#सन्यास -7
साकेत के साथ (2014)
शुरू में बहुत दिनों तक यही समझ में नहीं आता था कि ‘सत्य’ यानी क्या? ‘सत्य’ को पाना है, लेकिन ‘सत्य’ शब्द किस चीज़ के लिए प्रयोग हो रहा है, यह पल्ले नहीं पड़ता था। प्रवचन सुनने का मुख्य उद्देश्य जोक्स सुनना होता था। जिन प्रवचन माला में अधिक जोक्स होते थे, उन्हें ही सुनता था। सूत्र वाले प्रवचनों को अवॉड करता था। प्रश्न उत्तर वाले प्रवचन बड़े चाव से सुनता था, लोगों की कुटाई-पिटाई में बड़ा मज़ा आता था। लेकिन धीरे-धीरे यह बात सालने लगी कि असली चीज़ तो मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ। अष्ट्रवक्रगीता सूनना सबसे से बड़ा सिर दर्द था— अभी घट सकती है घटना, इसी क्षण, मुझे सुनते-सुनते तुम उपलब्ध हो सकते हो...! यह सब सुन कर मन बड़ा पगलाता था, माथा घोर हो जाता था। कई दिनों तक मैं सिर दर्द से परेशान रहता था। समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर घटना क्यों नहीं घट रही है? जनक के ‘अहो!’ पर मन बड़ा खीझता था।
परेशान होकर थोड़े-थोड़े दिनों के लिए मैं प्रवचन सुनना बंद कर देता था। फिर एक दिन, 2010 में संभवत: ऑक्टोबर महीने में, ‘ओशोवर्ल्ड’ पत्रिका ख़रीदकर पढ़ रहा था। उसमें ओशो बर्फ़ के टूकरे और पानी के रूपक की मदद से चेतना की स्थिति को समझा रहे थे। वो लेख मेरे भीतर तीर की तरह घुस गया, जैसे अंधेरे कमरे में अचानक से बल्ब जल गया हो। बात शीशे की तरह एकदम साफ़ हो गई। उस दिन के बाद से ओशो की सभी बातों का अभिप्राय मुझे समझ में आने लगा। ‘सत्य’ क्या है इसका पता तो नहीं चला, लेकिन ‘झूठ’ क्या है यह साफ़ होने लगा। फिर ‘जानने’ की एक अदम्य अभिप्सा भीतर पैदा हो गई। ओशो को सुनने का ढंग बदल गया। अब मैं कभी-भी और कैसे-भी नहीं सुनता था। पहली बार पता चला कि गुरु होना क्या होता, और शिष्य होना क्या है। ओशो की बातों, तर्क, जोक्स इत्यादि से रस ख़त्म हो गया। रोज़ सुबह शाम नहा धोकर रोब और माला पहनकर सुनने बैठता था। ओशो क्या बोलते थे कुछ समझ में नहीं आता था, पूरे प्रवचन के दौरान मैं बस रोता रहता था। दिन में भी कभी भी बिना किसी बात के रोने लगता था। अपने ऑफ़िस में ओशो की जो तस्वीरें लगा रखी थी, उसे फाड़कर फेंक दिया, लोगों से उलझना, तर्क करना, ज्ञान देना इत्यादि सब बंदकर दिया। यह सिलसिला क़रीब 6 महीने तक चला।

No comments:
Post a Comment