सुबह उठकर 8:45 पैतालीस से पहले हमें विडियो
रूम में पहुंचना था| इसीलिए बिना समय गवाएँ हम रात
जल्दी सो गए| हम उत्साहित थे, गोल मंदिर के अन्दर जाना
पोंडिचेरी का सबसे बड़ा आकर्षण था| जब भी गूगल में
पोंडिचेरी या ओरोविल डालता था, सबसे पहले 'गोल मंदिर(मातृमंदिर) दिखता था| हमारे मेहसाना आश्रम निवास के
दौरान संजय स्वामी जब पहली बार आश्रम में
आए थे, तो वे हमसे जोरबा (आश्रम का
टी-शॉप) पर ओरोविल की बहुत सी बातें किया करते थे| वे ओरोविल में 13 साल रहे थे| उन्ही से ओरोविल के बारे में
सुन-सुन कर हमारे अन्दर यहाँ आने की वासना पैदा हुई थी| हाल-फ़िलहाल में मेरे एक जर्मन
मित्र ने जब मुझसे जर्मनी छोड़ कर ओरोविल में आकर बसने की बात की, तब ओरोविल में मेरी उत्सुकता और
बढ़ गई| एक मास्टर उगवे को छोड़ कर सबसे
मैंने अब तक पोंडिचेरी के बारे में सकारात्मक बातें ही सुनी थी| अमोल स्वामी से जब
मेरी बात हुई तब उन्होंने भी ओरोविल के लिए काफी प्रेरित किया, साधना फारेस्ट में ठहरने पर भी
उनका काफी जोर था| मानसून फेस्टिवल के दौरान पुणे
में माँ मुक्ति से हमारी बात हुई तो उन्होंने
भी पोंडिचेरी को काफी सराहा| हम 18 अगस्त को पोंडिचेरी पहुँच गए थे, चार दिन हमें मातृमन्दिर के
अन्दर जाने का पास लेने में लग गया| सुबह ध्यान में
नींद न आए इस लिए हम दस बजे से पहले ही, बिना कोई फिल्म देखे, सोने चले गए|
नींद में किसी के
गेट पीटने की आवाज़ सुनाई दी, टाल कर मैं सो
गया| एक मिनट बाद फिर से आवाज़ आई, अब दिव्या भी जाग गई| मुझे लगा सुबह हो गई है, रूम सर्विस वाला आया होगा| घड़ी में समय देखा था, तो सुबह के 3 बज रहे थे| इतनी सुबह कौन गेट पीट रहा है? मैंने ख़ुद से सवाल किया| रूम से निकल कर हॉल में आया| गेट में शीशा लगा है, लेकिन बाहर की लाईट बंद होने की
वजह से मैं किसी को भी देख नहीं सकता था| थोड़ा संशय के साथ
मैंने गेट खोला| लुंगी लपेटे दो अधेड़ उम्र के
पुरुष खड़े थे| एक के मुंह से शराब की गंध आ
रही थी| मुझे थोड़ा डर लगा| हम जिस बिल्डिंग में रह रहे हैं, वह है तो मुख्य सड़क के पास ही
लेकिन थोड़ा सुनसान जैसा है| नीचे रिसेप्शन पर भी कोई नहीं
रहता है| अपने बगल और नीचे वाले फ्लैटों
में भी हमने अभी तक किसी को रहते नहीं देखा है| छत पर जिम है, जिसके लिए कई लड़कों को हमने ऊपर
नीचे आते-जाते देखा है| रूम सर्विस के लिए चार बार कॉल
करने पर एक बार दो लड़के आते हैं| वो भी तमिल में
क्या बोलकर चले जाते हैं, हमें कुछ समझ में नहीं आता है| “आपने अपना आईडी कार्ड दिया है”,
टूटी-फूटी अंग्रेजी में एक ने मुझसे पूछा| मैं अभी भी आधी नींद में था, दिमाग पूरी
तरह से काम नहीं कर रहा था| ‘हाँ लड़के ने हमारे कार्ड का फोटों खींच कर ले गया था’,
दिमाग पर जोर डालते हुए मैंने कहा| “ये लड़की यहाँ रह रही है?”, अपनी मोबाइल में एक
फोटो दिखाते हुए उन्होंने मुझसे पुछा| फोटो वाली लड़की को मैं नहीं जानता था, उसका
मुंह लम्बा था और बालों में फूलों का गजरा लगा हुआ था| ‘इस लड़की को मैं नहीं जानता’,
मुझे अब थोड़ा गुस्सा आने लगा था| “क्या आप अपना आईडी कार्ड दिखा सकते हैं”, एक ने
निवेदन करते हुए मुझसे कहा| उनके बातचीत के ढंग से मुझे लगा शायद ये गुंडे, ठग या
बदमाश हैं| “यह लड़की गायब हो गई है, FIR दर्ज हुआ है”, इसीलिए हम जांचपड़ताल कर रहे
हैं| अब मैंने थोड़ी राहत की सांस ली-पुलिस हैं| गेट बंद करके मैं अंदर ID कार्ड
लेने आया| जब मैं कार्ड लेकर आया दिव्या भी मेरे साथ आ गई| उन्होंने हमारे कार्ड
को देखा और फिर हमसे मांफी मांगने लगे, “सा’अरी हमने आपकी नींद ख़राब की|” इससे
पहले कि मैं उनसे कुछ कहता “कोई बात नहीं” बोल कर दिव्या ने गेट बंद कर दिया|
रूम में आने के
बाद दिव्या इस घटना के बारे में बात करना चाहती थी, वह थोड़ी डरी हुई भी थी| लेकिन
कुछ भी बोल कर मैं नींद ख़राब नहीं करना चाहता था| सिर ढक कर मैं सो गया| सिर ढकते
समय माधोपुर आश्रम में वकील साहब की कही एक बात मुझे याद आ गई, “किस-किस को याद
करें, किस-किस को रोइए, आराम बड़ी चीज़ है, सिर ढक कर सोइये”, वाह...वकील साहब
वाह...!
सुबह उठने के बाद रात के बारे में बिना कोई डिस्कशन किए, हम तैयार होकर मातृमन्दिर
की ओर भागे| रास्ते में एक जगह मैं नारियल पानी पीना चाहता था, लेकिन दिव्या ने
समय कम है कह कर टाल दिया| हालाँकि 8:15 पर हमने घर छोड़ दिया था, 8:30 तक हम ‘विडियो’
रूम तक पहुँच जाने वाले थे| हमारे हाथ में पन्द्रह मिनट फिर भी थे, मेरे ख्याल से
नारियल पानी पीने के लिए इतना समय पर्याप्त होता है| खैर, मेरे पिता जी कहते हैं, ‘स्त्री,
शराबी, पागल और नाबालिग से कभी भी किसी बात पर बहस नहीं करनी चाहिए| पिताजी के
नसीहतों का पालन करते हुए, मैंने दिव्या से बहस नहीं की| अपने पसंदीदा गुलमोहर पास
भी मेरा मन रुकने का था, लेकिन मैं गाड़ी भागता रहा|
ठीक आठ बजकर तीस मिनट पर हम विडियो रूम के बाहर खड़े थे| हमारे अलावा दस-बारह
लोग और खड़े थे| दो लोगो को छोड़ कर सभी भारतीय थे, ज्यादातर बुजुर्ग थे, और जो नहीं
थे वे दिख रहे थे| थोड़ी देर बाद एक भारतीय लड़की जिसकी उम्र कोई बीस साल होगी, एक
विदेशी लड़की के साथ आई| विदेशी की उम्र तीस से ज्यादा लग रही थी| भारतीय बाला उसे
ध्यान और समाधि के बारे में समझा रही थी| नए लोगों को, गेट के बाहर खड़ा स्टाफ पेड़
के नीचे बने पत्थर के बैंचों पर बैठ कर इंतजार करने को कह रहा था|
9 बजने के कुछ मिनट पहले हमें विडियो रूम में ले जाया गया| रूम किसी छोटे
सिनेमा घर जैसा था| बैठने के लिए सीमेंट की सीढ़ी बनी हुई थी, जिसपर कुश (या कुश
जैसी किसी दूसरे घास की) चटाई बिछी हुई थी| सामने एक छोटा पर्दा लगा हुआ था, जिस पर
प्रोजेक्टर की रौशनी पड़ रही थी| थोड़ी देर बाद जब सारे लोग अन्दर आ गए तो सभी गेट
और लाईट बंद कर दिये गये| लाईट बंद होने से पहले मैंने अपनी पंक्ति में बैठे लोगों
की संख्या को गिना था | एक लाइन में 12 लोग बैठे थे| मतलब हॉल में कुल 60 लोग थे|
माता जी (श्री अरविन्द की अध्यात्म संगनी) की आवाज़ से साथ विडियो शुरू हुआ|
फिर मेल वाईस-ओवर के साथ विडियो शुरू हुआ| विडियो में कोई ख़ास जानकारी नहीं थी| जितनी
बातें विडियो में बाताई गई, वो सब दो दिन पहले सूचना भवन से हमें पता चल गई थी|
फिर भी विडियो प्रभावशाली था, बैकग्राउंड संगीत, आवाज़ के संग चलने वाला क्लिप मन पर
अच्छा प्रभाव छोड़ रहा था| विडियो ख़त्म होने के बाद हमें बस तक ले जाया गया| बस में
बैठते समय मैंने नोटिस किया कि अन्दर बैठे 60 फीसदी से ज्यादा लोग उत्तर भारतीय
हैं, हमारे आगे वाली सीट पर बैठा दम्पति संभवतः ब्रिटेन का था|
क़रीब पांच मिनट की बस यात्रा के बाद हम अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच गए| जिन
लोगों के पास पर्स और मोबाइल था, वे उसे जमा करने के लिए ‘जमा काउंटर’ के सामने
लाइन में लग गए थे| जो लोग अपना सामान हमारी तरह रूम पर छोड़ कर आए थे, वो पानी
वाले मशीन से पानी पीने लगे| कुछ लोग इधर-उधर खड़े होकर अपने आसपास का मुआयना करने
लगे| हम जहाँ खड़े थे मातृमन्दिर वहाँ से 200 मीटर की दूरी पर था| जब सभी लोगों का
सामान जमा हो गया तब हमें एक पेड़ के नीचे ले जाया गया| वहीँ एक गोल घेरे में कटीले
पेड़ों के अनेकों प्रजातियां लगी हुई थी| पेड़ के नीचे बैठने के लिए बैंच बना हुआ
था| कुछ लोग बैंच के नीचे बैठ कर अगले निर्देश का इंतजार करने लगे|
थोड़ी देर बाद मध्यम हाईट की एक फिरंगी स्त्री, जिनकी उम्र 80 के करीब होगी,
हमें बुला कर एक दूसरे पेड़ के नीचे ले गई| पेड़ के नीचे बने पत्थर के बैंचों पर
हमसे बैठने को कहा गया| उनकी आवाज़ बहुत ही पतली और कमज़ोर थी| पीछे के बैंचों पर
बैठे लोग उनको बहुत मुश्किल से सुन पा रहे थे| मजबूरन उन्हें कुछ लोगों को बुला कर
अपने पास खड़ा करना पड़ा| खड़े होने वाले लोगों में हम दोनों भी थे| उन्होंने कोई बीस
मिनट हमसे एकतरफा बातचीत की| उन्होंने जितनी बातें बताई, उनमे से करीब-करीब ७० फीसदी
बातें हम अभी कुछ देर पहले ही विडियो रूम से सुन कर आए थे| अभी तक हमें जो कुछ
बताया, समझाया या फिर दिखाया गया था, वो सब मुझे अनावश्यक लगा|
20 मिनट के उबाऊ भाषण के बाद हम उनके पीछे-पीछे मन्दिर के लिए विदा हुए| मंदिर
से पहले एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ आया| पेड़ के अनेक जड़े जमीन से लग कर मोटे और
मज़बूत तने बन गए थे| पेड़ के पास से गुज़रना मुझे बहुत ही सुखद और शान्तिदायक लगा|
पेड़ के एक तने को छूकर मैंने अपना अनुग्रह प्रगट किया| बूढ़े और पूराने पेड़ों को
देख कर कई बार अनायास ही मेरी आँखे भर आती है|
पेड़ से गुजरने के बाद हम मंदिर के नीचे आ गए| मंदिर को पास से देखना किसी बहुत
ही बड़े करिश्मे को देखने जैसा था| ऐसा अभूतपूव और भव्य मंदिर मैंने इससे पहले कहीं
नहीं देखा था| मंदिर के आसपास के आबोहवा में एक सघन शांति और मौन को मैंने महसूस
किया| सूर्य के सामान देदीप्यमान पीतल के चक्रों से बने इस गोल मंदिर को देख कर
मेरा दिमाग एकदम गोल हो गया| एक जगह हमसे चप्पल उतारने को कहा गया| चप्पल उतारने
के बाद हमें मंदिर के नीचे ले जाया गया| मंदिर अब हमारे सिर के ऊपर था| नीचे जहाँ
हम खड़े थे वहां एक गोल चबूतरा बना हुआ था, जिसके बीच में सफ़ेद पत्थरों का एक कमल फूल
बना हुआ था, फूल के बीच में एक सफ़ेद गोला (क्रिस्टल) रखा हुआ था| कमल कुछ इस ढंग
से बना था कि हुआ था कि उसके पत्तियां ऊपर की ओर जाने के वजाय नीचे की ओर जा रही
थीं| ऊपर की पंक्तियों से होकर पानी का अविरल प्रवाह नीचे क्रिस्टल के गोले तक जा
रहा था| पूरा दृश्य बड़ा ही सम्मोहक और मुग्ध कर देने वाला था| यहाँ हम सारे लोग
गोलाकार बैठ गए| यहाँ हमें बीस मिनट ध्यान करना था| मेरे बाईं ओर जो दो लड़कियां
बैठी थी, उनसे जींस की वजह से सुखासन में बैठा नहीं जा रहा था, मजबूरन उन्हें
गोदुग्धा आसन (उकडू) बैठना पड़ा| कुछ लोगों ने अपनी आँखें बंद कर ली, कुछ आँखे खुली
रख कर क्रिस्टल बॉल पर अपना ध्यान क्रेंद्रित करने की कोशिश कर रहे थे| मेरी आँखे
आश्चर्य से इतनी फटी हुई थीं कि मैं चाह कर भी उन्हें बंद नहीं कर पाया| मेरी तरह
ही एक फिरंगी युवक आखें फाड़े सबको देख रहा था| सामने लाल पत्थर का एक कमल की
पंखुड़ी के आकर का भवन था, जिस पर काम चल रहा था, मजदूरों के बैठने व काम करने के
लिए उसके चारों तरफ लोहे का टाट बंधा हुआ था| उसी टाट पर एक स्टील की केतली टंगी
हुई थी| शायद केतली में थोड़ी चाय रह गई थी| दो कव्वे अपने चोंच से केतली को इधर
उधर हिला रहे थे| सामने खम्भे के पास बैठी औरत बेमन से अपनी ड्यूटी निभा रही थी|
दिव्या आँखे बंद करके ध्यान में लीन थी| उसके पुतलियों की हरकत से मुझे ऐसा लगा कि
वह आँखे बंद कर के बड़ी तेज़ी से कुछ सोच रही है|
बीस मिनट बाद घंटी की आवाज़ आई,
हम सब उठकर खड़े हो गए| दो लोग हमारी अगुवाई के लिए सीढ़ीयों के पास खड़े थे| हमें
पंखुड़ी नुमा लाल भवन में ले जाया गया है| पतली गलियों से गुजरते हुए मैंने देखा, एक
बंद कमरे में बहुत से सफ़ेद गोल गद्दे रखे थे, एक व्यक्ति आखें बंद किये ध्यान कर
रहा था| मुझे अजंता की याद आ गई वहां भी इसी तरह बौद्ध साधकों ने ध्यान करने के
लिए सामूहिक जगह के अलावा पर्सनल चेम्बर्स बना रखे थे| शुरू-शुरू में समूह में
ध्यान करना सहयोगी रहता है, लेकिन बाद में साधक को अकेले ही ध्यान करना चाहिए| ध्यान
के लिए पर्सनल चेम्बर्स मेहसाणा के पास वाले गोयंका विपसना ध्यान केंद्र में भी
था| गोल पगडंडीयों जैसे रास्ते से होते हुए हम एक सफ़ेद और लाल रौशनी वाले कमरे में
पहुंचे| कमरे में सफ़ेद रंग का एक लम्बा बैठने का बैंच बना हुआ था| एक विदेशी महिला
ने हमें बैंच पर बैठकर सफ़ेद मौजे पहनने का निर्देश दिया| पेंट के निचले हिस्से को
मौजे के अन्दर डालना था| यह क्रिया ओशो की समाधि से थोडा भिन्न था, वहां सिर्फ
सफ़ेद मौजे पहनने होते हैं, पतलून के निचले हिस्से को आप खुला रख सकते हैं| वैसे
आमतौर पर रोब के नीचे बहुत कम सन्यासी ही पजामा पहनते हैं|
मौजे पहनने के बाद गोल सीढ़ियों से हम ग्लोबाकार मंदिर के अन्दर-अन्दर से उसके
उपरी चैम्बर में जा रहे थे| सफ़ेद गद्देदार सीढ़ी (सीढ़ी कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि
स्टेप्स नहीं थे, सिर्फ ऊपर उठता हुआ सफेद गद्देदार सोपान था), सफ़ेद रौशनी, और
सफ़ेद मौजे में हम सब मौन साधे अवाक अवस्था में चल रहे थें| आँखों से जो दिख रहा था
वह इतना अनूठा और अभूतपूर्व था कि हमारी आँखों में समा नहीं रहा था| यह सोच कर कि
इतना बड़ा आयोजन सिर्फ ध्यान करने के लिए किया गया है, मेरे भीतर कुछ घटित हो रहा
था| रह-रहकर मैं अपने भीतर मीठी सिहरन महसूस कर रहा था| ऐसा ही मैंने अजंता में भी
महसूस किया था| वहां आखिरी मंदिर में, मरने से पहले बुद्ध एक पेड़ के नीचे लेटे
हुए हैं, भिक्खु उनके चारों तरफ बैठे हैं, उस प्रतिमा को देखकर मैं फूट-फूट कर
रोने लगा था|
इतना सब कुछ, ये सारा आयोजन ध्यान के लिए हैं, ये देखकर मेरा हृदय आल्हाद से
फटा जा रहा था| मैं सुखद अनुभूतियों से गुज़र रहा था|
कुछ देर पहले नीचे कमल के पत्त्तों के बीच प्रतिष्ठित गोल क्रिस्टल को देखते हुए जो
मौन घटा था, उससे चीज़ों को देखने और महसूसने की क्षमता बढ़ गई थी| सौन्दर्यबोध सघन
हो गया था| सीढीयों पर चलते हुए ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी मायालोक में चल रहे
हैं| बस देवी-देवताओं की कमी थी, बांकी माहौल एक दम साकेत जैसा था|
कुछ मिनटों तक चलने के बाद हम एक विशाल हॉल में पहुंचे| यह मुख्य ध्यान कक्ष
था| कक्ष के बीचो-बीच एक विशाल क्रिस्टल गेंद रखा हुआ था, जिस पर ऊपर से रौशनी गिर
रही थी| पेड़ के नीचे विदेशी महिला ने हमसे कहा था कि यह सूरज की रौशनी है, आईनों
की मदद से उन्हें, बॉल तक लाया जाता है| बॉल एक स्टैंड पर रखा हुआ था, जो मेरे
ख्याल से पीतल का था, सोना भी हो सकता है| हॉल की क्षमता पांच सौ से ज्यादा लोगों
की थी| बॉल के चारों तरफ बैठने के लिए कुशन बिछे हुए थे| हम लोग उन्ही कुशनों पर
बैठ गए| दिव्या टेका लेने के लिए दिवार के लगे हुए कुशन पर बैठ गई| कुछ पीठ-रोगी पास
लगे सफ़ेद कुर्सीयों पर जा बैठे| हॉल को खड़ा रखने के लिए चारों तरफ संगमरमर के मोटे-मोटे
विशाल खम्भे लगे हुए थे|
जैसे ही मैं अपनी जगह पर बैठा मुझे मौन की आवाज़ सुनाई देने लगी| पूरे हॉल में गहन
मौन पसरा हुआ था, बाहर से किसी भी प्रकार की कोई आवाज़ अन्दर नहीं आ रही थी| हॉल एकदम
साउंडप्रूफ़ था| कुछ मिनटों के बाद मुझे अपने हृदय और रगों में दौड़ते लहू की आवाज़
सुनाई पड़ने लगी है| सन्नाटे की ऐसी सघन अनुभूति इससे पहले मैंने कहीं नहीं की थी|
पूरा कक्ष सफेदी के अलौकिक आलोक में डूबा हुआ था| वाह! अति सुन्दर!
कुछ मिनटों के बाद मैं कमरे के मौन और शान्ति से बेचैन होने लगा| अचानक से
मुझे किसी चीज़ की कमी खलने लगी| कमरे की शांति मुझे मरी हुई शान्ति लगने लगी, मौन
मातमी लगने लगा| सबकुछ मरा-मरा-सा लगने लगा| मैंने पाया कि शांति के साथ संगीत का
समन्वय होना बहुत ही ज़रूरी है| कक्ष में शान्ति तो थी, लेकिन संगीत नहीं| संगीत के
बिना शान्ति शोर से भी ज्यादा बेहूदा लगने लगी| मैं फिर कल्पना करने लगा| काश! इन
संग-ए-मरमर के खम्भों की जगह यहाँ पेड़ लगे हुए होते| पेड़ पर बैठे पक्षियों का संगीत
होता, उनके गीत से ये मौन और गहरा हो जाता| इससे सुन्दर तो मरघट का मौन होता है|
माना कि वहां के मौन में उदासी पसरी होती है, लेकिन प्रकृति का सानिध्य व संगीत तो
होता है| कुछ नहीं तो कुत्ता ही भौंकता रहता है| रात झींगुरों की आवाज़ होती है| यहाँ
तो कुछ भी नहीं था, संगीत के आभाव में मौन एकदम एकाकी और उदास लगा मुझे|
आँखे खोल कर मैं कुछ देर तक क्रिस्टल बॉल को देखता है| पलक नहीं झपकने की वजह से
मेरी आँखों से पानी गिरने लगा| मैंने थोड़ी देर के लिए आँखे बंद कर ली| फिर मेरी खोपड़ी
चलने लगी| कितना सुन्दर होता यदि यहाँ क्रिस्टल बॉल की जगह एक जीवंत कमल या गुलाब
का फूल होता!
मुझे समझ में आ गया कि यह ध्यान कक्ष मेरे लिए नहीं है| परमात्मा मेरे लिए
जीवन का पर्याय है, जीवन से अलग नहीं, जीवन विरोधी तो बिलकुल भी नहीं| पक्षी, पेड़,
आकाश, बारिश, समंदर और झिगुरों के संगीत के दूर होकर इस कृतिम शान्ति में मेरा दम घुटने
लगा| ओशो आश्रम में हम ध्यान में बैठने से
पहले नृत्य करते हैं, जीवन का उत्सव मानते हैं, गीत गाते हैं, यहाँ हमें सीधे ही
सफ़ेद मौजा पहना कर बैठा दिया गया था| इतने नीरस तरीके से ध्यान में बैठना मुझे जम
नहीं रहा था| उपनिषद ने हमें सिखाया है कि परमात्मा ‘रस रूप है-रसो वै सः! यहाँ मुझे
सभी प्रकार के रस की कमी लगी| ऐसा ही मुझे पुणे आश्रम के पिरामिड में भी लगता है|
वहां भी सब कुछ मरा-मरा-सा लगता है| इसीलिए पुणे में मैं सिर्फ ओशो की समाधि पर
ध्यान करने जाता हूँ|
20 मिनट बाद एक पीली रौशनी दो बार जलकर बंद हो गई| यह इस बात का संकेत था कि
हमारा समय पूरा हो गया| हम सब जिस रास्ते से आए थे, उसी रास्ते से मौजे वाले रूम
में वापिस आ गए हैं| मौजे उतारने के बाद अपना-अपना चप्पल पहनने के लिए हमें बाहर
लाया गया| चप्पल पहनने के बाद बरगद के पेड़ से गुजरते हुए हम फिर बस तक आ गए| इस
बार मुझे बस की पहली सीट पर बैठने का मौका मिला| रास्ते में पेड़ों और हँसते खेलते परिंदों को देखकर मेरी साँसे वापिस लौटी| आँखों को आराम मिला, हृदय गति फिर से
नार्मल हो गई|
मनुष्य अपने हाथों से चाहे कितनी ही सुन्दर चीज़ें क्यों न बना ले, परमात्मा
द्वारा रचित एक साधारण घास की पत्ती के सामने भी उसका सौन्दर्य दो-कौड़ी का हो जाता
है| सुबह ओस से भीगे गुलाब पर प्रभाकर की पहली किरण जब उतरती है, तो उसके सौन्दर्य
के सामने हजारों ताज़महल की रौशनी फीकी पड़ जाती है|
