मुझे याद है, बचपन में जब कभी बहुत देर बाद किताब पढ़ कर उठता था, या फिर लंबे समय तक बंद कमरे में बैठकर फिल्म देखने के बाद बहार निकलता था, तो ऐसा लगता था मनो दुनिया एक दम से बदल गई हो | सब कुछ नया-नया और अजनबी-सा लगने लगता था| ऐसा लगता था मनो हर चीज़ को पहली बार देख रहा हूँ | धीरे-धीरे यह एहसास कम होने लगा, और बाद में कब मैं इसको पूरी तरह से भूल गया पता भी नहीं चला | इधर जब 2007 में जब ध्यान में बैठना शुरू किया तो फिर से वैसा ही घटित होने लगा| एक घंटे के झाजेन के बाद जब बहार निकलता था, तो बहुत देर तक खोया-खोया रहता था, ऐसा लगता था मनो सब कुछ बहुत धीरे-धीरे घटित हो रहा हो | धीरे-धीरे अनुभव में आया कि ऐसा तब होता है, जब हम किसी चीज़ में कुछ देर के लिए पूरी तरह से खो जाते हैं, और फिर जब उससे बहार निकलते हैं, तो सब कुछ बदला-बदला-सा प्रतीत होने लगता है| दोपहर में कभी यदि आपको गहरी नींद आ जाए, और आप एकदम से शाम में उठें, तो इस चीज़ को आप बहुत ही सघनता से महसूस कर सकते हैं | इन दिनों यात्रा से लौट कर आने के बाद भी मुझे कई दिनों तक ऐसा ही महसूस होता रहता है| जब से माधोपुर से आया हूँ, ऐसा लग रहा जैसे मैं किसी अजनबी लोक में टहल रहा हूँ, कुछ भी ठीक से समझ नहीं आ रहा है|
पृथ्वी थियेटर
अभी पीछे जब मुंबई गया था तो वहां पृथ्वी थियेटर के बुक शॉप से निर्मल वर्मा की एक किताब 'एक चिथड़ा सुख' खरीदा था| मुंबई में रहते हुए 90 पेज पढ़ा था, लेकिन यहाँ आकर जब आगे पढ़ना शुरू किया तो कुछ भी समझ में ही नहीं आ रहा था | 110 पेज तक जब कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा, तो फिर से शुरू किया| आज शाम में किताब खत्म किया है| भीतर सब कुछ ठहरा-ठहरा लग रहा है| दादा जी के मरने के बाद कई दिनों तक ऐसा ही महसूस होता रहा था, न सुख, न दुःख, बस एक उदास और रिक्त खालीपन | एक तरह की उदास शांति | सत्य कल्पना सा प्रतीत हो रहा है, और कल्पना सत्य जैसा|
"आगे इतनी संकरी जगह थी कि वहां से न सच गुज़र सकता था, न झूठ"
पृथ्वी थियेटर
कल (17, Sep 2018) सुबह 6:30 के क़रीब अहमदबाद पहुंचा | शिवरंजनी उतर कर BRT से रानिप आया| नित्य क्रिया से फारिग होने के बाद, कुणाल को कॉल किया| उस दिन जब हमें कुणाल बस में बिठाने आए थे, तब तय हुआ था कि माधोपुर से लौटने पर सुबह हम लोग 'शंभू' पर कॉफ़ी पिएंगे| जब मैंने कॉल किया, तब कुणाल ब्रश कर रहे थे, 'दस मिनट में पहुँचता हूँ' कह कर उन्होंने कॉल काट दिया| दस मिनट बाद जब उनका कॉल आया, तो उन्होंने हमें पांच मिनट के लिए बहार आने को कहा| मुझे यह समझ नहीं आया कि जब कॉफ़ी हाउस अंदर है, तो ख़ुद अन्दर आने के वजाए वो हमें बहार क्यों बुला रहे हैं| खैर, हम समान उठा कर बाहर आ गए| बहार आया तो दूर से देखा कि कुणाल एक खंभे के नीचे तीन गिलास निकाल कर उसमे बोतल से कुछ डाल रहे हैं| 'ससुर, ये क्या नौटंकी है', मैंने सोचा | जब पास पहुंचा तो देखा, वो घर से गुनगुने पानी में शहद और नींबू मिला कर लाए थे| यह बहुत ही सुन्दर सरप्राइज था| वहीं खंभे के नीचे बैठ कर हमने नींबू पानी पिया |
नींबू पानी पीने के बाद हम कॉफ़ी पीने के लिए अन्दर आ गए| हमारे उम्मीद के विपरीत 'शम्भू-24' बंद था| बड़ा गुस्सा आया, 'फिर 24 hrs लिखने का क्या मतलब है? दिये गए नंबर पर हमने कॉल भी किया लेकिन किसी ने रिंग का जवाब नहीं दिया| गूगल की मदद से आसपास दूसरा कॉफ़ी हाउस ढूंढन शुरू किया, लेकिन कोई भी 9:30 से पहले ओपन नहीं हो रहा था| इतना लम्बा इंतजार मुश्किल था| बड़ी देर तक हम शम्भू के ओपन होने का इंतजार करते रहे, लेकिन 9 बजे तक शम्भू वाले का कभी कोई अता-पता नहीं था| अंत में हम बिना कॉफ़ी पिए ही 9:10 बस में बैठ गए| खुश था कि सुबह-सुबह नीबू-शहद मिला हुआ गुनगुना पानी पीने को मिला, उदास था कॉफ़ी पीने को नहीं मिला| बस में बैठते के साथ ही मैं बैग से किताब (एक चिथड़ा सुख) निकाल कर पढ़ने लगा|
"कुछ लोग अपने अकेलेपन में काफी सम्पूर्ण दिखाई देते हैं- उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत महसूस नहीं होती| किन्तु बिट्टी में कोई ऐसा मुक म्मिलपन नहीं दिखाई देता था|- वह जैसे कहीं बीच रस्ते में 'ठिठकी-सी' दिखाई देती थी, जबकि दूसरे लोग आगे बढ़ गए हों| बीच में जो लोग ठहर जाते हैं, उनमे अकेलापन उतना नहीं, जितना अधूरापन दिखाई देता है|" क्या मैं भी कॉफ़ी के बिना अधूरा हो गया था?
रीडिंग 'एक चिथड़ा सुख' @ माधोपुर
कुछ समझ नहीं आ रहा है, कुछ से कुछ लिख रहा हूँ| अभी-अभी निर्मल वर्मा की चार और किताब की आर्डर दी है| ऐसे में ग़ालिब याद आ रहे हैं 'बक रहा हूँ जुनूं में क्या-क्या कुछ, कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई' विचारों की गति इतनी धीमी हो गई है कि कुछ भी ठीक से सोच नहीं पा रहा हूँ| नियम से जब इस तरह का कोई भाव भीतर पैदा हो तो उसे पहले जी लेना चाहिए, ऐसे में लिखने की जल्दी करना बेवकूफी है| लेकिन फिर सोचता हूँ अगर कहीं सच में सिफर हो गया तो लिखेगा कौन? इसीलिए जो भी समझ में आ राह है, अनापसनाप लिख दे रहा हूँ| क्या पता इस शून्य से कभी बहार ही न निकल पाऊं | भागते भूत की लंगोट ही सही|
किताब की शुरुआत निर्मल कामू की एक कोट से करते हैं,
"There is always a part of man that refuses love. It is the part that wants to die. It is the part which needs to be forgive."
और किताब के अंत में कहीं कहते हैं, "उसको रह-रहकर बाबू की बात याद हो आती- बिट्टी की ज़िन्दगी में दखल मत देना; वहां ऐसे रहना, जैसे तुम हो ही नहीं| होकर भी नहीं होना, पिछले तीन महीनो में उसने यह सीखा है, कोशिश की है कि अपने को एक सिफर में बदल डाले, उस बंद घड़ी की सुई की तरह, जो एक जगह ठहर जाति है; हिलाओ तो भी नहीं हिलती| "
जैसे ही मैं यह लाइन पढ़ता हूँ मुझे Max Ehrmann की Desiderata याद आ जाती है|
Go placidly amid the noise and haste,
and remember what peace there may be in silence.
निर्मल को पढ़ना मृत्यु को जीने जैसा है| किताब समाप्त होने के बाद कुछ, जो आपके भीतर था, हमेशा के लिए मर जाता है| आप थोड़े रिक्त हो जाते हैं| इस रिक्ता को भरने का कोई उपाय नहीं है| शायद मृत्यु के अतरिक्त और कुछ इसे नहीं भर सकता है|
"एक लम्बी नोटबुक, जिसे माँ ने उसे बारहवीं वर्षगांठ पर दी थी | पहले पन्ने पर लिखा था- 'Write what you see, but what you see may not be right.' यह शायद उन्होंने हंसी में लिखा था, क्योंकि देखना गलत कैसे हो सकता है? तुम देखे को न समझो, यह बात दूसरी है, लेकिन एक बार देख लेने पर दुनिया एक कीड़े की तरह सुई की नोंक पर बिंध जाती है, तिलमिलाती है, लेकिन कोई उसे छुड़ा नहीं सकता| देखना तभी खत्म होता है, जब मरना होता है, और मरने पर भी आँखे खुली रहती हैं- जैसे माँ की आँखें थीं - कांच के दो कंचे- जिन पर दुनिया एक पथराई छाया की तरह चिपकी रहती है..." - एक चिथड़ा सुख





Reading this post was like going through spiritual experience.
ReplyDeleteSo meditative.
शुक्रिया :)
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