9-Aug, 2019
ट्रेन नम्बर 12630 में बैठा हूँ। यह ट्रेन दिल्ली से कर्नाटक तक जाती है, लेकिन मैं पुणे उतर जाऊँगा। जैसे जहाज़ का पंछी जहाज़ से उड़ता है और पुनः-पुनः जहाज़ पर लौट आता है, वैसे ही मैं कहीं से भी घूमफिर कर फिर-फिर दिल्ली लौट आता हूँ। लाख चाह कर भी ख़ुद को दिल्ली के दामन से दूर नहीं कर पाता हूँ।
२००४ में जब पहली बार दिल्ली आया था, तब भी मेरा मन दिल्ली से ज़्यादा मुंबई जाने का था। २००२ में दसवीं का इग्ज़ाम देकर मुंबई घूमने गया था। यह मेरे जीवन का पहला सोलो ट्रिप था। इससे पहले जहाँ भी गया था, माँ-पिता जी के साथ गया था। मुंबई जाने से पहले कभी बिहार से बाहर नहीं गया था। बस एक बार माँ-पिताजी के साथ देवघर की यात्रा के दौरान तारापीठ गया था। तारापीठ के तंत्र मठ में नंगी स्त्रियों को टहलते हुए देखने और बड़े-बड़े रसगुल्ले खाने की याद आज भी बनी हुई है। हालाँकि मुंबई तक पहुँचने की यात्रा सुखद नहीं रही थी, ट्रेन में मेरा सब सामान चोरी हो गया था, लेकिन मुंबई पहुँच कर बड़ा मज़ा आया था। इसीलिए १२th के बाद, आगे की पढ़ाई करने के लिए, मेरा मुंबई जाने का मन था। लेकिन लोगों ने समझाया कि दिल्ली का माहौल पढ़ाई-लिखाई के लिए मुंबई से ज़्यादा माक़ूल है, और दिल्ली सस्ता भी है। लोगों ने दिल्ली को लेकर इतना समझाया कि अंत में मन मार कर दिल्ली आना ही पड़ा। तब से अब तक मन मार कर ही सही कुछ अंतराल के बाद दिल्ली आने का संयोग बन ही जाता है।
पिछले दो बार से दिल्ली में ठहरने का अनुभव सुखद रह रहा है। लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दिया है, तो दिन अपने हिसाब से बिता लेता हूँ। अगर कोई मिलने की इच्छा ज़ाहिर करता है, तो उससे साकेत में पीवीआर पर मिल लेता हूँ। मेरे कुछ मित्र इस बात से नाराज़ भी हैं कि अब मैं उनसे मिलने उनके घर पर नहीं जाता हूँ। और इस बात से तो बहुत ही ख़फ़ा हैं कि अब मैं मिलने का पैसा लेता हूँ। उनकी व्यवहारिक बुद्धि में यह बात घूस ही नहीं रही है कि मित्रता जैसी मामूली चीज की भी कोई मूल्य हो सकती है। उनकी दृष्टि में, मित्र तो वह होता है जो उनके शहर में आकर, किसी होटल में ठहरे, और फिर वो उसे जब बुलाएँ तब वह उनके सुविधानुसार उनके घर पर उनकी पत्नी(जिस मोहतरमा की वजह से उन्होंने उसे घर पर नहीं ठहराया) और बच्चों के लिए मिठाई लेकर आए। और जब वह मित्र पहुँचे तो वे उसकी स्वागत में टीवी चला कर बैठे होंगे। ये होती है असली मित्रता और उसकी पहचान। ये क्या कि तुम कॉफ़ी हाउस के शांत माहौल में बैठकर, मोबाइल फ़ोन साइलेंट करके कॉफ़ी पर चर्चा करो। जहाँ घर पर पाँच रुपए की चाय में बात हो जाती, वहाँ ४०० रुपए कॉफ़ी पर ख़र्च करो। घर का माहौल क्या किसी कॉफ़ी हाउस से कम अच्छा होता है? बैकग्राउंड में चल रहा टीवी ब्रेकिंग न्यूज़ देकर बातचीत करने के लिए नए-नए मुद्दे दे रहा होता है, बच्चों की चिल्लपों बातचीत के दौरान पैदा हो गए मौन को संगीत से भर रहा होता है, घर में पत्नी की मौजूदगी गुफ़्तगू को अश्लील होने से बचाता है। इससे सुंदर और क्या माहौल होगा मिलने के लिए? इतनी मेहनत करके आदमी पैसा क्या कॉफ़ी हाउस में फेंकने के लिए कमाता है? कॉफ़ी हाउस की झंझट से बचने के लिए तो मैंने ६ महीने के प्यार के बाद ही गर्लफ़्रेंड से शादी कर ली थी।
ख़ैर, नाराज़ मित्रों को ख़ुश करने के लिए अभी मैं कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं हूँ।
कल मैं पुणे पहुँच रहा हूँ, जिन मित्र को मुझसे मिलना है वे मुझसे परसों 3-5PM के बीच “Café Coffee Day - Gourmet Restaurant,Noth Main Road, Koregaon Park Opp Yogi Park, Next To German Bakery” पर मिल सकते हैं। डोनेशन अमाउंट- 1000/- है।
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