Thursday, 22 August 2019

पुदुच्चेरी में पुणे की बात लिखो


कल शाम दिव्या कह रही थी, "ये तुम्हारे लिखने की वजह से मुझे सब कुछ संभल-संभल कर बोलना पड़ता है, ऐसा लग रहा जैसे में हमेशा किसी कहानी में जी रही हूँ| कुछ भी करने से पहले सोचना पड़ता है| पता नहीं तुम क्या लिख दो|  अब तुम अभी जो कह रही हूँ उसको भी मत लिख देना..हाँ तो...! ये टटका लिखना बंद करो...पुदुच्चेरी में पुणे की बात लिखो, फिर जब हम यहाँ से बंगलोर जाएँगे तब यहाँ की लिखना|"
मुझे दिव्या की बात जंची, यह मैं भी देख रहा हूँ, टटका लेखनी में उतना स्वाद नहीं होता है, जितना बसिया में| मुझे याद है गाँव में अक्सर, बाढ़ के दिनों में, मछली का रेल-ठेल हो जाता था| पिता जी इतनी मछली ला देते थे कि माँ सिर्फ मछली रान्ह कर (बना कर) रख देती थी, अब सुबह से लेकर शाम तक खाओ मछली-ही-मछली, चावल रोटी सब बंद| आम के सीज़न में में भी घर में कई दिनों तक खाना नहीं बनता था| सुबह उठा तो, चार-पांच बाल्टी में मुंह कटा आम भरा रहता था| आम, माछ और दूध से मन अक्सर अकछ (उब) जाता था|
हाँ, तो मैं आपसे बसिया-टटके की बात कर रहा था| बोआरी माछ ठंड के दिनों में टटका में उतना अच्छा नहीं लगता था, जितना अगले दिन बसिया हो जाने पर| गर्म भात के साथ रात का जमा हुआ बोआरी माछ..आह...! मुझे लगता है, लिखना भी बोआरी माछ है| जितना पुराना हो जाता है, उतना अच्छा लगता है-पढ़ने में भी और लिखने में भी|
अरविन्द आश्रम समंदर (पुदुच्चेरी बीच) के बिलकुल पास है| जब हम आश्रम के गेट पर पहुंचे तो, हमें रोड के उस तरफ चप्पल जमा करने के लिए कहा गया| बाहर से देखने में पर आश्रम वैसा ही दिख रहा था, जैसा आस-पड़ोस का बांकी फ्रेंच स्टाइल घर, स्लेटी रंग पर सफ़ेद की पट्टी, लकड़ी के छोटे-छोटे पल्लों वाली खिड़कियाँ| आश्रम का पूरा एरिया ही बहुत बहुत ही सुन्दर और शांत है| अन्दर पहुँचने पर गार्ड ने हमें इशारे से समाधि की ओर जाने को कहा| रस्ते में अपनी बाईं तरफ मैंने कैक्टस का विशाल वृक्ष देखा| पुदुच्चेरी में जगह-जगह पर कैक्टस के अलग-अलग प्रजाति के पेड़ लगे हुए हैं| कोई बीस कदम चलने के बाद अरविन्द और माता जी (श्री अरविन्द घोष की अध्यात्मिक संगनी) की समाधि आ गई| एक विशाल पेड़ के नीचे संगेमरमर का बड़ा चबूतरा था| दो लोग चबूतरे से सिर टिकाए बैठे थे, एक दो लोग चबूतरे की परिक्रमा कर रहे थे| दो-चार लोग चबूतरे से दूर दीवार किनारे बैठे आँख बंद करके ध्यान कर रहे थे(यहाँ मास्टर उगवे होते तो कहते, “ये ढोंग-धतूरा कर रहे हैं)| दीवार के पास बैठे गार्ड ने मुझसे हेलमेट उसके पास रख कर समाधि की परिक्रमा करने को कहा| परिक्रमा करने के बाद हम गार्ड के बगल में दीवार से लग कर सुखासन में बैठ गए| मैंने दो मिनट के लिए आंख बंद करके ध्यान करने का नाटक किया, जब आँख खोला तो देखा दिव्या पहले से आँख खोले बैठे थी|
'इस पेड़ का क्या नाम है?', मैंने स्टूल पर बैठे गार्ड से पुछा| "हम इसे सर्विस ट्री कहते हैं", गार्ड धीरे से बोला| सर्विस ट्री? नाम थोडा अटपटा लगा मुझे| 'सब जगह इसे सर्विस ट्री ही बोलते हैं?', मैंने पुछा| "ये पता नहीं, लेकिन यहाँ यही बोलते हैं", गार्ड ने अफ़सोस व्यक्त किया| यहाँ का गार्ड पुणे के गार्ड जैसा ही था| पुणे में भी मैंने एक गार्ड से पेड़ का नाम पूछा था, उसे पता नहीं था तो वह तीन और से पूछ कर आ गया, लेकिन किसी को पता नहीं था| लगता है, आज कल लोग पेड़ों को हल्के में ले रहे हैं|
अरविन्द ने 1950 में देह त्यागा था, पेड़ उतना पुराना तो नहीं लग रहा था| हो सकता है समाधि बनाने के बाद लोगों से पेड़ लगा दिया हो| पेड़ के पत्ते गुलमोहर के पत्तों जैसे छोटे-छोटे थे| समाधी के ऊपर चादर की छत थी, जिसकी वजह से समाधी कुछ-कुछ मजार जैसा दिख रहा था|
समाधी से उठने के बाद हम अंदर हॉल में गए| हॉल में अरविन्द की और अरविन्द से जुडी किताबें और तस्वीरें थी| दिव्या ने 35 रूपये में अरविन्द की एक तस्वीर खरीदी| सब जगह से उसको तस्वीर खरीदने की बीमारी है|
हॉल से निकल कर हम लाइब्रेरी में आ गए| एक बुजुर्ग (स्टाफ) खिड़की की तरफ मुंह किए अपनी टेबल पर बैठे थे| जिस गेट से हम प्रवेश किये उसके ठीक सामने बड़े टेबल पर एक अमेरिकन लेडी 'सावित्री' से नोट्स बना रही थी| 'हम यहाँ आधा घंटा बैठ सकते हैं', मैंने दिव्या से पूछा| उसने सहमती में सिर हिलाया| 'यहाँ बैठ कर पढ़ने के लिए 'सावित्री' मिल सकती है?', मैंने दफ्तर बाबू से पूछा| मुझे यह समझ नहीं आया की ये हमारी और पीठ करके क्यों बैठे हैं| ऑफिस में किसी को इस तरह उल्टा बैठे मैंने पहली बार देखा था| मेरे देखा-देखी दिव्या ने भी उनसे सावित्री ही माँगा|
अमेरिकन लेडी के ऑपोजिट बैठकर मै किताब पढ़ने लगा| दिव्या मेरे बगल में बैठ गई| बाबू ने हमें एक, एंट्री करने के लिए, नोट बुक और पेन ला कर दिया| मैंने उसमे अपना नाम और पता लिख दिया|
'सावित्री' की पहली लाइन मुझे हमेशा से पसंद रही है, "It was the hour before the Gods awake." वाह...! इस बार यह लाइन पढ़कर मुझे गीत चतुर्वेदी की कविता ‘छोटा ईश्वर’ की याद आ गई| हालाँकि गीत ने ‘छोटा ईश्वर’ नीत्शे से प्रभावित होकर लिखा है| इतनी मोटी किताब को आधे घंटे में पढने का कोई मतलब नहीं था| किताब के आखरी पन्नो (पेज 738) पर अरविन्द द्वारा लिखे हुए सावित्री से सम्बंधित कुछ ख़त छपे हुए थे, मैं उन्ही खतों को पढ़ने लगा|
समाधि, हॉल और पुस्तकालय के आलावा आश्रम किसी और हिस्से में जाने की अनुमति नहीं थी| इससे मैं बड़ा निराश हुआ| मैं अरविन्द के शयनकक्ष में जाना चाहता था| गार्ड से पूछने पर पता चला कि समाधी के बगल वाले घरों में ही अरविन्द और माता जी रहते थे| हॉल से सटा एक सूचना रूम था, जहाँ से मैंने पांच रूपये में एक लीफलेट खरीदा, उसमे आश्रम और अरविन्द के बारे में थोड़ी जानकारी छपी हुई थी| सूचना रूम में बैठी महिला से जब मैंने कुछ जानकारी लेनी चाही तो पाया कि आप अमिताभ बच्चन की मम्मी हैं, फुसफुसा कर बोलती हैं, और आधी बात अन्दर ही खा जाती हैं| उनसे बातचीत करना संभव लगा|
आश्रम से निकल कर हम 'पुदुच्चेरी संग्रहालय' गए| संग्रहालय आश्रम से ज्यादा दूर नहीं था| “लाइट गई हुई है, अन्दर कुछ दिखेगा नहीं, आप लोग कल आइये”, संग्रहालय के गेट पर खड़े गार्ड ने हमसे कहा| वहां से स्कूटी स्टार्ट करके हम चर्च गए| चर्ज संग्रहालय से कोई एक किलोमीटर की दूरी पर होगा| चर्च के पास जब स्कूटी खड़ी कर रहा था, तो वहां से रेलवे लाइन दिखा, मतलब रेलवे स्टेशन भी यहीं कहीं आस-पास था| मेरे ख्याल से 10-15 किलोमीटर के भीतर ही घूमने और देखने की सारी जगहें हैं|
चर्ज मुझे कुछ ख़ास नहीं लगा| एक बड़े चर्ज को जैसा होना चाहिए था, वह बिलकुल वैसा ही था| चर्च और मंदिर मुझे टूटा-फूटा ही अच्छा लगता है| पूरा चर्च खाली था, जीसस अकेले सूली पर लटके हुए थे| थोड़ी देर बाद दो-तीन लोग आए और जीसस की तस्वीर खींच कर ले गए हैं| सूली पर लटके जीसस मुझे अच्छे नहीं लगते हैं| मौत और दुःख का ऐसा प्रदर्शन मुझे धार्मिक कम राजनीतिक ज्यादा लगता है| सूली वाले जीसस रुग्ण लोगों की इजात लगते हैं| पैगंबर का मंदिर नाचता, गाता और उत्सव पूर्ण होना चाहिए| बाइबल के जीसस से मुझे अथाह प्रेम है, लेकिन चर्च के जीसस से नहीं|
चर्च के बाद हम बीच पर आ गए| बीच के सामने बने फ्रेंच स्टाइल घर, होटल और सरकारी भवन, चोड़े पत्ते वाले छोटे-छोटे आदम कद पेड़, घर के आगे लगे पत्थर के बेंचो पर बैठे बुजुर्ग दम्पति, कहीं किताब पढ़ता युवक, तो कहीं चोंच मिलाता प्रेमी युगल, इम्तियाज़ अली के किसी फिल्म का सुंदर दृश्य लग रहा था| अगर आपने मुंबई का नरीमन पॉइंट देखा है, तो इस बीच की थोड़ी कल्पना आप कर सकते हैं| यहीं बैठे-बैठे, समन्दर की लहरों को देखते हुए, मेरे अन्दर पुदुच्चेरी के लिए पहली बार प्रेम का जन्म हुआ| अचानक यह शहर अपना और जाना-पहचाना लगने लगा| मैंने हाथ में डंडा लिए पास खड़े लड़के को इशारे से बुलाया| “अब तुम हवा मिठाई खाओगे?”, दिव्या बोली| मैंने अपने लिए लाल वाला पैकेट लिया, दिव्या ने ब्लू वाला लिया| ब्लू वाला हवा मिठाई मैं पहली बार देख रहा था|
हवा मिठाई खाते हुए हम नेहरु स्टेचू के पास ‘हैंडी क्राफ्ट’ का प्रदर्शनी देखने के लिए चल दिए...| ‘सिर्फ देखना है, खरीदना कुछ भी नहीं है’, प्रदर्शनी के अंदर जाने से पहले मैंने दिव्या से कहा| “अन्दर जाने से पहले कल वाली जगह से गन्ने का जूस पी लें”, दिव्या बोली| ‘नेकी और पूछ-पूछ’|


No comments:

Post a Comment

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...