11-Aug-2019
कल 11 बजकर 30 मिनट पर हम पुणे पहुचें। पुणे पहुँचे से पहले ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी, हम इस इंतज़ार में थे कि ट्रेन फिर से चलेगी, लेकिन प्लेटफ़र्म पर लगे भोपूओं से आवाज़ आई कि ट्रेन नंबर 12360 अब यहाँ से अलग रूट पर जाएगी, पुणे जाने वाले यात्रियों से अनुरोध है कि वे प्लेटफ़र्म नंबर पाँच पर खड़ी ट्रेन में जाकर बैठ जाएँ, ट्रेन कुछ ही मिनटों में पुणे के लिए निकलने वाली है।हम आनन-फ़ानन में भागकर पाँच नंबर पर पहुँचे, अगर तीस सेकेंड की भी और देरी होती तो हम चूक जाते। हमारी तरह ही जो यात्री भागते-पड़ते ट्रेन में बैठ पाये थे, वे सब भारतीय रेल को लानत भेज रहे थे।
11 बज कर पंद्रह मिनट पर हम पुणे पहुँचे। स्टेशन से auto बूक करके कोरेगाँव पार्क पहुँचे।
ट्रेनों की अनीयमिता की वजह से अभी तक बहुत कम सन्यासी आश्रम पहुँच पाए हैं। सुबह से रुक-रुक कर बारिश हो रही है। सुबह स्वागत कक्ष से लेकर दूर मुख्य सड़क तक आगंतुकों की लंबी क़तार होने की आशंका थी। लेकिन, इतने कम लोग आए थे कि ठीक से स्वागत कक्ष भी नहीं भर पाया। इतना फीका मासून उत्सव कभी नहीं हुआ था।
जब से आया हूँ, बहुत व्यस्त रह रहा हूँ, कुछ भी लिखना संभव नहीं हो पा रहा हूँ। बहुत से पुराने मित्रों से मिला। मिलने-मिलाने की दृष्टि से दिन अच्छा का जा रहा है। अभी तैयार होकर ईवनिंग मीटिंग के लिए जा रहा हूँ। दिन ढलते-ढलते अच्छी संख्या में सन्यासी आ चुके हैं।
12-Aug-2019
कल दिन आश्रम में बिल्कुल वैसा ही गुज़रा जैसा आज का और कल का गुज़रेगा। पता नहीं कैसे आजकल अलसुबह 4 बजे के आसपास नींद टूट जाती है। कल भी सुबह चार बजे आँख खुल गयी। दिव्या का रजिस्ट्रेशन परसों शाम ही हो गया था। मेरा भी renewal हो गया होता, लेकिन ऐन वक़्त पर ए॰टी॰एम॰ से कैश निकालने चले जाने की वजह से मेरा रह गया। जबतक मैं कैश लेकर आया, office बंद गया था। हालाँकि बाद में पता चला कि renewal के time कैश की ज़रूरत नहीं होती है। यह सोचने वाली बात है कि इतने बड़े आश्रम में सारा कारोबार कैश से ही होता है, कार्ड से payment करने या एनईएफ़टी की सुविधा नहीं है।
दिव्या का कार्ड तो परसों ही बन गया था, लेकिन कार्ड उसे मिला नहीं था। कार्ड लेने के लिए उसे कल सुबह सात बजे Welcome पर पहुँचना था। इतने बजे ही मझे भी renewal के लिए पहुँचना था। सुबह उठने के बाद, छः बजे तक नहा धोकर तैयार होकर कर हम आश्रम के लिए निकल लिए।
किसी भी शहर को अगर पूरा जानना हो, तो सुबह उठकर उसे देखना चाहिए। पुणे की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि पूरा शहर सदियों पुराने पीपल, गुलमोहर, नीम, ईमली, बाँस, नारियल और रंगबिरंग के असंख्य पेड़ों से शहर ढका हुआ है।
(कल शाम से थोड़ा बुख़ार हो गया है, आगे की कहानी स्वस्थ होने के बाद)
12-Aug-2019
सुबह 6 बजकर 21 मिनट पर स्वागत कक्ष पर पहुँचे। office खुलने में 40 मिनट बाँकी था। वहीं कक्ष में लगे लकड़ी के बेंच पर बैठकर हम इंतज़ार करने लगे। हमारे बाद एक-एक करके और कई लोग आ गए। धीरे-धीरे कक्ष भरने लगा। सात बजने से कुछ देर पहले, स्टाफ़ के लोग भी आने लगे। रूम का माहौल बदलने लगा। व्यवस्था और लोगों के काम करने का ढंग देख कर ऐसा लग रहा था मनो हम किसी ऐरपोर्ट पर आ गए हों।
परसों जिन्होंने ने दिव्या का कार्ड बनाया था वे उसे बुलाकर अपने काउंटर पर ले कर गए। जब वह जा रही थी तब मैंने अपने जेब से उसे पाँच हज़ार रुपये निकाल कर दिये, ‘संभवतः इतने में तुम्हारा पाँच दिन का प्रवेश-पास और वेलकम morning हो जाएगा।’ सहमती में सिर हिलते हुए दिव्या अपने रोब के दाहिने जेब में पैसे रखकर चली गई।
थोड़ी देर एक विदेशी लड़की ने आकर मुझसे पूछा, “आपको क्या करवाना है?” उसके पूछने का ढंग वैसा ही था जैसा ऐरपोर्ट पर होता-अतिशय विनम्रता और बनावटी मुस्कान। “मेरा पूरना कार्ड खो गया है, मुझे नया कार्ड बनवाना है।” मैंने उससे सपाट लहजे में कहा।
थोड़ी देर बाद दिव्या अपने नए कार्ड और एक पर्ची के साथ मेरे पास आई। “टोटल 3740/- ही लग रहा है, 3640/- पाँच दिन के पास का और सौ रुपये कार्ड का। यह एक हज़ार रुपया वापिस रखो मैं पैसा जमा करके आती हूँ।” पैसा और अपना mobile मेरे हाथ में थमाकर दिव्या पैसा जमा करने के किए क़तार में जाकर खड़ा हो गयी।
मैं अपनी जगह पर बैठे अपनी बारी के आने का इंतज़ार करता रहा। नया कार्ड बनाने वाला स्टाफ़ अभी तक नहीं आया था। मैंने जेब से mobile निकाल कर समय देखा 7:30AM. पाँच मिनट बाद दिव्या पैसा जमा करके मेरे पास आई, ”7:45 पर मुझे welcome morning के लिए जाना है। अभी यहीं बैठ कर इंतज़ार करना हैं।” फुसफुसाते हुए इतना कहकर वह मेरे राइट में क़रीने से सजी ‘MOOERNA( O’ D भी हो सकता है) की बिना हाथ वाली काली कुर्सी पर जाकर बैठ गई। उसे welcom के लिए तैयार बैठा देखकर मुझे अपना पुणे-first-टाइम याद आ गया।
2011 के सितंबर में, जब दिल्ली छोड़कर मैं मुंबई गया था, तभी अक्टूबर में अपने जन्म दिन पर 2 तारीख़ को मेरा पुणे जाने का मन था। लेकिन माली हालत ठीक न होने की वजह से तब जाना नहीं हो पाया था। 2011 के अक्टूबर के बदले, 2012 के फ़रवरी में 12 तारीख़ को मैं पहली बार पुणे पहुँच पाया।
(बुख़ार की वजह पूरा शरीर ऐंठ रहा है। सहज रूप से शरीर को स्वस्थ करने के लिए सुबह से उपवास में हूँ। सुबह आश्रम आने से पहले तुलसी पत्ता उबाल कर पिया था। आश्रम में एक अदरक, शहद और नींबू टी पिया था। इसके अलावा सिर्फ़ पानी पी रहा हूँ। हाँ, कल शाम और आज सुबह हिमालया के septilin की दो-दो गोली ली थी। लिखने में तकलीफ़ हो रही है, आगे की कहानी शाम में बताता हूँ।)
12-Aug-2019
आज प्लाज़ा पर हरियाणा के एक स्वामीजी बता रहे थे, “बचपन में मुझे समोकिंग की लत लग गई थी। मैं लोगों के द्वारा फेकें गए बीड़ी उठा कर पीने लगा था। लोगों को जब सिगरेट पीते हुए देखता था, तो सोचता था ये बड़े, पढ़े-लिखे और हाई क्लास लोग हैं। मेरे एक चचेरे बड़े भाई, जो गोरखपुर रेलवे में काम करते थे, सिगरेट पीते थे। मैं उनके गाँव आने का इंतज़ार किया करता था। उनके द्वारा फेकें गए सिगरेट के जले हुए टुकड़ों को पीने के लिए मैं हमेशा ललायित रहता था।
एक दिन मेरी चोरी पकड़ी गई। उन्होंने मुझे सिगरेट के फेकें गए टुकड़े उठाकर पीते हुए देख लिया। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया, मैं डरते-डरते गया। अपने डब्बे से एक सिगरेट निकाल कर मुझे देते हुए बोले, “अगर तुम्हें पिटने से बचना है तो इसे पीना होगा।” मैं बड़ा हैरान हुआ। उन्होंने मेरी सिगरेट जला दी। मैंने एक कश पिया, तो वे बोले, ‘ज़ोर की कश ले’। मेरी आँखे ला हो गई, मैं ज़ोर-ज़ोर से खाँसने लगा। एक के ख़त्म होने के बाद, उन्होंने दूसरी जला दी। मेरा सिर चकरा रहा था। खाँस-खाँस के बुरा हाल हो गया। दो दिन तक मेरी तबियत ख़राब रही।
वो दिन था और आज का दिन है, 20 साल हो गए इस बात को, मैंने आज तक सिगरेट को हाथ नहीं लगाया।”
12-Aug-2019
वायलन के एक बड़े उस्ताद अपने 16 शिष्यों के साथ आए हुए थे। आज दिन में दो बार उनका कार्यक्रम था- सुबह 7:30 बजे और दोपहर 2 से 3:30 तक। सुबह दिव्या सक्रिय-ध्यान के लिए जाना चाहती थी, लेकिन मेरी तबीयत ख़राब होने की वजह से नहीं गई। मेरे ख़याल से सुबह हम 9 बजे के बाद आश्रम पहुँचे थे। अनिल स्वामी (इनर सर्कल से)ने कहा कि सुबह की संगीत-सभा बहुत ही अभूतपूर्व था, “दोपहर तुम लोग मिस मत करना।”
दिव्या को वायलन बहुत पसंद है। हमने (सत्यम स्वामी, सुरेश स्वामी, नरेश स्वामी, धर्मेंद्र स्वामी, अमीता माँ और दिव्या) तय किया कि दोपहर में पहले हम स्वीमिंग करेंगे( इस बार प्रवेश-पास के साथ, स्वमिनिंग फ़्री है), फिर दो बजे ओशो की समाधि पर ध्यान करने जाएँगे, फिर 2:30 से संगीत-सभा का आनंद लेंगे।
दिन में हमने किसी भी ध्यान में भाग नहीं लिया। प्लाज़ा पर बैठकर गपियाने में और लोगों को देखने में ही सारा समय बीता। वैसे भी ओशो की समाधि पर बैठने के अलावा मुझे किसी और ध्यान में जाना अच्छा नहीं लगता है।
कल एक बात से मैं बड़ा हैरान हुआ। दोपहर में जब समाधि पर ध्यान करने के लिए गया, तब मैं काफ़ी थका हुआ था, और नींद से पलकें बोझिल हो रही थीं। ऐसी हालत में ध्यान के लिए बैठने पर नींद का आना तय होता है। लेकिन जैसे ही समाधि पर आँखे बंद करके बैठा नींद जैसे ग़ायब हो गई। थकान का कहीं कोई नमों निशान नहीं था। एक घंटा कैसे बीता पता ही नहीं चला। ऐसा ही मैंने पिछले साल चित्रकूट घाट और बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए महसूस किया था।
अनिल स्वामी (इनर सर्कल से) की एक बात मुझे हमेशा से बड़ी प्रभावकारी लगती है। पहली बार उनसे मैं 2014 के दिसंबर में ओशो मनन मेहसाणा में मिला था। वे कैम्प लेने आए थे। मैं बुद्धा सभागार में worship कर रहा था, और दिव्या मौन-मदिरालय में। बस एक महीने पहले 10 november को हम मुंबई से job छोड़कर आश्रम में रहने आ गये थे। रधेश्याम जी (ओशो मनन के मेनेजिंग ट्रस्टी ) ने, मौन-मदिरालय के बाहर अंधेरे में, अनिल स्वामी से हमारा परिचय करवाया था, “ये इक्क्यू और दिव्या हैं, कार्य ध्यान के लिए मुंबई से आए थे। प्यारे कपल हैं।” अनिल स्वामी ने बड़े प्यार से हमें गले लगाया था।
उस कैंप के ठीक एक साल बाद वे दुबारा मनन में आए। जब वे हमसे मिले तो उन्होंने नाम लेकर हमें संबोधित किया। हम बहुत हैरान हुए थे, उन्हें यह भी याद था कि हम कहाँ से आए थे और पहले क्या करते थे।
मनन से निकले अब हमें दो साल से ज़्यादा हो चुका है। इस बीच अनिल स्वामी से कहीं मिलना नहीं हुआ था। लेकिन कल जब उनसे मिला तो एक बार फिर से उनसे प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रह सका, “बहुत दिनों बाद देख रहा हूँ तुम दोनों को”। मेहसाणा आश्रम में जो लोग कैंप लेने के लिए आते हैं, उनमें से क़रीब-क़रीब सब से मिलना हो गया है। स्वामी आत्मों मनीष और धड़ूक स्वामी से मिल कर बहुत अच्छा लगा। स्वामी देवेंद्र भारती और साधना माँ ने मुझे पहचानने से इंकार कर दिया। सिंधु माँ को न तो मैं पहचानता हूँ न ही वो मुझे पहचानती हैं। स्वामी राधेश्याम जी इतनी आत्मीयता से मिले कि आँखे भर आई।
No comments:
Post a Comment