Sunday, 7 October 2018

मुझे सन्यास लेना है



काँपते हाथों से जब गेट पीट रहा था, तो भीतर से यही आवाज़ आ रही थी कि भगवान! अंदर कोई न हो, गेट न खुले। लेकिन मेरी उम्मीद के विपरीत एक भाई साहब ने पहले झाँककर मुझे देखा, फिर दरवाज़ा खोला। वो भीमकाय काला दरवाज़ा उस वक़्त मेरे लिए भय का प्रतीक था। ‘जी मुझे सन्यास लेना है।’, मैंने भीतर घुसते हुए कहा। उसने मेरी एंट्री की फिर दूर एक भवन की ओर इशारा करते हुए कहा, “वेल्कम सेंटर वहाँ है।” खरमा-खरमा चलते हुए मैं वेल्कम की ओर बढ़ा। रास्ते में कई बार लौट जाने का विचार आया, लेकिन इन सब ऊपरी विचारों के अलावा भीतर कुछ था जो बड़ा ही सघन था। विरोध का स्वर सिर्फ़ ऊपर-ऊपर से उठ रहा था।
वेल्कम सेंटर में एक 25-30 साल का सन्यासी, मरून रोब में बैठा हुआ था। आवाज़ सुनकर लगा कि ये वही हैं जिनसे फ़ोन पर, पता पूछने के लिए, मेरी बात हुई थी। फ़ोन पर जिस तरीक़े से उन्होंने बात किया था उससे मैंने बड़ा अनवेल्कम्ड फ़ील किया था। लेकिन यहाँ वे बड़े वेल्कमिंग और friendly लग रहे थे। ‘मुझे सन्यास लेना है’, मैंने अपना सामना रखते हुए उनसे कहा। “पता पूछने के लिए आपने ही फ़ोन किया था?” उन्होंने पूछा। ‘जी मैंने ही फ़ोन किया’, कहते हुए मैं उनके चेहरे को देखने लगा। चेहरे की बनावट से नेपाली लग रहे थे। “सन्यास कैम्प के आख़री दिन होता है, पाँच दिन का कैम्प है। कैम्प संचालक आपको सन्यास के बारे में बता देंगे। अभी आप कहाँ रुकना चाहेंगे?”, आँख मटकाते हुए वे मुझे देखने लगे। ‘चार्ज कितना है?’ “कबीर का 250/- है”
मैंने कबीर में पाँच दिन की बुकिंग कर ली। मेरे ख़्याल से लॉकर का 100/- रुपया डिपॉज़िट देना पड़ा था। लॉकर में सामान रख कर मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। पूरा कक्ष खाली था, ‘कल से शिविर है, अभी तक कहीं कोई दिख नहीं रहा है’, लेटे-लेटे मैं सोचने लगा। फिर मैंने जेब से फ़ूड-पास निकाल कर देखा। रात के खाने अभी टाइम था, लेकिन मुझे भूख लग गई थी। सोचा, पहले बाथरूम जाकर पानी से हाथ मुँह धो लेता हूँ, फिर बाहर निकल कर खाने का कुछ देखेंगे। बाथरूम में गया तो मैं हैरान रह गया, एक महानुभाव, बाथरूम का दरवाज़ा खुला रखकर, पूरा निवस्त्र होकर नहा रहे थे। ‘ये क्या नौटंकी है, भाई...’ ख़ैर, अपना काम करके मैं अपने dormitory में आ गया और रोब पहनकर बाहर रिसेप्शन के पास आ गया। 
ज़िन्दगी में पहली बार रोब पहना था, बड़ा अजीब सा लग रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ पहन ही नहीं रखा है। 
‘शिविर कब से शुरू होगा’, मैंने वेल्कम वाले स्वामी से पूछा। “परसों ओपनिंग है”, उन्होंने जवाब दिया। ‘लेकिन वेबसाईट पर आज की ओपनिंग लिखा था।’ मैंने हैरान होते हुए उनसे कहा। “हाँ, लेकिन बाद में हमने डेट बदल दिया था, आपने शायद नहीं देखा”, उन्होंने बड़ी शांति से जवाब दिया। ‘तभी आश्रम इतना ख़ाली-ख़ाली दिख रहा है’, मैंने सोचा। 
उनसे खाने और ध्यान की टाइमिंग के बारे में पूछ कर मैं आश्रम का चक्कर लगाने के लिए निकल गया। आधे-घंटे बाद चाय का समय था। वेल्कम के पास ही एक खम्भे पर पूरे दिन का schedule चिपका हुआ था।

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