22-Aug-2019
23-Aug-2019
पुदुच्चेरी आने के बाद से हमने एक नया शौक पाला है, रात को फ़िल्म देखने का| पहले दिन 'आनंद' देखा, दुसरे दिन 'शौक़ीन' और तीसरे दिन 'बरेली की बर्फी'| कल रात कुछ भी नहीं देखा| आनंद मैंने पहले भी कई बार देखी थी, पुरानी फिल्मों में 'गोलमाल, पड़ोसन, चश्मेबद्दूर' चलती का नाम गाड़ी, प्यासा, और अंगूर कुछ ऐसी फ़िल्में हैं, जिन्हें में एक अन्तराल के बाद देखता रहता हूँ| दिव्या को पुरानी फिल्मे देखना पसंद नहीं है, फिल्म चलाने से पहले मुझे फिल्म के बारे में पहले दस मिनट एक्सप्लेन करना पड़ता है, तब जाकर वो राज़ी होती है|
परसों रात 'बरेली की बर्फी' देखते-देखते सोने में देर हो गई| 11 बजे हम सोने के लिए गए| परिणामतः सुबह उठने में भी लेट हो गया| जल्दी-जल्दी तैयार होकर हम, मातृमन्दिर के अन्दर जाने का 'पास' लेने के लिए, ओरोविल की ओर भागे| रास्ते में एक दिव्यांग व्यक्ति की रेहड़ी से नारियल पानी पिया-एक नारियल का तीस रुपया| दिव्या ने पानी पीने के लिए प्लास्टिक का पाइप लिया, मैं ऐसे ही पी गया| धर्मेद्र स्वामी मरने से पहले मुझे बिना पाइप के नारियल से पानी पीना सिखा गए थे|
सूचना भवन तक पहुँचते-पहुँचते 11 बज गये| "सामने वाले भवन के पहले मंजिल पर जाओ, ध्यान के लिए पास वहीं से मिलेगा, जल्दी करो ऑफिस बंद होने वाला है", नीली शर्ट पहने स्टाफ ने कहा| तेज़ क़दमों से चलते हुए हम बुकिंग ऑफिस तक पहुंचे| "लो, ऑफिस बंद हो गया", दिव्या बोली| "अब दोपहर 2 बजे आओ'', प्रदर्शनी रूम के बाहर खड़े एक व्यक्ति ने हमने से कहा| बुकिंग ऑफिस सुबह 10 से 11 और दोपहर 2-3 खुलता है, मंगलवार बंद रहता है| "नीचे चलो 2 बजे तक हम यहीं वेट कर लेंगे", दिव्या बोली| 'चलो पहले अन्दर चलकर चित्रकला की प्रदर्शनी देख लेते हैं', हॉल की तरफ मुड़ते हुए मैंने कहा|
हॉल में 1-2-3 करके क्रम से श्री अरविन्द के वचनों के साथ पेंटिंग्स लगे हुए थे| दो-तीन पेंटिंग मुझे बहुत ही आकर्षक लगी| कोई दस मिनट तक चित्रों को निहारने के बाद हम नीचे कैफे के पास आ गए| पेड़ के नीचे पत्थर का एक बड़ा सा टेबल बना था, हम वहीं बैठ गए| "किताब लेकर आई होती, तो यहीं पढ़ लेती, अभी तीन घंटा है हमारे पास", दिव्या बोली| ‘चलो जहाँ से कल मद्रासी कॉफ़ी पिया था, वहीं से आज कैपेचिनो लेते हैं’ मैंने कहा।
गोल टेबल से उठ कर हम कैफे में आ गए हैं| कैफे के बाहर वाले एरिया में लगे छोटे पैरों वाले लाल चेयर पर मैं बैठ गया, दिव्या मेन्यू लेने अंदर चली गई| 'यहाँ के चेयर इतने आरामदायक नहीं हैं कि हम तीन घंटा तक बैठ सकें| इससे अच्छा तो घर चलो, वहीं से खाना आर्डर कर देंगे| खाने के बाद थोड़ी देर आराम करके फिर आ जाएँगे', मैंने दिव्या से कहा| “पार्किंग वाला फिर से 10 रूपये नहीं ले लेगा?, मेन्यू से सिर उठाते हुए दिव्या बोली| ‘यहाँ कॉफ़ी और समोसे का 300 रूपये देंगे, उससे तो अच्छा ही है’, मैंने कहा| “हाँ, ये तो है... चलो घर ही चलते हैं”, बैग उठाते हुए दिव्या बोली|
दोपहर में जब हम दुबारा आए, तो पार्किंग वाले ने हमसे पैसा नहीं लिया, “आप सुबह आए थे ना?”, पार्किंग वाले ने हम से पूछा| हमने हाँ में सिर हिलाया| “फिर दुबारा आपको पे करने की ज़रूरत नहीं है|” मैंने गर्दन मोड़ कर दिव्या को देखा, उसके चेहरे पर ख़ुशी थी|
2 बजने से 7 मिनट पहले हम बुकिंग ऑफिस के बाहर खड़े थे| थोड़ी देर बाद हमारे पीछे तीन-चार लोग और खड़े हो गए| ठीक दो बजे ऑफिस खुला| हमसे रूम के अन्दर आ कर एक बड़े टेबल से लगे हुए बेंच पर बैठने को कहा गया| थोड़ी देर बाद स्टाफ में से एक लेडी ने हमें एक कार्ड दिया, “इसे भरिये”| कार्ड का रंग पीला था| यह हमारा मातृमन्दिर के अन्दर जा कर ध्यान करने के पास था| अगले दिन सुबह 8:45 मिनट पर हमें विडियो हॉल में हाजिर होना था|
‘अब कहाँ चलना है’, गाड़ी स्टार्ट करते हुए मैंने पूछा| “अरविन्द आश्रम के पास ही एक फेमस मंदिर है ‘अरुलमिगु मनाकुला विनयागर टेम्पल’ वहीं चलो| वहीं से संग्रहालय चल लेंगे, फिर शाम में बीच पर चलेंगे”, स्कूटी पर बैठते हुए दिव्या बोली|
ओरोविल से निलकते समय रास्ते में एक गुलमोहर का बड़ा पेड़ आता है| पेड़ के नीचे की ज़मीन लाल फूलों से पटा रहता है| ओरोविल आते-जाते समय मैं उस पेड़ के नीचे थोड़ी देर ज़रूर रुकता हूँ| “शहर में बचपन बीतने की वजह से मैं पेड़ों के बहुत करीब नहीं आ पाई”, दिव्या गुलमोहर के नीचे मुझसे बोलने लगी“, शहर के बच्चे कुत्ते-बिल्लीयों के प्रेम से कभी आगे नहीं बढ़ पाते हैं|”
पेड़ से थोडा आगे एक सूखा तलाब है| तलाब में बस नाम मात्र पानी है, पूरा तलाब सूखा है, बस बीच में थोड़ा पानी है, जिसमे कमल के फूल खिले हुए हैं| उस तलाब के घाट पर बैठना भी मुझे अच्छा लगता है| उसी तलाब के पास एक आदमी जाल में बंद करके मुर्गी, तीतर, तर्की और बत्तख के जोड़े बेचता है| तलाब किनारे एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ है| पेड़ के नीचे एक बूढी औरत नारियल पानी बेचती है| पेड़ के पास ही कुत्ते के दो छोटे-छोटे बच्चे-एक काला और दूसरा ब्राउन, खेलते रहते हैं| थोडा और आगे आने पर दिव्यांग व्यक्ति का रेहड़ी है| इसी रेहड़ी से आज मैंने नारियल पानी पिया था| वहीं पास में एक बूढी औरत मछली बेचती हैं| अजनबी शहर में अब बहुत कुछ ऐसा है, जिससे पहचान हो गई है|
गूगल की मदद से हम मंदिर तक पहुँच गए| ‘जूस वाले से पूछो कि कितने का दे रहा है’, स्कूटी खड़ी करते हुए मैंने दिव्या से कहा|
23-Aug-2019
"२० रूपये का एक ग्लास बोल रहा है", जूस वाले के पास से पलटते हुए दिव्या बोली| 'उसे बोलो कि दो ग्लास बनाए', स्कूटी का हैंडल लॉक करते हुए मैंने पूछा| "मैं नहीं पियूंगी", बैग से ताम्बे वाला बोतल निकाल कर पानी पीते हुए दिव्या बोली| 'तुम क्यों नहीं पीओगी?', जूस वाले के पास पहुँचते हुए मैंने पुछा| "मैं कुछ और ले लुंगी, तुम जूस पी लो", बोतल का ढक्कन बंद करते हुए बोली|
'एक ग्लास जूस बनाना, चीनी, नमक और बर्फ कुछ भी मत डालना', मैंने जूस वाले से कहा| उसके रेहड़ी पर करीब दस किलो मौसमी थे| उसने चाकू से चार-पांच मौसमी को बीचो-बीच काट कर दो भागों में बाँट दिया| 'छिलने के बजाय ये गोल-गोल क्यों काट रहा है मौसमी को?', आँखे बड़ी करते हुए मैंने दिव्या से पूछा| "इसका जूस बनाने वाला भी तो देखो कुछ अलग हैं", मेरी तरह वह भी आश्चर्य में डूबी हुई थी| उसका जूस बनाने का मशीन लट्टू के जैसा था, बीच से दो भागों में बंट जाता था| नीचे का भाग मंदिर की तरह उठा हुआ था, और ऊपर का भाग गुम्बंद की तरह खोखला था| नीचे वाले भाग पर उसने मौसमी के कटे हुए टुकड़े पर रखा, फिर हैण्डल घुमा कर ऊपर वाले भाग को नीचे ले आया| एक बार में पूरे फांक का रस दब कर निकल गया| एक मिनट से भी कम समय में सारे फांकों से रस निकाल कर उसने एक ग्लास जूस मुझे पकड़ा दिया| "वाह! क्या सही तरीका है, हमारे यहाँ जैसे जूस निकालते हैं, उससे तो यही सही है", आश्चर्य से खुश होते हुए दिव्या बोली|
जूस पीने के बाद रोड पार करके हम मंदिर वाले रोड पर आ गए, "अरे...! देखो हाथी है", रोड पर एक फीट कूदते हुए दिव्या बोली| 'अंधी यही तो मैं तुमको रोड पार करते हुए कह रहा था, ध्यान कहाँ था तुम्हारा', हाथी की मौजूदगी को हल्के में लेते हुए मैंने कहा| हालाँकि हाथी देखकर मैं भी उसके इतना ही उत्साहित था| लेकिन हमारे बीच एक शीत युद्ध चलता रहता है| जिस चीज़ को लेकर वह उत्साहित होती है, उसके प्रति मैं उदासीन हो जाता हूँ, जो मुझे पसंद होता है, उसके प्रति उसका रवैया तीखा हो जाता है| तथ्य यह है की हम दोनों की पसंद-नापसंद कुछ एक अपवादों को छोड़ कर करीब-करीब एक जैसी है|
मंदिर के गेट के बाहर एक छोटे से घेरे में हाथी को रखा गया था| घेरे के अन्दर हाथी की सुविधा के लिए मिट्टी डाला हुआ था| हाथी की उम्र बहुत कम थी| उसके पूरे शरीर पर कलाकारी की हुई थी| आगे के दोनों पैरों में पायल पहनाया हुआ था| गौर से देखने पर पता चला यह हाथी नहीं हथनी है| गले में उसके नाम का बोर्ड लटका हुआ था 'लक्ष्मी'| आते-जाते श्रद्धालु उसके सूंढ़ पर पैसा, केला और प्रसाद रख देते थे, भेट पाने के बाद वह सूंढ़ मोड़ कर लोगों को आशीर्वाद देती थी| फिर अगर केला या खाने की कोई चीज़ हो तो खा लेती थी, पैसा होने पर अपने मालिक को दे देती थी| उसका मालिक वहीं उसके पैरों के पास मुंडेर पर बैठा था| एक आदमी वहीं तेल वाले कंटेनर में कुछ लेकर कर आया था, उसका बड़ा-बड़ा गोला बना कर हाथी के मुंह में डाल रहा था| "ये लोग क्या खिला रहे हैं, उसको?", दिव्या मुझसे पूछी| 'पता नहीं क्या खिला रहे हैं, लगता है आटा में केला मिला कर खिला रहे हैं', अंदाज़े से मैंने कहा| "मैं उसको पैसा देने जाती हूँ, तुम मेरी विडियो बनाओ", उसके चेहरे पर छोटे बच्चों जैसी चमक थी, और मेरे चेहरे पर बाप जैसी कठोरता| 'फिर शुरू हो गया तुम्हारा बोकलोली, विडियो बनाने की क्या जरूरत है, मैं देख रहा हूँ तुम्हारा मोबाइल एडिक्शन बढ़ता जा रहा है', कहते हुए मैंने उसे अपने जेब से पांच रूपये का सिक्का दिया| "पांच रुपया नहीं दस का नोट दो", पांच रुपया मेरे जेब में वापिस रखते हुए बोली, उससे पहले मैंने क्या बोला था उस पर उसने कान नहीं दिया| उस बात पर उसे बाद में लड़ाई करनी थी, अभी किसी भी सूरत में विडियो बनानी थी| कोई आम मौका होता तो, मुझे दस सुना चुकी होती-मेरा मोबाइल एडिक्शन बढ़ रहा है, तो तुम्हारा कौन से मीठे का एडिक्शन कम हो रहा है, दस-दस रसगुल्ला खाते समय नहीं सोचते हो|
हाथी के साथ दिव्या का विडियो बनाने के बाद हम मंदिर के अन्दर गए| अंदर लगे बोर्ड से पता चला कि यह मंदिर अरविन्द आश्रम के सहयोग से बना है| मंदिर में लगी मूर्तियों के सामने दक्षिण भारतीय श्रद्धालु| अलग-अलग तरीके से नाक-कान पकड़ कर मूर्ति को प्रणाम कर रहे थे| मंदिर साफ़-सुथरा और काफी फैलाव वाला था| प्रांगण में कुछ लोग आँखे बंद किए ढोंग-धतूरे में लीन थे|
मंदिर से निकल कर हम ‘बीच’ की तरफ जाने लगे| रास्ते में एक जगह HDFC का एटीएम देखकर मैंने स्कूटी रोकी| ‘चार हज़ार रूपये निकाल लो’, एटीएम कार्ड देते हुए मैंने दिव्या से कहा| कार्ड लेकर वह एटीएम के अंदर पैसा निकलने के लिए चली गई| “पैसा फंस गया”, थोड़ी देर बाद एटीएम से बाहर निकल कर बोली| मैंने जेब से मोबाइल निकाल कर देखा था| बैंक से 4000 निकालने का मेसेज आया था| ‘रुको में आता हूँ’, कहकर मैं गाड़ी खड़ी करने के लिए रोड के उस तरफ गया| जबतक मैं गाडी खड़ी करके के एटीएम पर आया, बैंक से दूसरा मेसेज आ गया, चार हज़ार अकाउंट में वापिस आ गए थे| ‘चलो बच गए, पैसा कहीं और से निकाल लेंगे’, एटीएम पर खड़ी दिव्या से मैंने कहा|
एटीएम से निकल कर हम ‘बीच’ पर आ गए है| थोड़ी देर बीच पर बैठने के बाद मैंने कहा, ‘रात में लेट खाने से अच्छा से चलो अभी ही कुछ खा लेते हैं, अगर तुम कहो तो पहले दिन रेलवे स्टेशन के पास जहाँ से इडली खाया था, उसी के यहाँ चलते हैं| सही खिलाता है वह|’ दिव्या खाने के नाम पर राजी हो गई| खाने के लिए इसे कभी भी राजी किया जा सकता है| “रेलवे स्टेशन यहाँ से पास ही है’’, उठते हुए बोली| ‘हाँ उस दिन चर्च के पास से मैंने ट्रेन खड़ी देखी थी’, मैंने कहा| ‘हें’अ’, बोलकर वह मेरे साथ रोड पार करने लगी|
इडली वाले के यहाँ जब हम पहुंचे तो पता चला कि वहां कुछ काम चल रहा है| एक घंटा समय लगेगा| “चलो फिर बीच पर ही कुछ देर बैठ लेते हैं| शाम ढलने के बाद रूम पर चल चलेंगे|”, निराश होते हुए दिव्या बोली| ‘हाँ चलो गाडी में पेट्रोल भी डलवाना है’, हेलमेट पहनते हुए मैं बोला| “ये हेलमेट क्यों लगा लेते हो तुम, कोई तो लगता नहीं, पुलिस ऐसे ही सब जगह घूमती रहती है| तुम्हारी हेलमेट की वजह से ही पुलिस ने उस दिन हमें रोक कर चेक किया था”, गाडी पर बैठते हुए दिव्या बोली| मैं भी सोचना लगा कि यहाँ हेलमेट के मामले में लोग इतने ढीले क्यों है| एक परसेंट लोग भी हेलमेट नहीं लागते हैं|
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