Saturday, 22 September 2018

ये उम्र सन्यास लेने की है?

#सन्यास-2

उन दिनों मेरा छोटा भाई Saket Jha मेरे साथ ही रह रहा था । सन्यास लेना है जब तय हो गया, तो सफ़दरगंज से 1200 रुपये में मैं दो रोब ख़रीदकर ले आया, एक मैरून और एक सफ़ेद। जब रोब लेने गया था तो Vikas Choudhary मेरे साथ थे। वे भी मेरे साथ सन्यास लेना चाह रहे थे। लेकिन ऐन मौक़े पर उनकी बुद्धि खुल गई और वे पलट गए। साकेत बड़ा ख़ुश था, ‘अब ये रोब पहनेगा तो इसके सारे कपड़े मुझे मिल जाएँगे।’ मेरा दूसरा भाई Biplava Kumar Jhaथोड़ा चिंतित था। ख़ुद मुझ से कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन और लोगों को मुझे समझाने के लिए भेजता था। मैं पता नहीं कौन सी दुनिया में जी रहा था। कहाँ BCA करने के लिए दिल्ली आया था, और कहाँ ये सन्यासी होने जा रहा था। 

घर से जब आश्रम के लिए निकला तो मन में हज़ार तरह के द्वन्द और डर पैदा होने लगे। ‘पता नहीं आश्रम में कैसे लोग होंगे, मेरे साथ क्या करेंगे?’ सुन रखा था कि आश्रमों में जादू से लोगों भेड़-बकरी बना दिया जाता है। रास्ते में, मेरे बग़ल वाली सीट पर बैठी एक स्त्री ने मेरी अजीब सी सूरत देखकर मुझसे पूछा,”कहाँ जा रहे हो?” मैंने कहा, ‘सन्यास लेने।’ फिर तो पूरे रास्ते मुझे समझाती रही, ‘पागल हो गए हो क्या? ये उम्र सन्यास लेने की है? सम्मोहित कर देंगे तुमको वहाँ पर, पागल होकर लौटोगे वहाँ से।’ पता नहीं और क्या-क्या कहती रही मुझसे। 

आश्रम के गेट पर पहुँचते-पहुँचते मैं काफ़ी डर गया था। गेट पर पहुँच कर थोड़ी देर खड़ा रहा। एक मन कह रहा था, ‘अब भी मौक़ा है भाग लो यहाँ से।’ मुझे याद है काँपते हाथों से मैंने गेट पीटा था।

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