Wednesday, 26 September 2018

मैं कौन हूँ, ये कहाँ हूँ मैं... ???

#सन्यास'- 5
जब माँ धर्मज्योति ने कहा कि रोब और माला पहनना अब अनिवार्य नहीं है, तो मैं बड़ा उदास हो गया| जिस चीज़ के लिए सन्यास लिया था, उसी चीज़ को गैर-ज़रूरी बता दिया| सोचा था रोब पहनकर घर आऊंगा, लोग देखकर चौंकेंगे, खूब नौटंकी होगी, मजा आएगा| लेकिन, सब उल्टा हो गया|
घर आकर मैं बड़ा दुखी हो गया| रास्ते भर यही सोचता रहा था कि 'ऐसे सन्यास का क्या फायदा जिसका किसी को पता ही नहीं चलेगा'| नियम के नाम पर बस रोज़ एक घंटा ध्यान करने के लिए कहा गया था| -यह भी कोई नियम हुआ, एक घंटा ध्यान करो, ये तो ऐसे ही कर लेता, इसके लिए सन्यासी बनने की क्या ज़रूर थी| 'नाम भी कितना अजीब दिया 'स्वामी ध्यान विराम'..हुंह...| नाम सुनकर मुझे एकदम मजा नहीं आ रहा था| सोचा था कोई भारी भरकम नाम मिलेगा 'स्वामी चैतन्य कृति, ध्यान मुहम्मद, ऐसा कुछ बड़ा-सा, यह क्या पिद्दी नाम दे दिया 'ध्यान विराम'| बिना मतलब रोब में तीन सौ रुपया और खर्च करवा दिया, अरे जब रोब था ही तो नया खरीदवाने की क्या ज़रूरत थी? और ऐसा क्या है इस माला में जिसका सौ रुपया ले लिया....
घर आकर मैंने ध्यान-व्यान कुछ भी नहीं किया-कितना डरा हुआ, कितना कुछ सोचा था, और हुआ क्या? एक बस नाम का सन्यास...!! यह एकदम खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसा मामला था| एक-दो दिन में मैं सन्यास-वन्यास सब भूल-भालकर अपनी रूटीन लाइफ में व्यस्त हो गया| सब कुछ पहले की तरह चलने लगा|
एक सप्ताह बाद, एक शाम मैं अपने इंस्टीट्यूट से घर जा रहा था| राह चलते हुए अचानक मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मैं अपने शरीर से अलग हूँ| एक बहुत ही अनूठे ढंग से पूरे शरीर का बोध होने लगा| ऐसा पहले कभी कुछ नहीं हुआ था| घर पहुंचे-पहुँचते एक और नई चीज़ घटने लगी| सब कुछ अजनबी-सा लगने लगा- मैं कौन हूँ, ये कहाँ हूँ मैं, कौन हैं ये लोग, क्या है यह सब, यहाँ आने से पहले मैं कहाँ था... ??? इस तरह के कई सवाल भीतर उठने लगे| भाई को देखा तो ऐसा लगा जैसे पहली बार इसे देख रहा हूँ, एकदम अजनबी लग रहा था भाई| बड़ी देर तक यह सब खेल चलता रहा| ऐसा लग रहा था जैसे शरीर बहुत ही नाज़ुक हो गया हो| इस तरह से शारीर का कभी पता नहीं चला था|
खाना खाकर मैं सोने के लिए छत पर चला गया| बिस्तर पर लेटा, लेकिन नींद नहीं आ रही थी, शरीर में बड़ी बेचैनी हो रही थी| मैंने सारे कपड़े उतार दिए और बिस्तर पर लेट कर सांस को देखने लगा (सांस को देखने का ध्यान प्रयोग आश्रम में सीखा था)| थोड़ी देर बाद, ऐसा लगने लगा जैसे मैं शरीर से बहुत दूर हूँ और शरीर को देख रहा हूँ, सांसें अपने आप आ और जा रही है| फिर तो ऐसा लगने कि यदि अभी मैं उठ कर खड़ा हुआ तो मैं उठ जाऊँगा और शरीर पड़ा रह जाएगा| थोड़ा डर भी लगने लगा| बड़ी देर तक यही सब चलता रहा, फिर कब नींद आ गई पता नहीं चला|

अगली सुबह जब आँख खुली तो सब कुछ नार्मल था| बस हृदय में ठंडा-ठंडा लग रहा था| दिन भर इंस्टीट्यूट में काम करता रहा| शाम में किसी काम से कैफ़े गया| इंस्टीट्यूट के पास ही कैफ़े था, एक घंटा का दस रुपया लगता था| सन्यास लेने से पहले से www.oshoworld.com पर जा कर कुछ-कुछ देखता रहता था| डिस्कोर्स वाले टैब पर जब भी click करता था तो प्रवचनों का लिस्ट आता था| जब उन पर click करता था तो एक औरत गाना गाने लगती थी| सोचता था-पता नहीं प्रवचन के नाम पर इन लोगों ने गाना क्यों डाल रखा है| उस दिन भी किसी अंतर प्रेरणा से मैं वेबसाइट पर गया और प्रवचन पर click किया, फिर से उसी औरत की आवाज़ आई..कुछ सेकेंड सुन कर मैंने हैडफोन रख दिया और कैफ़े वाले से कुछ पूछने के लिए केबिन से बाहर आ गया| थोड़ी देर बाद जब लौटकर अपने केबिन में आया और हेडफोन उठाकर कान में लगाया, तो मैं हैरान रह गया ओशो बोल रहे थे| मैंने दूसरा प्रवचन प्ले करके देखा| फिर मुझे खेला समझ में आया, शुरू में एक स्त्री श्लोक को गाती थी, फिर ओशो बोलते थे|
कुछ प्रवचन डाउनलोड कर के अपने पैन ड्राइव में रख लिया| घर आकर खाना खाने के बाद PC में प्रवचन को डाल कर प्ले किया| बातें कुछ ज्यादा समझ में नहीं आती थी, लेकिन ओशो के आवाज़ की जादू में मैं खो जाता था| एक दो दिन बाद नेहरु प्लेस से एक छोटा सा 2 GB का MP3 प्लेअर 1300 में खरीद कर लाया| फिर तो कैफ़े से प्रवचन डाउनलोड करके लाता था, और दिन भर प्लेयर में डाल कर सुनता रहता था|

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