Saturday, 24 August 2019

गुलाब पर प्रभाकर की पहली किरण


सुबह उठकर 8:45 पैतालीस से पहले हमें विडियो रूम में पहुंचना था| इसीलिए बिना समय गवाएँ हम रात जल्दी सो गए| हम उत्साहित थे, गोल मंदिर के अन्दर जाना पोंडिचेरी का सबसे बड़ा आकर्षण था| जब भी गूगल में पोंडिचेरी या ओरोविल डालता था, सबसे पहले 'गोल मंदिर(मातृमंदिर) दिखता था| हमारे मेहसाना आश्रम निवास के दौरान संजय स्वामी जब पहली बार आश्रम में आए थे, तो वे हमसे जोरबा (आश्रम का टी-शॉप) पर ओरोविल की बहुत सी बातें किया करते थे| वे ओरोविल में 13 साल रहे थे| उन्ही से ओरोविल के बारे में सुन-सुन कर हमारे अन्दर यहाँ आने की वासना पैदा हुई थी| हाल-फ़िलहाल में मेरे एक जर्मन मित्र ने जब मुझसे जर्मनी छोड़ कर ओरोविल में आकर बसने की बात की, तब ओरोविल में मेरी उत्सुकता और बढ़ गई| एक मास्टर उगवे को छोड़ कर सबसे मैंने अब तक पोंडिचेरी के बारे में सकारात्मक बातें ही सुनी थी| अमोल  स्वामी से जब मेरी बात हुई तब उन्होंने भी ओरोविल के लिए काफी प्रेरित किया, साधना फारेस्ट में ठहरने पर भी उनका काफी जोर था| मानसून फेस्टिवल के दौरान पुणे में माँ मुक्ति से हमारी बात हुई तो उन्होंने भी पोंडिचेरी को काफी सराहा| हम 18 अगस्त को पोंडिचेरी पहुँच गए थे, चार दिन हमें मातृमन्दिर के अन्दर जाने का पास लेने में लग गया| सुबह ध्यान में नींद न आए इस लिए हम दस बजे से पहले ही, बिना कोई फिल्म देखे, सोने चले गए|
नींद में किसी के गेट पीटने की आवाज़ सुनाई दी, टाल कर मैं सो गया| एक मिनट बाद फिर से आवाज़ आई, अब दिव्या भी जाग गई| मुझे लगा सुबह हो गई है, रूम सर्विस वाला आया होगा| घड़ी में समय देखा था, तो सुबह के 3 बज रहे थे| इतनी सुबह कौन गेट पीट रहा है? मैंने ख़ुद से सवाल किया| रूम से निकल कर हॉल में आया| गेट में शीशा लगा है, लेकिन बाहर की लाईट बंद होने की वजह से मैं किसी को भी देख नहीं सकता था| थोड़ा संशय के साथ मैंने गेट खोला| लुंगी लपेटे दो अधेड़ उम्र के पुरुष खड़े थे| एक के मुंह से शराब की गंध आ रही थी| मुझे थोड़ा डर लगा| हम जिस बिल्डिंग में रह रहे हैं, वह है तो मुख्य सड़क के पास ही लेकिन थोड़ा सुनसान जैसा है| नीचे रिसेप्शन पर भी कोई नहीं रहता है| अपने बगल और नीचे वाले फ्लैटों में भी हमने अभी तक किसी को रहते नहीं देखा है| छत पर जिम है, जिसके लिए कई लड़कों को हमने ऊपर नीचे आते-जाते देखा है| रूम सर्विस के लिए चार बार कॉल करने पर एक बार दो लड़के आते हैं| वो भी तमिल में क्या बोलकर चले जाते हैं, हमें कुछ समझ में नहीं आता है| “आपने अपना आईडी कार्ड दिया है”, टूटी-फूटी अंग्रेजी में एक ने मुझसे पूछा| मैं अभी भी आधी नींद में था, दिमाग पूरी तरह से काम नहीं कर रहा था| ‘हाँ लड़के ने हमारे कार्ड का फोटों खींच कर ले गया था’, दिमाग पर जोर डालते हुए मैंने कहा| “ये लड़की यहाँ रह रही है?”, अपनी मोबाइल में एक फोटो दिखाते हुए उन्होंने मुझसे पुछा| फोटो वाली लड़की को मैं नहीं जानता था, उसका मुंह लम्बा था और बालों में फूलों का गजरा लगा हुआ था| ‘इस लड़की को मैं नहीं जानता’, मुझे अब थोड़ा गुस्सा आने लगा था| “क्या आप अपना आईडी कार्ड दिखा सकते हैं”, एक ने निवेदन करते हुए मुझसे कहा| उनके बातचीत के ढंग से मुझे लगा शायद ये गुंडे, ठग या बदमाश हैं| “यह लड़की गायब हो गई है, FIR दर्ज हुआ है”, इसीलिए हम जांचपड़ताल कर रहे हैं| अब मैंने थोड़ी राहत की सांस ली-पुलिस हैं| गेट बंद करके मैं अंदर ID कार्ड लेने आया| जब मैं कार्ड लेकर आया दिव्या भी मेरे साथ आ गई| उन्होंने हमारे कार्ड को देखा और फिर हमसे मांफी मांगने लगे, “सा’अरी हमने आपकी नींद ख़राब की|” इससे पहले कि मैं उनसे कुछ कहता “कोई बात नहीं” बोल कर दिव्या ने गेट बंद कर दिया|

रूम में आने के बाद दिव्या इस घटना के बारे में बात करना चाहती थी, वह थोड़ी डरी हुई भी थी| लेकिन कुछ भी बोल कर मैं नींद ख़राब नहीं करना चाहता था| सिर ढक कर मैं सो गया| सिर ढकते समय माधोपुर आश्रम में वकील साहब की कही एक बात मुझे याद आ गई, “किस-किस को याद करें, किस-किस को रोइए, आराम बड़ी चीज़ है, सिर ढक कर सोइये”, वाह...वकील साहब वाह...!
सुबह उठने के बाद रात के बारे में बिना कोई डिस्कशन किए, हम तैयार होकर मातृमन्दिर की ओर भागे| रास्ते में एक जगह मैं नारियल पानी पीना चाहता था, लेकिन दिव्या ने समय कम है कह कर टाल दिया| हालाँकि 8:15 पर हमने घर छोड़ दिया था, 8:30 तक हम ‘विडियो’ रूम तक पहुँच जाने वाले थे| हमारे हाथ में पन्द्रह मिनट फिर भी थे, मेरे ख्याल से नारियल पानी पीने के लिए इतना समय पर्याप्त होता है| खैर, मेरे पिता जी कहते हैं, ‘स्त्री, शराबी, पागल और नाबालिग से कभी भी किसी बात पर बहस नहीं करनी चाहिए| पिताजी के नसीहतों का पालन करते हुए, मैंने दिव्या से बहस नहीं की| अपने पसंदीदा गुलमोहर पास भी मेरा मन रुकने का था, लेकिन मैं गाड़ी भागता रहा|
ठीक आठ बजकर तीस मिनट पर हम विडियो रूम के बाहर खड़े थे| हमारे अलावा दस-बारह लोग और खड़े थे| दो लोगो को छोड़ कर सभी भारतीय थे, ज्यादातर बुजुर्ग थे, और जो नहीं थे वे दिख रहे थे| थोड़ी देर बाद एक भारतीय लड़की जिसकी उम्र कोई बीस साल होगी, एक विदेशी लड़की के साथ आई| विदेशी की उम्र तीस से ज्यादा लग रही थी| भारतीय बाला उसे ध्यान और समाधि के बारे में समझा रही थी| नए लोगों को, गेट के बाहर खड़ा स्टाफ पेड़ के नीचे बने पत्थर के बैंचों पर बैठ कर इंतजार करने को कह रहा था|
9 बजने के कुछ मिनट पहले हमें विडियो रूम में ले जाया गया| रूम किसी छोटे सिनेमा घर जैसा था| बैठने के लिए सीमेंट की सीढ़ी बनी हुई थी, जिसपर कुश (या कुश जैसी किसी दूसरे घास की) चटाई बिछी हुई थी| सामने एक छोटा पर्दा लगा हुआ था, जिस पर प्रोजेक्टर की रौशनी पड़ रही थी| थोड़ी देर बाद जब सारे लोग अन्दर आ गए तो सभी गेट और लाईट बंद कर दिये गये| लाईट बंद होने से पहले मैंने अपनी पंक्ति में बैठे लोगों की संख्या को गिना था | एक लाइन में 12 लोग बैठे थे| मतलब हॉल में कुल 60 लोग थे|
माता जी (श्री अरविन्द की अध्यात्म संगनी) की आवाज़ से साथ विडियो शुरू हुआ| फिर मेल वाईस-ओवर के साथ विडियो शुरू हुआ| विडियो में कोई ख़ास जानकारी नहीं थी| जितनी बातें विडियो में बाताई गई, वो सब दो दिन पहले सूचना भवन से हमें पता चल गई थी| फिर भी विडियो प्रभावशाली था, बैकग्राउंड संगीत, आवाज़ के संग चलने वाला क्लिप मन पर अच्छा प्रभाव छोड़ रहा था| विडियो ख़त्म होने के बाद हमें बस तक ले जाया गया| बस में बैठते समय मैंने नोटिस किया कि अन्दर बैठे 60 फीसदी से ज्यादा लोग उत्तर भारतीय हैं, हमारे आगे वाली सीट पर बैठा दम्पति संभवतः ब्रिटेन का था|
क़रीब पांच मिनट की बस यात्रा के बाद हम अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच गए| जिन लोगों के पास पर्स और मोबाइल था, वे उसे जमा करने के लिए ‘जमा काउंटर’ के सामने लाइन में लग गए थे| जो लोग अपना सामान हमारी तरह रूम पर छोड़ कर आए थे, वो पानी वाले मशीन से पानी पीने लगे| कुछ लोग इधर-उधर खड़े होकर अपने आसपास का मुआयना करने लगे| हम जहाँ खड़े थे मातृमन्दिर वहाँ से 200 मीटर की दूरी पर था| जब सभी लोगों का सामान जमा हो गया तब हमें एक पेड़ के नीचे ले जाया गया| वहीँ एक गोल घेरे में कटीले पेड़ों के अनेकों प्रजातियां लगी हुई थी| पेड़ के नीचे बैठने के लिए बैंच बना हुआ था| कुछ लोग बैंच के नीचे बैठ कर अगले निर्देश का इंतजार करने लगे|
थोड़ी देर बाद मध्यम हाईट की एक फिरंगी स्त्री, जिनकी उम्र 80 के करीब होगी, हमें बुला कर एक दूसरे पेड़ के नीचे ले गई| पेड़ के नीचे बने पत्थर के बैंचों पर हमसे बैठने को कहा गया| उनकी आवाज़ बहुत ही पतली और कमज़ोर थी| पीछे के बैंचों पर बैठे लोग उनको बहुत मुश्किल से सुन पा रहे थे| मजबूरन उन्हें कुछ लोगों को बुला कर अपने पास खड़ा करना पड़ा| खड़े होने वाले लोगों में हम दोनों भी थे| उन्होंने कोई बीस मिनट हमसे एकतरफा बातचीत की| उन्होंने जितनी बातें बताई, उनमे से करीब-करीब ७० फीसदी बातें हम अभी कुछ देर पहले ही विडियो रूम से सुन कर आए थे| अभी तक हमें जो कुछ बताया, समझाया या फिर दिखाया गया था, वो सब मुझे अनावश्यक लगा|
20 मिनट के उबाऊ भाषण के बाद हम उनके पीछे-पीछे मन्दिर के लिए विदा हुए| मंदिर से पहले एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ आया| पेड़ के अनेक जड़े जमीन से लग कर मोटे और मज़बूत तने बन गए थे| पेड़ के पास से गुज़रना मुझे बहुत ही सुखद और शान्तिदायक लगा| पेड़ के एक तने को छूकर मैंने अपना अनुग्रह प्रगट किया| बूढ़े और पूराने पेड़ों को देख कर कई बार अनायास ही मेरी आँखे भर आती है|
पेड़ से गुजरने के बाद हम मंदिर के नीचे आ गए| मंदिर को पास से देखना किसी बहुत ही बड़े करिश्मे को देखने जैसा था| ऐसा अभूतपूव और भव्य मंदिर मैंने इससे पहले कहीं नहीं देखा था| मंदिर के आसपास के आबोहवा में एक सघन शांति और मौन को मैंने महसूस किया| सूर्य के सामान देदीप्यमान पीतल के चक्रों से बने इस गोल मंदिर को देख कर मेरा दिमाग एकदम गोल हो गया| एक जगह हमसे चप्पल उतारने को कहा गया| चप्पल उतारने के बाद हमें मंदिर के नीचे ले जाया गया| मंदिर अब हमारे सिर के ऊपर था| नीचे जहाँ हम खड़े थे वहां एक गोल चबूतरा बना हुआ था, जिसके बीच में सफ़ेद पत्थरों का एक कमल फूल बना हुआ था, फूल के बीच में एक सफ़ेद गोला (क्रिस्टल) रखा हुआ था| कमल कुछ इस ढंग से बना था कि हुआ था कि उसके पत्तियां ऊपर की ओर जाने के वजाय नीचे की ओर जा रही थीं| ऊपर की पंक्तियों से होकर पानी का अविरल प्रवाह नीचे क्रिस्टल के गोले तक जा रहा था| पूरा दृश्य बड़ा ही सम्मोहक और मुग्ध कर देने वाला था| यहाँ हम सारे लोग गोलाकार बैठ गए| यहाँ हमें बीस मिनट ध्यान करना था| मेरे बाईं ओर जो दो लड़कियां बैठी थी, उनसे जींस की वजह से सुखासन में बैठा नहीं जा रहा था, मजबूरन उन्हें गोदुग्धा आसन (उकडू) बैठना पड़ा| कुछ लोगों ने अपनी आँखें बंद कर ली, कुछ आँखे खुली रख कर क्रिस्टल बॉल पर अपना ध्यान क्रेंद्रित करने की कोशिश कर रहे थे| मेरी आँखे आश्चर्य से इतनी फटी हुई थीं कि मैं चाह कर भी उन्हें बंद नहीं कर पाया| मेरी तरह ही एक फिरंगी युवक आखें फाड़े सबको देख रहा था| सामने लाल पत्थर का एक कमल की पंखुड़ी के आकर का भवन था, जिस पर काम चल रहा था, मजदूरों के बैठने व काम करने के लिए उसके चारों तरफ लोहे का टाट बंधा हुआ था| उसी टाट पर एक स्टील की केतली टंगी हुई थी| शायद केतली में थोड़ी चाय रह गई थी| दो कव्वे अपने चोंच से केतली को इधर उधर हिला रहे थे| सामने खम्भे के पास बैठी औरत बेमन से अपनी ड्यूटी निभा रही थी| दिव्या आँखे बंद करके ध्यान में लीन थी| उसके पुतलियों की हरकत से मुझे ऐसा लगा कि वह आँखे बंद कर के बड़ी तेज़ी से कुछ सोच रही है|    
बीस मिनट बाद घंटी की आवाज़ आई, हम सब उठकर खड़े हो गए| दो लोग हमारी अगुवाई के लिए सीढ़ीयों के पास खड़े थे| हमें पंखुड़ी नुमा लाल भवन में ले जाया गया है| पतली गलियों से गुजरते हुए मैंने देखा, एक बंद कमरे में बहुत से सफ़ेद गोल गद्दे रखे थे, एक व्यक्ति आखें बंद किये ध्यान कर रहा था| मुझे अजंता की याद आ गई वहां भी इसी तरह बौद्ध साधकों ने ध्यान करने के लिए सामूहिक जगह के अलावा पर्सनल चेम्बर्स बना रखे थे| शुरू-शुरू में समूह में ध्यान करना सहयोगी रहता है, लेकिन बाद में साधक को अकेले ही ध्यान करना चाहिए| ध्यान के लिए पर्सनल चेम्बर्स मेहसाणा के पास वाले गोयंका विपसना ध्यान केंद्र में भी था| गोल पगडंडीयों जैसे रास्ते से होते हुए हम एक सफ़ेद और लाल रौशनी वाले कमरे में पहुंचे| कमरे में सफ़ेद रंग का एक लम्बा बैठने का बैंच बना हुआ था| एक विदेशी महिला ने हमें बैंच पर बैठकर सफ़ेद मौजे पहनने का निर्देश दिया| पेंट के निचले हिस्से को मौजे के अन्दर डालना था| यह क्रिया ओशो की समाधि से थोडा भिन्न था, वहां सिर्फ सफ़ेद मौजे पहनने होते हैं, पतलून के निचले हिस्से को आप खुला रख सकते हैं| वैसे आमतौर पर रोब के नीचे बहुत कम सन्यासी ही पजामा पहनते हैं|
मौजे पहनने के बाद गोल सीढ़ियों से हम ग्लोबाकार मंदिर के अन्दर-अन्दर से उसके उपरी चैम्बर में जा रहे थे| सफ़ेद गद्देदार सीढ़ी (सीढ़ी कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि स्टेप्स नहीं थे, सिर्फ ऊपर उठता हुआ सफेद गद्देदार सोपान था), सफ़ेद रौशनी, और सफ़ेद मौजे में हम सब मौन साधे अवाक अवस्था में चल रहे थें| आँखों से जो दिख रहा था वह इतना अनूठा और अभूतपूर्व था कि हमारी आँखों में समा नहीं रहा था| यह सोच कर कि इतना बड़ा आयोजन सिर्फ ध्यान करने के लिए किया गया है, मेरे भीतर कुछ घटित हो रहा था| रह-रहकर मैं अपने भीतर मीठी सिहरन महसूस कर रहा था| ऐसा ही मैंने अजंता में भी महसूस किया था| वहां आखिरी मंदिर में, मरने से पहले बुद्ध एक पेड़ के नीचे लेटे हुए हैं, भिक्खु उनके चारों तरफ बैठे हैं, उस प्रतिमा को देखकर मैं फूट-फूट कर रोने लगा था|
इतना सब कुछ, ये सारा आयोजन ध्यान के लिए हैं, ये देखकर मेरा हृदय आल्हाद से फटा जा रहा था| मैं सुखद अनुभूतियों से गुज़र रहा था| कुछ देर पहले नीचे कमल के पत्त्तों के बीच प्रतिष्ठित गोल क्रिस्टल को देखते हुए जो मौन घटा था, उससे चीज़ों को देखने और महसूसने की क्षमता बढ़ गई थी| सौन्दर्यबोध सघन हो गया था| सीढीयों पर चलते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी मायालोक में चल रहे हैं| बस देवी-देवताओं की कमी थी, बांकी माहौल एक दम साकेत जैसा था|
कुछ मिनटों तक चलने के बाद हम एक विशाल हॉल में पहुंचे| यह मुख्य ध्यान कक्ष था| कक्ष के बीचो-बीच एक विशाल क्रिस्टल गेंद रखा हुआ था, जिस पर ऊपर से रौशनी गिर रही थी| पेड़ के नीचे विदेशी महिला ने हमसे कहा था कि यह सूरज की रौशनी है, आईनों की मदद से उन्हें, बॉल तक लाया जाता है| बॉल एक स्टैंड पर रखा हुआ था, जो मेरे ख्याल से पीतल का था, सोना भी हो सकता है| हॉल की क्षमता पांच सौ से ज्यादा लोगों की थी| बॉल के चारों तरफ बैठने के लिए कुशन बिछे हुए थे| हम लोग उन्ही कुशनों पर बैठ गए| दिव्या टेका लेने के लिए दिवार के लगे हुए कुशन पर बैठ गई| कुछ पीठ-रोगी पास लगे सफ़ेद कुर्सीयों पर जा बैठे| हॉल को खड़ा रखने के लिए चारों तरफ संगमरमर के मोटे-मोटे विशाल खम्भे लगे हुए थे|
जैसे ही मैं अपनी जगह पर बैठा मुझे मौन की आवाज़ सुनाई देने लगी| पूरे हॉल में गहन मौन पसरा हुआ था, बाहर से किसी भी प्रकार की कोई आवाज़ अन्दर नहीं आ रही थी| हॉल एकदम साउंडप्रूफ़ था| कुछ मिनटों के बाद मुझे अपने हृदय और रगों में दौड़ते लहू की आवाज़ सुनाई पड़ने लगी है| सन्नाटे की ऐसी सघन अनुभूति इससे पहले मैंने कहीं नहीं की थी| पूरा कक्ष सफेदी के अलौकिक आलोक में डूबा हुआ था| वाह! अति सुन्दर!
कुछ मिनटों के बाद मैं कमरे के मौन और शान्ति से बेचैन होने लगा| अचानक से मुझे किसी चीज़ की कमी खलने लगी| कमरे की शांति मुझे मरी हुई शान्ति लगने लगी, मौन मातमी लगने लगा| सबकुछ मरा-मरा-सा लगने लगा| मैंने पाया कि शांति के साथ संगीत का समन्वय होना बहुत ही ज़रूरी है| कक्ष में शान्ति तो थी, लेकिन संगीत नहीं| संगीत के बिना शान्ति शोर से भी ज्यादा बेहूदा लगने लगी| मैं फिर कल्पना करने लगा| काश! इन संग-ए-मरमर के खम्भों की जगह यहाँ पेड़ लगे हुए होते| पेड़ पर बैठे पक्षियों का संगीत होता, उनके गीत से ये मौन और गहरा हो जाता| इससे सुन्दर तो मरघट का मौन होता है| माना कि वहां के मौन में उदासी पसरी होती है, लेकिन प्रकृति का सानिध्य व संगीत तो होता है| कुछ नहीं तो कुत्ता ही भौंकता रहता है| रात झींगुरों की आवाज़ होती है| यहाँ तो कुछ भी नहीं था, संगीत के आभाव में मौन एकदम एकाकी और उदास लगा मुझे|

आँखे खोल कर मैं कुछ देर तक क्रिस्टल बॉल को देखता है| पलक नहीं झपकने की वजह से मेरी आँखों से पानी गिरने लगा| मैंने थोड़ी देर के लिए आँखे बंद कर ली| फिर मेरी खोपड़ी चलने लगी| कितना सुन्दर होता यदि यहाँ क्रिस्टल बॉल की जगह एक जीवंत कमल या गुलाब का फूल होता!
मुझे समझ में आ गया कि यह ध्यान कक्ष मेरे लिए नहीं है| परमात्मा मेरे लिए जीवन का पर्याय है, जीवन से अलग नहीं, जीवन विरोधी तो बिलकुल भी नहीं| पक्षी, पेड़, आकाश, बारिश, समंदर और झिगुरों के संगीत के दूर होकर इस कृतिम शान्ति में मेरा दम घुटने  लगा| ओशो आश्रम में हम ध्यान में बैठने से पहले नृत्य करते हैं, जीवन का उत्सव मानते हैं, गीत गाते हैं, यहाँ हमें सीधे ही सफ़ेद मौजा पहना कर बैठा दिया गया था| इतने नीरस तरीके से ध्यान में बैठना मुझे जम नहीं रहा था| उपनिषद ने हमें सिखाया है कि परमात्मा ‘रस रूप है-रसो वै सः! यहाँ मुझे सभी प्रकार के रस की कमी लगी| ऐसा ही मुझे पुणे आश्रम के पिरामिड में भी लगता है| वहां भी सब कुछ मरा-मरा-सा लगता है| इसीलिए पुणे में मैं सिर्फ ओशो की समाधि पर ध्यान करने जाता हूँ|
20 मिनट बाद एक पीली रौशनी दो बार जलकर बंद हो गई| यह इस बात का संकेत था कि हमारा समय पूरा हो गया| हम सब जिस रास्ते से आए थे, उसी रास्ते से मौजे वाले रूम में वापिस आ गए हैं| मौजे उतारने के बाद अपना-अपना चप्पल पहनने के लिए हमें बाहर लाया गया| चप्पल पहनने के बाद बरगद के पेड़ से गुजरते हुए हम फिर बस तक आ गए| इस बार मुझे बस की पहली सीट पर बैठने का मौका मिला| रास्ते में पेड़ों और हँसते खेलते परिंदों को देखकर मेरी साँसे वापिस लौटी| आँखों को आराम मिला, हृदय गति फिर से नार्मल हो गई| 
मनुष्य अपने हाथों से चाहे कितनी ही सुन्दर चीज़ें क्यों न बना ले, परमात्मा द्वारा रचित एक साधारण घास की पत्ती के सामने भी उसका सौन्दर्य दो-कौड़ी का हो जाता है| सुबह ओस से भीगे गुलाब पर प्रभाकर की पहली किरण जब उतरती है, तो उसके सौन्दर्य के सामने हजारों ताज़महल की रौशनी फीकी पड़ जाती है| 


पोंडिचेरी में बैठे-बैठे पुणे की याद

23-Aug-2019

समाधि के अन्दर जाने के लिए हम जहाँ से एंट्री करते हैं, उस हॉल में ओशो की एक रोल्सरॉय खड़ी है, जिसका नंबर मेरे ख्याल से MV2041 है| वहीं गाड़ी के पास लगे कुर्सियों पर बैठकर आप को सफ़ेद मौजे पहनने होते हैं, ताकि अन्दर समाधी में लगे सफ़ेद संगमरमर ख़राब न हो जाए| मौजा पहनने के बाद आप एक रूम में प्रवेश करते हैं, जिसके बाईं ओर एक सीढ़ी ऊपर को जाती हैं| फिर आप जिस रूम में प्रवेश करते हैं, उसके दीवारों से लगे शीशों की आलमारी में ओशो की किताबें सजी हुई हैं| ये वो किताबें हैं, जिन्हें ओशो ने अपने जीवन काल में पढ़ी थी| जहाँ तक मुझे पता है, करीब दो लाख किताबें हैं| ज्योति माँ ने अपनी किताब 'दस हज़ार बुद्धों की एक सौ कथाएँ' में लिखा है कि ओशो एक दिन में 6 से भी ज्यादा किताबें पढ़ते थे| यह असंभव नहीं है| एक जर्मन अनुवादक, मेरे ख्याल से Paul Deussen, किसी किताब के सम्बन्ध में विवेकानंद से बात करना चाहते थे| विविकानन्द ने कहा, "मैंने किताब नहीं पढ़ी है, आप इसे यहाँ छोड़ जाइए, मैं पढ़ लेता हूँ, फिर इस पर बात करेंगे|" पॉल किताब छोड़ कर चले गए| किताब बहुत मोटी थी, उनका अनुमान था कोई पन्द्रह दिन के बाद विवेकानंद से इस किताब पर चर्चा हो पाएगी| इससे कम में किताब पूरी नहीं की जा सकती हैं| लेकिन अगले दिन जब वे विवेकानंद से मिलने आए, तो हैरान रह गए| "मैंने किताब पढ़ ली है, आप चाहे तो आज हम उस पर चर्चा कर सकते हैं", विवेकानंद ने डेयुसन से कहा| उन्हें यकीन नहीं हुआ, "इतनी मोटी किताब आप एक रात में कैसे खत्म कर सकते हैं", पॉल ने आश्चर्य प्रगट करते हुए कहा| "अगर विचारों की बाधा न हो, तो यह बिलकुल संभव है, मुझे किताब खत्म करने में एक घंटा भी नहीं लगा", विवेकानंद ने पॉल से कहा| पॉल को काटो तो खून नहीं| "तुम एक काम करो, किताब खोल कर तुम मुझसे पेज नम्बर कहो, मैं तुम्हे बता दूंगा कि उस पर क्या लिखा है", टेबल पर से किताब उठा कर पॉल को देते हुए विवेकानंद ने कहा| पॉल ने ऐसा ही किया, उसने किताब पलट कर एक पेज नम्बर विवेकानंद से बोला, विवेकानंद ने उसे बता दिया कि उस पेज पर क्या लिखा है|
कुछ हद तक ऐसा मेरे और आपके जीवन में भी होता है, हम जब कुछ पढ़ रहे होते हैं, उस वक्त अगर हमारा दिमाग बहुत अशांत है, तो दस पेज पढ़ जाते हैं और कुछ भी समझ में नहीं आता है| और कभी जब मन शांत होता है, तो सट से बीस पेज खत्म हो जाता है, और सब समझ में भी आ जाता है| बहुत से लोग किताब नहीं पढ़ पाते हैं क्योंकि उनका बेचैन मन किताब के पन्नों पर उनके ध्यान को टिकने नहीं देता है| 
किताबों के जंगल से गुजरते हुए आप एक ऐसे रूम में पहुँचते हैं, जहाँ हरे रंग की एक डेंटल-चेयर रखी हुई है| ओशो के जब दांतों का इलाज़ चलता था, तब वे इसी चेयर पर बैठते थे| मेरे ख्याल से उनकी किताब 'नोट्स ऑफ़ मैड मैन' इसी चेयर पर की गई बातचीत है| चेयर रूम के बाद एक और रूम-जैसी जगह पार करके आप समाधि तक पहुँचते हैं| समाधि का द्वार उलटे यू (U) जैसा है| गेट पर सेंसर इत्यादि लगे हुए हैं| 
शीशे के गेट को खोल कर जब आप अन्दर पहुँचते हैं, तो आपके दायीं ओर आपको एक शीशे का बेड दिखता है| यही ओशो की समाधि है| वहीं बेड के पास ओशो की एक मूर्ति बनी हुई है-सिर्फ गर्दन के ऊपर का हिस्सा| अपने मरने से कुछ दिन पहले दो-तीन दिनों तक इस बेड पर ओशो सोए थे| समाधि एक बहुत बड़ा हॉल है, जिसके फर्श सफेद और खम्भे ग्रीन मार्बल से आच्छादित हैं| ऊंचाई कोई 40 से पचास फीट होगी| गोलाकार समाधि के तीन हिस्से में शीशे लगे हुए है, शीशे के उस पार हरा-भरा बगीचा दिखता है| ऊपर एक बड़ा गोल झूमर लगा हुआ है, जिसमे हमेशा लाइट जलती रहती है| ध्यान के दौरान उसके लाईट को थोडा कम कर दिया जाता है| समाधि वाले बेड के पास ही हॉल का एक दूसरा गेट है, यह गेट ओशो की बाथरूम में खुलता है| जब समाधि पर ध्यान करने वाले सन्यासियों की संख्या ज्यादा हो जाती है, तो कुछ सन्यासियों को बाथरूम में भी बिठाया जाता है| मुझे भी एक दिन अन्दर बैठने का मौका मिला| इतना आलीशान बाथरूम मैंने पहले कभी नहीं देखा था, सत्तर के दशक का यह बाथरूम अपने समय में वर्ल्ड का नंबर वन बाथरूम रहा होगा| 
मानसून फेस्टिवल के दौरान समाधि पर ओशो के छोटे भाई की पत्नी ड्यूटी पर हुआ करती थी| ओशो के सबसे छोटे भाई आश्रम में ही रहते हैं| फेस्टिवल के मौके पर ओशो की एक बहन और उनके पति भी आये हुए थे| ओशो के भाई आश्रम में उतनी ही सरलता के साथ रहते हैं, जितनी सरलता के साथ माधोपुर आश्रम में ब्रह्मवेदांत जी के एक बेटे रहते हैं| जबतक आपसे कहा न जाए की ये ओशो के भाई हैं, आप उन्हें नहीं पहचान सकते हैं| आसान नहीं है अपने बड़े भाई को भगवान मान कर उसकी भक्ति में अपने जीवन को मिटा देना| 
जो जानते हैं, उनका कहना है कि ओशो की समाधि आश्रम की सबसे जीवंत जगह है| जो नहीं जानते हैं उनके लिए आश्रम सेक्स का अड्डा है, और रजनीश लड़कियों और ड्रग्स के माफिया थे| 
‘ताओ ते चिंग’ में बूढ़ा लओत्जु कहता है, “When a superior man heard of Tao, He cultivates himself diligently. When an average man heard of Tao, He is doubtful, vague and would give up halfway. When an inferior man heard of Tao, He laughs and thinks of It as foolish. If Tao is not being laughed at, It is not the Great Tao.”
ओशो की समाधि जिस भवन में है, उसे च्वांगतजु के नाम से जाना जाता है| मेहसाणा आश्रम में जिस घर में हम रहते थे, उसका नाम 'लओत्जु' था| और मेरा नाम इक्क्युत्जु है|

अरे...! देखो हाथी है


22-Aug-2019
पुदुच्चेरी आने के बाद से हमने एक नया शौक पाला है, रात को फ़िल्म देखने का| पहले दिन 'आनंद' देखा, दुसरे दिन 'शौक़ीन' और तीसरे दिन 'बरेली की बर्फी'| कल रात कुछ भी नहीं देखा| आनंद मैंने पहले भी कई बार देखी थी, पुरानी फिल्मों में 'गोलमाल, पड़ोसन, चश्मेबद्दूर' चलती का नाम गाड़ी, प्यासा, और अंगूर कुछ ऐसी फ़िल्में हैं, जिन्हें में एक अन्तराल के बाद देखता रहता हूँ| दिव्या को पुरानी फिल्मे देखना पसंद नहीं है, फिल्म चलाने से पहले मुझे फिल्म के बारे में पहले दस मिनट एक्सप्लेन करना पड़ता है, तब जाकर वो राज़ी होती है| 

परसों रात 'बरेली की बर्फी' देखते-देखते सोने में देर हो गई| 11 बजे हम सोने के लिए गए| परिणामतः सुबह उठने में भी लेट हो गया| जल्दी-जल्दी तैयार होकर हम, मातृमन्दिर के अन्दर जाने का 'पास' लेने के लिए, ओरोविल की ओर भागे| रास्ते में एक दिव्यांग व्यक्ति की रेहड़ी से नारियल पानी पिया-एक नारियल का तीस रुपया| दिव्या ने पानी पीने के लिए प्लास्टिक का पाइप लिया, मैं ऐसे ही पी गया| धर्मेद्र स्वामी मरने से पहले मुझे बिना पाइप के नारियल से पानी पीना सिखा गए थे|
सूचना भवन तक पहुँचते-पहुँचते 11 बज गये| "सामने वाले भवन के पहले मंजिल पर जाओ, ध्यान के लिए पास वहीं से मिलेगा, जल्दी करो ऑफिस बंद होने वाला है", नीली शर्ट पहने स्टाफ ने कहा| तेज़ क़दमों से चलते हुए हम बुकिंग ऑफिस तक पहुंचे| "लो, ऑफिस बंद हो गया", दिव्या बोली| "अब दोपहर 2 बजे आओ'', प्रदर्शनी रूम के बाहर खड़े एक व्यक्ति ने हमने से कहा| बुकिंग ऑफिस सुबह 10 से 11 और दोपहर 2-3 खुलता है, मंगलवार बंद रहता है| "नीचे चलो 2 बजे तक हम यहीं वेट कर लेंगे", दिव्या बोली| 'चलो पहले अन्दर चलकर चित्रकला की प्रदर्शनी देख लेते हैं', हॉल की तरफ मुड़ते हुए मैंने कहा| 
हॉल में 1-2-3 करके क्रम से श्री अरविन्द के वचनों के साथ पेंटिंग्स लगे हुए थे| दो-तीन पेंटिंग मुझे बहुत ही आकर्षक लगी| कोई दस मिनट तक चित्रों को निहारने के बाद हम नीचे कैफे के पास आ गए| पेड़ के नीचे पत्थर का एक बड़ा सा टेबल बना था, हम वहीं बैठ गए| "किताब लेकर आई होती, तो यहीं पढ़ लेती, अभी तीन घंटा है हमारे पास", दिव्या बोली| ‘चलो जहाँ से कल मद्रासी कॉफ़ी पिया था, वहीं से आज कैपेचिनो लेते हैं’ मैंने कहा।
गोल टेबल से उठ कर हम कैफे में आ गए हैं| कैफे के बाहर वाले एरिया में लगे छोटे पैरों वाले लाल चेयर पर मैं बैठ गया, दिव्या मेन्यू लेने अंदर चली गई| 'यहाँ के चेयर इतने आरामदायक नहीं हैं कि हम तीन घंटा तक बैठ सकें| इससे अच्छा तो घर चलो, वहीं से खाना आर्डर कर देंगे| खाने के बाद थोड़ी देर आराम करके फिर आ जाएँगे', मैंने दिव्या से कहा| “पार्किंग वाला फिर से 10 रूपये नहीं ले लेगा?, मेन्यू से सिर उठाते हुए दिव्या बोली| ‘यहाँ कॉफ़ी और समोसे का 300 रूपये देंगे, उससे तो अच्छा ही है’, मैंने कहा| “हाँ, ये तो है... चलो घर ही चलते हैं”, बैग उठाते हुए दिव्या बोली| 
दोपहर में जब हम दुबारा आए, तो पार्किंग वाले ने हमसे पैसा नहीं लिया, “आप सुबह आए थे ना?”, पार्किंग वाले ने हम से पूछा| हमने हाँ में सिर हिलाया| “फिर दुबारा आपको पे करने की ज़रूरत नहीं है|” मैंने गर्दन मोड़ कर दिव्या को देखा, उसके चेहरे पर ख़ुशी थी| 
2 बजने से 7 मिनट पहले हम बुकिंग ऑफिस के बाहर खड़े थे| थोड़ी देर बाद हमारे पीछे तीन-चार लोग और खड़े हो गए| ठीक दो बजे ऑफिस खुला| हमसे रूम के अन्दर आ कर एक बड़े टेबल से लगे हुए बेंच पर बैठने को कहा गया| थोड़ी देर बाद स्टाफ में से एक लेडी ने हमें एक कार्ड दिया, “इसे भरिये”| कार्ड का रंग पीला था| यह हमारा मातृमन्दिर के अन्दर जा कर ध्यान करने के पास था| अगले दिन सुबह 8:45 मिनट पर हमें विडियो हॉल में हाजिर होना था| 
‘अब कहाँ चलना है’, गाड़ी स्टार्ट करते हुए मैंने पूछा| “अरविन्द आश्रम के पास ही एक फेमस मंदिर है ‘अरुलमिगु मनाकुला विनयागर टेम्पल’ वहीं चलो| वहीं से संग्रहालय चल लेंगे, फिर शाम में बीच पर चलेंगे”, स्कूटी पर बैठते हुए दिव्या बोली| 
ओरोविल से निलकते समय रास्ते में एक गुलमोहर का बड़ा पेड़ आता है| पेड़ के नीचे की ज़मीन लाल फूलों से पटा रहता है| ओरोविल आते-जाते समय मैं उस पेड़ के नीचे थोड़ी देर ज़रूर रुकता हूँ| “शहर में बचपन बीतने की वजह से मैं पेड़ों के बहुत करीब नहीं आ पाई”, दिव्या गुलमोहर के नीचे मुझसे बोलने लगी“, शहर के बच्चे कुत्ते-बिल्लीयों के प्रेम से कभी आगे नहीं बढ़ पाते हैं|” 
पेड़ से थोडा आगे एक सूखा तलाब है| तलाब में बस नाम मात्र पानी है, पूरा तलाब सूखा है, बस बीच में थोड़ा पानी है, जिसमे कमल के फूल खिले हुए हैं| उस तलाब के घाट पर बैठना भी मुझे अच्छा लगता है| उसी तलाब के पास एक आदमी जाल में बंद करके मुर्गी, तीतर, तर्की और बत्तख के जोड़े बेचता है| तलाब किनारे एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ है| पेड़ के नीचे एक बूढी औरत नारियल पानी बेचती है| पेड़ के पास ही कुत्ते के दो छोटे-छोटे बच्चे-एक काला और दूसरा ब्राउन, खेलते रहते हैं| थोडा और आगे आने पर दिव्यांग व्यक्ति का रेहड़ी है| इसी रेहड़ी से आज मैंने नारियल पानी पिया था| वहीं पास में एक बूढी औरत मछली बेचती हैं| अजनबी शहर में अब बहुत कुछ ऐसा है, जिससे पहचान हो गई है| 
गूगल की मदद से हम मंदिर तक पहुँच गए| ‘जूस वाले से पूछो कि कितने का दे रहा है’, स्कूटी खड़ी करते हुए मैंने दिव्या से कहा| 

23-Aug-2019
"२० रूपये का एक ग्लास बोल रहा है", जूस वाले के पास से पलटते हुए दिव्या बोली| 'उसे बोलो कि दो ग्लास बनाए', स्कूटी का हैंडल लॉक करते हुए मैंने पूछा| "मैं नहीं पियूंगी", बैग से ताम्बे वाला बोतल निकाल कर पानी पीते हुए दिव्या बोली| 'तुम क्यों नहीं पीओगी?', जूस वाले के पास पहुँचते हुए मैंने पुछा| "मैं कुछ और ले लुंगी, तुम जूस पी लो", बोतल का ढक्कन बंद करते हुए बोली| 

'एक ग्लास जूस बनाना, चीनी, नमक और बर्फ कुछ भी मत डालना', मैंने जूस वाले से कहा| उसके रेहड़ी पर करीब दस किलो मौसमी थे| उसने चाकू से चार-पांच मौसमी को बीचो-बीच काट कर दो भागों में बाँट दिया| 'छिलने के बजाय ये गोल-गोल क्यों काट रहा है मौसमी को?', आँखे बड़ी करते हुए मैंने दिव्या से पूछा| "इसका जूस बनाने वाला भी तो देखो कुछ अलग हैं", मेरी तरह वह भी आश्चर्य में डूबी हुई थी| उसका जूस बनाने का मशीन लट्टू के जैसा था, बीच से दो भागों में बंट जाता था| नीचे का भाग मंदिर की तरह उठा हुआ था, और ऊपर का भाग गुम्बंद की तरह खोखला था| नीचे वाले भाग पर उसने मौसमी के कटे हुए टुकड़े पर रखा, फिर हैण्डल घुमा कर ऊपर वाले भाग को नीचे ले आया| एक बार में पूरे फांक का रस दब कर निकल गया| एक मिनट से भी कम समय में सारे फांकों से रस निकाल कर उसने एक ग्लास जूस मुझे पकड़ा दिया| "वाह! क्या सही तरीका है, हमारे यहाँ जैसे जूस निकालते हैं, उससे तो यही सही है", आश्चर्य से खुश होते हुए दिव्या बोली| 
जूस पीने के बाद रोड पार करके हम मंदिर वाले रोड पर आ गए, "अरे...! देखो हाथी है", रोड पर एक फीट कूदते हुए दिव्या बोली| 'अंधी यही तो मैं तुमको रोड पार करते हुए कह रहा था, ध्यान कहाँ था तुम्हारा', हाथी की मौजूदगी को हल्के में लेते हुए मैंने कहा| हालाँकि हाथी देखकर मैं भी उसके इतना ही उत्साहित था| लेकिन हमारे बीच एक शीत युद्ध चलता रहता है| जिस चीज़ को लेकर वह उत्साहित होती है, उसके प्रति मैं उदासीन हो जाता हूँ, जो मुझे पसंद होता है, उसके प्रति उसका रवैया तीखा हो जाता है| तथ्य यह है की हम दोनों की पसंद-नापसंद कुछ एक अपवादों को छोड़ कर करीब-करीब एक जैसी है| 
मंदिर के गेट के बाहर एक छोटे से घेरे में हाथी को रखा गया था| घेरे के अन्दर हाथी की सुविधा के लिए मिट्टी डाला हुआ था| हाथी की उम्र बहुत कम थी| उसके पूरे शरीर पर कलाकारी की हुई थी| आगे के दोनों पैरों में पायल पहनाया हुआ था| गौर से देखने पर पता चला यह हाथी नहीं हथनी है| गले में उसके नाम का बोर्ड लटका हुआ था 'लक्ष्मी'| आते-जाते श्रद्धालु उसके सूंढ़ पर पैसा, केला और प्रसाद रख देते थे, भेट पाने के बाद वह सूंढ़ मोड़ कर लोगों को आशीर्वाद देती थी| फिर अगर केला या खाने की कोई चीज़ हो तो खा लेती थी, पैसा होने पर अपने मालिक को दे देती थी| उसका मालिक वहीं उसके पैरों के पास मुंडेर पर बैठा था| एक आदमी वहीं तेल वाले कंटेनर में कुछ लेकर कर आया था, उसका बड़ा-बड़ा गोला बना कर हाथी के मुंह में डाल रहा था| "ये लोग क्या खिला रहे हैं, उसको?", दिव्या मुझसे पूछी| 'पता नहीं क्या खिला रहे हैं, लगता है आटा में केला मिला कर खिला रहे हैं', अंदाज़े से मैंने कहा| "मैं उसको पैसा देने जाती हूँ, तुम मेरी विडियो बनाओ", उसके चेहरे पर छोटे बच्चों जैसी चमक थी, और मेरे चेहरे पर बाप जैसी कठोरता| 'फिर शुरू हो गया तुम्हारा बोकलोली, विडियो बनाने की क्या जरूरत है, मैं देख रहा हूँ तुम्हारा मोबाइल एडिक्शन बढ़ता जा रहा है', कहते हुए मैंने उसे अपने जेब से पांच रूपये का सिक्का दिया| "पांच रुपया नहीं दस का नोट दो", पांच रुपया मेरे जेब में वापिस रखते हुए बोली, उससे पहले मैंने क्या बोला था उस पर उसने कान नहीं दिया| उस बात पर उसे बाद में लड़ाई करनी थी, अभी किसी भी सूरत में विडियो बनानी थी| कोई आम मौका होता तो, मुझे दस सुना चुकी होती-मेरा मोबाइल एडिक्शन बढ़ रहा है, तो तुम्हारा कौन से मीठे का एडिक्शन कम हो रहा है, दस-दस रसगुल्ला खाते समय नहीं सोचते हो| 
हाथी के साथ दिव्या का विडियो बनाने के बाद हम मंदिर के अन्दर गए| अंदर लगे बोर्ड से पता चला कि यह मंदिर अरविन्द आश्रम के सहयोग से बना है| मंदिर में लगी मूर्तियों के सामने दक्षिण भारतीय श्रद्धालु| अलग-अलग तरीके से नाक-कान पकड़ कर मूर्ति को प्रणाम कर रहे थे| मंदिर साफ़-सुथरा और काफी फैलाव वाला था| प्रांगण में कुछ लोग आँखे बंद किए ढोंग-धतूरे में लीन थे| 
मंदिर से निकल कर हम ‘बीच’ की तरफ जाने लगे| रास्ते में एक जगह HDFC का एटीएम देखकर मैंने स्कूटी रोकी| ‘चार हज़ार रूपये निकाल लो’, एटीएम कार्ड देते हुए मैंने दिव्या से कहा| कार्ड लेकर वह एटीएम के अंदर पैसा निकलने के लिए चली गई| “पैसा फंस गया”, थोड़ी देर बाद एटीएम से बाहर निकल कर बोली| मैंने जेब से मोबाइल निकाल कर देखा था| बैंक से 4000 निकालने का मेसेज आया था| ‘रुको में आता हूँ’, कहकर मैं गाड़ी खड़ी करने के लिए रोड के उस तरफ गया| जबतक मैं गाडी खड़ी करके के एटीएम पर आया, बैंक से दूसरा मेसेज आ गया, चार हज़ार अकाउंट में वापिस आ गए थे| ‘चलो बच गए, पैसा कहीं और से निकाल लेंगे’, एटीएम पर खड़ी दिव्या से मैंने कहा| 
एटीएम से निकल कर हम ‘बीच’ पर आ गए है| थोड़ी देर बीच पर बैठने के बाद मैंने कहा, ‘रात में लेट खाने से अच्छा से चलो अभी ही कुछ खा लेते हैं, अगर तुम कहो तो पहले दिन रेलवे स्टेशन के पास जहाँ से इडली खाया था, उसी के यहाँ चलते हैं| सही खिलाता है वह|’ दिव्या खाने के नाम पर राजी हो गई| खाने के लिए इसे कभी भी राजी किया जा सकता है| “रेलवे स्टेशन यहाँ से पास ही है’’, उठते हुए बोली| ‘हाँ उस दिन चर्च के पास से मैंने ट्रेन खड़ी देखी थी’, मैंने कहा| ‘हें’अ’, बोलकर वह मेरे साथ रोड पार करने लगी|
इडली वाले के यहाँ जब हम पहुंचे तो पता चला कि वहां कुछ काम चल रहा है| एक घंटा समय लगेगा| “चलो फिर बीच पर ही कुछ देर बैठ लेते हैं| शाम ढलने के बाद रूम पर चल चलेंगे|”, निराश होते हुए दिव्या बोली| ‘हाँ चलो गाडी में पेट्रोल भी डलवाना है’, हेलमेट पहनते हुए मैं बोला| “ये हेलमेट क्यों लगा लेते हो तुम, कोई तो लगता नहीं, पुलिस ऐसे ही सब जगह घूमती रहती है| तुम्हारी हेलमेट की वजह से ही पुलिस ने उस दिन हमें रोक कर चेक किया था”, गाडी पर बैठते हुए दिव्या बोली| मैं भी सोचना लगा कि यहाँ हेलमेट के मामले में लोग इतने ढीले क्यों है| एक परसेंट लोग भी हेलमेट नहीं लागते हैं|

Thursday, 22 August 2019

पुदुच्चेरी में पुणे की बात लिखो


कल शाम दिव्या कह रही थी, "ये तुम्हारे लिखने की वजह से मुझे सब कुछ संभल-संभल कर बोलना पड़ता है, ऐसा लग रहा जैसे में हमेशा किसी कहानी में जी रही हूँ| कुछ भी करने से पहले सोचना पड़ता है| पता नहीं तुम क्या लिख दो|  अब तुम अभी जो कह रही हूँ उसको भी मत लिख देना..हाँ तो...! ये टटका लिखना बंद करो...पुदुच्चेरी में पुणे की बात लिखो, फिर जब हम यहाँ से बंगलोर जाएँगे तब यहाँ की लिखना|"
मुझे दिव्या की बात जंची, यह मैं भी देख रहा हूँ, टटका लेखनी में उतना स्वाद नहीं होता है, जितना बसिया में| मुझे याद है गाँव में अक्सर, बाढ़ के दिनों में, मछली का रेल-ठेल हो जाता था| पिता जी इतनी मछली ला देते थे कि माँ सिर्फ मछली रान्ह कर (बना कर) रख देती थी, अब सुबह से लेकर शाम तक खाओ मछली-ही-मछली, चावल रोटी सब बंद| आम के सीज़न में में भी घर में कई दिनों तक खाना नहीं बनता था| सुबह उठा तो, चार-पांच बाल्टी में मुंह कटा आम भरा रहता था| आम, माछ और दूध से मन अक्सर अकछ (उब) जाता था|
हाँ, तो मैं आपसे बसिया-टटके की बात कर रहा था| बोआरी माछ ठंड के दिनों में टटका में उतना अच्छा नहीं लगता था, जितना अगले दिन बसिया हो जाने पर| गर्म भात के साथ रात का जमा हुआ बोआरी माछ..आह...! मुझे लगता है, लिखना भी बोआरी माछ है| जितना पुराना हो जाता है, उतना अच्छा लगता है-पढ़ने में भी और लिखने में भी|
अरविन्द आश्रम समंदर (पुदुच्चेरी बीच) के बिलकुल पास है| जब हम आश्रम के गेट पर पहुंचे तो, हमें रोड के उस तरफ चप्पल जमा करने के लिए कहा गया| बाहर से देखने में पर आश्रम वैसा ही दिख रहा था, जैसा आस-पड़ोस का बांकी फ्रेंच स्टाइल घर, स्लेटी रंग पर सफ़ेद की पट्टी, लकड़ी के छोटे-छोटे पल्लों वाली खिड़कियाँ| आश्रम का पूरा एरिया ही बहुत बहुत ही सुन्दर और शांत है| अन्दर पहुँचने पर गार्ड ने हमें इशारे से समाधि की ओर जाने को कहा| रस्ते में अपनी बाईं तरफ मैंने कैक्टस का विशाल वृक्ष देखा| पुदुच्चेरी में जगह-जगह पर कैक्टस के अलग-अलग प्रजाति के पेड़ लगे हुए हैं| कोई बीस कदम चलने के बाद अरविन्द और माता जी (श्री अरविन्द घोष की अध्यात्मिक संगनी) की समाधि आ गई| एक विशाल पेड़ के नीचे संगेमरमर का बड़ा चबूतरा था| दो लोग चबूतरे से सिर टिकाए बैठे थे, एक दो लोग चबूतरे की परिक्रमा कर रहे थे| दो-चार लोग चबूतरे से दूर दीवार किनारे बैठे आँख बंद करके ध्यान कर रहे थे(यहाँ मास्टर उगवे होते तो कहते, “ये ढोंग-धतूरा कर रहे हैं)| दीवार के पास बैठे गार्ड ने मुझसे हेलमेट उसके पास रख कर समाधि की परिक्रमा करने को कहा| परिक्रमा करने के बाद हम गार्ड के बगल में दीवार से लग कर सुखासन में बैठ गए| मैंने दो मिनट के लिए आंख बंद करके ध्यान करने का नाटक किया, जब आँख खोला तो देखा दिव्या पहले से आँख खोले बैठे थी|
'इस पेड़ का क्या नाम है?', मैंने स्टूल पर बैठे गार्ड से पुछा| "हम इसे सर्विस ट्री कहते हैं", गार्ड धीरे से बोला| सर्विस ट्री? नाम थोडा अटपटा लगा मुझे| 'सब जगह इसे सर्विस ट्री ही बोलते हैं?', मैंने पुछा| "ये पता नहीं, लेकिन यहाँ यही बोलते हैं", गार्ड ने अफ़सोस व्यक्त किया| यहाँ का गार्ड पुणे के गार्ड जैसा ही था| पुणे में भी मैंने एक गार्ड से पेड़ का नाम पूछा था, उसे पता नहीं था तो वह तीन और से पूछ कर आ गया, लेकिन किसी को पता नहीं था| लगता है, आज कल लोग पेड़ों को हल्के में ले रहे हैं|
अरविन्द ने 1950 में देह त्यागा था, पेड़ उतना पुराना तो नहीं लग रहा था| हो सकता है समाधि बनाने के बाद लोगों से पेड़ लगा दिया हो| पेड़ के पत्ते गुलमोहर के पत्तों जैसे छोटे-छोटे थे| समाधी के ऊपर चादर की छत थी, जिसकी वजह से समाधी कुछ-कुछ मजार जैसा दिख रहा था|
समाधी से उठने के बाद हम अंदर हॉल में गए| हॉल में अरविन्द की और अरविन्द से जुडी किताबें और तस्वीरें थी| दिव्या ने 35 रूपये में अरविन्द की एक तस्वीर खरीदी| सब जगह से उसको तस्वीर खरीदने की बीमारी है|
हॉल से निकल कर हम लाइब्रेरी में आ गए| एक बुजुर्ग (स्टाफ) खिड़की की तरफ मुंह किए अपनी टेबल पर बैठे थे| जिस गेट से हम प्रवेश किये उसके ठीक सामने बड़े टेबल पर एक अमेरिकन लेडी 'सावित्री' से नोट्स बना रही थी| 'हम यहाँ आधा घंटा बैठ सकते हैं', मैंने दिव्या से पूछा| उसने सहमती में सिर हिलाया| 'यहाँ बैठ कर पढ़ने के लिए 'सावित्री' मिल सकती है?', मैंने दफ्तर बाबू से पूछा| मुझे यह समझ नहीं आया की ये हमारी और पीठ करके क्यों बैठे हैं| ऑफिस में किसी को इस तरह उल्टा बैठे मैंने पहली बार देखा था| मेरे देखा-देखी दिव्या ने भी उनसे सावित्री ही माँगा|
अमेरिकन लेडी के ऑपोजिट बैठकर मै किताब पढ़ने लगा| दिव्या मेरे बगल में बैठ गई| बाबू ने हमें एक, एंट्री करने के लिए, नोट बुक और पेन ला कर दिया| मैंने उसमे अपना नाम और पता लिख दिया|
'सावित्री' की पहली लाइन मुझे हमेशा से पसंद रही है, "It was the hour before the Gods awake." वाह...! इस बार यह लाइन पढ़कर मुझे गीत चतुर्वेदी की कविता ‘छोटा ईश्वर’ की याद आ गई| हालाँकि गीत ने ‘छोटा ईश्वर’ नीत्शे से प्रभावित होकर लिखा है| इतनी मोटी किताब को आधे घंटे में पढने का कोई मतलब नहीं था| किताब के आखरी पन्नो (पेज 738) पर अरविन्द द्वारा लिखे हुए सावित्री से सम्बंधित कुछ ख़त छपे हुए थे, मैं उन्ही खतों को पढ़ने लगा|
समाधि, हॉल और पुस्तकालय के आलावा आश्रम किसी और हिस्से में जाने की अनुमति नहीं थी| इससे मैं बड़ा निराश हुआ| मैं अरविन्द के शयनकक्ष में जाना चाहता था| गार्ड से पूछने पर पता चला कि समाधी के बगल वाले घरों में ही अरविन्द और माता जी रहते थे| हॉल से सटा एक सूचना रूम था, जहाँ से मैंने पांच रूपये में एक लीफलेट खरीदा, उसमे आश्रम और अरविन्द के बारे में थोड़ी जानकारी छपी हुई थी| सूचना रूम में बैठी महिला से जब मैंने कुछ जानकारी लेनी चाही तो पाया कि आप अमिताभ बच्चन की मम्मी हैं, फुसफुसा कर बोलती हैं, और आधी बात अन्दर ही खा जाती हैं| उनसे बातचीत करना संभव लगा|
आश्रम से निकल कर हम 'पुदुच्चेरी संग्रहालय' गए| संग्रहालय आश्रम से ज्यादा दूर नहीं था| “लाइट गई हुई है, अन्दर कुछ दिखेगा नहीं, आप लोग कल आइये”, संग्रहालय के गेट पर खड़े गार्ड ने हमसे कहा| वहां से स्कूटी स्टार्ट करके हम चर्च गए| चर्ज संग्रहालय से कोई एक किलोमीटर की दूरी पर होगा| चर्च के पास जब स्कूटी खड़ी कर रहा था, तो वहां से रेलवे लाइन दिखा, मतलब रेलवे स्टेशन भी यहीं कहीं आस-पास था| मेरे ख्याल से 10-15 किलोमीटर के भीतर ही घूमने और देखने की सारी जगहें हैं|
चर्ज मुझे कुछ ख़ास नहीं लगा| एक बड़े चर्ज को जैसा होना चाहिए था, वह बिलकुल वैसा ही था| चर्च और मंदिर मुझे टूटा-फूटा ही अच्छा लगता है| पूरा चर्च खाली था, जीसस अकेले सूली पर लटके हुए थे| थोड़ी देर बाद दो-तीन लोग आए और जीसस की तस्वीर खींच कर ले गए हैं| सूली पर लटके जीसस मुझे अच्छे नहीं लगते हैं| मौत और दुःख का ऐसा प्रदर्शन मुझे धार्मिक कम राजनीतिक ज्यादा लगता है| सूली वाले जीसस रुग्ण लोगों की इजात लगते हैं| पैगंबर का मंदिर नाचता, गाता और उत्सव पूर्ण होना चाहिए| बाइबल के जीसस से मुझे अथाह प्रेम है, लेकिन चर्च के जीसस से नहीं|
चर्च के बाद हम बीच पर आ गए| बीच के सामने बने फ्रेंच स्टाइल घर, होटल और सरकारी भवन, चोड़े पत्ते वाले छोटे-छोटे आदम कद पेड़, घर के आगे लगे पत्थर के बेंचो पर बैठे बुजुर्ग दम्पति, कहीं किताब पढ़ता युवक, तो कहीं चोंच मिलाता प्रेमी युगल, इम्तियाज़ अली के किसी फिल्म का सुंदर दृश्य लग रहा था| अगर आपने मुंबई का नरीमन पॉइंट देखा है, तो इस बीच की थोड़ी कल्पना आप कर सकते हैं| यहीं बैठे-बैठे, समन्दर की लहरों को देखते हुए, मेरे अन्दर पुदुच्चेरी के लिए पहली बार प्रेम का जन्म हुआ| अचानक यह शहर अपना और जाना-पहचाना लगने लगा| मैंने हाथ में डंडा लिए पास खड़े लड़के को इशारे से बुलाया| “अब तुम हवा मिठाई खाओगे?”, दिव्या बोली| मैंने अपने लिए लाल वाला पैकेट लिया, दिव्या ने ब्लू वाला लिया| ब्लू वाला हवा मिठाई मैं पहली बार देख रहा था|
हवा मिठाई खाते हुए हम नेहरु स्टेचू के पास ‘हैंडी क्राफ्ट’ का प्रदर्शनी देखने के लिए चल दिए...| ‘सिर्फ देखना है, खरीदना कुछ भी नहीं है’, प्रदर्शनी के अंदर जाने से पहले मैंने दिव्या से कहा| “अन्दर जाने से पहले कल वाली जगह से गन्ने का जूस पी लें”, दिव्या बोली| ‘नेकी और पूछ-पूछ’|


Wednesday, 21 August 2019

उदासी, घुमकड़ी और पुदुच्चेरी!

21-Aug-2019
पहली बार जब गोवा गया था, तो वहां कोई 5-6 दिन रहा था| जब वहां से निकलने लगा तो दिल बड़ा उदास था, पता नहीं क्यों वहां से जाने का मन ही नहीं कर रहा था| उसी उदासी को मिटाने एक साल बाद फिर से गोवा गया, इस बार 15 दिन से भी ज्यादा रहा| पन्द्रह दिन में इतना उब गया गया कि इस साल दोस्तों ने जब गोवा चलने के बात की तो मैंने सिरे से खारिज कर दिया|
तरसों जब पुदुच्चेरी पहुंचा तो मैं कुछ बहुत खुश नहीं था| खुश नहीं था इसका मतलब ये नहीं है कि उदास था, लेकिन कुछ-कुछ उदासीन जैसा ज़रूर था| शहर बड़ा पराया-पराया लग रहा था, अजनबी लोग, अजनबी जबान और अपने उद्देश्य का भी ठीक-ठीक पता नहीं था कि हम यहाँ क्यों आए हैं| यहाँ आना बिलकुल जीवन में आने जैसा था, हम क्यों और कहाँ से आते हैं, कुछ भी तो पता नहीं होता है|
अरविन्द को मैंने थोड़ा पढ़ा है, सावित्री को कई बार उलट-पुलट कर देखा है, लेकिन जैसा लगाव मुझे रविन्द्रनाथ से है, वैसा अपनत्व मैंने कभी अरविन्द के साथ महसूस नहीं किया| अरविन्द के लिए मेरे हृदय में सम्मान जरूर है, लेकिन उनसे प्रेम मुझे बिलकुल भी नहीं है|
‘पास’ मिलने के पास जब हम मातृमन्दिर के लिए जा रहे थे, रास्ते पर चलते हुए मुझे देवघर के रास्ते की याद आ गई| वाहं भी ऐसी ही लाल मिट्टी पर चला करते थे| मातृमन्दिर का रास्ता कुछ-कुछ देवघर जैसा था| सुन्न, शांत, और सघन जंगल में चलते हुए कई बार ऐसा लगा जैसे अब कोई बोल-बम करता हुआ बगल से गुजरेगा|
रास्ते में पुराने बरगद और उसी के पास नारियल के पत्तों से बने पिरामिड को देखकर मन गदगद हो उठा| इतना पुराना बरगद बहुत दिन बाद देखा, 50 से अधिक जड़े ज़मीन में घुस कर तने बन गए थे| पेड़ के पास 'पेड़ पर न चढ़े' का बोर्ड लगा देख कर मन खिन्न हो गया| राव साहब जब मेरे गाँव आए थे, तब हम रोज़ सुबह गावं के सबसे पुराने तालाब के पास वाले मौलसिरी के वृक्ष के ऊपर बैठ जाते थे| वहां बैठ कर जैसी ब्रह्मचर्चा हम किया करते थे, वैसी गहन चर्चा पहले कहीं नहीं हुई थी| 'पहले मैं और साकेत साथ ही पास वाले स्कूल में पढ़ते थे, वह मेरे से तीन दर्ज़ा पीछे था| जब में चौथी कक्षा में आया तो दादाजी ने कहा कि अब इसका नाम सरकारी स्कूल में लिखा दो| एक दर्ज़ा छोड़ कर मेरा नाम पांचवी कक्षा में लिखवा दिया गया| घर से हम दोनों भाई साथ स्कूल के लिए निकले| आज मुझे अलग स्कूल में जाना था| साकेत मुझे नए स्कूल तक छोड़ने के लिए इसी पेड़ के नीचे तक आया था| इस टहनी के नीचे हम दोनों खड़े थे| हमारा पुराना स्कूल सड़क के उस तरफ था| जब साकेत यहाँ तक मुझे छोड़ कर जाने लगा, तो मैं रोने लगा| पहली बार उससे दूर हो रहा था| आज भी मैं ख़ुद को इस पेड़ के नीचे खड़ा रोता हुआ देख सकता हूँ| साकेत मेरा थियो है|', पेड़ के ऊपर बैठे-बैठे मैंने राव साहब से कहा| आज यहाँ बरगद के पेड़ को देख कर मेरा उस पर चढ़ कर बैठने का बड़ा मन था, लेकिन उस बोर्ड ने मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया|
बतौर विजिटर आप मातृमन्दिर को सिर्फ दूर से देख सकते हैं| अंदर जाने के लिए आपको अलग से 'पास' लेना होता है| सुबह ८:३० से ११:३० तक अन्दर ध्यान होता है, जिसके लिए सूचना भवन के पास वाली ईमारत के पहली मंजिल से आपको 'अनुमति पत्र लेना होता है| हम जहाँ से खड़े हो कर मन्दिर को देख रहे थे, वहां से मंदिर आग के गोले की तरह दिख रहा था| 'आज चल के पास ले लेते हैं, कल ध्यान करने के लिए आएँगे', मैंने दिव्या से कहा| मेरी बात सुनकर उसने ऊँगली से एक ओर इशारा किया हैं| लकड़ी की एक प्रतिमा मुंह पर ऊँगली रख कर चुप रहने को कह रहा था| मंदिर के लिए आते समय हमारी दोस्ती एक हैदराबादी दंपत्ति से हो गई थी, वे लोग पोज़ दे कर तस्वीर खींचने में व्यस्त थे| हम एक पेड़ के नीचे बैठ कर मंदिर को देखने लगे|
‘हैदराबादी लोगों की हिंदी कॉमेडी लगती है मुझे”, दिव्या बोली| ‘यही मैं उस प्रोफेसर से कह रहा था| इनके यहाँ की दो फिल्म मैंने देखी है, ‘हैदराबादी बिरयानी और अँगरेज़’ दोनों मुझे अच्छी लगी थी|’, मैंने दिव्या से कहा| “वो प्रोफेसर हैं? उनकी पत्नी मुझसे कह रही थी कि वो अपने पति से बहुत परेशान है| घर पर तो ठीक रहते हैं, पता नहीं कहीं घूमने आने पर उनको क्या हो जाता है|”, दिव्या बोली| ‘यात्रा में अक्सर लोगों के व्यक्तित्व का नया पहलु खुल कर सामने आता है, शांत बातूनी हो जाता है, बातूनी बदमाश और बदमाश सज्जन|, चीन में कहते हैं अगर किसी व्यक्ति को पूरा-पूरा जानना हो तो उसके साथ यात्रा पर ज़रूर जाना चाहिए’, धीरे से मैंने कहा| “अब यहाँ से चलो, कल के ध्यान के लिए पास ले लेंगे, फिर पुदुच्चेरी कौतुकालय चलेंगे, वहीं एक पुराना चर्च (Basilica of the Sacred Heart of Jesus) भी है, हम वहां भी चल सकते हैं|”, दिव्या बोली| ‘नहीं, तुम पहले ‘अरविन्द आश्रम का पता करो कि वह कहाँ है, यहाँ से हम पहले वहीं चलेंगे|’, मैंने कहा|
इंफोर्मेशन सेंटर से पता चला कि पास के लिए कल सुबह आना होगा| मंगलवार को पास नहीं मिलता है| ‘चलो कैफे में चल कर कॉफ़ी पीते हैं’, मैंने दिव्या से कहा| हमने एक होममेड समोसा और मद्रासी कॉफ़ी ऑर्डर किया| एक समोसा 30 रूपये का था, और कॉफ़ी 40 रूपये का| ओशो आश्रम की तरह कैपेचिनो यहाँ भी 130 रूपये की थी| थोड़ी देर बाद, हमारा आर्डर आ गया| पीतल के कटोरे में एक पीतल का ही ग्लास था, जिसमे कॉफ़ी भरा था| ऐसी कॉफ़ी हमने एक बार राव साहब के साथ खजुराहो में पी थी| मेरे ख्याल से जिस कैफे में हमने ये कॉफ़ी पी थी, उसका नाम ‘मद्रास कैफे’ था| समोसे के अंदर डोसे का मसाला भरा हुआ था| “अरविन्द आश्रम, पुदुच्चेरी संग्रहालय के पास ही है”, मोबाइल देखते हुए दिव्या बोली| “आश्रम 2 से 6 खुला रहता है| अब चलो यहाँ से, घर चल कर खाना आर्डर कर देते हैं, फिर खा कर आश्रम चलेंगे”, दिव्या बोली| ‘पहले कॉफ़ी तो खत्म कर लूं’, मैंने कहा| पीतल का पात्र काफी गर्म हो गया था| ‘कॉफ़ी कम और झाग ज्यादा था’, ग्लास रखते हुए मैंने दिव्या से कहा|


जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...