Wednesday, 3 July 2019

मुक्ति सदा अनुभव से मिलती है, लोभ से नहीं

प्रश्न- स्वामीजी, जीवन में स्वास्थ्य, संगीत, गमो को श्रीण करने वाली विचारधारा इत्यादि पॉजिटिव बात मैं अपने में दोहरा सकता हूँ अभ्यास कर सकता हूँ| परिणामस्वरूप वो मेरी आदत बन जाएगी| परिणामस्वरूप उसके कुछ लाभ होंगे| इस तरह में कई आदतों को अपने में विकसित कर लूँगा| परंतु उस आदत में आनंद की कुछ सुगंध नहीं है| कुछ अप्रमाणिक कुछ कमी से महसूस होती है क्यों|
जवाब- मित्र, आनंद हमारा स्वाभाव है, उसके लिए कुछ करने की ज़रूरत नहीं है| आनंद को नहीं पाना है ‘दुःख’ के प्रति जागना है, और जैसे ही हम दुःख के प्रति जागते हैं, हम पाते हैं दुःख है ही नहीं| दुःख अहंकार की छाया है, और अहंकार यानि झूठ| पॉजिटिव विचार और नेगेटिव विचार दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं हो सकता है| कोई विचार पॉजिटिव है इसका बोध ही तभी हो सकता है, जब बैकग्राउंड में नेगेटिव विचार चल रहा हो| आदमी कभी भी पूर्णतया दुखी या सुखी नहीं हो सकता है, क्योंकि पूर्ण का कोई अनुभव नहीं होता है| सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, एक का अनुभव दूसरे के बिना नहीं हो सकता है| ‘अनुभव मात्र’ सदा विपरीत का होता है| इसीलिए मैं कहता हूँ कि कोई अभी अनुभव अध्यात्मिक नहीं होता है| सारे अनुभव मन के है| ‘आनंद’ का कोई अनुभव नहीं होता है- आनंद उस पावन दशा का नाम है, जब आप न तो दुखी होते हैं, और न ही सुखी| वस्तुतः जब आनंद होता है, तब हम वहां नहीं होते हैं| जब तक आप यह कहने के लिए मौजूद हैं कि ‘मैं आनंदित हूँ’ तब तक समझ लीजिए कि अभी आनंद नहीं घटा है|

इसीलिए आनंद पाने की फिकिर छोड़िये, कोशिश करके आनंद को नहीं पाया जा सकता है| जैसे कुत्ता लाख कोशिश के बावजूद भी अपनी पूछ नहीं पकड़ पाता है, वैस ही हम कितना भी कोशिश कर लें आनंदित नहीं हो सकते हैं| इसीलिए आनंद की चिंता लेनी वर्थ है| हम बस इतना कर सकते हैं कि जिस दुःख से डर कर हम भागते हैं, छुकारा पाना चाहते हैं, उसको एक बार जान लें, भागने से पहले एक बार उसका दर्शन कर लें| एक बार इस बात की तसल्ली कर लें कि दुःख सच में ही है, या फिर हम यूं ही भाग रहे हैं| अगली बार जब दुःख पकड़े तो एक छोटा सा प्रयोग कीजिए, आँख बंद करके भीतर इस बात की खोज कीजिए कि दुःख कहाँ है, और दुःख की वजह से शरीर में क्या-क्या घटित हो रहा है| ख़ुद से सवाल पूछिए कि इस वक़्त मैं क्या सोच रहा हूँ, और कैसा महूस कर रहा हूँ, शरीर में क्या-कुछ घटित हो रहा है| सब चीजों को भलीभांति समझने की कोशिश कीजिए| एक वैज्ञानिक की तरह निरपेक्ष भाव से बिना पहले से कोई राय कायम किये एक-एक विचार और भाव का इन्वेस्टीगेशन कीजिए...फिर जो कुछ भी आपकी पकड़ में आता है, जो भी अंतर दृष्टि मिलती है, उसको एक कागज़ में नोट कर के रख लीजिए... ऐसा सभी भावों के साथ आप कर सकते हैं| बेहतर हो कि सुख के साथ भी आप यह प्रयोग करके देखें| आप हैरान होंगे या जानकर कि शरीर सुख और दुःख दोनों में एक ही प्रकार से प्रतिकिया देता है| बस मन अलग-अलग व्याख्या कर लेता है|
बिना जाने बिना अनुभव किए हर चीज़ की व्याख्या कर लेना हमारी बीमारी है| अगर सुख या दुःख किसी के भी अनुभव में हम एक बार भी पूरे उतरें, तो एक अनुभव में ही मुक्ति संभव है| एक अगर हम क्रोध का ठीक से अनुभव कर लें, तो एक अनुभव में ही सदा के लिए क्रोध से मुक्ति मिल सकती है| मुक्ति सदा अनुभव से मिलती है, लोभ से नहीं| ‘मैं क्रोधी हूँ, और मुझे अक्रोधी होना है, यह लोभ की भषा है| इसीलिए जिज्ञासु बनिए, जीवन को समझने की कोशिश कीजिए, कुछ भी इतना जटिल नहीं जितना हमने मन से व्याख्या कर के बना दिया है|

Monday, 1 July 2019

जो मर चुके हैं, सिर्फ वही हमारे अपने होते हैं

प्रश्न- सर, प्रेम और घरवालों में क्या चुने कुछ समझ नहीं आ रहा है..!

किसी को भी मत चुनिए... वेट कीजिए!  दो विल्कप में से एक को चुनना हमेशा ख़तरनाक होता है... जिसको आप छोड़ेंगी वो आप से बदला लेगा...क्योंकि जो नहीं मिलता है, उसका आकर्षण हमारे मन में कई गुना बढ़ जाता है| चुनाव के पीछे संताप अपरिहार्य रूप से आ जाता है| एक भयंकर अपराध भाव पकड़ लेगा आपको| और यह भाव भीतर-ही-भीतर आपको खोखला कर देगा...| होर्से लुईस बोहर्स ने अपनी एक कविता में लिखा है, 
" जो मर चुके हैं, सिर्फ वही हमारे अपने होते हैं
सिर्फ़ वही चीज़ होती है हमारी अपनी, जिसे हम खो चुके होते हैं...
हर कविता समय के साथ एक शोकगीत बन जाती है...
जिन स्वर्गों को हमने ने खो दिया, उनके सिवा कोई स्वर्ग नहीं| 
(There are no paradises other than lost paradises.)"


जबतक प्रेम चॉइसलेस न बन जाए, तब तक वेट करना ही उचित है| इसीलिए मन के शांत होने का वेट कीजिए दोनों विकल्पों को आपस में लड़ने दीजिए, धीरे-धीरे दोनों आपने आप शांत हो जाएँगे, फिर उस शांति से एक बोध का जन्म होगा, उस बोध की रौशनी में जो ठीक लगे वही कीजिए| वह हमेशा ठीक होगा, उसको करके कभी अफ़सोस नहीं होगा, उसको करने के लिए ख़ुद को समझाना नहीं पड़ेगा...! कुछ सूत्र बना लीजिए जैसे- मैं नकारात्मक मनो दशा में कोई भी निर्णय नहीं लूंगी, अगर ले भी लिया तो उसको फाइनल निर्णय नहीं मानूंगी...
जैसे तलाब का पानी अगर गन्दा हो गया हो तो कुछ देर छोड़ देने पर मिट्टी अपने आप अन्दर बैठ जाता है, और पानी साफ़ हो जाता है, वैसे ही अगर आप शांत होकर मन के भावों को, बिना उनसे उलझे, देखती रहेंगी तो वे अपने आप शांत हो जाएँगे.... 
दूसरी बात, अगर प्रेम और घर वालों में चुनाव करना हो तो निःसंचोक होकर प्रेम का चुनाव करना चाहिए... लेकिन सवाल यह है कि 'क्या घर वालों से प्रेम नहीं है?'.... प्रेम कभी किसी व्यक्ति से नहीं होता है... वह हमेशा आपके भीतर होता है, और समय-समय पर अलग-अलग वस्तु और व्यक्ति पर प्रक्षेपित होता रहता है| अभी आपको लग रहा है 'इस व्यक्ति से प्रेम' है, कल हो सकता है यह प्रेम किसी और पर प्रक्षेपित होने लगे, तो आपको लगने लगेगा कि उस व्यक्ति से है.. कल को आपको यदि बच्चा होगा तो फिर उससे से हो जाएगा... इस का अर्थ हुआ कि प्रेम हमारे ख़ुद के भीतर है, और यह अलग-अलग समय व परिस्थिति से प्रभावित होकर अलग-अलग व्यक्ति व वस्तु पर आरोपित होता रहता है.। 
प्रेम आपका स्वभाव है, कुछ भी कर के आप उसे खो नहीं सकती हैं| घरवाले और प्रेमी, यदि दोनों भी छूट जाए, तब भी आपका प्रेम आपके पास ही रहेगा| प्रेम को खोने का कोई उपाय नहीं है| 

Sunday, 30 June 2019

लोभाविष्ट होकर कोई भी विधि या ध्यान करने से कोई फायदा नहीं है

प्रश्न -Swami ji प्रणाम। समझ कैसे पैदा होबताइये कृपा करके। आपका शुल्क अदा हो जाएगा।
प्रणाम!
‘कैसे’ का जवाब विधि होगा, और अगर ‘विधि’ से कुछ हो सकता था, तो फिर ‘समझ’ की जरूरत ही क्या थी? किसी भी विधि से समझ को पैदा नहीं किया जा सकता है| हाँ, यह हो सकता है कि विधि करते-करते किसी को विधि की निरर्थकता समझ में आ जाए| विधियों की उपयोगिता बस इतनी है कि एक दिन आपको उनकी निरर्थकता समझ में आ जाए| अब समस्या यह है कि अगर बुनियाद में नासमझी हो, तो विधि करते-करते जीवन गुजर सकती है, लेकिन समझ नहीं आएगी| तो, प्रश्न यह उठता है कि विधि करने से पहले जो समझ चाहिए वह समझ कहाँ से आएगा, और कैसे पता चले कि बुनियाद में क्या है?
सबसे पहली बात तो हमें यह समझना होगा कि ‘समझ’ को किसी भी उपाय से पैदा नहीं किया जा सकता है| कम-से-कम पहली बार तो ऐसा नहीं किया जा सकता है| पहली बार जब भी ‘समझ’ किसी के जीवन में आता है, तो वह प्रयास से नहीं आता है, वह हमेशा ‘प्रसाद’ की भांति आता है| और हर एक के जीवन में ऐसे दो चार क्षण आते हैं, जब समझ की किरण उसके उपर उतरी है| आमतौर, पर लोग उस किरण का कोई उपयोग नहीं करते हैं| किरण आती है और खो जाती है|
अब, दूसरी बात हमें यह समझना होगा कि ‘विधि से समझ को सिर्फ गहराया जा सकता है, उसे पैदा नहीं किया जा सकता है|’ इसीलिए विधि हमेशा सेकंडरी है| उस रात जब सिद्धार्थ गौतम ने बीमार, बुजूर्ग, और मरे हुए को देखा, तो उनके जीवन में समझ/बोध का अवतरण हुआ, फिर उस समझ/बोध को गहराने के लिए वे जंगल गए| फिर विधि किया, और एक दिन जाना की विधि वर्थ, और उसी दिन वे निर्वाण को उपलब्ध हुए|

जो सौभाग्य का क्षण बुद्ध के जीवन में आया, वह क्षण हमारे जीवन में भी आता है| एक बार नहीं बार-बार आता है, हजार बार आता है| लेकिन हमारी मूढ़ता ऐसी है कि उसको गहराने के बजाय हम उसको भूलाने और मिटाने में लग जाते हैं| दो, अतियों के क्षण में बोध जीवन में उतरता है.. अतिशय ख़ुशी के क्षण में और अतिशय दुःख के क्षण में| और पहलीबार बोध/समझ नकार के रूप में उतरता है| जैसे, जीवन वर्थ है, सब असार है, मैं बेहोश हूँ, मैं एक दिन मर जाऊँगा..| ऐसा अक्सर तब होता है, जब हमारा कोई अति निकट संबंधी मर जाता है, प्रेम संबंध टूट जाता है, या फिर ऐसी कोई अप्रत्याशित घटना घट जाती है, जो आपको एक दम से सेण्टर से बाहर फ़ेक दे| जैसे बड़ी लाटरी लग जाना, दुर्घटना हो जाना इत्यादि-इत्यादि|
जब भी जीवन में कभी सौभाग्य का ऐसा कोई क्षण आए तब विधि के द्वारा उसको गहराने की कोशिश करनी चाहिए| तब, विधि की बहुत उपयोगिता है| अन्यथा, ऐसे ही अपनी सुविधा से, लोभाविष्ट होकर कोई भी विधि या ध्यान करने से कोई फायदा नहीं है|

Wednesday, 19 June 2019

मादक द्रव्यों का सेवन


19-जून, 2019
कल शाम, जब हम ‘मून लाइट’ कैफ़े (धर्मकोट) में कॉफ़ी पीते हुए गपिया रहे थे, एक फिरंगी हमारी ओर देख कर ऐसे मुंह बना रहा था जैसे हमारी बातों को समझने की कोशिश कर रहा हो| उसकी कोशिश को देखकर मैंने उससे कहा, We are talking in Hindi.(हम हिंदी में बात कर रहे हैं)| इस पर उसने सर हिलाते हुए कहा, Yes, I know. I am just trying to get some words.” इस तरह से हमारी उससे बातें होने लगी| थोड़ी देर की बातचीत से पता चला कि वह इजरायल से है, और दो महीने से धर्मकोट में रह रहा है| उसके अलावा इजरायल के और भी बहुत से लोग इस वक़्त धर्म कोट में रह रहे हैं| देखा जाए तो जैसे अरम्बोल, गोवा में रूस वालों की तादात ज्यादा होती हैं, उसी तरह धर्मकोट में इजरायल वालों का बोलबाला है| कुछ दिन पहले एक शाम स्पेस आउट, कैफ़े में हमारी मुलाकात एक और इजरायली सैलानी, जिसका नाम सत्या था, से हुई थी| सत्या ने बताया की उसकी माँ को भारत से इतना प्यार है कि उन्होंने अपनी बेटी का नाम भी भारतीय रख दिया|  
खैर, अभी हम सत्या के बारे में यहाँ ज्यादा बात नहीं करेंगे| उसकी अपनी लम्बी कहानी है| मेरे मित्र राव साहब को कैसे सत्या से प्यार हुआ और, कैसे सत्या ने उन्हें धोखा दिया, उसकी कहानी फिर कभी| अभी जिस इजरायली सैलानी से मैं बात कर रहा हूँ, ‘मून लाइट’ कैफ़े में, मुझे उसका नाम नहीं पता है| बातचीत के दौरान मैं नोटिस करता हूँ कि बीच-बीच में वह अपने बैग से एक पैकेट निकालता है, पैकेट में कुछ काला (मिट्टी के लोई जैसा) पदार्थ है, जिसका एक छोटा-सा हिस्सा वह तोड़ लेता है, और फिर उसको खोट-खोट कर अपनी हथेलियों के बीच रखता है, फिर दोनों हथेलियों की मदद से सरसों के दाने जितना गोली बना कर एक छोटे-से बैग में रखता है| उसके बैग, जो इअरफोन के बैग से थोड़ा बड़ा है, में कोई सौ के करीब दाने हैं, जो उसने अभी तक तैयार किया है| जिज्ञासावश जब मैंने उससे यह पूछा कि वह क्या बना रहा है, तो पता चला की वह काला पदार्थ चरस (वह चरस को ‘जरस’ बोल रहा था) है, और वह सिगरेट में डालने के लिए उसके छोटे-छोटे दाने बना रहा है| फिर उसने यह भी बताया की उसके पैकेट में कोई 10 ग्राम चरस है, जिसे उसने आज ही 2000/- रूपये में खरीदा है| साथ ही उसने यह भी बताया कि उसने आज जो जरस यानि चरस खरीदा है, वह उतना अच्छा नहीं है, और थोडा मंहगा भी है|
‘यह पी कर तुम्हे कैसा लगता है’, मैंने अपनी अगली जिज्ञासा मिटाने व बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए उससे पूछा| “गांजा से इसका नशा थोडा अलग होता है, यह मेरे विचारों को कम कर देता है, और फिर जब मैं अपने आस-पास की चीजों को देखता हूँ, तो कुछ अलग तो नहीं दिखता, लेकिन फिर भी मैं उन्हें पहले से ज्यादा अच्छे से देख पाता हूँ, और उसके सौन्दर्य को ज्यादा महसूस कर पाता हूँ|”, गोली बनाते हुए उसने यह सब मुझसे कहा| ‘क्या तुम जानते हो कि ऐसी या फिर कह लो कि इससे बेहतर अवस्था को, बिना किसी मादक पदार्थ के सेवन के प्राप्त किया जा सकता है?’ उसने ना में सिर हिलाया| मैंने बोलना जारी रखा, ‘हमारे मुल्क में हम पांच ऐसे रास्तो को जानते हैं, जिनके जरिये तुम जिस अवस्था की बात कर रहे हों उसको पाया जा सकता है| पहला तरीका वही है जो तुम कर रहे हो, ‘मादक द्रव्यों का सेवन’| लेकिन इस रास्ते को हम सबसे खतरनाक रास्ता मानते हैं, और इस पर चलने वाले को हम ‘योगभ्रष्ट’ कहते हैं| तुम्हे हिन्दुस्तान में बहुत से ऐसे साधू-सन्यासी मिल जाएँगे जो मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं| यहाँ उन्हें हम बहुत अच्छी नज़र से नहीं देखते हैं| हालाँकि उन्हें हम साधू मानते हैं, क्योंकि उनकी जो खोज है, वह आनंद की है| लेकिन जिस मार्ग से वह आनंद को खोज रहे हैं, उस मार्ग को हम कुछ बहुत अच्छा नहीं मानते हैं| इस मार्ग पर चलकर जो अवस्था उपलब्ध होती है, वह वस्तुतः परमानन्द झलक मात्र है| इस अवस्था के लिए हमारे पास एक खास शब्द है, “जड़ समाधि”, जड़ समाधि यानि आनंद की एक ऐसी अवस्था जिसे जबरदस्ती मन पर थोपा गया हो, और उस अवस्था में मन मरा तो नहीं हो, बस थोड़ी देर के लिए सो गया हो| जो सो गया है वह जागेगा| और जागने के बाद पहले से ज्यादा उपद्रव मचाएगा| इसीलिए रोज़-रोज़ तुम्हे मादक द्रव की मात्रा बढ़ानी होगी, अन्यथा थोड़े दिनों के बाद मन इस द्रव का इतना आदि हो जाएगा कि इसका उस पर कोई असर ही नहीं पड़ेगा| मादक द्रवों के सेवन के कई घातक दुष्परिणाम हैं| शरीर और मन को जो क्षति पहुँचता है, वो तो गौण है| असली खतरा यह कि आध्यात्मिक रूप से यह तुम्हे इतना अपाहिज बना देगा कि तुम इस जीवन में सही रास्ते से कभी भी समाधि तक पहुँच ही नहीं पाओगे| इसीलिए हमारे मुल्क में मंदबुद्धि और नासमझों को छोड़ कर कोई भी आनंदित होने के लिए मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करता है|’, वह अब अपनी रीढ़ सीधी करके मुझे सुन रहा था|
चित्र साभार-गूगल 
दूसरा रास्ता है ‘मंत्र जाप’| अगर तुम किसी एक शब्द या मंत्र को बार-बार दोहराते रहो, तो भीतर एक प्रकार की तन्द्रा पैदा होने लगती है| विचार कम हो जाते हैं, और तुम्हे थोड़ी शांति और आनंद का अनुभव होता है| लेकिन इस अवस्था में भी मन पूरी तरीके से मरता नहीं है, बस तोड़ी देर के लिए सो जाता है| इसके भी कई दुष्परिणाम है| एक ही शब्द को बार-बार दोहराने से धीरे-धीरे तुम्हारी बुद्धि जड़ होने लगती है| और तुम अंत में मंद बुद्धि बन कर रह जाते हो| मंत्र के माध्यम से जो अवस्था उपलब्ध होती है, उसे भी ‘जड़ समाधि’ ही कहते हैं|’, अब उसने गोली बनाना भी बंद कर दिया था|
तीसरा रास्ता है ‘तपश्चर्या’| पहले दो रास्तों की तरह यह बहुत ज्यदा खतरनाक तो नहीं है, लेकिन आदमी की अपनी बेवकूफीयों की वजह से यह रास्ता भी पहले दो की भांति खतरनाक हो सकता है| बल्कि कुछ मामले में पहले दो से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है| क्योंकि यह शक्ति का मार्ग है| इस मार्ग पर चेतन मन पहले दो मार्गों की तरह ही सो जाता है, लेकिन अचेतन मन की कुछ सुप्त शक्तियां जागृत हो जाती है| और शक्ति के साथ खतरा सदा मौजूद है| इसीलिए किसी सच्चे सद्गुरु के देखरेख में यदि इस मार्ग की साधना की जाए तो इसे कई सुखद परिणाम हो सकते हैं| अन्यथा यह मार्ग सिवाय सेल्फ-टार्चर के और कुछ भी नहीं| आमतौर पर आत्मघाती लोग इस मार्ग में उत्सुक हो जाते हैं| ऐसे लोग खुद को दुःख पहुंचा कर आनंद लेते हैं| बिना सद्गुरु की देशना के इस मार्ग पर एक क़दम भी नहीं चलना चाहिए| इस मार्ग पर चलकर जो अवस्था उपलब्ध होती है, उसे भी जड़-समाधि ही कहते हैं|’, वह सुनने में पूरी तरह से तल्लीन था|
चौथा रास्ता है ‘ध्यान’| यह मार्ग पहले तीनों मार्गों से ज्यादा सुरक्षित है| इस मार्ग का साधक ध्यान की अलग-अलग विधियाँ जैसे विचारों को देखना, श्वास को देखना, झाजेन में बैठना, भक्ति करना, शरीर और मन के प्रति होश रखना, आदि- आदि कर के परम-आनंद की अवस्था को पाने की कोशिश करता है| इस मार्ग पर कोई 84,000 विधियाँ है, जिसके द्वारा साधक आनंद को पाने की कोशिश करता है| इस मार्ग पर ‘मन’ साधक का दुश्मन नहीं है| इसीलिए वह मन को मारना नहीं चाहता है| वह मन के पार तो जाना चाहता है, लेकिन मन को मारना नहीं चाहता| न ही मन से मुक्त होने की उसकी कोई चाह है| बल्कि वह मन से दोस्ती करके, अपनी खोज में मन का सहयोग लेता है| उसकी खोज सकारात्मक है, वही किसी भी चीज़ से लड़ता नहीं है, न ही किसी चीज़ का विरोध करता है| वह सर्व-स्वीकार की भाव दशा में जीने की कोशिश करता है| लेकिन इस सब के बावजूद भी वह उस परमतत्व या परमानन्द की अवस्था को पाने में सफल नहीं हो पाता है| हाँ, प्रयास से जितना पाया जा सकता है, उतना वह पा लेता है| उसे कई बार उस अवस्था की झलकें भी मिलती है, जिसको पा लेने के बाद सब पा लिया जाता है| जिसको जान लेने के बाद और कुछ जानने को शेष नहीं रह जाता है| लेकिन और इस अवस्था में अथाई रूप से नहीं ठहर पाता है| इसीलिए इस मार्ग का साधक जिस अवस्था को उपलब्ध होता है, उसे ‘सबीज समाधि’ कहते हैं| मन बीज रूप में इस अवस्था में मौजूद रहता है|
इस मार्ग पर चलना पहाड़ चढ़ने जैसा है, यह सबसे दुर्गम और कठिन मार्ग है| पहला मार्ग पहाड़ पर से उतरने जैसा है, एकदम सरल और सुगम| दूसरा उबड़-खाबड़ वाले रोड पर चलने जैसा है, पहले से थोडा कठिन लेकिन मुश्किल बिलकुल भी नहीं| तीसरा थोडा मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं| चौथा मार्ग दिखने में शुरू-शुरू में सरल लग सकता है, लेकिन जब आप चलना शुरू करेंगे तो पाएंगे कि यह बहुत ही कठिन है| इन्ही कठनाइयों से घबरा कर लोग पहले, दूसरे और तीसरे मार्ग को चुन लेते हैं|
पहले, दुसरे और तीसरे की तरह इस मार्ग के भी साइड-एफ्फेक्ट है| बिना गुरु या किसी मिस्ट्री स्कूल की मदद के इस मार्ग पर चलने की सोचा भी नहीं जा सकता है| इस मार्ग पर अगर आपसे जरा-सी भी चूक हुई, तो या तो आप पागल हो जाएँगे या फिर मर जाएँगे| मैंने अक्सर इस मार्ग के साधकों को पागल होते हुए देखा है|, अब वह मुझे सुनते हुए कॉफ़ी पी रहा था|
पांचवा रास्ता है-समझ’| अगर इमानदारी से कहें तो पांचवा मार्ग वस्तुतः कोई मार्ग नहीं है| पांचवे पर चलना यानि ‘अमार्ग’ पर चलना| इन फैक्ट, पांचवे पर चलना होता ही नहीं है| आप अभी इसी वक्त जैसे हैं, वैसे ही बिना किसी तैयारी के आनंद को उपलब्ध हो सकते हैं| कुछ भी करने, कहीं भी जाने की कोई जरूरत नहीं है| आँख खोलने और बंद करने के लिए जितने श्रम की जरूरत होती है, उतने भी श्रम की जरूरत नहीं है समाधि को पाने के लिए| पांचवे मार्ग का साधक (हालाँकि उसे साधक कहना ठीक नहीं है), अपने समझ से जिस अवस्था को उपलब्ध होता है, उसे ‘सहज समाधि’ की अवस्था कहते हैं| कुछ परम्परा में इस अवस्था को ‘निर्बीज समाधि’ की अवस्था भी कहते हैं| क्योंकि इस अवस्था में ‘मन’ बीज रूप में भी नहीं बचता है| इसी अवस्था को नानक ‘अमनिय अवस्था’ और झेन फ़कीर ‘नो-माइंड’ कहते हैं| यही बुद्ध का ‘नो सेल्फ’ और नागार्जुन का ‘शून्यवाद’ है|’, थोड़ी देर के लिए मुझे अपनी बात को रोकना पड़ा, उसका एक दोस्त उसे बुलाने के लिए आ गया| उसने अपने दोस्त को हाथ के इशारे से पांच मिनट के लिए रुकने के लिए बोला| और फिर मेरी तरफ मुख़ातिब होकर, इशारे से मुझे बात जारी रखने को बोला|
‘पांचवे मार्ग पर जो समझ चाहिए अक्सर वह समझ चौथे मार्ग पर चलने व असफ़ल होने के बाद आता है| लेकिन यह अपरिहार्य नहीं है| चौथे मार्ग के साधक को अक्सर मार्ग की निरर्थकता दिख जाती है, लेकिन शुरू के तीन मार्गों पर चलने वाले शायद ही कभी कोई इस चीज़ को समझ पाता है| अक्सर तो यह होता है कि वह चलने और चलते चले जाने का इतना आदि हो जाता है कि चाह कर भी खुद को रोक नहीं पाता है|
‘समझ’ मंजिल और मार्ग दोनों है| समझपूर्वक अगर चला जाए तो पहले मार्ग पर चल कर भी परम-आनंद को पाया जा सकता है| और अगर बुनियाद में नासमझी हो तो चौथे मार्ग पर चल कर भी सिवाय भटकने के और कुछ हाथ नहीं लगता| समझ पूरी हो तो एक कदम भी चलने की जरूरत नहीं है| और अगर समझ नहीं है, तो किसी भी मार्ग पर चलने से पहले अपने भीतर समझ पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए|’ इससे पहले कि मैं उसे यह बताता कि ‘समझ’ को कैसे पैदा किया जाए| उसका दोस्त उसे फिर से बुलाने के लिए आ गया| दुःख प्रगट करते हुए उसने हमसे फिर से मिलने की उम्मीद के साथ विदा लिया|
-Ikkyu Kensho Tzu

Sunday, 7 October 2018

इसे déjà vu कहते हैं



माँ देवयानी और स्वामी अमित शिविर के संचाल थे। शिविर का नाम था ‘यूथ कैम्प’। ओपनिंग के दिन टोटल बारह पंद्रह लोग ही आए हुए थे। अगले दिन मैं सुबह नहा धोकर ‘सक्रिय ध्यान’ के लिए गया। स्वामी अमित ने ध्यान के सारे चरण डेमो के साथ समझाया। सबकुछ ठीक लगा लेकिन दूसरे चरण में पागल होने वाली बात समझ नहीं आई- मैं यहाँ पागल होने आया हूँ या ठीक?। खौर, म्यूज़िक के साथ ध्यान शुरू हुआ, इन्स्ट्रक्शन था कि पूरे एक घंटे आँख नहीं खोलना है, लेकिन मैं हर दो मिनट पर एक बार आँख खोलकर सबको देख लेता था। दूसरे चरण में जब सब चीख़ने-चिल्लाने लगे तो मैं एकदम से सहम गया-ये क्या खेला हो रहा है? थोड़ी देर बाद मुझे तेज़ हँसी आने लगी- ध्यान के नाम पर ये पागल कर देंगे क्या हमको? सोचने लगा, बाहर निकल जब दोस्तों से कहूँगा कि एक ऐसी भी दुनियां है जहाँ खुल कर हंसने, रोने, नाचने और पागल होने की आज़ादी है, तो क्या वे यकीन कर पाएँगे..!
सुबह डयनमिक के बाद प्रवचन बजा, फिर नादब्रह्म किया, फिर नटराज, फिर दोपहर में कुंडलनी। हर ध्यान से पहले स्वामी अमित और माँ देवयानी हमें ख़ूब नाचते थे। नाचने का यह मेरा पहला अनुभव था। इससे पहले कभी नाचा नहीं था। बहुत बचपन से भीतर नाचने की एक अदम्य इच्छा थी, लेकिन झिझक और शर्म की वजह से कभी नाचा नहीं था| 
शाम होते-होते शरीर टूटने लगा था। लेकिन संध्या सत्यसंग से पहले जब नहा कर सफ़ेद रोब पहना, तो फिर से एक नई ताज़गी से भर गया। जब बुद्ध सभागार में पहुँचा तो मैं दंग रह गया। मेरी आँखे फटी-की-फटी रह गयी। मध्यम रोशनी, हल्की म्यूज़िक, और सफ़ेद रोब में झूमते सन्यासी मुझे ऐसा लगा जैसे मैं इंद्रलोक में आ गया हूँ और देवी-देवताओं को नाचते हुए देख रहा हूँ| इतना शांत, आनंदित और प्रेमपूर्ण लोग मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी कभी नहीं देखा था। थोड़ी देर बाद, आनंद से भावविहोर होकर मैं रोने लगा। मेरे अलावा एक-दो सन्यासी और रो रहे थे। 
थोड़ी देर बाद स्लो म्यूज़िक बंद हुआ और कीर्तन शुरू हुआ, ‘तुम्हारे दर्शन की वेला, यह मौसम रास रचाने की’। सारे सन्यासी खड़े होकर मस्ती में झूमने लगे। मैं भी नाचने लगा, थोड़ी देर में शरीर बोझ सा लगने लगा, ऐसा लगने लगा जैसे शरीर मेरे और नृत्य के बीच आ रहा है| मस्ती, उन्माद और पागपन का ऐसा स्वाद मैंने पहले कभी नहीं चखा था| ओशो के तस्वीर के सामने जब माँ देवयानी को कूद कर नाचते हुए देखा तो मेरी टकटकी बंध गई- ये कौन सी दुनिया है? कौन हैं ये लोग? इसी तरह के कई सवाल भीतर उठने लगे| तभी गज़ब की प्रतीती होने लगी, ऐसा लगने लगा जैसे मैं इन लोगों को बहुत पहले से जानता हूँ, सब कुछ परिचित सा लगने लगा| उस दिन तो पता नहीं चला कि यह क्या था, बाद में पता चला कि इसे déjà vu कहते हैं|

मुझे सन्यास लेना है



काँपते हाथों से जब गेट पीट रहा था, तो भीतर से यही आवाज़ आ रही थी कि भगवान! अंदर कोई न हो, गेट न खुले। लेकिन मेरी उम्मीद के विपरीत एक भाई साहब ने पहले झाँककर मुझे देखा, फिर दरवाज़ा खोला। वो भीमकाय काला दरवाज़ा उस वक़्त मेरे लिए भय का प्रतीक था। ‘जी मुझे सन्यास लेना है।’, मैंने भीतर घुसते हुए कहा। उसने मेरी एंट्री की फिर दूर एक भवन की ओर इशारा करते हुए कहा, “वेल्कम सेंटर वहाँ है।” खरमा-खरमा चलते हुए मैं वेल्कम की ओर बढ़ा। रास्ते में कई बार लौट जाने का विचार आया, लेकिन इन सब ऊपरी विचारों के अलावा भीतर कुछ था जो बड़ा ही सघन था। विरोध का स्वर सिर्फ़ ऊपर-ऊपर से उठ रहा था।
वेल्कम सेंटर में एक 25-30 साल का सन्यासी, मरून रोब में बैठा हुआ था। आवाज़ सुनकर लगा कि ये वही हैं जिनसे फ़ोन पर, पता पूछने के लिए, मेरी बात हुई थी। फ़ोन पर जिस तरीक़े से उन्होंने बात किया था उससे मैंने बड़ा अनवेल्कम्ड फ़ील किया था। लेकिन यहाँ वे बड़े वेल्कमिंग और friendly लग रहे थे। ‘मुझे सन्यास लेना है’, मैंने अपना सामना रखते हुए उनसे कहा। “पता पूछने के लिए आपने ही फ़ोन किया था?” उन्होंने पूछा। ‘जी मैंने ही फ़ोन किया’, कहते हुए मैं उनके चेहरे को देखने लगा। चेहरे की बनावट से नेपाली लग रहे थे। “सन्यास कैम्प के आख़री दिन होता है, पाँच दिन का कैम्प है। कैम्प संचालक आपको सन्यास के बारे में बता देंगे। अभी आप कहाँ रुकना चाहेंगे?”, आँख मटकाते हुए वे मुझे देखने लगे। ‘चार्ज कितना है?’ “कबीर का 250/- है”
मैंने कबीर में पाँच दिन की बुकिंग कर ली। मेरे ख़्याल से लॉकर का 100/- रुपया डिपॉज़िट देना पड़ा था। लॉकर में सामान रख कर मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। पूरा कक्ष खाली था, ‘कल से शिविर है, अभी तक कहीं कोई दिख नहीं रहा है’, लेटे-लेटे मैं सोचने लगा। फिर मैंने जेब से फ़ूड-पास निकाल कर देखा। रात के खाने अभी टाइम था, लेकिन मुझे भूख लग गई थी। सोचा, पहले बाथरूम जाकर पानी से हाथ मुँह धो लेता हूँ, फिर बाहर निकल कर खाने का कुछ देखेंगे। बाथरूम में गया तो मैं हैरान रह गया, एक महानुभाव, बाथरूम का दरवाज़ा खुला रखकर, पूरा निवस्त्र होकर नहा रहे थे। ‘ये क्या नौटंकी है, भाई...’ ख़ैर, अपना काम करके मैं अपने dormitory में आ गया और रोब पहनकर बाहर रिसेप्शन के पास आ गया। 
ज़िन्दगी में पहली बार रोब पहना था, बड़ा अजीब सा लग रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ पहन ही नहीं रखा है। 
‘शिविर कब से शुरू होगा’, मैंने वेल्कम वाले स्वामी से पूछा। “परसों ओपनिंग है”, उन्होंने जवाब दिया। ‘लेकिन वेबसाईट पर आज की ओपनिंग लिखा था।’ मैंने हैरान होते हुए उनसे कहा। “हाँ, लेकिन बाद में हमने डेट बदल दिया था, आपने शायद नहीं देखा”, उन्होंने बड़ी शांति से जवाब दिया। ‘तभी आश्रम इतना ख़ाली-ख़ाली दिख रहा है’, मैंने सोचा। 
उनसे खाने और ध्यान की टाइमिंग के बारे में पूछ कर मैं आश्रम का चक्कर लगाने के लिए निकल गया। आधे-घंटे बाद चाय का समय था। वेल्कम के पास ही एक खम्भे पर पूरे दिन का schedule चिपका हुआ था।


एक बार मैं एक जगह 'शिविर' करने गया था| एक बहुत पुराने सन्यासी, ओशो के समय के, शिविर के संचालक थे| उन सन्यासी का संबंध ओशो के जिस कुनवे से है, वहां के अनुसार 'माला' पहनना, और दाढ़ी बढ़ाना कुफ्र है| और मैं शिविर में माला पहनकर घूम रहा था| मेरे अलावा एक दो और सन्यासियों ने भी माला पहन रखा था| 
सुबह के सक्रीय ध्यान के बाद जब बैठक हुई, तो उन्होंने बिना किसी को लक्षित किए हुए कहा, "ओशो ने माला पहनने से कबका मना कर दिया था| फिर भी पता नहीं क्यों कुछ लोग अब भी माला पहन के घुमते हैं| शायद उनको लगता है कि माला पहनने से ज्यादा ध्यान लगेगा|" मुझे बात चोट कर गई, मन में बहुत सी बातें उठने लगी| लेकिन मैंने जब्त किया, और उस वक़्त वहां कुछ नहीं बोला| 
लेकिन शाम की बैठक में जब प्रश्न-उत्तर चल रहा था, तो मैंने उनसे पूछा, 'स्वामी जी, सुबह आपने कहा कि कुछ लोग इसलिए माला पहनकर घूम रहे हैं, क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि माला पहनने से ज्यादा ध्यान लगेगा| तो, मेरा सवाल यह है कि अगर आपके हिसाब से माला पहनने से ज्यादा ध्यान नहीं लगता है, तो क्या माला उतार देने से ज्यादा ध्यान लग जाएगा?'

जब मैं बहुत छोटा था, संभवत: 8 या 9 वर्ष का रहा होऊँगा, तब अपने एक चाचा, जिनका नाम मोहन झा है, से सुना था कि रजनीश एक बहुत बड़ा माफ़िया था। यह पहला मौक़ा था जब मैंने किसी के मुँह से ओशो का नाम सुना था। यह बात मुझे क्यों याद रह गई, यह बड़े हैरानी की बात है। क्योंकि किस संदर्भ में यह बात उन्होंने कही थी यह मुझे बिलकुल भी याद नहीं है। मैं ऐसा मानता हूँ कि शायद ‘माफ़िया’ शब्द के आकर्षण की वजह से यह बात मुझे याद रह गई। 
फिर सन 2000 में, मैं अपने एक दोस्त, जिसका नाम गोविंद है और लोग उसे गोविंदा या गोविंदजी बुलाते हैं, के यहाँ बैठकर किताबें पढ़ा करता था। उसके पास बहुत सी किताबें थीं। मैं उन में से चुन-चुनकर पढ़ता रहता था। उन्हीं किताबों में मुझे एक दिन एक ऐसी किताब हाथ लगी जिसके शुरू और अंत के कुछ पृष्ठ ग़ायब थे। हर पृष्ठ के नीचे किताब का नाम लिखा था ‘संभोग से समाधि की ओर’ नाम देखते ही मैंने झट-से किताब जेब में रख ली। 
घर आकर जब किताब पढ़ा तो बड़ी निराशा हुई। संभोग के बारे कुछ लिखा ही नहीं था। बस एक जहग यह लिखा था कि अगर कोई सात घंटे तक लगातार संभोग कर ले, किस ढंग से करना है उसकी विधि बताई हुई थी, तो फिर वह सदा के लिए संभोग से मुक्त हो जाएगा। बस यह एक बात मुझे रोचक लगी थी, बाँकि किताब में जो बातें लिखी थी वो मेरे सिर के ऊपर से चला गया। लेकिन किताब के लेखक का नाम जानने की इच्छा मन में घर कर गयी। पर किताब का नाम ऐसा था कि किसी से उसके बारे में पूछ भी नहीं सकता था। 
फिर 2001 में जब मैं दसवीं में आया तो ट्यूशन पढ़ने के लिए अपने गाँव से चार किलोमीटर दूर एक दूसरे गाँव ‘भरवाड़ा’ जाने लगा। टीचर का नाम गुनानंद जी था आप मेरे ननिहाल ‘कटका’ निवासी थे। बिहार के प्रसिद्ध विदूषक गोनु झा की समाधि पर हमारी क्लास लगती थी। अपने गाँव से हम चार लोग, प्रेम ठाकुर, अमित झा, भैरव झा, सुमित झा और मैं, वहाँ पढ़ने जाते थे। 
दिवाली के नज़दीक जिस भवन में हमारी क्लास लगती थी उसकी सफ़ाई होनी थी। सो, कुछ दिनों के लिए क्लास की जगह शिफ़्ट कर दी गई। नई जगह पूरानी जगह के ठीक सामने रोड के उस तरफ़, लेकिन रोड से काफ़ी ऊँचाई पर थी। 
एक दिन एक लंबे घुंघराले बाल और बड़ी दाढ़ी वाला व्यक्ति नीचे रोड से गुज़र रहा था। इस व्यक्ति को मैं जानता था, ये मेरे पिता के मित्र थे। उनको जाता देख मेरे क्लास की एक लड़की ने गुनानंद जी से पूछा, “सर, इसके बाल-दाढ़ी इतने लंबे क्यों हैं?” गुनानंद जी ने बड़ी आत्मीयता के साथ उसके कान के पास अपना मुँह लाकर क़रीब-क़रीब फुसफुसाते हुए कहा, “यह रजनीश का चेला है। रजनीश लड़की और ड्रग्स का धंधा करता था।”

यह मेरा ओशो से दूसरा परिचय था। पहला- रजनीश एक बहुत बड़ा माफ़िया था, और दूसरा- रजनीश लड़की और ड्रग्स का धंधा करता था।

सत्य का कोई अनुभव नहीं होता है



सत्य का कोई अनुभव नहीं होता है। सारे अनुभव मन के हैं। और मन के बहुत से अनुभवों से बहुत बार गुज़रा। बुद्धत्व भी कई बार घटा। एक दौर ऐसा भी था जब जो भी सोच लेता था, वही होने लगता था। कभी ‘मैं’ मिट जाता था, कभी आनंद की बारिश होने लगती थी, कभी हज़ार-हज़ार सूरज निकल जाता था। कभी लगता था मैं हवा में उड़ रहा हूँ। प्रवचन सुनते समय ओशो जो-जो बोलते थे वही होने लगता था। 
अनजाने ही ओशो की नक़ल करना शुरूकर दिया था। उनकी तरह हाथ घूमाना, धीरे-धीरे बोलना, हाथ बिना हिलाए चलना, पलक झपकाए बिना बात करना। रॉलस रॉय की कमी रह गई थी बस। नौटंकी की चलती-फिरती दूकान बन गया था। राह चलता था तो बड़ा हैरान होता था कि लोग मेरे चरणो में क्यों नहीं गिर रहे हैं, क्या ये अंधे हैं? इतनी बड़ी घटना घटी है मेरे भीतर इनको दिख नहीं रहा है?
शुरू में ओशो से प्रेम था इसीलिए उनको लोगों से छिपाता था, उनका नाम लेने से झिझकता था। बाद में उनको इस डर से छिपाने लगा कि कहीं लोगों को अगर यह पता चल जाएगा कि मेरा कोई गुरु है और मेरी जिन बातों से वे प्रभावित हो रहे हैं, वे मेरी नहीं किसी और की है, तो लोग फिर मुझे पूजना छोड़ कर सीधा उन में उत्सुक हो जाएँगे। और उन दिनों बहुत से लोग मुझसे प्रभावित थे, मेरे पिताजी के उम्र के लोग मेरे पैर छूने लगे थे। कई लोग मुझे आकर कहते थे कि आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। जहाँ-भी जाता था जिससे भी मिलता था उसको अपने ज्ञान से प्रभावित करने का कोई मौक़ा छोड़ता नहीं था। 
लेकिन इस सब के बावजूद कभी खुलकर अपने ज्ञान की घोषणा नहीं कर पाता था। इसके पीछे कारण यह था कि जानकारी इकट्ठा करने के लिए ही सही ओशो को सुनना जारी रखे हुआ था। और गाहे-बगाहे ओशो की कोई-न-कोई बात मुझे चोट कर जाती थी और एक क्षण के लिए ही सही मुझे मेरा पाखंड दिख जाता था। और इसका परिणाम यह हो रहा था कि पहले मैं लोगों को प्रभावित कर लेता था, फिर कोई-न-कोई ऊटपटाँग हरकत करके उनको दूर भी भगा देता था। यह खेल बहुत दिनों तक चला।

Saturday, 6 October 2018

‘सत्य’ यानी क्या?


                                                                       साकेत के साथ (2014)

शुरू में बहुत दिनों तक यही समझ में नहीं आता था कि ‘सत्य’ यानी क्या? ‘सत्य’ को पाना है, लेकिन ‘सत्य’ शब्द किस चीज़ के लिए प्रयोग हो रहा है, यह पल्ले नहीं पड़ता था। प्रवचन सुनने का मुख्य उद्देश्य जोक्स सुनना होता था। जिन प्रवचन माला में अधिक जोक्स होते थे, उन्हें ही सुनता था। सूत्र वाले प्रवचनों को अवॉड करता था। प्रश्न उत्तर वाले प्रवचन बड़े चाव से सुनता था, लोगों की कुटाई-पिटाई में बड़ा मज़ा आता था। लेकिन धीरे-धीरे यह बात सालने लगी कि असली चीज़ तो मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ। अष्ट्रवक्रगीता सूनना सबसे से बड़ा सिर दर्द था— अभी घट सकती है घटना, इसी क्षण, मुझे सुनते-सुनते तुम उपलब्ध हो सकते हो...! यह सब सुन कर मन बड़ा पगलाता था, माथा घोर हो जाता था। कई दिनों तक मैं सिर दर्द से परेशान रहता था। समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर घटना क्यों नहीं घट रही है? जनक के ‘अहो!’ पर मन बड़ा खीझता था। 
परेशान होकर थोड़े-थोड़े दिनों के लिए मैं प्रवचन सुनना बंद कर देता था। फिर एक दिन, 2010 में संभवत: ऑक्टोबर महीने में, ‘ओशोवर्ल्ड’ पत्रिका ख़रीदकर पढ़ रहा था। उसमें ओशो बर्फ़ के टूकरे और पानी के रूपक की मदद से चेतना की स्थिति को समझा रहे थे। वो लेख मेरे भीतर तीर की तरह घुस गया, जैसे अंधेरे कमरे में अचानक से बल्ब जल गया हो। बात शीशे की तरह एकदम साफ़ हो गई। उस दिन के बाद से ओशो की सभी बातों का अभिप्राय मुझे समझ में आने लगा। ‘सत्य’ क्या है इसका पता तो नहीं चला, लेकिन ‘झूठ’ क्या है यह साफ़ होने लगा। फिर ‘जानने’ की एक अदम्य अभिप्सा भीतर पैदा हो गई। ओशो को सुनने का ढंग बदल गया। अब मैं कभी-भी और कैसे-भी नहीं सुनता था। पहली बार पता चला कि गुरु होना क्या होता, और शिष्य होना क्या है। ओशो की बातों, तर्क, जोक्स इत्यादि से रस ख़त्म हो गया। रोज़ सुबह शाम नहा धोकर रोब और माला पहनकर सुनने बैठता था। ओशो क्या बोलते थे कुछ समझ में नहीं आता था, पूरे प्रवचन के दौरान मैं बस रोता रहता था। दिन में भी कभी भी बिना किसी बात के रोने लगता था। अपने ऑफ़िस में ओशो की जो तस्वीरें लगा रखी थी, उसे फाड़कर फेंक दिया, लोगों से उलझना, तर्क करना, ज्ञान देना इत्यादि सब बंदकर दिया। यह सिलसिला क़रीब 6 महीने तक चला।

Monday, 1 October 2018

खोपड़ी में भयंकर उत्पात मचने लगा


                                                                  चित्र साभार- गूगल 

चार किताबें पढ़कर गुरु बनने की बात तो आपने शायद सुनी होगी, लेकिन एक किताब पढ़कर गुरु बनने की घटना बहुत कम ही घटती है| अपने पैसे से ओशो की जो पहली किताब मैंने खरीदी थी, वो थी 'मैं मृत्यु सिखाता हूँ'| किताब पढ़कर मैं पगला गया था| किताब पढ़ने के बाद उसका ऑडियो CD भी खरीद कर ले आया| फिर ऑडियो चलाकर सुनता भी था, और साथ-साथ पढ़ता भी था| एक किताब में इतनी जानकारी थी, इतनी जानकारी थी कि मेरे खोपड़ी में भयंकर उत्पात मचने लगा| और जानकारी के साथ जो बड़े-से-बड़ा ख़तरा है, वो है उसको बांटने की खुजली| अनुभव के बारे में बात करने में एक बार आदमी झिझकता भी है, लेकिन जानकारी को पचा पाना बहुत ही कठिन| मैं बिलकुल भी हैरान नहीं होता उन सन्यासियों को देखकर जो 'अपने बुद्धत्व की घोषणा करके, गुरु बन बैठे हैं| ओशो सन्यासी के लिए गुरु बनने की वासना से मुक्त होना बहुत ही कठिन है| क़रीब-क़रीब असंभव है| जिस परंपरा में भी साधकों को जरूरत से ज्यादा जानकारी दी जाएगी, उस परंपरा में ऐसा होना तय है| और ओशो के साथ यह अपरिहार्य है| और जानकारी के साथ एक और खतरा है| जैसे-जैसे जानकारी की बोझ बढ़ता है-वैसे-वैसे ज्ञान की क्षमता कम होने लगती है| मेरे ही मामले को ले लीजिए, बुद्धत्व के मामले में शायद में बुद्ध से भी ज्यादा जानता होऊं, जितनी कुशलता से मैं होश, जागरण, और बुद्धत्व के बारे में बातकर सकता हूँ, शायद कबीर, नानक, और दरिया जैसे बुद्ध पुरुष भी न कर पाएं| अगर मैं आज गोरखधंधे की दूकान खोलूं, तो किसी भी टूटपूंजिये बाबा और तथाकथित बुद्धों से अच्छी दूकान चला सकता हूँ, लेकिन इस सब का हासिल क्या है? 
आज इन जानकारियों के जंगल में जितना मैं ख़ुद को भटका हुआ पता हूँ, उतना में आज से दस साल पहले भी नहीं था| ओशो के हिंदी और अंग्रेज़ी के क़रीब-क़रीब सारे प्रवचन सुन चुका हूँ, कृष्णमूर्ति को आर-पार पढ़ चुका हूँ, गुरिजेइफ़ को निपटा चुका हूँ, विवेकानंद, एलन watts, इकहार्ट, रमण, जीसस, मिखाइल, और पता नहीं कितने लोगों को पढ़ चुका हूँ, कितने ही लोगों से मिल चुका हूँ, न जाने कितने प्रकार के प्रयोग कर चुका हूँ| आश्रमों में रहा हूँ| लेकिन इस सब का सार क्या है? कुछ भी नहीं, बस कुशलता से तर्क कर सकता हूँ, और अपनी जानकारी से लोगों को प्रभावित कर सकता हूँ, लेकिन क्या इसी के लिए मैंने सन्यास लिया था? जहाँ तक लोगों को प्रभावित करने का सवाल है, वो तो पैसे से भी हो सकता था, पद से हो सकता था, बल्कि अधिक सुगमता से हो सकता था| इसके लिए सन्यास लेने की क्या जरूरत थी?

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...