं देखा था, सत्तर के दशक का यह बाथरूम अपने समय में वर्ल्ड का नंबर वन बाथरूम रहा होगा| 
मानसून फेस्टिवल के दौरान समाधि पर ओशो के छोटे भाई की पत्नी ड्यूटी पर हुआ करती थी| ओशो के सबसे छोटे भाई आश्रम में ही रहते हैं| फेस्टिवल के मौके पर ओशो की एक बहन और उनके पति भी आये हुए थे| ओशो के भाई आश्रम में उतनी ही सरलता के साथ रहते हैं, जितनी सरलता के साथ माधोपुर आश्रम में ब्रह्मवेदांत जी के एक बेटे रहते हैं| जबतक आपसे कहा न जाए की ये ओशो के भाई हैं, आप उन्हें नहीं पहचान सकते हैं| आसान नहीं है अपने बड़े भाई को भगवान मान कर उसकी भक्ति में अपने जीवन को मिटा देना| 
जो जानते हैं, उनका कहना है कि ओशो की समाधि आश्रम की सबसे जीवंत जगह है| जो नहीं जानते हैं उनके लिए आश्रम सेक्स का अड्डा है, और रजनीश लड़कियों और ड्रग्स के माफिया थे| 
‘ताओ ते चिंग’ में बूढ़ा लओत्जु कहता है, “When a superior man heard of Tao, He cultivates himself diligently. When an average man heard of Tao, He is doubtful, vague and would give up halfway. When an inferior man heard of Tao, He laughs and thinks of It as foolish. If Tao is not being laughed at, It is not the Great Tao.”
ओशो की समाधि जिस भवन में है, उसे च्वांगतजु के नाम से जाना जाता है| मेहसाणा आश्रम में जिस घर में हम रहते थे, उसका नाम 'लओत्जु' था| और मेरा नाम इक्क्युत्जु है|

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