दोपहर के तीन बज रहे हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ कुछ लिखने बैठ हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रफ़ी साहब और आशा जी गा रहे हैं 'इशारों-इशारों में दिल लेने वाले...'
यह गीत मुझे बहुत पसंद है। बाहर से गिलहरी के किकियाने की आवाज़ आ रही है।ऐसी आवाज़ सुनकर कई बार ऐसा धोखा हो जाता है कि कोई पक्षी है। बाहर की धूप रोकने के लिए खिड़की पर पर्दा लगा रखा है, रोज़ इस समय कमरे में धूप आने लगती है। हर बार पर्दा हटा कर आवाज़ की दिशा में देखता हूँ कि कौन सी चिड़िया हैं, कहीं कुछ नहीं दिखता है, बस सहजन के पेड़ पर उछल-कूद करती खिसकोली दिख जाती। अभी कुछ दिन पहले वाचस्पति से कह रहा था, "गुजराती में आप लोगों ने एकदम सटीक नाम दिया है इसको 'खिसकोली', हमारे यहाँ भी इसके स्वभाव से मिलता-जुलता ही नाम है 'लुक्खी', पता नहीं हिन्दी में 'गिलहरी' क्यों कहते हैं।" लुक्खी से बचपन का एक क़िस्सा याद आ गया। मेरे एक फूफेरे भाई की दादी का नाम लुक्खी था, बड़का बाबा (बड़े दादा जी) उसको चिढ़ाया करते थे, "लुक्खी-लुक्खी तार पर, कूदे भतार (पति) पर", वह बहुत चिढ़ता था, हम हँसा करते थे।
दूध वाली कॉफ़ी पीना एक अरसे से बंद कर दिया था, लेकिन 8AM Metro देखने के बाद फ़िल्टर कॉफ़ी पीने का भूत चढ़ गया। रिसर्च करके आमेजन से एक फ़िल्टर कॉफ़ी मेकर मँगवाया। इस बार निर्वाणों एडिंबरा से Lavazza Coffee लेकर आयी थी, जिसका कुछ दिनों से फ़्रेंच प्रेस बना कर पी रहा था, अब उसी का फ़िल्टर कॉफ़ी बनाता हूँ। फ़्रेंच प्रेस का प्रोसेस काफ़ी छोटा था, पाँच-से-सात मिनट में कॉफ़ी बनकर तैयार हो जाती थी, इंस्टेंट कॉफ़ी के बनिस्बत अच्छा था, लेकिन फ़िल्टर कॉफ़ी मुझे उससे भी ज़्यादा सही लग रहा है। एक कप कॉफ़ी तैयार करने में कोई तीस मिनट लग जाते हैं। जिस चीज़ को पीने में कम-अज-कम एक घंटे लगाता हूँ, उसको बनने में तीस मिनट तो लगना ही चाहिए।
गाना बदल चुका है, "दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छाई..." कॉफ़ी आधी बची हुई है अभी। बीच में लिखना रोकर अमज़ेन पर ब्रास का फ़िल्टर कॉफ़ी मेकर और ब्रास का ही डबरा (कप और कटोरी जिसमें दक्षिण भारत के लोग फ़िल्टर कॉफी पीते हैं) देखने लगा था। कुछ समझ नहीं आया, लोगों के मिक्स्ड रिव्यू थे। लगता है कभी दक्षिण भारत जाना होगा तभी ले पाऊँगा। अजमेर में झील किनारे एक कॉफ़ी शॉप है 'बुडान अंकल', यह अजीब सा नाम सुनकर कई बार ज़ेहन में सवाल उठता था कि इस अजीब से नाम का क्या अर्थ है? इन दिनों जब साउथ इंडियन कॉफ़ी पर रिसर्च कर रहा था तो पता चला कि बाबा बुडान एक सूफ़ी फ़क़ीर थे, जो पहली बार अरब के देशों से कॉफ़ी का बीज भारत लेकर आए थे। अरब के लोग कॉफ़ी को अपने देश से बाहर नहीं जाने देना चाहते थे, इसलिए वे भूना हुआ कॉफ़ी ही एक्सपोर्ट करते थे। कहानी कहती है कि बाबा बुडान अपनी लंबी दाढ़ी में बीज छुपा कर लाए थे। क्या बात है चाय का संबंध बौद्ध फ़क़ीर बोधिधर्म से है, तो कॉफ़ी का सूफ़ी फ़क़ीर बाबा बुडान से!
चार बजने को हैं। मेरी कॉफ़ी ऑलमोस्ट ख़त्म हो चुकी है। आशा जी गा रही हैं, "बालमा खुली हवा में दिल चाहता है मिलना..." आँगन में छावँ उतर आया है। लैपटॉप बंद कर के अनार के नीचे बैठने जा रहा हूँ। कुछ पढ़ूँगा अभी। कुछ दिन पहले बोधिसत्व गार्गी एक किताब भेजी थी 'दास्तान-ए-लापता' इन दिनों वही पढ़ रहा हूँ।
-इक्क्यु त्ज़ु

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