#सन्यास-10
एक बार मैं एक जगह 'शिविर' करने गया था| एक बहुत पुराने सन्यासी, ओशो के समय के, शिविर के संचालक थे| उन सन्यासी का संबंध ओशो के जिस कुनवे से है, वहां के अनुसार 'माला' पहनना, और दाढ़ी बढ़ाना कुफ्र है| और मैं शिविर में माला पहनकर घूम रहा था| मेरे अलावा एक दो और सन्यासियों ने भी माला पहन रखा था|
सुबह के सक्रीय ध्यान के बाद जब बैठक हुई, तो उन्होंने बिना किसी को लक्षित किए हुए कहा, "ओशो ने माला पहनने से कबका मना कर दिया था| फिर भी पता नहीं क्यों कुछ लोग अब भी माला पहन के घुमते हैं| शायद उनको लगता है कि माला पहनने से ज्यादा ध्यान लगेगा|" मुझे बात चोट कर गई, मन में बहुत सी बातें उठने लगी| लेकिन मैंने जब्त किया, और उस वक़्त वहां कुछ नहीं बोला|
लेकिन शाम की बैठक में जब प्रश्न-उत्तर चल रहा था, तो मैंने उनसे पूछा, 'स्वामी जी, सुबह आपने कहा कि कुछ लोग इसलिए माला पहनकर घूम रहे हैं, क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि माला पहनने से ज्यादा ध्यान लगेगा| तो, मेरा सवाल यह है कि अगर आपके हिसाब से माला पहनने से ज्यादा ध्यान नहीं लगता है, तो क्या माला उतार देने से ज्यादा ध्यान लग जाएगा?'

No comments:
Post a Comment