Wednesday, 26 September 2018

मैं कौन हूँ, ये कहाँ हूँ मैं... ???

#सन्यास'- 5
जब माँ धर्मज्योति ने कहा कि रोब और माला पहनना अब अनिवार्य नहीं है, तो मैं बड़ा उदास हो गया| जिस चीज़ के लिए सन्यास लिया था, उसी चीज़ को गैर-ज़रूरी बता दिया| सोचा था रोब पहनकर घर आऊंगा, लोग देखकर चौंकेंगे, खूब नौटंकी होगी, मजा आएगा| लेकिन, सब उल्टा हो गया|
घर आकर मैं बड़ा दुखी हो गया| रास्ते भर यही सोचता रहा था कि 'ऐसे सन्यास का क्या फायदा जिसका किसी को पता ही नहीं चलेगा'| नियम के नाम पर बस रोज़ एक घंटा ध्यान करने के लिए कहा गया था| -यह भी कोई नियम हुआ, एक घंटा ध्यान करो, ये तो ऐसे ही कर लेता, इसके लिए सन्यासी बनने की क्या ज़रूर थी| 'नाम भी कितना अजीब दिया 'स्वामी ध्यान विराम'..हुंह...| नाम सुनकर मुझे एकदम मजा नहीं आ रहा था| सोचा था कोई भारी भरकम नाम मिलेगा 'स्वामी चैतन्य कृति, ध्यान मुहम्मद, ऐसा कुछ बड़ा-सा, यह क्या पिद्दी नाम दे दिया 'ध्यान विराम'| बिना मतलब रोब में तीन सौ रुपया और खर्च करवा दिया, अरे जब रोब था ही तो नया खरीदवाने की क्या ज़रूरत थी? और ऐसा क्या है इस माला में जिसका सौ रुपया ले लिया....
घर आकर मैंने ध्यान-व्यान कुछ भी नहीं किया-कितना डरा हुआ, कितना कुछ सोचा था, और हुआ क्या? एक बस नाम का सन्यास...!! यह एकदम खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसा मामला था| एक-दो दिन में मैं सन्यास-वन्यास सब भूल-भालकर अपनी रूटीन लाइफ में व्यस्त हो गया| सब कुछ पहले की तरह चलने लगा|
एक सप्ताह बाद, एक शाम मैं अपने इंस्टीट्यूट से घर जा रहा था| राह चलते हुए अचानक मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मैं अपने शरीर से अलग हूँ| एक बहुत ही अनूठे ढंग से पूरे शरीर का बोध होने लगा| ऐसा पहले कभी कुछ नहीं हुआ था| घर पहुंचे-पहुँचते एक और नई चीज़ घटने लगी| सब कुछ अजनबी-सा लगने लगा- मैं कौन हूँ, ये कहाँ हूँ मैं, कौन हैं ये लोग, क्या है यह सब, यहाँ आने से पहले मैं कहाँ था... ??? इस तरह के कई सवाल भीतर उठने लगे| भाई को देखा तो ऐसा लगा जैसे पहली बार इसे देख रहा हूँ, एकदम अजनबी लग रहा था भाई| बड़ी देर तक यह सब खेल चलता रहा| ऐसा लग रहा था जैसे शरीर बहुत ही नाज़ुक हो गया हो| इस तरह से शारीर का कभी पता नहीं चला था|
खाना खाकर मैं सोने के लिए छत पर चला गया| बिस्तर पर लेटा, लेकिन नींद नहीं आ रही थी, शरीर में बड़ी बेचैनी हो रही थी| मैंने सारे कपड़े उतार दिए और बिस्तर पर लेट कर सांस को देखने लगा (सांस को देखने का ध्यान प्रयोग आश्रम में सीखा था)| थोड़ी देर बाद, ऐसा लगने लगा जैसे मैं शरीर से बहुत दूर हूँ और शरीर को देख रहा हूँ, सांसें अपने आप आ और जा रही है| फिर तो ऐसा लगने कि यदि अभी मैं उठ कर खड़ा हुआ तो मैं उठ जाऊँगा और शरीर पड़ा रह जाएगा| थोड़ा डर भी लगने लगा| बड़ी देर तक यही सब चलता रहा, फिर कब नींद आ गई पता नहीं चला|

अगली सुबह जब आँख खुली तो सब कुछ नार्मल था| बस हृदय में ठंडा-ठंडा लग रहा था| दिन भर इंस्टीट्यूट में काम करता रहा| शाम में किसी काम से कैफ़े गया| इंस्टीट्यूट के पास ही कैफ़े था, एक घंटा का दस रुपया लगता था| सन्यास लेने से पहले से www.oshoworld.com पर जा कर कुछ-कुछ देखता रहता था| डिस्कोर्स वाले टैब पर जब भी click करता था तो प्रवचनों का लिस्ट आता था| जब उन पर click करता था तो एक औरत गाना गाने लगती थी| सोचता था-पता नहीं प्रवचन के नाम पर इन लोगों ने गाना क्यों डाल रखा है| उस दिन भी किसी अंतर प्रेरणा से मैं वेबसाइट पर गया और प्रवचन पर click किया, फिर से उसी औरत की आवाज़ आई..कुछ सेकेंड सुन कर मैंने हैडफोन रख दिया और कैफ़े वाले से कुछ पूछने के लिए केबिन से बाहर आ गया| थोड़ी देर बाद जब लौटकर अपने केबिन में आया और हेडफोन उठाकर कान में लगाया, तो मैं हैरान रह गया ओशो बोल रहे थे| मैंने दूसरा प्रवचन प्ले करके देखा| फिर मुझे खेला समझ में आया, शुरू में एक स्त्री श्लोक को गाती थी, फिर ओशो बोलते थे|
कुछ प्रवचन डाउनलोड कर के अपने पैन ड्राइव में रख लिया| घर आकर खाना खाने के बाद PC में प्रवचन को डाल कर प्ले किया| बातें कुछ ज्यादा समझ में नहीं आती थी, लेकिन ओशो के आवाज़ की जादू में मैं खो जाता था| एक दो दिन बाद नेहरु प्लेस से एक छोटा सा 2 GB का MP3 प्लेअर 1300 में खरीद कर लाया| फिर तो कैफ़े से प्रवचन डाउनलोड करके लाता था, और दिन भर प्लेयर में डाल कर सुनता रहता था|

Monday, 24 September 2018

रात को भोर में बदलते हुए देखना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है


‘दिन’ मेरे लिए एक किताब की तरह है। और ऐसी किताब पढ़ने में मुझे बिलकुल भी मज़ा नहीं आता है, जिसके शुरू के और अंत के कुछ पृष्ठ ग़ायब हों। अभी दो दिन पहले किसी वजह से रात देर तक जगना पड़ा था। परिणामस्वरूप सुबह देर तक सोता रहा। उठने के बाद पूरे दिन एक अजीब प्रकार की बेचैनी से परेशान रहा। दिन, दिन जैसा नहीं लग रहा था, ऐसा लग रहा था मानो किसी अजनबी को जी रहा हूँ। जब भी सूरज के उगने से पहले नहीं उठ पाता हूँ, ऐसा ही फ़ील होता है। 
सुबह सूरज के उगने से पहले का जो समय है-भोर, वह मेरा सबसे ज़्यादा पसंदीदा समय है। वह किताब का मुख्य पृष्ठ है। सूर्योदय पहला चैप्टर है, और सूर्यास्त अंतिम पृष्ठ। शाम अगर सूरज को डूबता हुआ न देख लूँ, तो ऐसा लगने लगता है जैसे किताब ख़त्म किए बिना ही सो रहा हूँ। 
दिन को अपनी आँखों के सामने जन्म लेते हुए देखना, इस अस्तित्व के सबसे बड़े करिश्मे का गवाह होना है। सुबह की सघन शांति में बालकनी में बैठ कर, रात को भोर में बदलते हुए देखना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।

Sunday, 23 September 2018

इस दिन को मैं कभी नहीं भूलूंगा

#सन्यास-3
                                  माँ-पिताजी @आश्रम 
घटना-1
मेरे ख्याल से 7 या 8 साल का रहा होऊंगा| आम का महीना था| पिता जी साइकल चला रहे थे, और मैं पीछे कैरियर पर बैठा हुआ था| मुझे बड़ा मजा आ रहा था| ‘3 इडियट’ के आमिर खान की तरह मैं मुस्कुराए जा रहा था| पिताजी के साथ कहीं जाना मेरे लिए उत्सव जैसा होता था| हालाँकि, ‘पिता पुत्र को घर से एक साथ नहीं निकलना चाहिए’, अपनी इस धारणा की वजह से बहुत कम ही अपने साथ कहीं ले जाते थे| लेकिन जब भी ले जाते थे, मेरे आनंद की कोई सीमा नहीं रहती थी| किसी चीज़ के लिए कभी डांटते नहीं थे, बड़ा भयमुक्त फील करता था| माँ के साथ कहीं जाना बड़ी मुसीबत हो जाती थी| हमेशा आँख दिखाती रहती थी| लोगों के सामने तो कुछ नहीं बोलती थी, लेकिन घर आने के बाद बड़ा सुनाती थी, बाज़दफा अच्छे से धोया भी करती थी| घंटों प्रवचन सुनना पड़ता था|
तो, उस दिन पिताजी की साइकल पर बैठे हुए, अपने सुख को साक्षी मान कर, मैंने कुछ प्रण लिये थे| ‘इस दिन को मैं कभी नहीं भूलूंगा, बड़ा होकर भी याद रखूँगा, पिताजी को कभी कष्ट नहीं पहुंचाउंगा|’ अभी आँखों के सामने वो पूरा दृश्य उभर रहा है, आम्रकुंज से आती मंजरो की गंध, पिताजी की गंजी में बना छेद, पहिया के घूमने की आवाज़, और पीछे बैठा प्रमुदित मैं| आह...कितना आल्हादित था मैं...!!!!!!
ऐसे ही कुछ प्रण मैंने उस दिन भी लिए थे, जब पिताजी दिल्ली के लिए मुझे विदा करने आए थे| आगे की पढाई के लिए बेटे को दिल्ली भेजते समय उनके आँखों में उम्मीद की एक अपूर्व चमक थी| उस दिन (12, अक्टूबर 2008) सन्यास लेने के लिए जाते समय, बस में बैठे-बैठे पिताजी के आँखों की उस चमक को मैं मलिन होते हुए देख रहा था| ‘क्या मेरे सन्यासी हो जाने से पिता जी खुश होंगे?’ फिर सोचा, बुद्ध के पिता भी तो कितने दुखी हुए थे, जब बुद्ध उस रात पत्नी और नवजात राहुल को सोता हुआ छोड़ कर जंगल चले गए थे| मेरे बच्चा पैदा न करने के निर्णय में बहुत से कारणों में से एक कारण मैं ख़ुद भी हूँ| बेटे के तौर पर मैं असफल रहा| न चाहते हुए भी कई तरह के कष्ट अपने माता-पिता को देते आया हूँ| कभी-कभी सोचता हूँ बुद्ध का जंगल भागना ज्यादा ठीक था| कुछ दिन बाद घर के लोग उन्हें भूल गए होंगे| लेकिन ओशो ने अपने सन्यासियों को घर पर बिठाकर ठीक नहीं किया| घरवालों के लिए एक चौबीस घंटे की मुसीबत पैदा कर दी| रोब उतार कर और भी मुसीबत कर दी| कभी-कभी मैं ख़ुद को जासूस जैसा महसूसता हूँ| जंगल सिर्फ जंगल नहीं है, जैसे पागलों के लिए पागलखाना होता है, वैसे ही सन्यासियों के लिए जंगल है| घर छोड़कर भागने वाले सन्यासियों के माँ-बाप कम-से-कम गर्व से यह तो कह पाते थे कि मेरा बेटा त्यागी है, अपरिग्रही है, सन्यासी है| हमारे माता-पिता को यह सुख भी नहीं मिला| कहने को घर पर हूँ, लेकिन घर का नहीं हूँ, दिखने में नार्मल हूँ, लेकिन नार्मल बिलकुल भी नहीं हूँ| घर वालों के लिए एक बिनामतलब का उपद्रव हूँ|    
   
घटना-2 

उन दिनों (2007 में) मैं अपने दो भाईयों (गोविंद, और निकेश) और एक दोस्त ‘शंकर’ के साथ कृष्णा पार्क में रह रहा था| 2005 में अंग्रेज़ी सीखते हुए, सोनू नाम के एक बन्दे से मिला था, उसकी अंग्रेज़ी (ख़ासकर उसका RP accent) से बड़ा प्रभावित हुआ था| पूछने पर बताया कि उसने ब्रिटिश कौंसिल से अंग्रेज़ी सीखा था| तभी से मेरा भी ब्रिटिश कौंसिल से अंग्रेज़ी सीखने का बड़ा मन था| लेकिन फ़ी इतनी ज्यादा थी कि मन मसोस कर रह जाता था| 2007 में जब जॉब करना शुरू किया तो, लगा कि अब शायद फ़ी पे कर सकता हूँ| एक दिन ऑफिस से छुट्टी लेकर BC गया| वहां जाकर पता चला कि एडमिशन लेने से पहले एक टेस्ट देना होता है, फिर रिजल्ट से पता चलता है कि किस कोर्स में एडमिशन मिल सकता है| टेस्ट फ़ी 5 हंड्रेड था| मैंने टेस्ट दे दिया| मुझे जो कोर्स सजेस्ट किया गया उसकी फ़ी 8 हज़ार थी| 22 फ़रवरी तक मुझे एडमिशन ले लेना था| मेरी सेलरी 7 मार्च को आने वाली थी| एकदम से इतने पैसे जुटना मेरे लिए क़रीब-क़रीब असंभव था| अभी-अभी जॉब शुरू ही किया था, और घर से पैसे लेना बंदकर दिया था| गोविन्द ने आश्वासन दिया कि पैसे का जुगाड़ हो जाएगा, लेकिन नहीं हो पाया|
22 तारिख़ को मुरझाया हुआ चेहरा लिए मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था| निकेश मेरी बुआ का बेटा है, बचपन से हम दोनों में अच्छी दोस्ती थी| लेकिन हमउम्र होने की वजह से हमारे बीच हमेशा एक तनाव की स्थिति बनी रहती थी| हमेशा शीत युद्ध चलता रहता था| किसी-न-किसी बात को लेकर आए दिन हम में बहस हो जाती थी| गोविन्द मेरा चचेरा भाई है, बचपन से ही हम दोनों साथ रह रहे थे| वो उम्र में मुझसे थोड़ा बड़ा है, इसलिए मामला थोड़ा ठीक रहता था| सो, गोविन्द से मैंने पैसे के लिए कहा था, लेकिन निकेश से कुछ नहीं बोला था| वैसे मुझे लगा था कि अगर इसके पास होगा भी तो यह मुझे नहीं देगा| एक ताज़ा घटना है, जो आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ, इससे पता चलेगा कि हमारे (निकेश और मेरे) बीच किस तरह के शीत युद्ध होते थे| अभी पिछले महीने फ्रेंडशिप दिवस पर, गोविन्द और मैं निकेश से मिलने उसके घर (राजस्थान) गए थे| धनौल्टी से आकर मैं दिल्ली में गोविन्द के यहाँ रुका हुआ था| उसी दौरान एक दिन गोविन्द को निकेश का फोन आया| वह अपनी पत्नी, जो गाँव से आ रही थी, को स्टेशन से पिक करने दिल्ली आ रहा था| गोविन्द ने उसे मेरे दिल्ली में होने की बात बताई| थोड़ी देर बाद मुझे निकेश का कॉल आया, फिर उसके इसरार पर हम उसकी कर में बैठकर एक दिन के लिए राजस्थान गए| इससे पहले आखरी बार हम तीनो 2015 में गोविन्द की शादी पर मिले थे| 
संयोग से उस दिन पीसाजी (निकेश के पिताजी) का जन्मदिन भी था| घर पहुँचने पर, हमें खिलाने के लिए निकेश मिठाई लेकर आया| डाइटिंग के चक्कर में मैंने मिठाई खाने से इंकार कर दिया, बोला डॉक्टर ने मना कर रखा है| फिर थोड़ी देर बाद, इस घटना को भूल-भाल कर जब हम बाहर घूमने के लिए गए, तो एक जगह मैंने एक ब्लैक चोकलेट खरीदा| जब चोकलेट को तीन भाग में तोड़कर एक भाग उसकी ओर बढ़ाया, तो लेने से मना करते हुए बोला, “मैं चोकलेट नहीं खाता”, मुझे एकदम से समझ नहीं आया कि यह क्या बोल रहा है, चोकॉलेट कबसे नहीं खाने लगा| फिर याद आया ससुर यह मिठाई का बदला ले रहा है|
उस दिन मुझे लेटा देखकर निकेश मेरे पास आया, “तू जा नहीं रहा है एडमिशन के लिए?” मुझे लगा यह मेरे जले पर नमक छिड़कने आया है| ‘पैसा नहीं हो पाया, नहीं ले रहा एडमिशन|’ मैंने आवाज़ नार्मल करके कहा| वह ‘हम्म्म....’ बोलकर थोड़ी देर तक मेरे बगल में बैठा रहा फिर अपने जेब से IDBI का एक ATM कार्ड निकाल कर मेरी ओर बढ़ाते हुए बोला, “यह ATM पापाजी ने मुझे दे रखा है, तू इसमें से पैसा निकाल ले, मैं उनको बोल दूंगा कि मेरे किसी दोस्त को एमरजेंसी थी, सो उसे कुछ दिन के लिए पैसा दिया है|” मैं एकदम से भरोसा नहीं कर पाया| बड़ी मुश्किल से मैंने अपने आंसू को रोका| इस घटना के बाद से मेरे भीतर कुछ बदलने लगा था| उस दिन घर से निकल कर ATM जाते समय भी मैंने कई प्रण लिए थे| 
                               गोविन्द और निकेश के साथ

घटना-3 (जागरण)

संभवतः यह 2010 कि बात है| गोविन्द और मैंने साथ मिलकर एक कोर्स करने का निर्णय लिया| जब खर्चे का पता किया तो पता चला 30 से पैंतीस हज़ार का खर्चा आएगा| उन दिनों मैं ट्यूशन पढाया करता था| मेरी आमदनी बहुत कम थी| जो भी कमाता था खर्च कर देता था, बचता कुछ भी नहीं था| 8 हज़ार की तरह ये तीस हज़ार जुटाना भी मेरे लिए असंभव ही था| घर से पैसा लेना कब का बंद कर दिया था| खैर, मैं पैसे जुटाने की कोशिश करने लगा| गोविन्द ने अपने घर से पैसा मंगा लिया| एडमिशन का डेट नज़दीक आती जा रही थी, कहीं से भी पैसे का कोई जुगाड़ नहीं हो पा रहा था| गोविन्द उन दिनों देवली रोड पर एक कंप्यूटर इंस्टीट्यूट चला रहा था| लास्ट डेट से एक दिन पहले कॉल कर के मुझे अपने इंस्टीट्यूट पर बुलाया| “पैसे का जुगाड़ हुआ”, पानी का ग्लास मेरी ओर सरकाते हुए मुझसे पूछा|
'नहीं हो पाया, तुम एडमिशन ले लो, मैं अगले साल ले लूँगा', मैंने दुखी मन से गोविन्द से कहा|
“मैं नहीं तुम एडमिशन ले लो|”
‘लेकिन मेरे पास तो पैसा नहीं है’, मैंने थोड़ा असहज होते हुए कहा|
“मेरे पास जो पैसा से उससे ले लो”
‘और तुम?’, मैंने हैरान होते हुए पूछा|
“मैं नहीं लूँगा, मेरी चिंता मत लो, कोर्स के बाद जब तुम जॉब करोगे, तब मैंने ले लूँगा, अभी तुम एडमिशन ले लो|” यह क्या सुन रहा था मैं| दो साल का कोर्स था| दो साल बाद मैं जॉब करूँगा, तब पैसा आएगा, फिर ये एडमिशन लेगा| मुझे काटो तो खून नहीं| उसके इंस्टिट्यूट से नीचे उतरते वक़्त खोपड़ी में भयंकर उत्पात मचा हुआ था| उस दिन भी मैंने कई प्रण लिए थे|
                                    गोविन्द के साथ



Saturday, 22 September 2018

ये उम्र सन्यास लेने की है?

#सन्यास-2

उन दिनों मेरा छोटा भाई Saket Jha मेरे साथ ही रह रहा था । सन्यास लेना है जब तय हो गया, तो सफ़दरगंज से 1200 रुपये में मैं दो रोब ख़रीदकर ले आया, एक मैरून और एक सफ़ेद। जब रोब लेने गया था तो Vikas Choudhary मेरे साथ थे। वे भी मेरे साथ सन्यास लेना चाह रहे थे। लेकिन ऐन मौक़े पर उनकी बुद्धि खुल गई और वे पलट गए। साकेत बड़ा ख़ुश था, ‘अब ये रोब पहनेगा तो इसके सारे कपड़े मुझे मिल जाएँगे।’ मेरा दूसरा भाई Biplava Kumar Jhaथोड़ा चिंतित था। ख़ुद मुझ से कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन और लोगों को मुझे समझाने के लिए भेजता था। मैं पता नहीं कौन सी दुनिया में जी रहा था। कहाँ BCA करने के लिए दिल्ली आया था, और कहाँ ये सन्यासी होने जा रहा था। 

घर से जब आश्रम के लिए निकला तो मन में हज़ार तरह के द्वन्द और डर पैदा होने लगे। ‘पता नहीं आश्रम में कैसे लोग होंगे, मेरे साथ क्या करेंगे?’ सुन रखा था कि आश्रमों में जादू से लोगों भेड़-बकरी बना दिया जाता है। रास्ते में, मेरे बग़ल वाली सीट पर बैठी एक स्त्री ने मेरी अजीब सी सूरत देखकर मुझसे पूछा,”कहाँ जा रहे हो?” मैंने कहा, ‘सन्यास लेने।’ फिर तो पूरे रास्ते मुझे समझाती रही, ‘पागल हो गए हो क्या? ये उम्र सन्यास लेने की है? सम्मोहित कर देंगे तुमको वहाँ पर, पागल होकर लौटोगे वहाँ से।’ पता नहीं और क्या-क्या कहती रही मुझसे। 

आश्रम के गेट पर पहुँचते-पहुँचते मैं काफ़ी डर गया था। गेट पर पहुँच कर थोड़ी देर खड़ा रहा। एक मन कह रहा था, ‘अब भी मौक़ा है भाग लो यहाँ से।’ मुझे याद है काँपते हाथों से मैंने गेट पीटा था।

Thursday, 20 September 2018

मैं अलग नहीं हूँ, तुम सब एक जैसे हो


#सन्यास -1

बाहर से देखने पर तो सब कुछ संयोग ही लगता है, लेकिन जब पीछे मुड़ कर देखता हूँ, तो लगता है शायद सब कुछ पहले से ही तय था। बचपन में गर्दन झुका कर चलता था। घर के लोग बड़ा डाँटते थे, “चोर हो क्या तुम, गर्दन झुका कर क्यों चलते हो? सर उठा कर चलो और सीना तान कर रखो?” पिता जी कहते थे, “तीन पुश्त् के बाद ख़ानदान बदलता है, यह लगता है अपने परदादा, दादा और पिता से अलग होगा।” 

बहुत कोशिशों के बाद भी मैं कभी सीना तान कर और गर्दन उठा कर नहीं चल सका। बहुत दिनों तक समझ नहीं आता था कि मैं अपने ख़ानदान के तथकथित महापुरुषों से अलग क्यों हो गया। मेरे ददिहाल से लेकर ननिहाल तक मेरे पूरे ख़ानदान में मेरे जैसा गोबर पुरुष (घर वालों के हिसाब से) कोई नहीं था। 

(ऐसा मैंने सुना है कि) मेरे पितामह के डर से, जब वे राह से निकलते थे, लोग घर में घुस जाते थे। दादाजी, पिता जी, और चाचा जी सबने कमोबेस अपने ख़ानदान का नाम उजागर किया था। ननिहाल का भी यही हाल था, एक से बढ़कर एक सूरमा उधर भी थे। ऐसे बाहुवलियों के ख़ानदान में मैं एक ऐसा गोबर पैदा हुआ था जो लोगों से पिटकर आ जाता था। माँ बहुत चिंतित रहती थी, “आज तक मेरा कोई भाई कभी किसी से पिटकर नहीं आया, पता नहीं यह किसके जैसा हो गया।” 
एक बार ऐसा हुआ कि मेरी लड़ाई एक टिड्डे जैसे लड़के से हो गई, बस संयोग कहिए कि मैंने उसे पटकनी देदी और उसके सीने पर चढ़ बैठा। पता नहीं कैसे मेरे पिता जी ने मुझे यह पुरुषार्थ का कार्य करते हुए कहीं से देख लिया। उसके बाद से महीनों तक लोगों के सामने मेरे इस पराक्रम का गुणगान करते रहते थे। लेकिन जल्द ही फिर मैं जब कहीं से पिट कर आ गया तो उन्होंने लोगों को गाथा सुनानी बंद करदी। 
घर वालों की अपेक्षाओं पर खड़ा न उतर पाने की वजह से मैं काफ़ी चिंतित रहता था। मेरे सारे रिश्तेदार मेरी माँ से कहा करते थे, “आपका यह बेटा बोलता भी है? हमने कभी इसे बोलते नहीं सुना।” माँ बड़ा चिंतित रहती थी। ननिहाल में भी उसे सबसे मेरे व्यहार के बारे में सफ़ाई देनी पड़ती थी, “थोड़ा शांत है, पढ़ाई लिखाई करता है न इसीलिए थोड़ा अलग है, बड़ा होकर ठीक हो जाएगा।” 
एक बार तो एक आदमी ने मेरी माँ से यहाँ तक कह दिया कि “आपका बेटा मंदबुद्धि है क्या? इसे कभी और लड़कों की तरह बोलते या खेलते हुए कभी नहीं देखा।” कभी-कभी माँ इन सब चीज़ों को लेकर बहुत दुखी हो जाती थी। और मैं भी बड़ा परेशान रहता था। सोचा करता था कि मैं ऐसा क्यूँ हूँ..? 
2008 तक मेरे पास किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था। 2008 में 20 अक्टूबर को जब सन्यास लिया और साधना शुरू की तो धीरे-धीरे मुझे सारे प्रश्नो के उत्तर मिलने लगा। शुरू-शुरू में अपने सन्यासी हो जाने पर मुझे बड़ा अचरज होता था। समझ नहीं आता था कि अच्छा भला नॉर्मल इंसान इन सब चक्करों में कैसे फँस गया। लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें साफ़ होने लगी। फिर दिखने लगा कि शुरू से ही चीज़ें साफ़ थीं। ‘धम्मपद में जब बुद्ध से भिक्षुओं को कहते हुए सुना, “भिक्षुओं, राह पर चलते समय हमेशा गर्दन झुका कर रखो, तीन क़दम से आगे मत देखो।” तो, मैं रोने लगा। फिर समझ में आया कि ससुर मैं घंटों अकेले क्यूँ बैठा रहता था, कम क्यों बोलता था। पिट कर घर क्यों आता था। 
विवेकानंद से जब एक पत्रकार अमेरिका में पूछता है, “आप इतने अलग क्यों हैं?”, तो विवेकानंद हँसते हुए जवाब देते हैं, “मैं अलग नहीं हूँ, तुम सब एक जैसे हो ।” पहली बार जब मैं यह पढ़ा तो बड़ी देर तक हँसता रहा। 
मैं अलग नहीं था, I was a born monk. 🧘‍♂️

Tuesday, 18 September 2018

एक चिथड़ा सुख



मुझे याद है, बचपन में जब कभी बहुत देर बाद किताब पढ़ कर उठता था, या फिर लंबे समय तक बंद कमरे में बैठकर फिल्म देखने के बाद बहार निकलता था, तो ऐसा लगता था मनो दुनिया एक दम से बदल गई हो | सब कुछ नया-नया और अजनबी-सा लगने लगता था| ऐसा लगता था मनो हर चीज़ को पहली बार देख रहा हूँ | धीरे-धीरे यह एहसास कम होने लगा, और बाद में कब मैं इसको पूरी तरह से भूल गया पता भी नहीं चला | इधर जब 2007 में जब ध्यान में बैठना शुरू किया तो फिर से वैसा ही घटित होने लगा| एक घंटे के झाजेन के बाद जब बहार निकलता था, तो बहुत देर तक खोया-खोया रहता था, ऐसा लगता था मनो सब कुछ बहुत धीरे-धीरे घटित हो रहा हो | धीरे-धीरे अनुभव में आया कि ऐसा तब होता है, जब हम किसी चीज़ में कुछ देर के लिए पूरी तरह से खो जाते हैं, और फिर जब उससे बहार निकलते हैं, तो सब कुछ बदला-बदला-सा प्रतीत होने लगता है| दोपहर में कभी यदि आपको गहरी नींद आ जाए, और आप एकदम से शाम में उठें, तो इस चीज़ को आप बहुत ही सघनता से महसूस कर सकते हैं | इन दिनों यात्रा से लौट कर आने के बाद भी मुझे कई दिनों तक ऐसा ही महसूस होता रहता है| जब से माधोपुर से आया हूँ, ऐसा लग रहा जैसे मैं किसी अजनबी लोक में टहल रहा हूँ, कुछ भी ठीक से समझ नहीं आ रहा है|
                                                                      पृथ्वी थियेटर

अभी पीछे जब मुंबई गया था तो वहां पृथ्वी थियेटर के बुक शॉप से निर्मल वर्मा की एक किताब 'एक चिथड़ा सुख' खरीदा था| मुंबई में रहते हुए 90 पेज पढ़ा था, लेकिन यहाँ आकर जब आगे पढ़ना शुरू किया तो कुछ भी समझ में ही नहीं आ रहा था | 110 पेज तक जब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा, तो फिर से शुरू किया| आज शाम में किताब खत्म किया है| भीतर सब कुछ ठहरा-ठहरा लग रहा है| दादा जी के मरने के बाद कई दिनों तक ऐसा ही महसूस होता रहा था, न सुख, न दुःख, बस एक उदास और रिक्त खालीपन | एक तरह की उदास शांति | सत्य कल्पना सा प्रतीत हो रहा है, और कल्पना सत्य जैसा| 
                            "आगे इतनी संकरी जगह थी कि वहां से न सच गुज़र सकता था, न झूठ" 
                                                                          पृथ्वी थियेटर
कल (17, Sep 2018) सुबह 6:30 के क़रीब अहमदबाद पहुंचा | शिवरंजनी उतर कर BRT से रानिप आया| नित्य क्रिया से फारिग होने के बाद, कुणाल को कॉल किया| उस दिन जब हमें कुणाल बस में बिठाने आए थे, तब तय हुआ था कि माधोपुर से लौटने पर सुबह हम लोग 'शंभू' पर कॉफ़ी पिएंगे| जब मैंने कॉल किया, तब कुणाल ब्रश कर रहे थे, 'दस मिनट में पहुँचता हूँ' कह कर उन्होंने कॉल काट दिया| दस मिनट बाद जब उनका कॉल आया, तो उन्होंने हमें पांच मिनट के लिए बहार आने को कहा| मुझे यह समझ नहीं आया कि जब कॉफ़ी हाउस अंदर है, तो ख़ुद अन्दर आने के वजाए वो हमें बहार क्यों बुला रहे हैं| खैर, हम समान उठा कर बाहर आ गए| बहार आया तो दूर से देखा कि कुणाल एक खंभे के नीचे तीन गिलास निकाल कर उसमे बोतल से कुछ डाल रहे हैं| 'ससुर, ये क्या नौटंकी है', मैंने सोचा | जब पास पहुंचा तो देखा, वो घर से गुनगुने पानी में शहद और नींबू मिला कर लाए थे| यह बहुत ही सुन्दर सरप्राइज था| वहीं खंभे के नीचे बैठ कर हमने नींबू पानी पिया | 
नींबू पानी पीने के बाद हम कॉफ़ी पीने के लिए अन्दर आ गए| हमारे उम्मीद के विपरीत 'शम्भू-24' बंद था| बड़ा गुस्सा आया, 'फिर 24 hrs लिखने का क्या मतलब है? दिये गए नंबर पर हमने कॉल भी किया लेकिन किसी ने रिंग का जवाब नहीं दिया| गूगल की मदद से आसपास दूसरा कॉफ़ी हाउस ढूंढन शुरू किया, लेकिन कोई भी 9:30 से पहले ओपन नहीं हो रहा था| इतना लम्बा इंतजार मुश्किल था| बड़ी देर तक हम शम्भू के ओपन होने का इंतजार करते रहे, लेकिन 9 बजे तक शम्भू वाले का कभी कोई अता-पता नहीं था| अंत में हम बिना कॉफ़ी पिए ही 9:10 बस में बैठ गए| खुश था कि सुबह-सुबह नीबू-शहद मिला हुआ गुनगुना पानी पीने को मिला, उदास था कॉफ़ी पीने को नहीं मिला| बस में बैठते के साथ ही मैं बैग से किताब (एक चिथड़ा सुख) निकाल कर पढ़ने लगा| 
"कुछ लोग अपने अकेलेपन में काफी सम्पूर्ण दिखाई देते हैं- उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत महसूस नहीं होती| किन्तु बिट्टी में कोई ऐसा मुक म्मिलपन नहीं दिखाई देता था|- वह जैसे कहीं बीच रस्ते में 'ठिठकी-सी' दिखाई देती थी, जबकि दूसरे लोग आगे बढ़ गए हों| बीच में जो लोग ठहर जाते हैं, उनमे अकेलापन उतना नहीं, जितना अधूरापन दिखाई देता है|"  क्या मैं भी कॉफ़ी के बिना अधूरा हो गया था? 
                                                                रीडिंग 'एक चिथड़ा सुख' @ माधोपुर
कुछ समझ नहीं आ रहा है, कुछ से कुछ लिख रहा हूँ| अभी-अभी निर्मल वर्मा की चार और किताब की आर्डर दी है| ऐसे में ग़ालिब याद आ रहे हैं 'बक रहा हूँ जुनूं में क्या-क्या कुछ, कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई' विचारों की गति इतनी धीमी हो गई है कि कुछ भी ठीक से सोच नहीं पा रहा हूँ| नियम से जब इस तरह का कोई भाव भीतर पैदा हो तो उसे पहले जी लेना चाहिए, ऐसे में लिखने की जल्दी करना बेवकूफी है| लेकिन फिर सोचता हूँ अगर कहीं सच में सिफर हो गया तो लिखेगा कौन? इसीलिए जो भी समझ में आ राह है, अनापसनाप लिख दे रहा हूँ| क्या पता इस शून्य से कभी बहार ही न निकल पाऊं | भागते भूत की लंगोट ही सही| 

किताब की शुरुआत निर्मल कामू की एक कोट से करते हैं, 
"There is always a part of man that refuses love. It is the part that wants to die. It is the part which needs to be forgive." 

और किताब के अंत में कहीं कहते हैं, "उसको रह-रहकर बाबू की बात याद हो आती- बिट्टी की ज़िन्दगी में दखल मत देना; वहां ऐसे रहना, जैसे तुम हो ही नहीं| होकर भी नहीं होना, पिछले तीन महीनो में उसने यह सीखा है, कोशिश की है कि अपने को एक सिफर में बदल डाले, उस बंद घड़ी की सुई की तरह, जो एक जगह ठहर जाति है; हिलाओ तो भी नहीं हिलती| "

जैसे ही मैं  यह लाइन पढ़ता हूँ मुझे Max Ehrmann की Desiderata याद आ जाती है| 
    Go placidly amid the noise and haste,
    and remember what peace there may be in silence.

    निर्मल को पढ़ना मृत्यु को जीने जैसा है| किताब समाप्त होने के बाद कुछ, जो आपके भीतर था, हमेशा के लिए मर जाता है| आप थोड़े रिक्त हो जाते हैं| इस रिक्ता को भरने का कोई उपाय नहीं है| शायद मृत्यु के अतरिक्त और कुछ इसे नहीं भर सकता है| 


    "एक लम्बी नोटबुक, जिसे माँ ने उसे बारहवीं वर्षगांठ पर दी थी | पहले पन्ने पर लिखा था- 'Write what you see, but what you see may not be right.' यह शायद उन्होंने हंसी में लिखा था, क्योंकि देखना गलत कैसे हो सकता है? तुम देखे को न समझो, यह बात दूसरी है, लेकिन एक बार देख लेने पर दुनिया एक कीड़े की तरह सुई की नोंक पर बिंध जाती है, तिलमिलाती है, लेकिन कोई उसे छुड़ा नहीं सकता| देखना तभी खत्म होता है, जब मरना होता है, और मरने पर भी आँखे खुली रहती हैं- जैसे माँ की आँखें थीं - कांच के दो कंचे- जिन पर दुनिया एक पथराई छाया की तरह चिपकी रहती है..." - एक चिथड़ा सुख

Monday, 17 September 2018

इंतज़ार तो खड़ा ही रहता है...

परसों (12, Sep, 2018) सुबह-सुबह उठकर जब ब्लैक कॉफ़ी पी रहा था, तो अनायास ही कहीं घूमने जाने का कीड़ा काटने लगा..। एक दो जगहों के बारे में सोचने के बाद, बिना बहुत सोचे हमने आनन-फ़ानन में बस से माधवपुर की टिकट बुक कर ली। टिकट बुक करने के बाद ख़याल आया कि इस रविवार से पहले तीन बेहद ज़रूरी काम को अंजाम देना था। कुछ घंटों बाद तो पच्चीस चीज़ें सामने उभर कर सामने आने लगी, लेकिन अब कुछ किया नहीं जा सकता था। बहुत गहरे में, टिकट कटाने से पहले ही मुझे पता था कि अगर तय करने में देर की तो मन कोई-न-कोई बखेड़ा ज़रूर खड़ा कर देगा। बहुत-सी उलझनो में एक उलझन यह भी था कि शनिवार को हमने zen cafe में एक बार फिर कॉफ़ी पीने का प्लान बनाया था (यह within month पाँचवा कॉफ़ी होने वाला था)। कॉफ़ी न पी पाने का बड़ा दुःख हो रहा था। ख़ैर...अब कुछ नहीं किया जा सकता था। 

इसीलिए, मैं सारे महत्वपूर्ण फ़ैसले जल्दबाज़ी में लेता हूँ, सोच-विचार कर सही निर्णय लेना क़रीब-क़रीब असंभव है।गुरजेईफ कहा करते थे, “शुभ करने की हमेशा जल्दी करना, और अशुभ को जितना हो सके उतना टालते जाना।” 
हमारी बस रात ११ बजे starबाज़ार, अहमदाबाद से थी। कुणाल को कॉल करके इत्तिला दिया कि हम ADI आ रहे हैं। कुणाल आजकल थिएटर कर रहे हैं, शाम सात बजे से वे थिएटर में व्यस्त हो जाते हैं।सो, उन्होंने थिएटर का हवाला देकर मिलने की असमर्थता जतलाई। सोचा था अगर कुणाल से मिलना हो पाता तो कॉफ़ी न सही लेकिन गन्ने का जूस ही पी लेता। 
थोड़ा मायूस था, ऐसे में ग़म ग़लत करने के लिए ग्रीन-टी तैयार करने लगा। पानी स्टोव पर रख कर, किचन में ही पंखे के नीचे बैठ गया, और पानी के गर्म होने का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर में पानी सिरसिराने लगा। पानी में खौल रहे अदरक और तुलसी की सुगंध से किचन सुवासित होने लगा। आँखें बंद कर के मैं गंध और आवाज़ को अपने भीतर आत्मसात करने लगा। तभी हॉल में रखे फ़ोन से आवाज़ आई “कुणाल कॉलिंग”, किचन से उठकर में हॉल में आया। जैसे ही कॉल उठाया उधर से कुणाल की आवाज़ आई, “सुनिये...मैंने थिएटर जाना केन्सल कर दिया है। आप २:३० की ट्रेन से अहमदाबाद आ जाइए, शाम 5-8 हम Zen-Cafe पर बैठेंगे, फिर रात में कहीं खाना खाएँगे, और अंत में मैं आपको बस स्टैंड छोड़ दूँगा।” कुणाल के फ़ोन रखने के बाद मैं सोचने लगा,” यह आदमी कितना बड़ा नशेड़ी है, कॉफ़ी के चक्कर में थिएटर छोड़ रहा है।” मैं यह सब सोच ही रहा था कि पीछे कुर्सी में कुछ चुभने लगा। अचानक ऐसा लगने लगा कि जैसे कुर्सी में समा नहीं पा रहा हूँ। उत्सुकतावस मैंने पीछे मुड़ कर देखा....OMG मेरी बाँछें खिल गई थी..!!!!
चित्र साभार- गूगल

तो, जैसा कि तय हुआ था हम 2:30 की ट्रेन (जो कि आई 3 बजे और चली तीन दस पर) पकड़ कर ठीक 5 बजे साबरमती पहुँचे। अगर ट्रेन समय से होती तो हम 4:15 तक सबरमती पहुँच चुके होते। ट्रेन पूरे रास्ते जहाँ-तहाँ रुकते हुए आई थी। मैं बड़ा बेचैन रहा था, कभी बैठ जाता था, तो कभी गेट पर आ कर बाहर झाँकने लगता था। भीतर बार-बार गीत चतुर्वेदी जी की एक पंक्ति, “बैठ कर किए गए इंतज़ार में भी, इंतज़ार तो खड़ा ही रहता है।”, दुहराए जा रहा था। ख़ैर, साबरमती से मैंने ओला बुक किया और हम अख़बारनगर आ गाए।5 मिनट के इंतज़ार के बाद स्कूटर हड़हराते हुए कुणाल हाज़िर हुए। भाग करके हम गन्ने का जूस पीने के लिए गए। रास्ते भर हम इसी बात का अफ़सोस करते रहे कि अब हमें कॉफ़ी हाउस में एक घंटा कम बैठने को मिलेगा। इस बात का मलाल हमें पहले दिन से रहा है कि कॉफ़ी हाउस इतनी जल्दी क्यूँ बंद हो जाता है। 8 बजे कोई बंद होने का टाइम है। एक घंटा तो हमें सेटल होने में लग जाता है। तीन घंटा से कम बैठने का कोई मतलब नहीं है। इसीलिए हमारी कोशिश रहती है कि किसी भी सूरत पर हम 5 बजे तक कॉफ़ी हाउस पहुँच जाएँ, ताकि हमें तीन घंटे बैठने का मौक़ा मिले।

गन्ने वाले के यहाँ पहुँच कर हमने चार ग्लास रस का ऑर्डर दिया। जब से कॉफ़ी हाउस में बैठना शुरू किया है तभी से गन्ने का रस पीना रिचूअल जैसा बन गया है। जहाँ से हम जूस पीते हैं वहाँ की कुछ विशेषताएँ है- यहाँ गन्ने को पेरा नहीं जाता है, बल्कि अंगूर की तरह पूरे गन्ने को मशीन में डाल कर जूस निकाला जाता है। स्टिक को पहले से ही वे फ़्रीज़ में रखते हैं, इसीलिए अलग से बर्फ़ डाल कर जूस को ठंडा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। पूरे गन्ने का जूस होने की वजह जूस का स्वाद बहुत ही बेहतरीन हो जाता है। एक तरह का हरापन होता है स्वाद में, जो आपको वैसे पूरे गन्ने को दाँत से चूसने पर ही मिल सकता है। 
जूस पीने के बाद हम ट्रैफ़िक के सभी नियमों का उल्लंघन करते हुए तीर की तरह कॉफ़ी हाउस पहुँचे। जब कुणाल गाड़ी पार्क कर रहे थे, घड़ी में ठीक 6 बज रहा था, यानी हम पूरे एक घंटा लेट थे..शिट..! 
हमारे पसंदीदा टेबल पर एक जोड़ा पहले से बैठा हुआ था। हम थोड़े मायूस हुए...ख़ैर मन मसोस कर हम अपनी-अपनी पसंदीदा कुर्सी पर बैठ गए, टेबल की तरह हम सबका अपना-अपना पसंदीदा कुर्सी भी है। अपने सामने हमने अपनी-अपनी किताबें रखी-एक चिथड़ा सुख, courage और अडल्ट्री। थोड़ी देर बैठने के बाद कुणाल ने राजूभाई को कॉल करके हमारा ऑर्डर दिया “3 Cappuccino”. 10 मिनट बाद एक नया लड़का जिसे हम नाम से नहीं जानते हैं कॉफ़ी लेकर आया। हम झाग के ऊपर बने दिल को कम्पेर करने लगे कि किसका दिल ज़्यादा नुमाया है। 
At कॉफ़ी हाउस 
दो घूँट सुड़कने के बाद जान में जान आई। आधी कॉफ़ी समाप्त होते-होते भीतर का सारा ऊहापोह शांत हो गया। अंदर बस एक ही नाद उठ रहा था ‘कॉफ़ीयम ब्रह्म’....! 7:30 पर हमने zen टी का ऑर्डर दिया। zen टी के आते-आते हम ब्रह्म चर्चा में पूरी तरीक़े से डूब चुके थे। बार-बार बस दाग़ साहब को दोहराए जा रहे थे,

“वो और होंगे तेरी महफ़िल से उभरने वाले, हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए” ।
चित्र साभार- गूगल
"Never trust anyone who doesn't drink coffee."

-AJ Lee
कॉफ़ी हाउस से निकल कर हम डोसा खाने के लिए गए। रास्ते में TP से बचने के लिए रेड लाइट से पहले कुणाल हमें उतार देते थे। बीच में जब-जब हमें मौक़ा मिलता था, हम कॉफ़ी हाउस पर किए गए डिस्कशन का सिरा फिर से पकड़ लेते थे। कॉफ़ी हाउस पर हमने कई मुख़्तलिफ़ मुद्दों पर चर्चा की थी। सारी बात-चीत का हासिल यह निकला कि हमने अपने शग़ल को विस्तार देने का निर्णय लिया। पाँच बैठक के बाद हमें यह साफ़ हो गया था कि इस युग में अगर कहीं बुद्धत्व घट सकता है, तो वह है कॉफ़ी हाउस।काफ़ी घमर्थन के बाद हमने यह तय किया कि अपने जैसे और लोगों को हमें इससे जोड़ना चाहिए। इसी सिलसिले में हमने यह तय पाया कि zen टी ध्यान का आयोजन किया जाय। फिर हम इसकी रूपरेखा के बारे में काफ़ी देर तक तजकिरा करते रहे। 
चित्र साभार- गूगल
डोसा हाउस पहुँच कर मैंने अपने लिए रवा चीज़ मसाला डोसा ऑर्डर दिया, कुणाल और दिव्या ने मैसूर डोसा मँगाया। उनके डोसे का स्वाद मेरे डोसे बेहतर था। खाने के मामले में मेरा निर्णय अक्सर ग़लत निकलता है। 
डोसा हाउस से निकल कर हम रीवर फ़्रंट गए। घड़ी में सवा नौ बज रहा था। रीवर फ़्रंट पहुँच कर कुणाल ने बताया कि दिन में कोई ऊटपटाँग जूस पी लेने की वजह से ऊन के पेट में भयंकर गैस बन रहा है। हम तत्काल गैस की समस्या से निजात पाने की कोशिश में लग गए। पहले कुछ देर ब्रजासन में बैठे, फिर गूलगल की मदद से एक्यूप्रेसर points का पता करके उसको दबाने लगे। इन सब कवायत से थोड़ा लाभ तो हुआ लेकिन पूर्ण आराम नहीं मिला। फिर हम नदी किनारे टहलने लगे। टहलते-टहलते कुणाल की कुछ शाश्वत समस्या पर बात-चीत होती रही। कुणाल को मैं पिछले तीन साल से जानता हूँ, डे वन से उनकी सुई एक ही जगह अँटकी हुई है। इसीलिए जब भी हम मिलते हैं घूम-फिर कर दिन में एक बार तो उनकी समस्या के बारे में बात हो ही जाती है। उनकी समस्या क्या है, यह अभी आपको नहीं बताऊँगा, इसके बारे में कभी तफ़सील बात करेंगे। टहलते-टहलते हम जगह पर भी गए जहाँ से पिछले साल मेरे दोस्त की भाभी ने कूद कर आत्महत्या ली थी। 
दस बजे रीवर फ़्रंट बंद हो जाता है। वहाँ से हम सीधा बस स्टैंड के लिए निकले। रास्ते में कुणाल ने गैस की दवाई ख़रीदी, मैंने भी सफ़र के लिए एक दो सामान लिया। बस स्टैंड पहुँच कर हमने बस का पता किया फिर id का फ़ोटो कॉपी करवाने के लिए दूकान ढूँढने लगा। सुबह जब माधोपुर, पवन स्वामी को, कॉल किया तो उन्होंने ख़ास हिदायत दी थी कि सभी आगंतुकों के पास अपने id प्रूफ़ का फ़ोटो कॉपी होना चाहिए। लेकिन रात को साढ़े दस बजे सारी दूकाने बंद हो गयी थी। सुबह 8 बजे हम माधोपुर पहुँचने वाले थे, इतनी सुबह वहाँ भी कुछ हो पाना मुश्किल था। ख़ैर, हमने सोचा कि पवन स्वामी से मोहलत ले कर हम कल दिन में कहीं से फ़ोटो कॉपी करवा लेंगे। 
इस बीच कुणाल को प्रेसर आ गया, वे भाग कर पासवाले बाथरूम में गए। थोड़ी देर बाद उनका कॉल आया, “यहाँ पानी नहीं है, आप कहीं से एक बोतल पानी ख़रीद कर ले कर आइये...peeeuh!” 
बाथरूम बहुत ही ज़्यादा गंदा था। गेट के नीचे बने छेद से मैंने कुणाल को पानी दे दिया। बाहर आ कर मैं किसी साफ़ बाथरूम की तलाश करने लगा। जबतक कुणाल बाथरूम से आए, बस का टाइम हो गया था। हमें see off करने के बाद कुणाल चले गए। हम अपने भीतर एक मुकम्मल सुकून का अनुभव कर रहे थे। कॉफ़ी हाउस पर जो एक घंटा कम मिला था, उसकी कमी हमने रीवर फ़्रंट पर पूरी कर ली थी। किसी चीज़ का कोई मलाल नहीं था। 
At Coffee House 
”Three hundred years ago, during the Age of Enlightenment, the coffee house became the center of innovation."
-Peter Diamonde
चित्र साभार- गूगल
कुणाल के जाने के पाँच मिनट बाद, अपने निर्धारित समय से बीस मिनट लेट, बस अहमदाबाद से चली। चलती बस में मैंने ड्रेस चेंज किया और सोने की कोशिश करने लगा। 
काफ़ी देर तक बस के अंदर की लाइट जलती रही थी। ज़रा भी रोशनी हो तो मुझे नींद नहीं आती है। मुझे हैरानी होती है उन लोगों पर जो लाइट जला कर सोते हैं। खजुराहो से लौटते समय बस में हुए भयानक अनुभव (पानी के बोतल का मुँह काट कर उसमें पेशाब करना पड़ा था, इस अनुभव का ज़िक्र ‘खजुराहो की खोज’ में मैंने विस्तार से किया है) के बाद अब मैं बस में बैठने से पहले काफ़ी कम पानी पीता हूँ। लेकिन चीज़ डोसा खाने की वजह से कंठ बहुत सूख रहा था। पानी पीने से बड़ा डर लग रहा था। बस कंठ को गीला करने के लिए एक घूँट पी लेता था। बड़ी देर बाद जब लाइट बंद हुई तो मैं सो पाया। अभी ठीक से सो भी नहीं पाया था कि आवाज़ आने लगी, “अभी दस मिनट के लिए बस यहाँ रुकेगी, जिनको फ़ारिग़ होना है, हो लें।” नीचे जाने जैसा लग नहीं रहा था, लेकिन सोचा हो आना ही सही रहेगा। फ़ारिग़ होने के बाद ढाबे के आगे लगी दूकान से एक दो चीज़ें ख़रीदी, एक पैकेट सिकंदर का मूँगफली, एक डब्ब हींग गोली (कुणाल का गैस ठीक करते-करते मुझे ख़ुद गैस बनने लगा था) और एक पैकेट रामलड्डू। 
सारा सामान लेकर हम बस के अंदर आ गाए। बाहर से आने के बाद अंदर बड़ी गर्मी लगने लगी। मैंने बाहर वाला शीशा खोल दिया। पाँच मिनट बाद बस चलने गई। ठंडी हवा सनसनाते हुए चेहरे पर लग रही थी। डोलते-डोलते कब नींद आ गयी पता ही न चला। सुबह जब आँख खुली तो पाया ठंड की वजह से नाक बंद हो गयी और बालों पर धूल की एक परत जमी हुई थी। मोबाइल में समय देखा 6:30, मतलब माधोपुर आने में अभी एक घंटा और लगना था। दस मिनट तक फिर से सोने की असफल कोशिश करने के बाद उठ कर बैठ गया और किताब पढ़ने लगा। 7:15 बजे अपनी सीट से उतर कर संचालक की केबिन तक गया और उन्हें आगाह किया कि हमें माधोपुर ओशो आश्रम के सामने उतरना है। संचालक से मिल कर जब लौट रहा था तो अचानक मेरी निगाह एक यात्री पर अटक गयी। उनके चेहरे पर पसरे शांति को देख कर मुझे लगा संभवत वे एक सन्यासी हैं, और वे भी हमारे साथ ही उतरेंगे। स्टॉप आने पर मेरा यक़ीन सच सावित हुआ, वे हमारे साथ ही उतरे। बस से उतर कर जब मैं एक स्थानीय दुकानदार से राह पूछने लगा, तो वे मेरे पास आ गए और मुझे गाइड करने लगे। बाद में जब वे क़दम-क़दम पर हमें गाइड करने लगे तो मजबूरन मुझे उन्हें बताना पड़ा कि मैं पहले भी एक बार यहाँ आ चुका हूँ, हालाँकि मैं उनके मदद करने की भावना को ठेस नहीं पहुँचना चाहता था। 
बस स्टॉप से आश्रम की दूरी बस एक मिनट की है। सुबह-सुबह वेल्कम-सेंटर बंद था। पूछने पर पता चला कि वेल्कम प्रवचन के बाद खुलेगा। फिर याद आया कि last टाइम जब हम आए थे, तब भी ऐसा ही हुआ था। हमने वेल्कम के बाहर सामान रख दिया और वहीं पास बने बाथरूम में फ़्रेश होने के लिए चले गए। नित्यक्रिया से निवृत होने के बाद हम किचन में नाश्ता करने गए। हालाँकि प्रवचन के लिए हम लेट हो रहे थे। सुबह के प्रवचन का टाइम 8:30 है। नियम से नाश्ता हमें प्रवचन से लौट कर आने के बाद करना चाहिए था। लेकिन पिछली बार के अनुभव के बाद मैं सुबह के प्रवच में जाने के बहुत पक्ष में नहीं था। पिछली बार 2015 में जब हम सत्यम स्वामी के साथ आए थे, तो बस ने हमें ठीक अपने ठीक समय पर 7:30 बजे छोड़ दिया था। (इस बार बस 20 मिनट लेट चली थी, सो पहुँचने में भी आधा घंटा देर से पहुँची। ) प्रवचन के समय से पहले हम तैयार हो गए थे। भगवान (स्वामी ब्रह्म वेदांत जी) के आने से पहले हम बुद्ध हॉल में पहुँच गए थे। लेकिन जैसे ही प्रवचन शुरू हुआ मुझे भयंकर नींद आने लगी। पूरा समय नींद से लड़ने में ही गुज़र गया था। इस बार भी मुझे पता था, ऐसा ही होने वाला था। इसीलिए नाश्ते को टालना मैंने उचित नहीं समझा। नाश्ता करने के बाद जब प्रवचन के लिए निकले तो घड़ी में 9 बज रहा था।

At माधवपुर
किचन से निकल कर जब बुद्ध हॉल की तरफ़ जा रहा था, तो रास्ते में एक जगह सही राह पहचानने में दिक़्क़त होने लगी। लेकिन थोड़े से शुरुआती स्ट्रगल के बाद पुरानी सारी यादें फिर से ताज़ा हो गई। रास्ते में जब एक जन से पूछा कि प्रवचन कहाँ चल रहा है, तो रास्ता बताते हुए उसने कहा, “लेकिन आप जब तक पहुँचेंगे तब तक प्रवचन समाप्त हो चुका होगा।” और हुआ भी ऐसा ही। हमारे पहुँचने के एक मिनट बाद ही प्रवचन समाप्त हो गया। तीन साल में भगवान में कुछ ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा था। इन फ़ैक्ट मैं बड़ा हैरान हुआ यह देख कर कि पिछले तीन साल में आश्रम में कुछ भी नहीं बदला था। 
बुद्ध सभागार से जब हम लौट कर आए, तो वेल्कम सेंटर खुल गया था। पवन स्वामी भी तीन साल में बिलकुल भी नहीं बदले थे। एंट्री करने के बाद जब पहचान पत्र देने की बारी आई, तो मैं अपनी फ़ोटो कॉपी न करा पाने की असमर्थता की दास्ताँ उनको सुनाई। मेरी कहानी सुनकर उन्होंने बड़े ही सहज भाव से मुझसे कहा, “कोई नहीं, वहाँ नहीं हो पाया तो यहाँ हो जाएगा, दिन में यहाँ करा लीजिएगा।” 
रजिस्ट्रेशन के बाद हम अपना बिस्तर लेकर अपने कमरे में आ गए। नींद इतनी आ रही थी कि दोपहर, 12:30, के प्रवचन में भी नहीं जा पाया। 1:45 पर खाना खाने गया। किचन में भी सब कुछ वैसा-का-वैसा था। खाने बाद हम थोड़ी देर तक टहलते रहे, फिर कमरे पर आ गए। रास्ते में किसी ने बताया शाम में 5:30 स्टडी होता है। सो, स्टडी में जाने का तय करके फिर से सो गए। 
सुबह जिस सभागार में प्रवचन हुआ था, स्टडी उसी में होना। हम समय से 10 मिनट पहले ही पहुँच गए थे। धीरे-धीरे पूरा हॉल भर गया। कुछ मित्र अपने साथ किताब लेकर आए थे। ठीक 5:30 पर भगवान की पोती आई, और सामने रखे माईक के पास बैठ गयी। थोड़ी देर बाद एक और महानुभाव आए और दूसरी माइक के पास बैठ गए। दोनो ने अपनी-अपनी किताबें खोली। पहले भगवान की पोती ने अपनी किताब में से एक लाइन अंग्रेज़ी में पढ़ा, फिर सामने वाले महानुभाव ने उसका गुजराती अनुवाद किया और साथ ही उसकी व्याख्या भी की। मुझे स्टडी का यह तरीक़ा बहुत ही सतही और अनावश्यक लगा। 
गुरजेईफ को समझने का यह तरीक़ा देख कर मुझे पी.D ओस्पेनसकी की याद आ गई, वे भी गुरजेईफ से अलग होने के बाद श्यामपट पर लोगों को सत्य समझाते थे। यह बहुत ही कुरूप था। 
स्टडी के तुरंत बाद, भगवान के घर पर ‘संगीत’ होने वाला था। सब लोग सभागार से उठ कर वहीं चले गए। 
भगवान को गाते हुए सुनना एक चमत्कार को अपनी आँखों के सामने घटते हुए देखना है। यह एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में नहीं समेटा जा सकता है। वो कान, कान नहीं है जिसने ब्रह्म वेदांत जी को गाते हुए नहीं सुना है। 
भगवान को मोबाइल पर बात करते हुए देख कर मैं बड़ा रोमांचित हो उठा था। सोचने लगा, क्या बुद्ध (गौतम बुद्ध) ने कभी इस बात की परिकल्पना की होगी कि भविष्य में कोई बुद्ध इस तरह से मोबाइल पर बात कर रहा होगा??

At माधवपुर

Thursday, 6 September 2018

उन लोगों में बाँट दीजिए, जो आज भूखें हैं

अर्थ(धन) की दृष्टि से मनुष्य के तीन प्रकार हैं-
अमीर- अमीरी का कोई भी संबंध इस बात से नहीं है कि आपके पास कितना है| अमीरी का संबंध खर्च करने की क्षमता से है| अगर आप महीने में एक लाख कमाते हैं, और पूरा का पूरा खर्च कर देते हैं, कल के लिए कुछ भी बचा कर नहीं रखते हैं,तो आप अमीर है| आमतौर पर धन के बढ़ने के साथ ही लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो जाती है.. मतलब जैसे-जैसे धन बढ़ता है, वैसे-वैसे धन को खर्च करने की क्षमता कम होने लगती है| अमीर कल की चिंता नहीं करता है, उसकी आमदनी और खर्च दोनों सम्यक होता है, एक सामंजस्य होता है| वह जितना कमाता है, उतना खर्च कर देता है.. कल के लिए कुछ भी बचा कर नहीं रखता है| अगर वह पाता है, उसे आज जितने की जरूरत है, उससे ज्यादा उसके पास है, तो वह अपने अतिरिक्त धन को उन लोगों में बाँट देता है, जिनके पास नहीं है| कल के लिखे वह कुछ भी बचा कर नहीं रखता है|
"आई मौज फकीर की , दिया झोपड़ा फूंक"
गरीब- गरीब वह इंसान होता है- जिसकी खर्च करने की क्षमता क़रीब-क़रीब खत्म हो चुकी है| गरीब आदमी अगर एक लाख रुपया कमेगा, तो वह दस हज़ार खर्च करेगा और 90 हज़ार बचा कर रख लेगा| इन्हीं लोगों की वजह से दुनियां में हजारों लोग भूखे मर रहे हैं| लाखों लोगों के आज को बर्बाद करके गरीब अपने कल को सुरक्षित रखते हैं|


"धन इकठ्ठा करना पाप है| आज अगर आपके पास ज़रूरत से ज्यादा है, तो उसे कल के लिए मत बचाइये, उन लोगों में बाँट दीजिए, जो आज भूखें हैं|"

मंदबुद्धि- ये वे लोग हैं जो एक लाख कमाते हैं, और सवा लाख खर्च करते हैं| मतलब 25 हज़ार का कर्जा कर लेते हैं| जितना नुकसान गरीब समाज को पहुंचता है, उतना ही ये लोग भी पहुंचाते हैं| इसीलिए कभी किसी को कर्ज न दें, कर्ज देना और लेना दोनों पाप है| अगर आपके पास अधिक हैं तो उनके साथ शेयर करें जिनके पास नहीं है... कर्ज देकर कभी किसी की मदद न करें.. अमीर आदमी न तो कभी किसी से कर्ज लेता है, और न ही कभी किसी को कर्ज देता है...! वह सिर्फ बांटना जानता है.. सिर्फ गरीब लोग कर्ज देते हैं... और मंदबुद्धि कर्ज लेते हैं...


ज़रूरत से ज्यादा कुछ भी पाप है

इस संसार को मैंने जैसा पाया है, जाते-जाते इसे उससे थोड़ा और सुंदर करके जाना चाहता हूँ| इस प्रयास में कुछ चीजें जो मैं कर रहा हूँ, उसकी जानकारी आपको देना चाहता हूँ...शायद आपके किसी काम आजाए...!
1. जनसंख्या वृद्धि में मैं किसी भी प्रकार का कोई सहयोग नहीं कर रहा हूँ| मेरा ऐसा मानना है कि अगले बीस साल तक इस दुनिया में एक भी बच्चा पैदा नहीं होना चाहिए|  जार्ज गुरजिएफ  ने पाप की परिभाषा देते हुए कहा है, "ज़रूरत से ज्यादा कुछ भी पाप है"| इस हिसाब से आज 'बच्चा पैदा करने से बड़ा पाप और कोई भी नहीं है'| विश्व की जनसंख्या 1 अरब से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और अभी यह संख्या 10 अरब के क़रीब है| 

नोट- सब के माँ-बाप की तरह मेरे माता-पिता की भी यह ख्वाहिश है कि वे मरने से पहले अपने पोते/पोती का मुंह देख लें, लेकिन विश्व हित का ध्यान रखते हुए मैं उनकी यह ख्वाहिश कभी पूरा नहीं करूँगा| 

2. जनसंख्या के बाद जो सबसे अहम् चीज़ है, वह है 'पर्यावरण'| कहीं आने-जाने के लिए मैं 'साइकल' या पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करता हूँ| मेरे घर में न तो AC है, न ही टीवी, फ्रिज़, और वाशिंग मशीन है| साल के किसी भी महीने में मेरा बिजली बिल 300 से ज्यादा नहीं आता है|

3. सरकार ने आज प्लास्टिक बंद किया है, लेकिन मैं पिछले 4 साल से घर से छोला लेकर सामान खरीदने जाता हूँ|
4. फिलहाल मैं किराये के मकान में रह रहा हूँ, और संभवतः हमेशा किराए के मकान में ही रहूँगा| लेकिन यदि कभी अपना घर बनाया, तो मेरा घर आम के पेड़ से ऊँचा नहीं होगा| मेरे घर में टाइल्स नहीं होगा, अनावश्यक लकड़ी का फर्नीचर नहीं होगा| अभी जिस घर में रह रहा हूँ, उसमे भी फर्नीचर के नाम पर चार कुर्सियां हैं बस| जमीन पर चटाई बिछा कर सोता हूँ|
5. पिछले दो साल से मैंने कपड़े की ख़रीदारी क़रीब-क़रीब बंद कर दिया है| एक जींस बनाने में हजारों लीटर पानी लगता है| जल्द ही मेरे पास सिर्फ दो जोड़ी कपड़े होंगे, जब तक फट नहीं जाता दूसरा नहीं लूँगा|
6. पिछले तीन साल से वृक्षारोपण कर रहा हूँ| पिछले साल ख़ुद के पैसे से हमने अपने शहर में कोई 100 पेड़ लगाए थे| इस साल भी इस दिशा में प्रयास जारी है| 'i do my bit' के नाम से पिछले दो साल से हम वृक्षारोपण अभियान में सक्रीय हैं|
7. मेरी आर्थिक स्थिति बहुत ही अच्छी है, 30 से 50 हज़ार रूपया हर महीने घर बैठे-बैठे बड़े आराम से कमा लेता हूँ| (जिस शहर में मैं रहता हूँ वहां के लिए तीस हजार रुपया बहुत होता है, जैसा घर आपको यहाँ 4 हजार में मिल जाता है, वैसा आपको दिल्ली मुंबई में 2 लाख में भी नहीं मिलेगा) एसी, कार, टीवी, फ्रिज, बाइक, और वाशिंग मशीन सब अफ़्फोर्ड कर सकता हूँ| लेकिन अपनी कमाई का 70% मैं किताब और घूमने में खर्च करता हूँ| सेविंग क़रीब-क़रीब जीरो है.. सेविंग के नाम पर हर महीने 5 हज़ार बचाता हूँ| साल के अंत में जब ६०००० इकठ्ठा जो जाता है, तब एक लंबी छुट्टी पर निकल जाता हूँ| एकाध महीने में साकिम बन कर लौट आता है| कोई LIC नहीं है, मेडिकल इंश्योरेंस नहीं है| यह सब आपको इसलिए बताया ताकि आप यह समझ सकें कि 'इक्कट्ठा करने की प्रवृति' और जरूरत से ज्यादा कमाना पाप है| आपको शायद इल्म नहीं होगा कि अपने भविष्य को सुरक्षित करने के चक्कर में आप कितने लोगों को भूखे मार रहे हैं|
9. उपवास नहीं करता हूँ, लेकिन पहले जितना खाता था, अब उसके आधे से भी कम खाता हूँ| उम्मीद करता हूँ कि जितना अन्न मैं बचा रहा हूँ, उससे किसी का पेट भर रहा होगा|
10. यह मेरा अजीब सा नाम इस बात का सूचक है कि मैं जाति, धर्म और क्षेत्रवाद की सीमाओं से खुद को तोड़ देना चाहता हूँ| मेरा नाम से न तो आप मेरे जाति का पता लगा सकते हैं, और न ही मेरे धर्म का|
11- अंतिम बात- अपनी जीवन संगनी का चुनाव मैंने अपनी मर्ज़ी से किया था| और मेरी मर्ज़ी जाति, धर्म, क्षेत्र, देश और दहेज की लोभ से मुक्त थी| 

नोट- यहाँ भी मेरे पिताजी और माँ की इच्छा थी कि मैं उस्न्की मर्जी से 'शरीक-ए-हयात' का चुनाव करूँ, वे भी चाहते थे कि उनको दहेज़ मिले| मैं एक ऐसे खानदान से ताल्लुक रखता हूँ जहाँ मुर्ख और पढ़े लिखे सब समान है| मैंने अपने खानदान के डॉक्टर, इंजीनियर,CA, BA MBA, गवर्नमेंट जॉब वाले, प्राइवेट जॉब वाले, भैस चराने वाले और अनपढ़-मुर्ख सबको दहेज लेकर शादी करते हुए देखा है| ऐसे में बिना दहेज़ लिए और अपनी मर्ज़ी से 'पार्टनर' का चुनाव करना मेरे लिए कतई आसान नहीं था| 

जा जा रे अपने मंदिरवा

दोपहर के साढ़े तीन बजने वाले हैं। फ़िल्टर कॉफ़ी के साथ अपने राइटिंग टेबल पर आ गया हूँ। लैपटॉप के स्पीकर पर रवि शंकर सितार बजा रहे हैं। १९५८ ...