#सन्यास -6
चित्र साभार- गूगल
चार किताबें पढ़कर गुरु बनने की बात तो आपने शायद सुनी होगी, लेकिन एक किताब पढ़कर गुरु बनने की घटना बहुत कम ही घटती है| अपने पैसे से ओशो की जो पहली किताब मैंने खरीदी थी, वो थी 'मैं मृत्यु सिखाता हूँ'| किताब पढ़कर मैं पगला गया था| किताब पढ़ने के बाद उसका ऑडियो CD भी खरीद कर ले आया| फिर ऑडियो चलाकर सुनता भी था, और साथ-साथ पढ़ता भी था| एक किताब में इतनी जानकारी थी, इतनी जानकारी थी कि मेरे खोपड़ी में भयंकर उत्पात मचने लगा| और जानकारी के साथ जो बड़े-से-बड़ा ख़तरा है, वो है उसको बांटने की खुजली| अनुभव के बारे में बात करने में एक बार आदमी झिझकता भी है, लेकिन जानकारी को पचा पाना बहुत ही कठिन| मैं बिलकुल भी हैरान नहीं होता उन सन्यासियों को देखकर जो 'अपने बुद्धत्व की घोषणा करके, गुरु बन बैठे हैं| ओशो सन्यासी के लिए गुरु बनने की वासना से मुक्त होना बहुत ही कठिन है| क़रीब-क़रीब असंभव है| जिस परंपरा में भी साधकों को जरूरत से ज्यादा जानकारी दी जाएगी, उस परंपरा में ऐसा होना तय है| और ओशो के साथ यह अपरिहार्य है| और जानकारी के साथ एक और खतरा है| जैसे-जैसे जानकारी की बोझ बढ़ता है-वैसे-वैसे ज्ञान की क्षमता कम होने लगती है| मेरे ही मामले को ले लीजिए, बुद्धत्व के मामले में शायद में बुद्ध से भी ज्यादा जानता होऊं, जितनी कुशलता से मैं होश, जागरण, और बुद्धत्व के बारे में बातकर सकता हूँ, शायद कबीर, नानक, और दरिया जैसे बुद्ध पुरुष भी न कर पाएं| अगर मैं आज गोरखधंधे की दूकान खोलूं, तो किसी भी टूटपूंजिये बाबा और तथाकथित बुद्धों से अच्छी दूकान चला सकता हूँ, लेकिन इस सब का हासिल क्या है?
आज इन जानकारियों के जंगल में जितना मैं ख़ुद को भटका हुआ पता हूँ, उतना में आज से दस साल पहले भी नहीं था| ओशो के हिंदी और अंग्रेज़ी के क़रीब-क़रीब सारे प्रवचन सुन चुका हूँ, कृष्णमूर्ति को आर-पार पढ़ चुका हूँ, गुरिजेइफ़ को निपटा चुका हूँ, विवेकानंद, एलन watts, इकहार्ट, रमण, जीसस, मिखाइल, और पता नहीं कितने लोगों को पढ़ चुका हूँ, कितने ही लोगों से मिल चुका हूँ, न जाने कितने प्रकार के प्रयोग कर चुका हूँ| आश्रमों में रहा हूँ| लेकिन इस सब का सार क्या है? कुछ भी नहीं, बस कुशलता से तर्क कर सकता हूँ, और अपनी जानकारी से लोगों को प्रभावित कर सकता हूँ, लेकिन क्या इसी के लिए मैंने सन्यास लिया था? जहाँ तक लोगों को प्रभावित करने का सवाल है, वो तो पैसे से भी हो सकता था, पद से हो सकता था, बल्कि अधिक सुगमता से हो सकता था| इसके लिए सन्यास लेने की क्या जरूरत थी?

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