Sunday, 7 October 2018

इसे déjà vu कहते हैं



माँ देवयानी और स्वामी अमित शिविर के संचाल थे। शिविर का नाम था ‘यूथ कैम्प’। ओपनिंग के दिन टोटल बारह पंद्रह लोग ही आए हुए थे। अगले दिन मैं सुबह नहा धोकर ‘सक्रिय ध्यान’ के लिए गया। स्वामी अमित ने ध्यान के सारे चरण डेमो के साथ समझाया। सबकुछ ठीक लगा लेकिन दूसरे चरण में पागल होने वाली बात समझ नहीं आई- मैं यहाँ पागल होने आया हूँ या ठीक?। खौर, म्यूज़िक के साथ ध्यान शुरू हुआ, इन्स्ट्रक्शन था कि पूरे एक घंटे आँख नहीं खोलना है, लेकिन मैं हर दो मिनट पर एक बार आँख खोलकर सबको देख लेता था। दूसरे चरण में जब सब चीख़ने-चिल्लाने लगे तो मैं एकदम से सहम गया-ये क्या खेला हो रहा है? थोड़ी देर बाद मुझे तेज़ हँसी आने लगी- ध्यान के नाम पर ये पागल कर देंगे क्या हमको? सोचने लगा, बाहर निकल जब दोस्तों से कहूँगा कि एक ऐसी भी दुनियां है जहाँ खुल कर हंसने, रोने, नाचने और पागल होने की आज़ादी है, तो क्या वे यकीन कर पाएँगे..!
सुबह डयनमिक के बाद प्रवचन बजा, फिर नादब्रह्म किया, फिर नटराज, फिर दोपहर में कुंडलनी। हर ध्यान से पहले स्वामी अमित और माँ देवयानी हमें ख़ूब नाचते थे। नाचने का यह मेरा पहला अनुभव था। इससे पहले कभी नाचा नहीं था। बहुत बचपन से भीतर नाचने की एक अदम्य इच्छा थी, लेकिन झिझक और शर्म की वजह से कभी नाचा नहीं था| 
शाम होते-होते शरीर टूटने लगा था। लेकिन संध्या सत्यसंग से पहले जब नहा कर सफ़ेद रोब पहना, तो फिर से एक नई ताज़गी से भर गया। जब बुद्ध सभागार में पहुँचा तो मैं दंग रह गया। मेरी आँखे फटी-की-फटी रह गयी। मध्यम रोशनी, हल्की म्यूज़िक, और सफ़ेद रोब में झूमते सन्यासी मुझे ऐसा लगा जैसे मैं इंद्रलोक में आ गया हूँ और देवी-देवताओं को नाचते हुए देख रहा हूँ| इतना शांत, आनंदित और प्रेमपूर्ण लोग मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी कभी नहीं देखा था। थोड़ी देर बाद, आनंद से भावविहोर होकर मैं रोने लगा। मेरे अलावा एक-दो सन्यासी और रो रहे थे। 
थोड़ी देर बाद स्लो म्यूज़िक बंद हुआ और कीर्तन शुरू हुआ, ‘तुम्हारे दर्शन की वेला, यह मौसम रास रचाने की’। सारे सन्यासी खड़े होकर मस्ती में झूमने लगे। मैं भी नाचने लगा, थोड़ी देर में शरीर बोझ सा लगने लगा, ऐसा लगने लगा जैसे शरीर मेरे और नृत्य के बीच आ रहा है| मस्ती, उन्माद और पागपन का ऐसा स्वाद मैंने पहले कभी नहीं चखा था| ओशो के तस्वीर के सामने जब माँ देवयानी को कूद कर नाचते हुए देखा तो मेरी टकटकी बंध गई- ये कौन सी दुनिया है? कौन हैं ये लोग? इसी तरह के कई सवाल भीतर उठने लगे| तभी गज़ब की प्रतीती होने लगी, ऐसा लगने लगा जैसे मैं इन लोगों को बहुत पहले से जानता हूँ, सब कुछ परिचित सा लगने लगा| उस दिन तो पता नहीं चला कि यह क्या था, बाद में पता चला कि इसे déjà vu कहते हैं|

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