Wednesday, 21 August 2019

मातृमंदिर पुदुच्चेरी (सफ़र-ए-मुसलसल)

18-Aug-2019

नाम का आदमी ही की तरह शहर पर भी असर पड़ता है। इस शहर का नाम पुदूच्चेरी (पोंडिचेरी) है और यहाँ सब कुछ प-से-पीला है। रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही रोड के उस तरफ़ गोल्डन रेस्तराँ है, वहीं इडली, दाल वडा, सांबर और नारियल की चटनी खाया। खाना दी-बेस्ट था! केले के पत्ते पर एक बार दिल्ली में नैवेदम में भी खाया था, लेकिन ऐसा स्वाद नहीं था। 
नाश्ता करने के बाद, एक पीले-auto में बैठे कर अभी-अभी hotel पहुँचा हूँ, रास्ते में ज़्यादातर घर और दीवारें पीले रंग से पुता हुआ था...auto वाले को 170/- रुपये में बात करके लाया था, लेकिन पैसा लेते समय उसने ऐसा पीला मुँह बनाया की 200 देना पड़ा..! अरे हाँ वो दो सौ का नोट भी तो पीला ही था!


19-Aug-2019

कल ECR रोड पर होटल पलाशियल पोंदि में रुका था। वहाँ से पुदूच्चेरी कौतुकालय बहुत नज़दीक तो नहीं लेकिन दूर भी नहीं था। शाम होटल से निकल कर हम यूँ ही रोड पर टहल रहे थे, एक जगह लोगों को ऑटो में बैठते देखा। पूछने पर पता चला कि ऑटो हमें जहाँ तक ले जाएगा वहाँ से बीच आधा किलोमीटर है। पैसे का पूछ कर हम ऑटो में बैठ गए। शाम के ६ बज रहे थे, अँधेरा होने में ज़्यादा वक़्त बाँकी नहीं था। रास्ते में जगह-जगह पर राजीव गांधी की तस्वीरें लगी। तिरंगे का चक्र बना कर बीच में उनकी गोल तस्वीर लगी हुई थी, अजनबी भाषा में क्या लिखा था समझ नहीं आया। 
ऑटो वाले ने हमें राजा टकीज पर उतारा। दो जन का १४ रुपया किराया लिया। राजा टकीज से हमें पैदल चल कर जाना था। रास्ते में हम ग्रैनड बाज़ार पुलिस स्टेशन और नेहरु रोड से होकर गुज़रे। नेहरु रोड से सटा हुआ ही म्यूजियम था। शाम हो जाने की वजह से म्यूज़ियम बंद हो गया था। एक जगह दीवार पर नेता जी(सुभाषचंद्र बोस) की (शायद 1945 की ) एक तस्वीर लगी हुई थी। बीच पहुँचने से पहले एक जगह हमने गन्ने का जूस पिया। जूस का स्वाद बहुत ही अलग था, ऐसा लग रहा था जैसे गुड़ का शर्बत हो।
बीच कुछ-कुछ मुंबई के नरीमन point जैसा था। किनारे पर गांधी जी की एक बड़ी मूर्ति खड़ी थी। बीच पर लोगों की अच्छी ख़ासी संख्या मौजूद थी। एक साफ़ पत्थर देखकर हम बैठ गए। “रूम लॉक का झमेला नहीं हुआ होता तो हम जल्दी पहुँच जाते”, दिव्या बोली। 
‘वो लेडी दो बार ‘aai-ai-o’ बोल कर चली क्यों गई?’ 
“वो लॉक करती थी, और तुम बार-बार गेट खोल देते थे, तो वो क्या करती, वो शायद रेसेप्शन पर बताने चली गई।” 
‘वो लॉक बिल्कुल मेहसाणा आश्रम जैसा था। याद है एक बार कैसे हम चाभी रूम में भूलकर रूम बंद कर दिए थे।’
“हाँ, तब हम स्वीमिंग पूल के पास रबिया में रह रहे थे। शुक्र था कि खिड़की थोड़ी खुली हुई थी, वरना गेट काटना पड़ता।”
‘लेकिन यहाँ तो रूम लॉक ही नहीं हो रहा था।’
“चलो अब चलते हैं, क्या पता लेट हो जाने पर जाने के लिए कुछ मिले ही ना”


आज हम जहाँ रुके हुए हैं, वहाँ से बीच सिर्फ़ तीन सौ मीटर की दूरी पर है। कल के होटल की तुलना में आज का फ़्लैट ज़्यादा सही है। फ़्लैट में घर वाली फ़ीलिंग आ रही है। पहले हमने यहाँ एक दिन की बुकिंग की थी, लेकिन आने के बाद हमें लोकेशन और सबकुछ इतना सही लगा कि दो दिन की बुकिंग और कर दी। ECR (ईस्ट कोस्ट रोड) से सटा 1BHK फ़्लैट है, अंदर ज़रूरी और ग़ैरज़रूरी सब सामान उपलब्ध है। किचन में सब कुछ है, बस बर्तन नहीं है, अगर बर्तन होता तो मज़ा ही आ जाता। धर्मकोट की तरह यहाँ भी ख़ुद ही खाना बना लेते हम। 
औरोविल यहाँ से आठ किलोमीटर की दूरी पर है। 
धर्मकोट से जब मैंने औरोविल आने का प्लान बनाया था, तब हम चार लोग आने वाले थे। लेकिन, आख़िर-आख़िर में दो लोगों का प्लान रद्द हो गया। राव साहब अपनी शाश्वत खुजली और स्वामी आनंद तीर्थ अपने ऑफ़िस की वजह से नहीं आ पाए। 
भाषा ना समझ आने की वजह से कहीं आना जाना यहाँ बड़ा मुश्किल है। हिंदी तो छोड़िये लोग इंग्लिश भी नहीं समझते हैं। मकान मालिक सुबह पाँच मिनट तक क्या बोल कर गया कुछ समझ नहीं आया। उत्तर भारतीय खाना भी यहाँ ना के बराबर ही मिलता है। जिस फ़्लैट में हम रह रहे हैं, उसके बाहर ही ‘मिड टाउन’ रेस्तराँ हैं, वहीं से ऑनलाइन ऑर्डर देकर दोपहर का खाना मँगाया था। डोसा 60 रुपए था और एक रोटी 40 रुपये का। बटर पनीर का स्वाद भी साम्बर जैसा था। 
अभी जैसा यहाँ महसूस कर रहा हूँ, ऐसा ही कुछ-कुछ कोलकाता में भी लगा था। हिंदी/इंग्लिश ना बोल पाने की वजह से बड़ी घुटन महसूस हो रही हैं।


नोट-फ़्लैट का रंग पीला है।
20-Aug-2019
जहाँ से हमें स्कूटी लेनी थी, कल उनके पास स्कूटी उपलब्ध नहीं थी, आज सुबह उन्होंने बुलाया था| सुबह उठकर हम पैदल ही मातृमंदिर की ओर चल दिए, मौसम आच्छा था, चलने में मजा आ रहा था, 'हरिवंश राय बच्चन के मामा रोज़ सुबह उठकर, अपने घर से सात किलोमीटर दूर' गंगा नहाने जाते थे', मैंने दिव्या से कहा| "हमारा भी आज आठ किलोमीटर तो हो ही जाएगा, मातृमंदिर यहाँ से 7.5 किलोमीटर बता रहा है", मोबाइल देखते हुए दिव्या ने कहा| 'बाइक वाले का एड्रेस डाल कर देखो, मेरे ख्याल से उसका पहले आएगा, अमोल स्वामी ने बताया था कि SBI बैंक वाले चौराहे के पास है|', मैंने दिव्या से कहा| 
एक किलोमीटर चलने के बाद हमने एक जगह रुककर नारियल पानी पिया, 30 रूपये का एक नारियल| सोमनाथ में नारियल बहुत सस्ता है, 5-15 रूपये के बीच आपको कैसा भी नारियल मिल जाता है| "ये देखो मदर्स-ग्रेस", मेरा ध्यान आकर्षित करते हुए दिव्या बोली| 'मुझे लगता है, ये वही हैं जिनसे हमने तीन साल पहले बात की थी' (मेहसाणा आश्रम में रहते हुए हमने एक बार पोंदिच्चेरी में शिफ्ट होने की सोची थी, तभी Mother's Grace वालों से बात की थी)| 'चलो लौटते समय इसकी एक फोटो खींच कर संजय स्वामी को भेज देंगे, उन्होंने ही यहाँ के बारे में बताया था', आगे बढ़ते हुए मैंने दिव्या से कहा| 
"अगर बाइक वाले के पास आज भी बाइक नहीं हुआ तो?" चलते हुए दिव्या ने चिंता जतलाई| 'किसी और के यहाँ देखेंगे, अगर एक 150 में दे रहा रहा है, तो वहां और भी ऐसे होंगे जो इतने का दे देंगे', मैंने कहा| "ऐसा कैसे है कि बाहर 350/- में एक दिन के लिए दे रहा है, और अन्दर औरोविल में सिर्फ 150/- में, हैरानी की बात है|" सिर खुजाते हुए दिव्या बोली| 'ये देखो SBI वाला चौराहा तो आ गया, बाइक वाला यहीं कहीं आस-पास होगा', नज़रे घुमाते हुए मैंने कहा| "यहाँ कैसे होगा, औरोविल यहाँ से 6 किलोमीटर बता रहा है|" मोबाइल देखते हुए दिव्या बोली| 'अमोल स्वामी ने कहा था बाइक वाला मातृमंदिर मंदिर से पहले है, 6 किलोमीटर मंदिर का बता रहा है, तुम 'कुमार बाइक' या फिर 'न्यू क्रिएशन' डाल कर देखो, या फिर सीधा उनको फोन करो|', मैंने कहा| दिव्या मोबाइल में पता डाल कर देखने लगी| "अरे हाँ यहीं आस-पास बता रहा है...", चहकते हुए बोली, "मुझे तो लगा पूरा आठ किलोमीटर चल के जाना होगा|"
"पुणे में बारिश हो रही थी?", बाइक वाले ने हमसे पुछा| 
मुख्य सड़क से थोड़ा हटकर जंगल में 'कुमार बाइक' वालों का अड्डा है| 
"हाँ वहां बारिश हो रही थी", दिव्या ने बाइक वाले से कहा| 
"दस साल से यहाँ का मौसम दिन-ब-दिन बिगड़ता ही जा रहा है, इस बार बहुत कम बारिश हुई है|"
"प्रदूष्ण की वजह से सब जगह मौसम में हेर-फेर हो रहा है", एक लेडी सटाफ जो हमारे बगल में खड़ी थी, अपने छोटे बालों में हाथ फेरते हुए बोली| 
'बाइक मिलने में समय लगेगा?', मैंने काउंटर पर बैठे तिलकधारी से पूछा| 
"हमारा सब बाइक बुक है, बगल से मंगा कर आपको दे रहे हैं, थोड़ी देर में लड़का आ जाएगा |" उसने जवाब दिया| 
थोड़ी देर बाद ब्लू टी-शर्ट में एक लड़का स्कूटी पर बैठ कर आया| 
'एक दिन का कितना किराया लेते हो?' मैंने लड़के से पुछा| 
"300/- एक दिन का", लड़के ने जवाब दिया| 
'लेकिन मेरी बात उनसे 150 की हुई है'
"150 में पुरानी स्कूटी मिलती है, यह नई है"
मैंने स्कूटी को गौर से देखा, नई थी| 
"पुरानी कहीं भी ख़राब हो जाती है, आप ये ले जाओ, प्रॉब्लम नहीं होएंगा"
"हमें लम्बा रुकना है, 300/- मंहगा पड़ेगा'', दिव्या बोली| 
तभी मैरून रोब में एक विदेशी लड़की स्कूटी पर बैठ कर आई, 'पूछो तो यह ओशो सन्यासी है क्या', मैंने दिव्या से कहा| वह उस विदेशी लड़की से बात करने चली गई| 'दो सौ में डन करो..', मैंने लड़के से कहा| "नहीं सअ'र 250 लास्ट|" थोड़ी देर विदेशी लड़की से बात करने के बाद दिव्या 'कुमार बाइक' वाले से बात करने ऑफिस में चली गई| 
"वो ओशो सन्यासी नहीं है, उसके किसी दोस्त ने उसे ये रोब दे दिया है, वे कह रही थी, हमें इन्फॉर्मेशन सेंटर जाना होगा, वहीं से यहाँ के बारे में पता चलेगा|'', दिव्या बोली| 
'वो सब ठीक है, बाइक वाले से क्या बात करके आई हो?'
" वे कह रहे हैं, दोपहर तक उनके पास बाइक आ जाएगी, अगर ये दो सौ तक नहीं देता है, तो रहने दो, हम दोपहर में ले लेंगे, अभी पैदल ही चलते हैं|" 
जैसे हम जाने को हुए वह दो सौ में बाइक देने को राज़ी हो गया| "अगर पुलिस रोकती है, तो tell him कि दोस्त की बाइक है, डोंट से की किराये पर ली है|", चाभी देते हुए लड़के ने मुझसे कहा| मैंने गाडी का नंबर प्लेट देखा वह पीला नहीं था| 


21-Aug-2019
जहाँ से स्कूटी लिया वहाँ से लेकर मातृमंदिर तक का सफ़र बहुत ही सुहाना था, छोटे-छोटे घरों और बड़े-बड़े पेड़ों से सड़क का दोनों किनारे सजे हुए थे। कोरेगाँव पार्क (पुणे) के पेड़ बहुत ही पुराने और सघन थे, उनकी वजह से रोड पर अँधेरा छाया रहता था। यहाँ के पेड़ उतने पुराने तो नहीं थे, लेकिन सुंदर और ऊँचे थे। 
इन्फ़र्मेशन सेंटर के बाहर स्कूटी पार्क करने का 10 रुपया चार्ज था। पैसा अदा कर मैंने एक पेड़ के नीचे गाड़ी खड़ी कर दी। सामने रेहड़ी पर एक दक्षिण भारतीय दंपत्ति चाय, कॉफ़ी और इडली बेच रहे थे। उसी के पास लगे यंत्र से एक आदमी अपने बोतल में पानी भर रहा था। हम जिस रोड पर चल रहे थे उसके लेफ़्ट में कुछ ऑटो वाले खड़े थे, जो जाते हुए लोगों से ‘मातृमंदिर-मातृमंदिर’ पूछ रहे थे। वहीं सामने लगे बोर्ड पर लिखा था, ‘मातृमंदिर यहाँ से एक किलोमीटर है, आपको चल कर जाना है, रास्ता शेडी(छायादार) है..! लौटते समय फ़्री बस सेवा है।’ 
कोई 100 मीटर चलने के बाद ‘सूचना भवन’ आ गया। बोर्ड पर लिखा था ‘कृपया चप्पल पहन कर अंदर आए।’
भवन में घुसते ही लेफ़्ट में एक किताब रूम था, उसी से लगा हुआ एक बड़ा हॉल था। हॉल के दीवारों पर बड़े-बड़े बैनर लगे थे, जिन पर अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, तमिल और हिंदी में औरोविल सिटी और मातृमंदिर के बारे में जानकारी दी हुई थी। हॉल के दूसरे कोने से लगे एक रूम में विडीओ चल रहा था। 10 मिनट का एक विडीओ बार-बार रिपीट हो रहा था। विडीओ में बताया जा रहा था कैसे मातृमंदिर बनकर तैयार हुआ था। 
हॉल से बाहर निकलने पर एक पेड़ के नीचे नीले शर्ट में बैठा एक व्यक्ति लगों को मातृमंदिर के लिए फ़्री पास दे रहा था। उसके पीछे एक कैफ़े था जिसमें 30 रुपए में पूरी और 15 रुपए में आधी चाय मिल रही थी। 
हमें जो पास मिला उसपर लिखा था, “निःशुल्क पास (अनुमति पत्र) उपलब्ध है। मातृमंदिर के बाह्य दर्शन के लिए पास दिए जाते हैं। सोमवार से शनिवार सुबह ९:०० से दोपहर ४:३०। रविवार केवल सुबह ९:०० से १:००। निजी/किराये पर वाहन की अनुमति नहीं है। वापसी यात्रा के लिए मुफत शटल बस है। (रविवार दोपहर को मातृमंदिर बंद रहता है।)
वहाँ से मातृमंदिर की अच्छी झलक मिलती है। अद्दान में शोर न करें, सफ़ाई का ध्यान रखें एवं अनुशासन बनाए रखें। पिकनिक मना है। नशीले पदार्थों तथा शराब के नशे में लोग अंदर प्रवेश न करें। कृपया ड्यूटी पर लगे लोगों की बात माने। धन्यवाद । 
मातृमंदिर आपके नीजी सामान की ज़िम्मेवारी नहीं लेती है। 
तारीख़- 20-Aug 2019. दर्शकों की संख्या- 2
पास लेने के बाद हम मंदिर की ओर चल दिए...।

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