8-Aug 2019
मेरे एक परिचित को जब पता चला कि मैं बिहार संपर्क क्रांति से दिल्ली जा रहा हूँ, तो वे सिवान स्टेशन पर मुझसे मिलने आ गए। सिवान में ट्रेन सिर्फ़ पाँच मिनट के लिए रूकती है। स्टेशन पर वो अपनी पत्नी और नवजात पुत्र के साथ मुझसे मिलने आए थे।
1 बजे के क़रीब जब उन्होंने मुझसे फ़ोन करके स्टेशन पर मिलने आने की बात कही, तो मैं थोड़ा थॉटफ़ुल हो गया था। मुझे इस बात का अंदेशा था कि वो अपने बच्चे के साथ मिलने आ सकते हैं। हमारे यहाँ ऐसी रवायत है कि जब आप पहली बार बच्चे को देखते हैं तो उसे कुछ उपहार देते हैं। इतने शॉर्ट नोटिस पे, चलती ट्रेन में मेरे पास उनके बच्चे को देने के लिए कुछ भी नहीं था। दिव्या से जब मैंने अपनी चिंता व्यक्त की तो उसने प्रतीक के रूप में कुछ पैसे दे देने का विकल्प सुझाया। कोई और उपाय न देखते हुए मैं मन मार कर राज़ी हो गया।
2 बज कर तीस मिनट पर ट्रेन सिवान पहुँची। गाड़ी रूकने से पहले हम गेट पर आकर खड़े हो गये थे। जैसे ही मेरी नज़र मुलाक़ाती मित्र पर पड़ी हाथ हिलाते हुए मैंने उन्हें आवाज़ दी, ‘लक्ष्मण जी, यहाँ हूँ मैं’। लक्ष्मण जी एक टी स्टाल के सामने खड़े थे। उनके साथ उनकी धर्म पत्नी गोद में बच्चे को संभाले खड़ी थी। मेरी आवाज़ सुनते ही उनकी खोजती नज़र मुझ तक पहुँच गई। ट्रेन के रुकते ही मैं झट से नीचे उतरा और उनकी तरफ़ लपका। ‘पाँच मिनट मिलने के लिए इतनी ज़हमत क्यूँ ली आपने।’, गले मिलते हुए मैंने उनसे कहा। “मैंने भी साक्षी से यही कहा था, लेकिन यह आप दोनों को शिवम् से मिलवाना चाह रही थी। छठिहार पर आप दोनों नहीं आए इस बात की नाराज़गी भी ज़ाहिर करनी थी, आप दोनों से मिलकर।”, साक्षी भाभी की गोद से बच्चे को लेकर मेरी गोद में देते हुए लक्ष्मण जी बोले। शिशु हमारी बातचीत से बेख़बर हो चैन की नींद सो रहा था। “हम उस वक़्त सिक्किम में थे, इसी लिए नहीं आ पाए। अगर गाँव में होते तो अवश्य आते।”, दिव्या साक्षी भाभी को सफ़ाई देते हुए कह रही थी। साक्षी जी का प्रेगनेंसी के बाद वज़न काफ़ी बढ़ गया था। बच्चे को गोद में उठाते हुए मुँझे थोड़ा डर भी लग रहा रहा था- कहीं पेशाब तो नहीं कर देगा यह। फिर याद आया आजकल माँ-बाप अपने बच्चे को डायपर पहना कर रखते हैं।
हम ठीक से मिल भी नहीं पाए थे कि ट्रेन ने सिटी दे दी। “शाम को जल्दी खाना खा लिया कीजिये, ७ बजे से पहले, और सुबह ११ बजे तक उपवास कर लीजिए। १५ दिन में वज़न कम हो जाएगा। अगर शुरू में आप कुछ दिन एनिमा ले लेती हैं, तो प्रॉसेस और फ़ास्ट हो जाएगा। एनिमा से शरीर भी शुद्ध हो जाएगा।बड़ी आँत की सफ़ाई हो जाएगी”, दिव्या साक्षी जी को ज्ञान दे रहे थी। मैंने उसे ट्रेन में चलने के लिए हिलाया। भाभी जी ने झट से अपने हाथ का थैला हमारी ओर बढ़ाया, “गैस ही ख़तम हो गया था, कुछ भी ठीक से बना नहीं पाई। मकान मालिक के गैस पर थोड़ा चावल फ्राई आप लोगों के लिए बना कर ले आई हूँ। डिनर में खा लीजिएगा।”, साक्षी जी अफ़सोस जताते हुए बोलीं। हाथ में थैला लेते हुए दिव्या ने बच्चे को पैसा देने के लिए मुझे कोहनी मारी। मैंने झट से पैसा निकाला और बच्चे के हाथ में पकड़ाते हुए बोला, ‘इसे आशीर्वाद के रूप में रख लीजिए। अभी और तो कुछ दे नहीं सकता था। जल्द ही सितम्बर में आप लोगों से मिलने आऊँगा।’, ट्रेन की ओर बढ़ते हुए मैंने कहा। “अरे इसकी क्या ज़रूर है, बस आशीर्वाद दीजिए।”, बच्चे के हाथ से पैसा लेकर मुझे वापिस देते हुए लक्ष्मण जी बोले। साक्षी जी भी उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगीं, "अगर हमें पता होता आप फ़ोरमलिटी करेंगे तो बच्चे को लेकर आते ही नहीं।” हम ट्रेन में आधा घुस चुके थे। ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी। “आपको मेरी कसम है, आप प्लीज़ ये रख लीजिए।” कहते हुए लक्ष्मण जी ने पैसा मेरी जेब में ठूँस दिया। दिव्या और हम ने काफ़ी इसरार किया, लेकिन उन्होंने एक न सुनी। पैसा नहीं लिया।
डिब्बे में आकर मैं अपनी सीट पर आकर बैठ गया । दिव्या खिड़की के पास जाकर हाथ हिला कर उन्हें विदाई देने लगी। मैं काफ़ी दूखी और अपमानित महसूस कर रहा था। “लोग उपहार स्वीकार करने की महत्ता को नहीं समझते हैं, उन्हें माफ कर दो।”, मेरे मन को पढ़ते हुए दिव्या ने कहा।
अहंकार देने में तो सुख लेता है, लेकिन किसी से कुछ लेना नहीं चाहता है। अगर आपको किसी को कुछ देने में या किसी के लिए कुछ करने में सुख मिलता है। तो, आप यह सुख दूसरों को भी लेने दीजिए। लेकिन अहंकारी व्यक्ति ऐसा नहीं चाहता है, वह दूसरों के लिए तो कुछ करना चाहता है, इससे उसके अहंकार को तृप्ति मिलती है, लेकिन वह दूसरों को अपने लिए कुछ भी नहीं करने देना चाहता है।
दिव्या लक्ष्मण जी के द्वारा दिए थैले को खोल कर देखने लगी। “इसमें तुम्हारा फ़ेवरेट खजूर का पैकेट भी है। अरे... इसमें लिटल हार्ट भी है।” दिव्या चहकते हुए बोली। मैं उदासीन था। थैले की तरफ़ देखने का भी मन नहीं कर रहा था। हठात् मुझे दूर डब्बे में एक विप्र आता हुआ दिखा। मेरे चेहरे पर चमक आ गई। जैसे ही विप्र मेरे नज़दीक आया, मैंने दिव्या के हाथ से थैला लेकर विप्र के हाथों में थमाते हुए बोला, “आपके खाने के लिए”। हतप्रभ विप्र ने थैले को खोल कर देखा। उसकी आँखे ख़ुशी से चमकने लगी। उसने झुककर मुझे धन्यवाद दिया। जब वह जाने लगा तो दिव्या मुझसे बोली,”तुम कुछ भूल रहे हो, उन्होंने तुम्हारा उपहार क़बूल किया है, उन्हें दक्षिणा कौन देगा?” मुझे जैसे होश आया। मैं झट से अपनी सीट से उठा, और आवाज़ देखर साधूपुरुष को रोका, “आप चाहते तो मेरा उपहार लेने से मना भी कर सकते थे, लेकिन आपने सहृदय क़बूल किया, ये दक्षिणा मेरी ओर से ग्रहण कर लीजिए। मैं अनुगृहीत हूँ।”, कहते हुए मैंने अपने पर्स से ५१/- रुपये निकाल कर उन्हें दिया। वे विस्मय से मेरी ओर देखते लगे।
सीट पर आकर मैंने राहत की साँस ली। अब दुःख की जगह मेरे हृदय में इस सज्जन पुरुष के लिए अपार प्रेम और अहोभाव था। लक्ष्मण जी के प्रति भी मेरे हृदय में अब कोई रोष नहीं था।

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