#सन्यास--8
सत्य का कोई अनुभव नहीं होता है। सारे अनुभव मन के हैं। और मन के बहुत से अनुभवों से बहुत बार गुज़रा। बुद्धत्व भी कई बार घटा। एक दौर ऐसा भी था जब जो भी सोच लेता था, वही होने लगता था। कभी ‘मैं’ मिट जाता था, कभी आनंद की बारिश होने लगती थी, कभी हज़ार-हज़ार सूरज निकल जाता था। कभी लगता था मैं हवा में उड़ रहा हूँ। प्रवचन सुनते समय ओशो जो-जो बोलते थे वही होने लगता था।
अनजाने ही ओशो की नक़ल करना शुरूकर दिया था। उनकी तरह हाथ घूमाना, धीरे-धीरे बोलना, हाथ बिना हिलाए चलना, पलक झपकाए बिना बात करना। रॉलस रॉय की कमी रह गई थी बस। नौटंकी की चलती-फिरती दूकान बन गया था। राह चलता था तो बड़ा हैरान होता था कि लोग मेरे चरणो में क्यों नहीं गिर रहे हैं, क्या ये अंधे हैं? इतनी बड़ी घटना घटी है मेरे भीतर इनको दिख नहीं रहा है?
शुरू में ओशो से प्रेम था इसीलिए उनको लोगों से छिपाता था, उनका नाम लेने से झिझकता था। बाद में उनको इस डर से छिपाने लगा कि कहीं लोगों को अगर यह पता चल जाएगा कि मेरा कोई गुरु है और मेरी जिन बातों से वे प्रभावित हो रहे हैं, वे मेरी नहीं किसी और की है, तो लोग फिर मुझे पूजना छोड़ कर सीधा उन में उत्सुक हो जाएँगे। और उन दिनों बहुत से लोग मुझसे प्रभावित थे, मेरे पिताजी के उम्र के लोग मेरे पैर छूने लगे थे। कई लोग मुझे आकर कहते थे कि आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। जहाँ-भी जाता था जिससे भी मिलता था उसको अपने ज्ञान से प्रभावित करने का कोई मौक़ा छोड़ता नहीं था।
लेकिन इस सब के बावजूद कभी खुलकर अपने ज्ञान की घोषणा नहीं कर पाता था। इसके पीछे कारण यह था कि जानकारी इकट्ठा करने के लिए ही सही ओशो को सुनना जारी रखे हुआ था। और गाहे-बगाहे ओशो की कोई-न-कोई बात मुझे चोट कर जाती थी और एक क्षण के लिए ही सही मुझे मेरा पाखंड दिख जाता था। और इसका परिणाम यह हो रहा था कि पहले मैं लोगों को प्रभावित कर लेता था, फिर कोई-न-कोई ऊटपटाँग हरकत करके उनको दूर भी भगा देता था। यह खेल बहुत दिनों तक चला।

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