Monday, 24 September 2018

रात को भोर में बदलते हुए देखना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है


‘दिन’ मेरे लिए एक किताब की तरह है। और ऐसी किताब पढ़ने में मुझे बिलकुल भी मज़ा नहीं आता है, जिसके शुरू के और अंत के कुछ पृष्ठ ग़ायब हों। अभी दो दिन पहले किसी वजह से रात देर तक जगना पड़ा था। परिणामस्वरूप सुबह देर तक सोता रहा। उठने के बाद पूरे दिन एक अजीब प्रकार की बेचैनी से परेशान रहा। दिन, दिन जैसा नहीं लग रहा था, ऐसा लग रहा था मानो किसी अजनबी को जी रहा हूँ। जब भी सूरज के उगने से पहले नहीं उठ पाता हूँ, ऐसा ही फ़ील होता है। 
सुबह सूरज के उगने से पहले का जो समय है-भोर, वह मेरा सबसे ज़्यादा पसंदीदा समय है। वह किताब का मुख्य पृष्ठ है। सूर्योदय पहला चैप्टर है, और सूर्यास्त अंतिम पृष्ठ। शाम अगर सूरज को डूबता हुआ न देख लूँ, तो ऐसा लगने लगता है जैसे किताब ख़त्म किए बिना ही सो रहा हूँ। 
दिन को अपनी आँखों के सामने जन्म लेते हुए देखना, इस अस्तित्व के सबसे बड़े करिश्मे का गवाह होना है। सुबह की सघन शांति में बालकनी में बैठ कर, रात को भोर में बदलते हुए देखना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।

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